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प्रथम विश्व युद्ध में भारत के बलिदान का अंग्रेजों ने क्या ‘पुरस्कार' दिया?

आज 25 अगस्त है और आज की तारीख़ का संबंध है भारतीय सेना से.

1915 में चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने एक कहानी लिखी थी- ‘उसने कहा था’. इस कहानी के बारे में लल्लनटॉप के हमारे साथी मुबारक कहते हैं-

‘तेरी कुड़माई हो गई?

इस एक सवाल को लिख भर के चंद्रधर शर्मा गुलेरी हिंदी साहित्य में अमर हो गए. उनकी कहानी ‘उसने कहा था’, हिंदी कहानियों की दुनिया का एवरेस्ट है. ओ हेनरी की ‘द लास्ट लीफ’ जितनी मारक. प्रेम का ऐसा रूप कि तड़पाकर रख दे. न पढ़ी हो, तो पढ़े बगैर दुनिया न छोड़िएगा.’

प्रेम के मार्मिक वर्णन के अलावा इस कहानी को एक और वजह से पढ़ा जाना चाहिए. प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों के योगदान, उनके साहस और उनकी वीरता के लिए.

प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय सेना 

प्रथम विश्व युद्ध को ब्रिटेन लोकतंत्र की लड़ाई का नाम दे चुका था. तब भारत में आज़ादी को लेकर आंदोलन चल रहा था. लेकिन ऐसा कोई बड़ा मूवमेंट खड़ा नहीं हुआ था जिसमें पूरी जनता हिस्सेदार हो. भारतीय नेताओं ने विश्व युद्ध में ब्रिटेन का साथ देने का ऐलान किया. इन नेताओं में लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी भी शामिल थे. उन्हें लगा कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाला ब्रिटेन अगर विश्व युद्ध जीत गया, तो उस पर भारत को स्वायत्तता देने का प्रेशर बढ़ेगा.

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वेस्टर्न फ़्रंट पर फ़्रांस के नज़दीक भारतीय सैनिक, प्रथम विश्व युद्ध (तस्वीर: यूनाइटेड किंग्डम गवरमेंट)

जनता के लिए तो चाहे अंग्रेज सरकार हो या रियासतों के राजे महाराजे, ये ही माई-बाप थे. रियासतों में आपसी होड़ लगी थी कि कौन खुद को अंग्रेजों का कितना वफ़ादार साबित कर सकता है. लिहाज़ा जनता से चंदा इकट्ठा किया गया. यहां तक कि रियासतों की फ़ौजों को भी अंग्रेजों की तरफ़ से लड़ने के लिए भेजा गया. क़रीब 10 लाख भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था. इस युद्ध में 60 हज़ार भारतीयों की मृत्यु हुई. 70 हज़ार जख्मी हुए. इसके अलावा हज़ारों ऐसे थे जो लापता थे और जिनका कभी कुछ पता ही नहीं चला.

प्रथम विश्व युद्ध से पहले भारतीयों को आर्मी में ऑफ़िसर का ओहदा नहीं दिया जाता था. ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में नेहरू लिखते हैं,

‘आर्मी के सभी पदों पर अंग्रेज ऑफिसर नियुक्त थे. इन्हें किंग्स कमीशन मिलता था यानी ब्रिटेन के राजा द्वारा आर्मी में ऑफ़िसर का पद दिया जाता था. कोई भी भारतीय किंग्स कमीशन नहीं पा सकता था. एक नया-नया कमीशन हुआ अंग्रेज भी अनुभवी भारतीय ऑफिसरों से सीनियर हुआ करता था. अकाउंट्स विभाग में एक अदने क्लर्क पद के अलावा कोई भी भारतीय सेना मुख्यालय में काम तक नहीं कर सकता था.’ 

आर्मी में कोई भारतीय जो सबसे ऊंची रैंक पा सकता था, वो थी सूबेदार की. और वो भी 65-70 वर्ष की उम्र में जाकर मिलती थी. भारत में कोई मिलिट्री कॉलेज भी नही था कि भारतीय उनमें ट्रेनिंग ले सकें.

इम्पीरियल कैडेट कोर 

1887 के कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार ये मांग उठाई गई कि सेना में भारतीयों को भी ऑफ़िसर के रूप में कमीशन किया जाना चाहिए. तब कमांडर चीफ जनरल फ़्रेडरिक रॉबर्ट्स ने ये कहते हुए प्रपोजल रिजेक्ट कर दिया,

‘भारतीयों को कोई रैंक नहीं दी जा सकती, क्योंकि इस तरह वो ब्रिटिशर्स के बराबर हो जाएंगे. इसके अलावा कोई भी ब्रिटिश सैनिक अपने से ऊंचे पद वाले भारतीय ऑफ़िसर की बात नहीं मानेगा.’

