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कसाब की फांसी का बदला थे 2011 के मुंबई बम धमाके?

आज है 13 जुलाई. इस तारीख़ का संबंध है मुम्बई से. वहां हुए बम धमाकों से. तारीख़: 13 जुलाई, 2011. समय: शाम के क़रीब पौने 7 बजे. जब एक के बाद हुए तीन बम धमाकों से मुम्बई दहल उठी. उसकी बात करेंगे, पहले BBC पर एक रिपोर्ट की बात करें.

चैप्टर 1: कसाब 

BBC की रिपोर्ट में लिखा था:

‘रिपोर्ट्स के अनुसार मुंबई बम धमाकों की तारीख़ वही है, जब मुहम्मद अजमल अमीर कसाब का जन्मदिन होता है’.

‘कसाब’, का नाम सुनकर सभी लोगों के दिमाग़ में एक दूसरी तारीख़ दौड़ गई.

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21 नवम्बर, 2012 को अज़मल क़साब को फांसी दे दी गई थी (तस्वीर: Getty)

दरअसल नहीं. हुआ कुछ यूं था कि विकिपीडिया में कसाब की बर्थडेट को बदल दिया गया था. ताकि इन बम धमाकों को बदले की कहानी के तौर पर प्रॉपगैंडाइज किया जा सके. इसीलिए BBC की इस रिपोर्ट को बाद में खुद BBC, और साथ में कुछ दूसरे सोर्सेस ने भी ख़ारिज कर दिया था.

चैप्टर 2: वारदात

राइटर और पोएट जैरी पिंटो अपनी नॉवल ‘एम एंड द बिग हूम’ में मुम्बई के लिए लिखते हैं,

‘इस शहर में, हर सुनसान कोना अपने अंदर एक भीड़ छुपाए है. दुनिया जैसी चलनी चाहिए, उस क्रम में अगर एक मिनट के लिए भी कुछ डिसरप्ट हो जाए, तो ये भीड़ आपको दिख जाती है. और जैसे ये भीड़ उजागर होती है, उतनी ही जल्दी ग़ायब हो जाती है’.

पहला धमाका-

ऐसी ही भीड़भाड़ वाली जगह है मुम्बई का ज़ावेरी बाज़ार. इस इलाक़े में सर्राफ़ा व्यापारियों और गहनों की दुकानें हैं. ये बाज़ार अपनी मारवाड़ी कचौड़ी और खूबसूरत कारीगरी वाले गहनों के लिए फ़ेमस है. बाज़ार के नज़दीक ही मुम्बई पुलिस का हेडक्वार्टर भी है. सबसे पहला धमाका, पौने सात बजे यहाँ एक धमाका हुआ. ये एक IED डिवाइस था जो एक मोटरसाईकल में रखा हुआ था.

एक चश्मदीद ने इस घटना का बयान कुछ यूं किया-

‘बहुत ज़ोर की आवाज़ हुई. पहले हमें लगा कि आग लग गई है. लेकिन आग के हिसाब से धुआं बहुत ज़्यादा था. फिर हमें समझ आया कि ये बम का धमाका था. क़रीब बीस लोग रोड पर गिरे पड़े थे. दो या तीन लोगों की शायद टांगे भी चली गई थी.’

दूसरा धमाका-

अब तक लोगों को अंदेशा हो चुका था कि ये ज़रूर कोई आतंकी हमला है. इस धमाके की खबर आई ही थी कि ठीक एक मिनट बाद दूसरा धमाका हुआ. वहां से कुछ मील दूर, ओपेरा हाउस के पास. अबकी बार एक टिफ़िन में बम रखा हुआ था.

