Submit your post

Follow Us

अमेरिका ने पाकिस्तान को दिए फ़ाइटर जेट, डील रोकने इंदिरा अमेरिका पहुंच गईं

आज है 27 जुलाई और इस तारीख का संबंध है प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अमेरिका दौरे से.

आज के परिदृश्य में अगर आपसे पूछा जाए कि भारत पर दुनिया के किस देश का सबसे अधिक असर है. तो आप बिना एक पल गंवाए जवाब देंगे ‘अमेरिका’. मैकडॉनल्ड हो या डॉनल्ड ट्रम्प. दोनों का ही भारत ने भव्य स्वागत किया है. इसी तरह हसन मिनाज़ हो या रसल पीटर्स. सत्य नडेला हो या सुंदर पिचाई. भारतीय मूल के लोगों ने जो पहचान अमेरिका में बनाई, वो शायद ही कहीं और बनाई हो.

लेकिन आज हम भारत और अमेरिका के रिश्तों में जो गर्मजोशी देखते हैं. ऐसे हालात हमेशा न थे. 1971 के अपने दूसरे अमेरिकी दौरे में इंदिरा गांधी को बहुत कड़वे अनुभव हुए थे. तब हेनरी किसिंजर सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट हुआ करते थे. 2010 में उन्होंने एक किताब के हवाले से बताया कि किस प्रकार निक्सन ने इंदिरा और भारतीयों के लिए नस्लभेदी टिप्पणी की थी. इसके बाद बांग्लादेश युद्ध के दौरान किस तरह अमेरिका ने अपनी नेवी फ्लीट को भारतीय महासागर में उतारा, और सोवियत संघ ने भारत की मदद की. इस बारे में आप सब जानते ही होंगे. रही सही कसर इमरजेंसी ने पूरी कर दी. इन सारी घटनाओं ने भारत-अमेरिका रिश्तों को एकदम रसातल पर पहुंचा दिया. कुल जमा ये कि यह भारत अमेरिकी रिश्तों का सबसे कठिन दौर था.

इंडिया इन 80’s 

1971 के दौरे के पूरे 11 साल बाद यानि 1982 में इंदिरा ने अमेरिका का एक और दौरा किया. 27 जुलाई 1982 को इंदिरा अमेरिका पहुंची थीं. तब तक भारत के हालात काफी बदल चुके थे. 14 जनवरी, 1980 को हुए आम चुनावों में जीतकर इंदिरा दुबारा सत्ता पर काबिज़ हो चुकी थीं.

उसके अगले साल यानि 1981 में दूरदर्शन ने पहली बार टेस्ट के तौर पर कलर टेलीकास्ट शुरू किया था. इसी साल इंफ़ोसिस की स्थापना भी हुई थी. और इसी के साथ शुरू हुआ था भारत में IT बूम. जिसके कारण आने वाले सालों में हजारों लाखों भारतीय अमेरिका गए. 1980 के पहले भी अमेरिका में भारतीयों की अच्छी खासी तादाद थी. लेकिन तब वो व्यापार और होटल बिजनेस में ज्यादा संलग्न थे. आंकड़ों के हिसाब से 1980 में अमेरिकी भारतीय करीब 15000 मोटल्स के मालिक थे, जो अमेरिका के कुल मोटल संख्या का करीब 28% था.

Untitled Design (6)
1971 के अमेरिका दौरे पर निक्सन और इंदिरा की मुलाक़ात (फाइल फोटो: Getty)

जुलाई1982में ही एक ऐसे शख्स का भी जन्म हुआ था,जिसने करीब38साल बाद जाकर अमेरिका में धूम मचाई.कौन था/थी ये शख्स?ये हम आपको अंत में बताएंगे.इन छोटेमोटे ट्रिविया के बाद आइये चलते हैं,इंदिरा के अमेरिका दौरे के किस्से पर.जिसके लिए हमें उस समय के वैश्विक हालत और अमेरिका की अंदरूनी राजनीति को जानना होगा. 1980के चुनावों को जीतकर फिल्मों में एक्टर रह चुके रॉनल्ड रीगन राष्ट्रपति बन चुके थे.फ्रैंक सिनात्रा अपने करियर के अंतिम वर्षों में थे,और माइकल जैक्सन की सबसे बड़ी एल्बम थ्रिलर रिलीज़ हो चुकी थी. 

