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इंडिया और पाकिस्तान के बीच खेला गया महानतम क्रिकेट मैच

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टीम इंडिया सेंचुरियन के मैदान पर प्रैक्टिस कर रही है. अगले मैच में अभी दो दिन बाकी हैं. रिपोर्टर्स राहुल द्रविड़ को घेर लेते हैं. राहुल द्रविड़ चूंकि राहुल द्रविड़ हैं इसलिए वो कहते हैं

हम इस गेम को एक इम्पोर्टेन्ट गेम की तरह ले रहे हैं. लेकिन ये एक नार्मल क्रिकेट गेम है. बाकी सभी गेमों की तरह, बैट और बॉल से, 22 यार्ड्स में 22 खिलाड़ी इसे खेलेंगे.

हमने द्रविड़ के इस स्टेटमेंट को अगले दिन अख़बार में पढ़ा. और ओफेंड हो गए.
ये एक नॉर्मल गेम कैसे हो सकता है? इंडिया वर्सेज़ पाकिस्तान एक नॉर्मल गेम? जब टीम का प्लेयर ही ऐसा कहे तो शक होने लगता है कि कहीं ये सभी इस मैच को हलके में तो नहीं ले रहे? मिनट भर में ही ये शक डर में बदल जाता है. अगर खिलाड़ी ही हल्का खेले तो हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकेंगे. प्लेयर्स बढ़िया खेले तो बाकी का काम हम अपनी अपनी टीवी में देखते हुए कर देंगे. आखिर उन्हें भी मॉरल सपोर्ट की ज़रुरत होती है न? बस हम उसी के लिए तैय्यार थे.

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ये मैच आखिर इतना ज़रूरी क्यूं था? क्यूं इस मैच पर इतना कुछ लदा हुआ था कि लगता था अगर हार गए तो खुद को आईने में देखना मुश्किल होगा. ऐसी तो कोई जल्द ही ख़त्म हुई सीरीज़ भी नहीं थी और न ही मैच जिसका हिसाब बाकी रक्खा हो. इस मैच के पहले आखिरी बार इंडिया ने पाकिस्तान के खिलाफ़ 2 साल 8 महीने 26 दिन पहले खेला था. 143 हफ़्ते. 1001 दिन.

इन 1001 दिनों में क्या क्या हुआ?

2000 में नवाज़ शरीफ को पाकिस्तान से भगा सऊदी अरब भेज दिया गया. मुशर्रफ ने पाकिस्तान पर कारगिल वॉर के बाद कब्ज़ा करने की कोशिश तेज़ कर दी. 2000 के आखिरी हफ़्ते में नूर जहां  की मौत हो जाती है.

2001 की शुरुआत में ही गुजरात में आता है भूकम्प. 30,000 लोग जान गवां देते हैं. मुशर्रफ पाकिस्तानी राष्ट्रपति बन जाते हैं. इंडिया में अटल और मुशर्रफ की मुलाक़ात 2 सालों में पहली बार हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच होने वाली मुलाकात होती है. कारगिल वॉर के बाद पहली बार. अक्टूबर में बॉर्डर पर इन दोनों देशों के बीच भयानक गोलियां चलती हैं. दिसंबर में हिन्दुस्तानी संसद पर हमला होता है.

2002 की शुरुआत में पाकिस्तान में डेनियल पर्ल को मार दिया जाता है. मुशर्रफ रेफेरेंडम जीत जाते हैं. हिंदुस्तान में होता है गोधरा! एक भारी बट्टा! जितना सोचो उतना चुभता है. आज भी! साल खतम होते होते पाकिस्तान को एक नया पीएम मिलता है –  ज़फ़रउल्ला खान जमाली.

1 मार्च 2003 और अब तक का सबसे बड़ा दिन आ जाता है. इंडिया वर्सेज़ पाकिस्तान. सेंचुरियन. तो क्या हुआ कि SAARC में मुशर्रफ ने वाजपेयी की ओर बढ़कर हाथ बढ़ा दिया था. कारगिल, सीज़फायर वॉयलेशन, मिसाइल टेस्टिंग, और चिक-चिक का सूद समेत बदला लेने का यही एक मौका था. तो क्या हुआ कि ज़मीन विदेशी थी? सामने वही आवारा भाई था जिसने 56 साल पहले अलग रहने का फ़ैसला कर लिया था.