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धामके के बाद के हालात का मुआयना करते हुए पुलिस (तस्वीर: Getty)

धमाके के बारे में बात करते हुए एक व्यक्ति ने बताया-

‘धमाका एकदम बाज़ार के बीचों-बीच हुआ. ये दुनिया का सबसे बड़ा हीरों का बाज़ार है. इस सड़क पर बहुत भीड़ रहती है. इतनी कि औरतें इस सड़क से गुजरने से बचती हैं. मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर, करोड़ों रुपए के हीरे सड़क पर बिखर गए होंगे. बारिश में बह गए होंगे. यहां सुरक्षा के भी कोई इंतज़ाम नहीं हैं. बाज़ार की मेन सड़क पर कोई भी घुस सकता है. मुझे लगता है आतंकी संगठनों के आकाओं के इस हीरों के बाज़ार में कोई निहित स्वार्थ थे. हालांकि इसके कोई पुख़्ता सबूत नहीं है’.

एक दूसरे चश्मदीद ने आंखों देखी बताते हुए कहा,

‘हमने एक ज़ोर का धमाका सुना. धमाका इतना तेज़ था कि आसपास की बिल्डिंग हिलने लगी और खिड़कियों के कांच टूट गए. ऐसा लगा जैसे कान के पर्दे फट गए हों. बाहर जाकर देखा तो चारों ओर काला धुआं था. सड़क पर लाशें बिछी थी. वहां बहुत खून था. कई लोगों की बाहों और टांगों के चिथड़े उड़ गए थे’.

तीसरा धमाका-

अब तक समझ आ चुका था कि ये सीरियल बम ब्लास्ट हैं. इसी कड़ी में तीसरा ब्लास्ट 7 बजकर 5 मिनट पर हुआ. दादर बस स्टैंड के पास एक चौराहे पर. इस जगह को कबूतर-खाना के नाम से जाना जाता है.

एक के बाद एक हुए तीन बम धमाकों ने पूरी मुम्बई को हिलाकर रख दिया. देश-विदेश से प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की तरफ़ से बयान आया:

‘इस संकट की घड़ी में अमेरिका के लोग भारत के साथ हैं. इस घृणित जुर्म के दोषियों को सजा दिलवाने में हम भारत सरकार को मदद पेश करते हैं. मुम्बई दौरे के दौरान मैंने अपनी आंखों से भारत के लोगों की जीवटता देखी है. मुझे कोई शंका नहीं कि भारत के लोग इन आतंकी हमलों के बाद दुबारा उठ खड़े होंगे’.

इस हमले से लोग बहुत ग़ुस्से में थे. अभी तक 2008 हमलों के आरोपी कसाब को सज़ा तक नहीं हुई थी और दुबारा इतना बड़ा आतंकी हमला हो चुका था.

चैप्टर 3: तहक़ीक़ात

सरकार एकदम से हरकत में आई. होम मिनस्ट्री की तरफ़ से NIA की तीन टीमें को जांच के लिए भेजा गया. ख़ास बात ये कि इस तहक़ीक़ात का पहला सुराग तो ये तारीख़ ही थी. 13. इस संख्या में कुछ ख़ास था. पिछले कुछ आतंकी हमलों की तारीख़ों में एक पैटर्न दिखाई देता था. ये ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ नाम के आतंकी ग्रुप का सिग्नेचर पैटर्न था. ये महीने की 13 या 26 तारीख़ को ही बम ब्लास्ट को अंजाम देते थे. 2008 में दिल्ली बम धमाकों की तारीख़ भी 13 ही थी. 13 सितम्बर. इसके अलावा इस घटना की दिल्ली बम धमाकों से और काफ़ी समानताएं थी. दोनों बम धमाके शाम के वक्त हुए थे. दोनों मौक़ों पर किसी भीड़भाड़ वाली जगह को चुना गया था. दोनों घटनाओं में IED डिवाइस का उपयोग किया गया था. और दोनों बार बम को किसी गाड़ी या कूड़े में छुपाकर रखा गया था.

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2011 से पहले भी कई आतंकी साज़िशों का मास्टरमाइंड रह चुका था यासीन मालिक.(तस्वीर: Getty)

9 अगस्त, 2011 को इस मामले में पुलिस ने पहली गिरफ़्तारी की. CCTV फुटेज में घटना के दिन एक संदिग्ध लंबे बालों वाले व्यक्ति को देखा गया. वो लाल रंग की होंडा एक्टिवा लेकर ज़ावेरी बाज़ार में घुसा. इसके बाद उसने स्कूटी को वहां पार्क कर दिया जहां धमाके हुए थे. ये होंडा एक्टिवा चोरी की थी.

