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किन वजहों से भारत को बार-बार अफगानिस्तान में अपना दूतावास खाली कराना पड़ा है?

अफ़ग़ानिस्तान. एक ऐसा देश जहां खुद उसके नागरिक रहना नहीं चाहते. तालिबान के क़ब्ज़े के बाद दुनिया के ज़्यादातर देश अफ़ग़ानिस्तान स्थित अपने दूतावास (Embassy) खाली करा रहे हैं और अपने नागरिकों को किसी तरह निकाल रहे हैं. भारत भी ऐसा कर रहा है. अफगानिस्तान में भारत के राजदूत रुदरेंद्र टंडन को काबुल से वापस भारत लाया गया है.

ये पहला मौक़ा नहीं है जब भारत ने अफगानिस्तान स्थित अपने दूतावास के अधिकारियों और अन्य कर्मियों को वापस बुलाया. इतिहास में ऐसा चार बार हो चुका है जब भारत ऐसा कदम उठाने को मजबूर हुआ है. आइए जानते हैं ऐसे कौन से मौके थे और तब के राजनीतिक हालात कैसे थे.

कब-कब भारत ने अफगानिस्तान छोड़ा?

बताया जाता है अलग-अलग देशों द्वारा अपने दूतावासों को ख़ाली कराने का सिलसिला 1990 के दशक में शुरू हुआ. भारत के लिए इसकी शुरुआत 1992 में हुई थी. उस वक़्त तालिबान (Taliban) ने काबुल एयर ट्रैफिक कंट्रोल को उड़ा दिया था. इस हमले में अमेरिका द्वारा दी गई एंटी-एयरक्राफ्ट स्टिंगर मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया था. तब उस समय के भारतीय राजदूत विजय नांबियार को अफ़ग़ानिस्तान आर्मी के जनरल रशीद दोस्तम की मदद से मजार-ए-शरीफ से बाहर निकाला गया था. ये काम भारतीय वायु सेना ने किया था.

उस समय अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जाने वाले सिर्फ़ भारतीय नहीं थे, बल्कि दक्षिण एशिया के कई देशों के राजदूतों ने अफगानिस्तान छोड़ दिया था. इस पूरी कवायद में सबसे बड़ा रोल था भारत के पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी का, जो उस वक़्त ईरान में भारत के राजदूत थे. उससे पहले वो अफ़ग़ानिस्तान में भी भारत के राजदूत रह चुके थे.

गुलबदीन हेकमेतयार को काबुल का कसाई भी कहा जाता है.
गुलबदीन हेकमेतयार को काबुल का कसाई भी कहा जाता है.

1993

इस साल अफगानिस्तान स्थित चांसरी इमारत पर एक रॉकेट हमला हुआ था. इस इमारत में अलग-अलग देशों के दूतावास होते हैं. हमले में एक भारतीय सुरक्षा गार्ड की मौत हुई थी. इसके बाद भारत ने काबुल में अपनी एंबेसी को बंद करने का फैसला किया था. उस वक़्त के राजदूत आरिफ क़मरैन के नेतृत्व में सारे दूतावास के कर्मचारियों को तीन बसों में उज़्बेकिस्तान बॉर्डर पर बसे शहर टर्मेज़ ले जाया गया था. उसके बाद कई देशों से सलाह मशवरा करने के बाद ताशकंद के जरिये स्वदेश वापस लाया गया.

हमले को आतंकी संगठन हिज्ब-ए-इस्लामी ने अंजाम दिया था. तब इस संगठन का कमांडर गुलबुद्दीन हिकमतयार हुआ करता था. बाद में गुलबुद्दीन अफ़ग़ानिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने. गौरतलब है कि गुलबुद्दीन अफ़ग़ानिस्तान के इस नए तालिबान शासन के साथ बातचीत कर रहे समन्वय परिषद के सदस्यों में से एक हैं.

अहमद शाह मसूद
नॉर्धर्न अलायन्स के नेता अहमद शाह मसूद .