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और द्रविड़ ने कह दिया कि इसे एक नॉर्मल गेम की तरह खेला जाएगा? वाह!

मैच के दिन टीम को सुबह 7.50 पर होटल से निकलना था लेकिन सभी प्लेयर्स ब्रेकफास्ट के लिए तय टाइम से पहले ही पहुंच जाते हैं. क्यूं? क्यूंकि द्रविड़ साहब, ये एक नॉर्मल गेम नहीं था. बाहर फैन्स ने धान बो रक्खा था. इसलिए ब्रेकफास्ट को कॉफ़ी शॉप के अन्दर शिफ्ट किया गया. टेबल टेनिस खेल रहे मुहम्मद कैफ ने टीम के कंप्यूटर एक्सपर्ट श्रीराम को हराया और फ्रूट्स खा रहे सचिन तेंदुलकर को अगले गेम के लिए चैलेन्ज किया. सचिन इंडियन टीम में टेबल टेनिस के भी पितामह थे. सचिन के दिमाग में क्या चल रहा था ये या तो सचिन जाते हैं या ख़ुदा. दोनों में फ़र्क क्या है, मत पूछियेगा. मुझे भी नहीं मालूम.

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अमूमन प्लेयर्स अपने अपने बल्ले और बाकी किट ग्राउंड में ही लाकर्स या ड्रेसिंग रूम में छोड़ के आते हैं. लेकिन आज जब सचिन, सहवाग, कैफ़, युवराज, द्रविड़ और गांगुली बस से उतर रहे थे तो सभी के हाथ में बल्ले थे. क्यूं? क्यूंकि ये एक नॉर्मल गेम नहीं था. ज़ाहिर है सभी अपने अपने कमरों में शैडो प्रैक्टिस कर रहे थे.

पाकिस्तानी टीम पहले से ही मैदान पर थी. वक़ार, वसीम, रज्ज़ाक, सईद अनवर इस टीम को वैसे तो पैना बनाते थे पर साथ ही फिटनेस और तेजी के मामले में नीचे खींच देते थे. हांलांकि एक्सपीरियंस का कोई सानी नहीं होता. युवराज, कैफ, दिनेश मोंगिया अभी चिल्लर ही थे. और वो करारे नोट.

टॉस होता है, टीम की लिस्ट बदली जाती हैं. हाथ मिलाये जाते हैं. इस वादे के साथ कि आज पानी भरवा के मानेंगे. क्यूं? क्यूंकि ये एक नॉर्मल गेम नहीं था. मुझे नहीं लगता कि दोनों टीमें जीतना चाहती थीं. दोनों टीमें दरअसल द्रविड़ को ग़लत साबित करना चाहती थीं. पाकिस्तान को पहले बैटिंग करनी है.

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सईद अनवर सचिन को बताना शुरू करते हैं कि फ़रारी होता क्या है. कभी विकेट गिरता है तो कभी गिरने ही वाला होता है लेकिन 194 ठोंकने वाला सईद अनवर जुटा था. नेहरा को ठोंकने में. ज़हीर को स्क्वायर में मारने में. कुंबले की एक गेंद डिफेंड हुई तो अगली पे लेट खेल के कसर पूरी कर लेता.

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टीम की बॉडी लैंग्वेज मरी हुई थी. नेहरा ने 10 ओवर में 74 रन दिए. जो टीवी से चिपके थे हताश थे. पाकिस्तान में पटाखों का ऑर्डर दिया जाने लगा था. 273. बहुत होता है. और बहुत मुश्किल भी.