रीगन इन वाइट हाउस 

20 जनवरी, 1981 को रीगन ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली. और रिपब्लिकन पार्टी सत्ता में आ गई. इसका सबसे पहला असर उनकी विदेश नीति पर देखने को मिला. रीगन की सबसे बड़ी प्रायोरिटी थी सोवियत रूस को रोकना. इसके लिए उन्होंने नई विदेश नीति बनाई. जिसका उद्देश्य था, दुनिया भर के देशों में सोवियत संघ के प्रभाव को काउंटर करना. जैसे सेंट्रल अमेरिका, अंगोला, साउथ ईस्ट एशिया और अफ़ग़ानिस्तान.

कोल्ड वॉर का एक नया फेज शुरू हो चुका था. दिसम्बर 1979 में सोवियत अफ़ग़ानिस्तान में एंट्री कर चुका था. ऐसे में अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते मजबूत करने की कोशिश शुरू कर दी थी. उसका प्लान था कि पाकिस्तान की मदद से अफ़ग़ानिस्तान में USSR को काउंटर किया जाए. इसी के चलते अमेरिकी संसद ने पाकिस्तान के साथ एक बड़ी आर्म्स डील को मंजूरी दी. जिसमें पाकिस्तान को 2.5 बिलियन डॉलर का रक्षा सहयोग और 40 F-16 फाइटर जेट शामिल थे. वैसे तो इस पूरे खेल में भारत की कोई बड़ी भूमिका नहीं थी. पर पाकिस्तान के साथ आर्म्स डील को लेकर वो चिंता में ज़रूर था.

आजादी से लेकर तब तक भारत नॉन एलाइनमेंट की नीति अपनाता रहा था. लेकिन अमेरिका में भारत की छवि ऐसी थी कि वो सोवियत का तरफदार है. कुछ हद तक ऐसा था भी. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत की एंट्री से भारत की हालत ‘खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा 12 आना’ जैसी हो गयी थी. अफ़ग़ानिस्तान में USSR की मौजूदगी को लेकर UN में भले ही भारत ने USSR का पक्ष लिया था. लेकिन ख़ैबर दर्रे पर रेड आर्मी की मौजूदगी भारत को रास नहीं आ रही थी.

Untitled Design (2)
1979 में सोवियत संघ की सेना ने अफगान सरकार की तरफ से मुजाहिदीनों के खिलाफ जंग लड़ी थी. (तस्वीर: Getty)

इसकी मुख्य वजह ये थी कि इस सिचुएशन में पाकिस्तान की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण हो गई थी. अनजाने ही उसके हाथ अलादीन का चिराग लग गया था. एक तरफ तो उसे अमेरिका की तरफ से डिफेंस डील मिल रही थी. और दूसरा इस डील की आड़ में वो भारत के लिए और खतरे पैदा कर सकता था. बांग्लादेश युद्ध की हार से वैसे ही वो खार खाया हुआ था.

इन हालातों में इंदिरा को समझ आ गया था कि बहुत दिन तक भारत सोवियत के भरोसे नहीं रह सकता. वो भी तब जबकि ये मुसीबत USSR के कारण ही आन पड़ी थी. इसके अलावा रक्षा मामलों में भी भारत सोवियत पर हथियारों के लिए निर्भर था. भारत को लगा कि बेहतर रक्षा तकनीक के लिए उसके पास और भी सोर्स होने चाहिए.
इसी के चलते इंडिया ने रक्षा खरीद में विस्तार करना शुरू किया. उसने ग्रेट ब्रिटेन से जैगुआर बॉम्बर जेट, फ़्रांस से मिराज़ और वेस्ट जर्मनी से सबमरीन की खरीद शुरू की . लेकिन उस समय रक्षा हथियारों में सबसे उन्नत तकनीक अमेरिका के पास थी. भारत सोच रहा था कि रक्षा और इकॉनमी के क्षेत्र में उन्नत अमेरिकी तकनीक हासिल की जानी चाहिए.
मुसीबत भी केवल यही नहीं थी. 1974 में ‘स्माइलिंग बुद्धा’ ऑपरेशन के तरह किए गए परमाणु परीक्षणों के बाद पश्चिमी देशों ने तारापुर न्यूक्लियर प्लांट में यूरेनियम की सप्लाई बंद कर दी थी. इस समस्या को सुलझाने के लिए भी अमेरिका की सहायता की जरूरत थी. दूसरा, भारत की IMF और वर्ल्ड बैंक पर निर्भरता बढ़ती जा रही थी. अमेरिका अपने इन्फ्लुएंस से लोन की शर्तों को और सख्त बना रहा था जिससे भारत की दिक्कतें बढ़ती जा रही थीं.