कमाल की बात ये थी कि यही रॉबर्ट साहब, राजपूत, सिख, जाट और गोरखा सैनिकों के मुरीद हुआ करते थे. कहा करते,

‘इन्हें लेकर मैं किसी भी यूरोपियन आर्मी का सामना कर सकता हूं.’

1900 में गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्ज़न ने आर्मी के भारतीयकरण का एक और प्रपोज़ल रखा. जिसके मुताबिक़ राजसी और कुलीन घरानों से 20-30 लोगों को लेकर एक ‘Imperial Cadet Corps’ (ICC) बनाया गया. ICC के किसी भी ऑफ़िसर के पास ब्रिटिश या भारतीय सैनिकों को आदेश देने की शक्ति नहीं थी. कुल मिलाकर ये बस दिखावे का एक फ़िनिशिंग स्कूल था जिसे 1915 में भंग कर दिया गया.

किंग्स कमीशन

इस समय ब्रिटेन विश्व युद्ध में उलझा हुआ था. भारत के लोगों ने इस युद्ध में ब्रिटेन की जमकर मदद की थी. इसके बावजूद अंग्रेज़ी सरकार आज़ादी के आंदोलनकारियों को फांसी पर चढ़ा रही थी. जिसके कारण भारत में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ आक्रोश बढ़ता जा रहा था. इस आक्रोश को ठंडा करने के लिए ब्रिटिश संसद में एक मीटिंग बुलाई गई. उस समय सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फ़ॉर इंडिया थे एडविन मांटेग्यू. उन्होंने 20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कॉमन्स में एक भाषण देते हुए कहा,

‘हमारी सरकार एक प्रगतिशील सोच वाली सरकार है. हम ब्रिटिश साम्राज्य के अभिन्न अंग के रूप में भारत में एक जिम्मेदार सरकार के गठन के लिए प्रतिबद्ध है. इसलिए भारत में प्रशासन की हर शाखा में भारतीयों की मौजूदगी बढ़ाई जाएगी और इंडिपेंडेंट संस्थाओं का विकास किया जाएगा.’

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सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फ़ॉर इंडिया एडविन मांटेग्यू और 1917 में भारत के वाइसरॉय लॉर्ड चेल्म्सफ़ोर्ड (फ़ाइल फोटो)

इसी घोषणा में यह भी सम्मिलित था कि भारतीय भी सेना में किंग्स कमीशन पाने के अधिकारी होंगे. इसी के नतीजे में आज ही दिन यानी 25 अगस्त 1917 को 7 भारतीयों को किंग्स कमीशन ग्रांट किया गया. इन्हें ‘किंग्स कमीशन इंडियन ऑफ़िसर’ यानी KCIO कहकर बुलाया जाता था. इसी साल ब्रिटिश संसद में मांटेग्यू-चेल्म्सफ़ोर्ड रिपोर्ट पेश की गई. जिसमें प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों की वीरता और साहस की प्रशंसा की गई थी. इसी रिपोर्ट के नतीजे में तय किया गया कि रॉयल मिलिट्री कॉलेज सैंडहर्स्ट में 10 सीटें भारतीयों के लिए आरक्षित होंगी. जैसा कि पहले बताया ICC तब भंग किया जा चुका था.

11 नवम्बर 1918 को विश्व युद्ध ख़त्म हुआ. वहां ब्रिटेन पेरिस के महलों में युद्ध के बाद संधियों पर हस्ताक्षर कर रहा था. वहीं 1919 में 60 हज़ार भारतीयों के बलिदान का रिवार्ड अंग्रेजों ने जलियावालां बाग हत्याकांड के रूप में दिया. जब एक शांतिपूर्ण सभा पर अंग्रेज हुक्मरान ने अंधाधुंध गोलियां बरसा दी थीं. 1919 में ही गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट लाया गया. उम्मीद थी कि इसमें भारत को स्वायत्तता देने के लिए ज़रूरी कदमों की बात होगी. लेकिन इसमें भी भारत को निराशा ही हाथ लगी. नतीजतन भारतीयों का अंग्रेजों से मोहभंग हो गया.

इंडियन सैंडहर्स्ट कमिटी

मार्च 1921 में लेजिस्लेटिव असेंबली की एक मीटिंग हुई. इसमें मौजूद भारतीय सदस्यों ने मांग उठाई कि सेना में भारतीयों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए. और सेना के ऑफिशियल काडर का भारतीयकरण किया जाए. तेज बहादुर सप्रु के नेतृत्व में एक कमिटी का गठन किया गया. इस कमिटी ने अंग्रेज सरकार के सामने 3 मांगें रखी,

1) किंग्स कमीशन पाने वाले ऑफ़िसर्स में से 25 % भारतीय होने चाहिए.
2) ट्रेनिंग पाने वाले भारतीयों को वो सभी सुविधाएं दी जानी चाहिए जो अंग्रेज ऑफ़िसर्स को मिलती हैं.
3) रॉयल मिलिट्री कॉलेज सैंडहर्स्ट की तर्ज़ पर भारत में भी मिलिट्री अकादमी खोली जाए, ताकि भारतीय देश में रहकर ही प्रशिक्षण ले सकें. 