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इनिंग्स ब्रेक में इंडियन ड्रेसिंग रूम में सब कुछ शांत था. कोई कुछ कहना भी चाहता था तो चाह कर भी न कहता. सचिन टेबल टेनिस की टेबल पर पैड पहनकर, पैरों को नीचे लटकाकर, हेडफ़ोन पर गाने सुनते हुए एक बड़े से कटोरे में आइस-क्रीम खा रहे थे. सहवाग, अपनी भौं ऊपर उठाये कहीं कुछ देख रहे थे. पाकिस्तानी प्लेयर्स मैदान पर उतरे और सचिन ने हेलमेट उठाया. सहवाग की ओर देखा, जो पहले से ही उनका इंतज़ार कर रहे थे. सचिन सहवाग को समझते थे. समझाते भी थे. वर्ल्ड कप के हर मैच से पहले सहवाग को गुरुमन्त्र मिलता था – “आराम से खेलना वरना बहुत मारूंगा.” आज सहवाग ने पूछा, “कैसे खेलना है सर जी?” “आज मारेंगे इनको.” भगवान का जवाब था. बात होते होते दोनों बाउंड्री पर पड़ी रस्सी लांघ रहे थे. बाकी की बातें अफ़्रीकी जमीन पर खड़े हिन्दुस्तानियों के शोर में दब गयीं.

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वसीम अकरम अटैक की शुरुआत करते हैं. तीसरी गेंद, शार्ट ऑफ़ गुड लेंथ, ऑफ़ स्टम्प के बाहर. सचिन बैकफुट पर पहुँचते हैं, बिजली से भी तेज. अपने पंजों पर पाए जाते हैं, और गेंद पॉइंट के मुंह के सामने से बाउंड्री की और दौड़ पड़ती है. रवि शास्त्री चीखते हैं – “Tendulkar on his way!” शास्त्री को भी खुद नहीं मालूम था कि वो क्या देखने वाले हैं. तेंदुलकर और सहवाग बारी बारी से उन्हें चौका मारते हैं.

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अगला ओवर वो जिसका हर किसी को इंतज़ार था. शोएब अख्तर बनाम सचिन तेंदुलकर. पहली गेंद वाइड. शोर अपने चरम पर. अगली तीन गेंदों में 3 रन और आते हैं. ओवर की चौथी गेंद, पटकी हुई. गेंद की स्पीड 150. 9 किलोमीटर प्रति घंटा. 22 गज की ज़मीं को उस गेंद ने उतनी देर में कवर कर लिया जितनी जितनी देर में एक पाकिस्तानी सैनिक की कालाश्निकोव से दो गोलियां निकलती हैं. सचिन ने इंडिया को 6 रन दिए.

ये अकेला शॉट एक नॉकआउट था. जो कभी माइक स्पिन्क्स को माइक टाईसन ने दिया था. इसके बाद पाकिस्तान ने बहुत कोशिशें की उठने की, मगर उठ नहीं पाया. स्पिन्क्स ने भी ऐसा ही किया था. फाइट खतम होने के बाद उसे सहारे की ज़रुरत पड़ रही थी.

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पहले ही ओवर के बाद कालाश्निकोव जाम पड़ गयी. चौथे ओवर में अख्तर को गेंद ही नहीं मिली. वक़ार ने अख्तर को अटैक से हटा लिया. शायद इसलिए क्यूंकि वो खुद गेंदबाज थे और माहौल भांप गए थे. मैच दरअसल अख्तर पहले ही ओवर में ख़तम हो चुका था. अब बस अगले 48 ओवर खेले जाने थे.

सचिन को अख्तर ने ही आउट किया लेकिन तब तक मैन-ऑफ़-द-मैच की चेक पर उनका नाम लिखा जा चुका था. 75 गेंद में क्रैम्प से जूझते 98 रन. जब वो आउट हुए थे तो 22 ओवरों में 97 रन ही चाहिए थे. राहुल द्रविड़ और युवराज ने बाकी का काम संभाल लिया.

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26 गेंद पहले ही इंडिया ने वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ़ 100% जीत का रिकॉर्ड बनाये रक्खा. शोएब अख्तर ने 10 ओवर में 72 रन दिए.

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सालों बाद कहीं किसी के मुंह से बाप-बाप होता है और बेटा बेटा वाली बात सुनी. हांलांकि मैंने इस बात पर कभी विश्वास नहीं किया. ऐसे मैचों में बाप बेटे नहीं खेलते. ऐसे मैचों में खिलाड़ी खेलते हैं. जो खेल नहीं खेलते बल्कि लड़ाई लड़ते हैं.

क्यूं?

क्यूंकि ये एक नॉर्मल गेम नहीं था.

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