इस पूरे परिदृश्य में भारत के लिए जरूरी हो गया कि वो किसी भी तरह अमेरिका के साथ संबंध सुधारे. अमेरिका की विदेश नीति में भारत की कोई विशेष जगह नहीं थी. किन्तु वो भी चाहता था कि भारत पर USSR के इन्फ्लुऐंस को कम किया जाए.
इंदिरा के अमेरिकी दौरे से दोनों देश नेगोसियेशन की टेबल पर आए. हालांकि दोनों देशों के बीच की वार्ता में दो और देशों के संबंध आड़े आ रहे थे. USSR और पाकिस्तान. स्टेक्स बहुत ज्यादा और खेल बहुत इंटरेस्टिंग था.

गेम थ्योरी 

आइये इस सिनारियो को गेम थ्योरी से समझें. यूं गेम थ्योरी मैथ्स के बहुत से जटिल सूत्रों और ग्राफ्स से युक्त होती है. लेकिन आसानी के लिए हम यहां पर बहुत कम वेरिएबल्स से समझेंगे. खेल के नियम बहुत साधारण हैं. जो अपने हित की बात मनवा लेता उसको उतने अंक. अगर फायदे की बात तो पॉजिटिव अंक और घाटे की बात तो नेगेटिव अंक.
ऐसी स्थिति में जो मैट्रिक्स बनेगी वो इस तरह होगी.

Untitled Design (3)

अमेरिका के लिए सबसे फायदेमंद स्थिति तब होती,जब अमेरिका पाकिस्तान को सपोर्ट करे लेकिन भारत सोवियत का साथ न दे.लेकिन ये भारत के लिए सबसे घाटे की स्थिति होती.भारत के लिए सबसे बेहतर स्थिति होती अगर अमेरिका पाकिस्तान को सपोर्ट न करे.इस स्थिति में सोवियत को सपोर्ट करना या न करना,उसे कोई ख़ास फायदा या घाटा नहीं पहुंचाता.इसलिए उसकी रणनीति का एक ही दांव था.किसी भी तरह से अमेरिका पाकिस्तान को सपोर्ट ना करे.चाहे इसके लिए उसे सोवियत को सपोर्ट करना बंद भी करना पड़े. 

दूसरी तरफ़ अमेरिका के लिए सबसे बेहतर रणनीति थी कि वो किसी भी हालत में पाकिस्तान को सपोर्ट करे.क्योंकि हो सकता था कि पाकिस्तान को सपोर्ट करने में उसको पूरा फायदा न हो.पर अगर वो पाकिस्तान को सपोर्ट न करे तो बड़ा घाटा होने का रिस्क ज़रूर था. 

अमेरिका ने ऐसा किया भी.पाकिस्तान के लिए रक्षा डील इसी रणनीति का हिस्सा थी.अब बारी भारत की थी कि वो अमेरिका को अपने हितों के लिए कैसे मनाए.इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए इंदिरा ने शपथ लेने से पहले ही रीगन को एक ख़त भिजवाया.जिसमें लिखा था कि वो अमेरिका से अच्छे रिश्ते चाहती हैं और उनके मन में अमेरिका विरोधी भावनाएं नहीं हैं.

1981में इंदिरा ने दो हाई लेवल राजदूत भेजे ताकि वो पाकिस्तान के साथ आर्म्स डील के खिलाफ लॉबी कर सकें.लेकिन अमेरिका ने भारत की बातों को टालते हुए जवाब दिया कि पाकिस्तान को मिलनी वाली मदद ग्लोबल पीस के लिए है,जिससे भारत को कोई खतरा नहीं होगा. 

इंदिरा इन अमेरिका

इसी वार्ता का अगला पड़ाव था इंदिरा का अमेरिकी दौरा.उनकी आठ दिन की इस यात्रा को इंडिया टुडे ने नाम दियाऑपरेशन डीफ्रॉस्ट’.वो इसलिए कि रक्षा मामलों पर भले की भारत पाकिस्तान डील को नहीं रोक पाया.लेकिन इस दौरे ने अमेरिका और भारत के रिश्तों में जमी बर्फ़ को पिघलाने का काम ज़रूर किया.इंदिरा के एयरपोर्ट पर उतरने से पहले तक अमेरिका के मन में उनकी एक अलग छवि थी. 1971के दौरे पर अमेरिकी मीडिया ने उन्हें एक कम्युनिस्ट घमंडी महिला का नाम दिया था. 