23 जनवरी, 2012 को मुम्बई पुलिस ने इस केस को सॉल्व करने का दावा किया. पुलिस ने दो लोगों को गिरफ़्तार किया. नक़ी अहमद वसी शेख़ और नदीम अख़्तर अश्फ़ाक शेख़.

आगे के इन्वेस्टिगेशन से कुछ और खुलासे हुए. कुछ समय से वक्कास और तबरेज़ नाम के दो पाकिस्तानी बॉम्बर्स, बाइकुला में रह रहे थे. इनके पास से पुलिस को 18 सिम कार्ड और 6 हैंड्सेट बरामद हुए. इनको सिम कार्ड दिए थे, नकी अहमद ने. ATS के अनुसार घटना का मास्टरमाइंड यासीन भटकल था. जिसने लॉजिस्टिक्स आदि का इंतज़ाम किया था. यासीन भटकल डोमेस्टिक टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ का फ़ाउंडिंग मेम्बर था.

अगस्त, 2013 में यासीन भटकल को भारत-नेपाल बॉर्डर से पकड़ लिया गया. पूछताछ में यासीन भटकल ने स्वीकार किया की 2011 बम धमाकों की पूरी योजना उसी ने बनाई थी.

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19 दिसम्बर, 2016 को यासीन भटकल को हैदराबाद में NIA कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई.

इन बम धमाकों के चलते आगे चलकर भारत की आंतरिक सुरक्षा एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनी. आतंक विरोधी क़ानूनों में और सख़्ती लाई गई. सेटेलाइट फ़ोन के इंफ़्रास्ट्रक्चर को लेकर पाबंदियां बढ़ा दी गई. और शहर में CCTV के नेटवर्क को भी बढ़ाया गया.

मुम्बई तो ख़ैर किसके लिए रुकी है. अगले कुछ रोज़ में फिर चल पड़ी. किसी मेहनतकश औरत की तरह. जो अपने बच्चों को साथ लेकर चलती है. तूफ़ान आ जाए या कड़ी धूप हो. कुछ देर इंतज़ार करके फिर चलना शुरू कर देती है. एक ऐसा सफ़र, जो दिन-रात चलता जाता है.

एपिलॉग- 

अब आप कहेंगे आतंकियों ने लोगों को मार डाला. ये तो उनकी जीत थी. तो हम कहेंगे, जी नहीं!

डनकर्क फ़िल्म का एक सीन है,

युद्द से किसी तरह बचकर देश लौटे सैनिकों से एक अंधा आदमी कहता है-

‘वेल डन लैड्स, वेल डन’ यानि ‘बहुत अच्छे लड़कों, बहुत अच्छे’

इस पर एक सैनिक कहता है,

‘ऑल वी डिड इस सर्वाइव’ यानि ‘हम तो केवल बचकर आए हैं’

तो वो अंधा आदमी जवाब देता है,

‘डेट्स इनफ़’ यानि ‘इतना ही काफ़ी है’

आतंकवादियों का मंसूबा केवल लोगों को मारना नहीं होता. बल्कि लोगों के दिल में आतंक भर देना, डर भर देना होता है. हमारे सुरक्षा दल दिन-रात काम कर रहे हैं. ताकि आतंकी अपने इरादों में सफल ना हों. आतंक को हराने का पहला कदम है, हमारा हौंसला. ऐसी हर आतंकी घटना में जब हम अपना मनोबल बनाए रखते हैं. तो हम एक देश के रूप में सर्वाइव करते हैं. इस देश के विचार को सर्वाइव करते हैं.


वीडियो देखें: पुलिस की नौकरी छोड़कर ‘जनरल लाभ सिंह’ ख़ालिस्तानी मूवमेंट से क्यों जुड़ गया था? 

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