13 मार्च 1922 को देहरादून में मिलिटरी कॉलेज की स्थापना हुई. लेकिन इसमें केवल प्रारम्भिक ट्रेनिंग की व्यवस्था थी. कमीशन पाने के लिए अभी भी सैंडहर्स्ट जाना पड़ता था. इस दिशा में आगे बढ़ते हुए, 1925 में ‘इंडियन सैंडहर्स्ट कमिटी’ का गठन किया गया. जिसे ‘स्कीन कमिटी’ भी कहा जाता है. स्कीन कमिटी की सिफ़ारिशें कुछ इस प्रकार थी-

1) सैंडहर्स्ट में भारतीयों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या को दुगना किया जाए.
2) इंफ़ेंट्री  के अलावा भारतीयों को आर्टिलरी, सिग्नल और इंजीनियरिंग ऑफ़िसर्स के रूप में भी कमीशन किया जाए.
3) एक कॉलेज की स्थापना हो जहां ऑफ़िसर्स को ट्रेंड कर भारत में ही कमीशन किया जा सके. 

ब्रिटिश संसद द्वारा इनमें से केवल एक सिफ़ारिश स्वीकार की गई. जिसके नतीजे में सैंडहर्स्ट में भारतीयों के लिए आरक्षित सीटों को दोगुना कर दिया गया. जो अब 10 से बढ़कर 20 हो गई थी.

यूरोपीयकरण से छुटकारा

ये भारतीय सैनिकों के बलिदान की सरासर तौहीन थी. इस मुद्दे पर जब लेजिस्लेटिव असेम्बली में चर्चा चली तो नेहरू बोले,

‘ब्रिटिश सरकार बार-बार एक शब्द का उपयोग करती है. वो है सेना का ‘भारतीयकरण’. मैं इस शब्द को नहीं समझ पा रहा हूं. भारत के भारतीयकरण से आपका क्या मतलब है? सेना भारतीय ही है. और हमें अपनी सेना में भारतीय अधिकारी नियुक्त करने हैं. ऐसे में भारतीयकरण का कोई मतलब नहीं है. असल में हम जो चाहते हैं, वो है सेना के यूरोपीयकरण से छुटकारा.’

लगातार कोशिशों के बाद ब्रिटिश सरकार 1931 में भारत में सैन्य अकादमी खोलने को लेकर राज़ी हुई. 10 दिसम्बर 1932 को IMA का उद्घाटन किया गया. इसे देहरादून के रेलवे स्टाफ कॉलेज भवन में खोला गया था .

30 सितम्बर 1932 को IMA में 40 कैडेट्स का पहला बैच पहुंचा. ये खुद को ‘पायनियर’ बुलाया करते थे. इसी बैच में भारत के पहले फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ भी शामिल थे. भारत में अब तक केवल दो लोगों को फ़ील्ड मार्शल की रैंक मिली है. सैम मानेकशॉ और के.एम. करियप्पा. करियप्पा के योगदान को देखते हुए 1986 में भारत सरकार ने उन्हें फ़ील्ड मार्शल की रैंक प्रदान की. 1919 में किंग्स कमीशन पाने वाले पहले भारतीयों में से एक करियप्पा भी थे.

पढ़िए: के.एम. करियप्पा, जिनकी पैरवी में नेहरू से कह दिया गया था, क्यों न किसी अंग्रेज को देश का पीएम बना दें

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IMA देहरादून से पास हुआ पहला बैच (फ़ाइल फोटो)

KCIO की ट्रेनिंग के लिए उन्हें रॉयल मिलिट्री कॉलेज, सैंडहर्स्ट भेजा गया, और 1919 में 2/Lt के रूप में कमीशन किया गया. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे इराक, सीरिया, ईरान और बर्मा में तैनात रहे. जिसके बाद उन्हें ब्रिगेडियर के पद पर प्रमोट कर दिया गया. 1947-48 में भारत पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने भारतीय सेना का संचालन संभाला. और अंततः 15 जनवरी, 1949 को उन्हें कमांडर इन चीफ़ नियुक्त कर दिया गया. इस तरह 1900 में शुरू हुई आर्मी के भारतीयकरण की प्रक्रिया 1949 में जाकर पूरी हुई. इसी दिन को भारत में सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है.


वीडियो देखें: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में कदम रखते ही पहला दांव क्या चला?

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