दोबारा भारत ने 1995 में अफ़ग़ानिस्तान में अपना दूतावास खोला. लेकिन महज़ एक साल बीतने के बाद तालिबान ने काबुल में पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह और उनके भाई की बेरहमी से हत्या कर दी थी. उस दौर में क़ाबुल शहर पर अहमद शाह मसूद के नेतृत्व वाली नॉर्दर्न अलायंस सेना का क़ब्ज़ा था. लेकिन इस घटना के बाद नॉर्दर्न अलायंस की सेना पीछे हट गई और पंजशीर घाटी वापस चली गई. ऐसे में भारत को तीसरी बार दूतावास खाली कराना पड़ा था.

द हिंदू की एक रिपोर्ट में उस वक़्त के विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे विवेक काटजू के हवाले से कहा गया है,

“हमने मिशन (दूतावास) को खाली करा लिया था, जो काफी छोटा था. हम कई भारतीयों को आराम से वापस ले आए थे.”

लेकिन इसी रिपोर्ट में काटजू कहते हैं कि तब और अब में 25 सालों का फ़ासला है. वो बताते हैं कि तब और अब में एक बड़ा फ़र्क़ ये है कि इस वक़्त तालिबान को सारे देशों ने अलग थलग नहीं किया है. अमेरिका, चीन, रूस जैसे देश तालिबानी प्रतिनिधिमंडलों को आमंत्रित करते हुए उनके साथ समझौता करने की बात कह रहे हैं.

1996 में भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने संसद में बयान दिया था कि भारत और तालिबान के बीच कोई भी संबंध नहीं होगा. उस दौर में भारत बुरहानुद्दीन रब्बानी के नॉर्दर्न अलायंस वाली सरकार का समर्थन कर रहा था, जिसका केवल अफ़ग़ानी ज़मीन के 10 प्रतिशत हिस्से पर शासन था. 1996 में संसद में बोलते हुए तत्कालीन विदेश मंत्री गुजराल ने कहा था,

“कइयों ने तालिबान के नेतृत्व वाली रूढ़िवादी सरकार की निंदा की है, जिसकी वजह से अफ़ग़ानिस्तान में मानव अधिकारों, विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ है. इस घटनाक्रम का आंकलन किया गया है और इससे भारत की सुरक्षा को जोखिम है.”

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भारत के पूर्व विदेश और प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल.

वो तब की सरकार की बात थी. आज बात कुछ और है. 19 अगस्त 2021 को जारी भारत के विदेश मंत्रालय की एक प्रेस रिलीज़ में अफ़ग़ानिस्तान में हुए घटनाक्रम की आलोचना तो की गई है, लेकिन कहीं भी तालिबान के नाम का इस्तेमाल नहीं किया गया है.

शुक्रवार 20 अगस्त को एक कार्यक्रम में बोलते हुए भारत के विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला ने कहा कि अफगानिस्तान में अपने पिछले शासन के विपरीत तालिबान इस बार अंतरराष्ट्रीय वैधता की मांग कर रहा है. बताते चलें कि विदेश मंत्रालय ने 12 अगस्त को एक बैठक के लिए दो लोगों के प्रतिनिधिमंडल को दोहा भेजा था. इस बैठक में अन्य देशों के साथ तालिबान के भी प्रतिनिधि शामिल थे.

1996-2001 के बीच भारत ने नॉर्दर्न अलायंस को सक्रिय रूप से समर्थन दिया था. ताजिकिस्तान के ज़रिए भारत ने अमरुल्ला सालेह और अहमद शाह मसूद से रिश्ता बनाए रखा था. वो हर संभव मदद उनको पहुंचा रहा था. अमरुल्लाह सालेह, राष्ट्रपति अशरफ गनी के सरकार में उपराष्ट्रपति थे. अब जब तालिबान की वापसी के बाद भारत समेत कई देशों ने अफगानिस्तान में अपने दूतावास खाली करा लिए हैं, ये दोनों अन्य कई नेताओं के साथ मिलकर दोबारा नॉर्दर्न अलायंस को संगठित करने में लगे हैं.


वीडियो-अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी के भाई ने तालिबान से हाल मिला लिया?

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