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देश की गरीबी में महिलाएं कितनी बुरी तरह पिस रही हैं, इस डराने वाली रिपोर्ट में सामने आया

24 लाख 42 हज़ार 213 करोड़. ये भारत का बजट था. 2018-19 का. इससे ज्यादा प्रॉपर्टी देश के 63 अरबपतियों के पास है.

ये ऑक्सफैम इंटरनैशनल की ताज़ा रिपोर्ट कह रही है. इस रिपोर्ट के साथ ही लगातार तीन साल से अमीरों के और अमीर होने का सिलसिला जारी है. ज़ाहिर है गरीब और गरीब हुआ है. 2019 में इसी रिपोर्ट में सामने आया था कि देश के टॉप एक प्रतिशत अमीर हर दिन 2200 करोड़ कमाते हैं. 2018 में इसी रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत के एक प्रतिशत अमीरों के पास देश की 73 प्रतिशत संपत्ति है.

यानी अगर देश में 100 लोग रहते हैं. और देश के पास कुल 1000 रुपये हैं. तो उसमें से 730 रुपये एक ही आदमी के पास हैं. बचे हुए 270 रुपये बाकी के 99 लोगों में बंटे हैं. वो भी बराबर नहीं.

पहले नज़र डाल लेते हैं कि इस रिपोर्ट में क्या-क्या है-

– भारत की सबसे रईस एक प्रतिशत आबादी की संपत्ति में एक साल में 46 फीसद बढ़ी है. जबकि सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी की संपत्ति सिर्फ 3 प्रतिशत बढ़ी है.
– देश के टॉप एक प्रतिशत अमीरों को पास जितनी संपत्ति है, वो नीचे के 70 प्रतिशत यानी करीब 95 करोड़ लोगों की कुल प्रॉपर्टी से चार गुना ज्यादा है.
– ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी के पास देश की 74.3 फीसद दौलत है. और नीचे के 90 प्रतिशत लोगों के पास महज़ 25.7 फीसद.
– देश के जो सबसे अमीर नौ लोग हैं, उनके पास जितनी प्रॉपर्टी है वो सबसे गरीब 50 प्रतिशत लोगों की कुल प्रॉपर्टी के बराबर है.
– भारत की महिलाएं और लड़कियां हर दिन 3.26 अरब घंटे देखरेख का काम करती हैं. अर्थव्यवस्था में उनके योगदान को कीमत में आंका जाए तो यह सालाना 19 लाख करोड़ बैठेगा. यह भारत के वार्षिक शिक्षा बजट, जो कि 93 हज़ार करोड़ है, का चार गुना है.
– नौकरी करने वाली महिलाओं के प्रतिशत की बात करें तो केवल नौ देश ऐसे हैं जो भारत से नीचे हैं. वो नौ देश हैं- मिस्र, मोरक्को, सोमालिया, ईरान, अल्जीरिया, जॉर्डन, इराक, सीरिया और यमन.

ये रिपोर्ट कहती है,

‘दुनिया की सेक्सिस्ट अर्थव्यवस्थाएं आम जनता, खासकर गरीब महिलाओं और लड़कियों की कीमत पर अमीरों की जेब भर रही हैं.’

रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जाहिर की गई है कि पूरी दुनिया में संपत्ति के कुछ ही लोगों के हाथों तक सीमित होने का ट्रेंड बढ़ रहा है.

लेकिन इस साल की रिपोर्ट का फोकस है घरेलू औरतों पर. जो अपने घर संभालती हैं, परिवार का ख्याल रखती हैं. इस रिपोर्ट को ऑक्सफैम ने ‘टाइम टू केयर’ नाम दिया है.

काम करने वाली औरतें जिन्हें सैलरी नहीं मिलती

ये रिपोर्ट उन औरतों की स्थिति पर डिटेल में बात करती है जो घर की देखभाल, परिवारवालों का ख्याल रखने में अपनी उम्र खपा देती हैं लेकिन उन्हें उसका मेहनताना नहीं मिलता है. ये रिपोर्ट कहती है कि ये औरतें हमारी अर्थव्यवस्था को चलाने में सबसे ज़रूरी भूमिका निभाती हैं, इंजन का काम करती हैं. लेकिन इनके योगदान को पूरी तरह नकार दिया जाता है. उनके काम को काम ही नहीं समझा जाता. रिपोर्ट में लिखा है,

‘देखरेख का काम आवश्यक है. लेकिन परिवार के स्तर पर या GDP के स्तर पर इसकी उपेक्षा होती है. क्योंकि इसे ऐसा काम मान लिया जाता है जो प्रेम का कार्य है. और महिलाएं इसे संभाल ही लेंगी.’