लेकिन ये एक नई इंदिरा थीं.इस दौरे पर वो सभी से बहुत गर्म जोशी से मिलीं.राष्ट्रपति रीगन ने उनके स्वागत के लिए वाइट हाउस में एक डिनर रखवाया.दोनों के बीच पाकिस्तान समेत कई मामलों पर वार्ता हुई,जिनमें तारापुर प्लांट के लिए यूरेनियम की सप्लाई दुबारा चालू किए जाने की बात भी थी.इस मीटिंग में तय हुआ कि तारापुर प्लांट के लिए न्यूक्लियर फ़्यूल की सप्लाई फ़्रांस करेगा.

Untitled Design (4)
वाइट हाउस में रीगन और इंदिरा (तस्वीर: Getty)

इस मीटिंग के बाद उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स की. जिसमें उनसे बार-बार एक ही सवाल पूछा जा रहा था. सवाल था कि आखिर अमेरिका आने का उनका मकसद क्या है? इस पर इंदिरा ने जवाब दिया-

‘मुझे राष्ट्रपति रीगन ने आने का न्योता दिया और मुझे लगा कि न्योते को स्वीकार ना करना अशिष्टता होगी.’

उन्होंने आगे कहा,

‘मैं एक मिसकंसेप्शन दूर कर देना चाहती हूं कि भारत हमेशा केवल कुछ ना कुछ मांगता रहता है. जबकि सच ये है कि भारत के पास देने के लिए बहुत कुछ है. भारत एक बड़ा बाजार है और हम अमेरिकी कंपनियों को वहां निवेश के लिए आमंत्रित करते हैं. एक मिथ यह भी है कि भारत सोवियत के कैंप में हैं. हां! हमारी उनसे दोस्ती है, पर हम किसी कैंप में नहीं हैं. सोवियत से दोस्ती का यह मतलब नहीं कि भारत और देशों से दोस्ती नहीं रख सकता.’

अपनी खराब छवि के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया,

‘आप लोग मुझे आयरन लेडी कहते हैं लेकिन सच ये है कि मुझे खुद आयरन सप्लीमेंट की जरूरत पड़ती है.’

दौरे के अंतिम लेग में वो न्यू यॉर्क में एक गुरुद्वारे में गई. पूर्व रॉ ऑफिसर जी॰बी॰एस॰ सिंधु ने अपनी किताब ‘खालिस्तान कांस्पिरेसी’ में बताया है कि इस दौरान इंदिरा की जान को खतरा हो सकता था.

जब इंदिरा न्यू यॉर्क में भारतीय सिख कम्युनिटी से मिलने रिचमंड गुरुद्वारे पहुंचीं तो वहां काउंसिल ऑफ़ जनरल ऑफ़ खालिस्तान के कुछ मेम्बर मौजूद थे. कहते हैं वो इंदिरा को गोली मारने के इरादे से वहां आए थे. आखिरी समय में उन्होंने अपना इरादा इसलिए टाल दिया क्योंकि अगर वो ऐसा करते तो कनाडा और अमेरिका की सुरक्षा एजेंसीज़ उनके पूरे संगठन पर बैन लगा सकती थी. इसके बाद इंदिरा लॉस एंजेलिस और वहां से होनोलूलू होते हुए 1 सितम्बर को भारत लौट गईं.

पहले में हमने आपको एक ट्रिविया बताया था. कि जुलाई 1982 में एक ऐसे शख्स का जन्म हुआ था. जिसने 38 साल बाद अमेरिका जाकर धूम मचाई थी. उस शख्स का नाम है. प्रियंका चोपड़ा जोनस.


वीडियो देखें: कारगिल युद्ध से पहले की वो कहानी, जो कभी किसी फिल्म ने भी नहीं बताई होगी

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

जगह थी मुंबई एयरपोर्ट. अब दस साल बाद फिर से दोनों का नाम एक साथ सुर्ख़ियों में है.

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

अली का रोल करने वाले इंडियन एक्टर अनुपम त्रिपाठी का सलमान-शाहरुख़ कनेक्शन क्या है?

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

ईमानदारी से स्कोर भी बताते जाना. हम इंतज़ार करेंगे.

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.