ये रिपोर्ट इस बात पर भी ज़ोर देती है कि महिलाओं पर घरेलू काम का दबाव बेहद ज्यादा है. इस वजह से वो या तो कम घंटे का रोज़गार करने को मजबूर हैं या फिर उन्हें नौकरी ही छोड़नी पड़ जाती है. रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में ‘केयर टेकिंग’ के बोझ के चलते बेरोजगारी का प्रतिशत महिलाओं में 42 है, जबकि पुरुषों में यह मात्र छह प्रतिशत है.

ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर कहते हैं,

‘महिलाओं और लड़कियों को आज की आर्थिक व्यवस्था का लाभ बहुत कम मिलता है. वो खाना बनाने, सफाई करने और बुजुर्गों की देखरेख में अरबों घंटे लगाती हैं. उनकी वजह से ही हमारी अर्थव्यवस्था, बिजनेस और समाज के पहिये चलते रहते हैं. इन औरतों को पढ़ने या रोज़गार हासिल करने का पर्याप्त समय नहीं मिलता. इसके चलते वे अर्थव्यवस्था के निचले हिस्से में सिमट कर रह गई हैं.’

अर्थव्यवस्था में टॉप और बॉटम के बीच खाई कितनी गहरी है, ये समझने के लिए ऑक्सफैम ने एक उदाहरण भी दिया है-

टेक महिंद्रा के सीईओ सीपी गुरनानी एक साल में जितना कमाते हैं, वो कमाने में एक महिला घरेलूकर्मी को 22 हजार 277 साल लगेंगे. वह हर सेकंड 106 रुपये कमाते हैं, वो 10 मिनट में उतना कमा लेते हैं जितना एक घरेलू महिला सालभर में कमाती है.

छह साल से कम उम्र के बच्चों की देखभाल का जिम्मा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के पास होता है. उन्हें बदले में बेहद कम वेतन दिया जाता है.
छह साल से कम उम्र के बच्चों की देखभाल का जिम्मा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के पास होता है. उन्हें बदले में बेहद कम वेतन दिया जाता है.

और वो जो बेहद कम पैसों पर काम करने को मजबूर हैं

ये रिपोर्ट कहती है कि देखरेख के वो काम जिनके बदले भुगतान होता है उसमें भी महिलाओं की संख्या अधिक है. दो तिहाई. भारत के संदर्भ में देखें तो इनमें आते हैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, घरेलू कामों में हाथ बंटाने वाले लोग, बुजुर्गों और बच्चों की देखरेख के लिए रखे गए लोग वगैरह.  इन कामों में वेतन बेहद कम मिलता है. काम के घंटे तय नहीं होते और दूसरी नौकरियों की तरह अतिरिक्त सुविधाएं नहीं मिलती. इसके साथ ही इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जो परिवार सिर्फ महिला की कमाई पर निर्भर हैं, उनमें गरीबी ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक, एक ही तरह के काम के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम पैसे दिये जाते हैं.

इससे निपटने के लिए ऑक्सफैम ने सुझाव भी दिये हैं

– अगर देखरेख की अर्थव्यवस्था में GDP का दो प्रतिशत इनवेस्ट किया जाए तो इससे एक करोड़ 10 लाख नए रोज़गार पैदा हो सकते हैं.
– महिलाओं पर देखरेख के बोझ को कम करने के लिए जिस ढांचे की ज़रूरत है उसमें सरकार निवेश करे. पानी, साफ-सफाई, बिजली, बच्चों की देखरेख और स्वास्थ्य सेवाओं पर ज्यादा निवेश हो.
– पुरुषों को तीन महीने की पैटरनिटी लीव मिले, जिससे बच्चों के देखभाल की ज़िम्मेदारी को बांटा जा सके.

ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर ने यह भी कहा कि जो लोग पेरेंट्स, बच्चों या बीमार परिजन की देखरेख की जिम्मेदारी संभालते हैं उन्हें भी आजीविका मिलनी चाहिए.


अर्थात: नरेंद्र मोदी सरकार के लिए बजट 2020 क्यों गिरती GDP में सुधार का बड़ा और जरूरी मौका है?

 

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