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भारत-पाकिस्तान मैच: खेल के पीछे की राजनीति और अर्थशास्त्र

एक क्रिकेट मैच में दांव पर क्या लग सकता है? एक ट्रॉफी? मैच फीस? एक रिकॉर्ड? इससे ज़्यादा क्या जीता जा सकता है? क्या हारा जा सकता है? लेकिन अगर मैच भारत और पाकिस्तान के बीच हो, तो ”स्टेक्स” कुछ ज़्यादा ही ”हाई” हो जाते हैं. इसीलिए तो हम 24 अक्टूबर के रोज़ सिर्फ 10 विकेट से नहीं हारे. हम हार गए अपनी शराफत. अपना विवेक और अपना नागरिक बोध भी. सिर्फ हार-जीत की खुन्नस होती, तो भी चलता. अपने नारों-गानों में सामने वाले से चुहलबाज़ी होती, तब भी चलता. लेकिन हमने तो अपनों की वफादारी पर ही सवाल उठा दिया. पहले टीवियों पर ज़ोर चलता था. इस बार ज़िंदा इंसान कूटे गए. आखिर 20 ओवर्स में इतना कैसे हार गए हम?

थोड़ा पीछे चलते हैं

”1 मार्च 2003 को सेंचुरियन में होने वाले इंडिया-पाकिस्तान के मैच को लेकर मेरे दोस्त साल भर पहले से ही गज़ब के उत्साह के साथ बात करने लगे थे. ये दोनों टीमों के लिए एक बड़ा मुकाबला होने वाला था. मैच से पहले तीन रातों तक मैं ढंग से सो नहीं पाया. अगर हम कोई एक मुकाबला जीतना चाहते थे, तो वो यही था. देश हार को बिलकुल बर्दाश्त नहीं करने वाला था. कई फैन्स के लिए तो यही फाइनल था. उन्हें बाकी टूर्नामेंट से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वो बस चाहते थे कि हम सेंचुरियन में पाकिस्तान को पछाड़ दें.”

अपने क्लासिक खेल के साथ साथ हमेशा अपने सौम्य स्वभाव के लिए तारीफ पाने वाले सचिन तेंदुलकर ने अपनी किताब ”प्लेइंग इट माय वे” में सेंचुरियन वाले मुकाबले से पहले का माहौल कुछ इस तरह बांधते हैं. वो यही मैच था, जब शोएब अख्तर बार-बार विरेंद्र सहवाग को बाउंसर पर हुक मारने की चुनौती दे रहे थे. सहवाग ने तब शोएब से कहा था,

”उधर नॉन स्ट्राइक एंड पर तेरा बाप खड़ा है. उसको बोल, वो मारके दिखाएगा.” इसके बाद जब तेंदुलकर स्ट्राइक पर आए तो शोएब अख्तर ने उन्हें भी बाउंसर फेंकी. सहवाग कभी हुक या पुल खेलने में माहिर नहीं रहे. लेकिन क्रिकेट के भगवान को ऐसी कोई समस्या नहीं थी. प्रसाद स्वरूप शोएब अख्तर को मिला बाउंसर पर एक छक्का.

लेकिन ऐसा नहीं कि पाकिस्तानियों के पास याद करने के लिए छक्के नहीं. 1986 में ऑस्ट्रल एशिया कप के फाइनल में पाकिस्तान को जीत के लिए आखिरी गेंद पर 4 रन चाहिए थे. कपिल देव ने फील्डिंग पर एक और नज़र दौड़ाई. फिर चेतन शर्मा को कुछ समझाया. लेकिन मियांदाद भी मियांदाद थे. उन्होंने चेतन की फुल टॉस पर एक छक्का जड़ दिया. उस दिन मियांदाद के बल्ले से चली गेंद करोड़ों हिंदुस्तानी क्रिकेट फैन्स के दिल में आकर चुभ गई थी. और आज तक सालती रहती है.

पाकिस्तान के साथ क्रिकेट पर आपत्ति

इंडिया पाकिस्तान मैच की जब भी बात होती है यादों के पिटारे से ये प्रसंग बाहर आने लगते हैं. जो मैच देखे हुए हैं, वो आंखों के सामने तैरने लगते हैं. और अगर मुकाबला वर्ल्ड कप का हो, तब तो क्या ही कहने. वो एड अब कुछ दिनों से दिखा नहीं, लेकिन उसकी धुन दिमाग में बजने लगती है – मौका मौका!! भारत और पाकिस्तान का मैच, क्रिकेट के त्योहार की तरह है. इसमें घर नहीं, मोहल्ला नहीं, पूरा गांव शामिल होता है. लेकिन गांव में कुछ अच्छा हो, और सभी लोग खुश हो जाएं, ऐसा कैसे हो सकता है. इसीलिए एक कॉल दिया जाता है – इंडिया को पाकिस्तान से नहीं खेलना चाहिए. इसके बाद क्रमशः 1947, 1965, 1971 और 1999 की लड़ाइयों का ज़िक्र शुरू होता है. फिर कश्मीर का नासूर तो है ही.

इस बार केंद्रीय पंचायती राज मंत्री गिरिराज सिंह और केंद्रीय सामाजिक आधिकारिता मंत्री रामदास आठवले, आम आदमी पार्टी की विधायक आतिशी मार्लेना समेत कई लोगों ने जम्मू कश्मीर में प्रवासी मजदूरों की टारगेटेड किलिंग्स का बहाना बनाकर मांग की कि भारत, पाकिस्तान से मैच न खेले. तब बीसीसीआई की तरफ से राजीव शुक्ला ने कहा कि बोर्ड हत्याओं की निंदा करता है, लेकिन हम इस तरह किसी टूर्नामेंट का एक मैच खेलने से पीछे नहीं हट सकते.

खेल के पीछे का खेल

यहां रुककर उस खेल को समझने की कोशिश कीजिए जो हर बार आपके साथ होता है, और आप हर बार उसके फेर में फंस भी जाते हैं. बीसीसीआई लाख कह ले कि वो एक निजी संस्था है. लेकिन उस संस्था को चला रहे लोगों के संबंध, सरकार चला रहे और कुछ मामलों में तो विपक्ष में बैठे लोगों से क्या हैं, हम सब जानते हैं. तो फिर ऐसा कैसे हो जाता है कि हर बार बॉयकॉट का कॉल होता है. सरकार और विपक्ष में बैठे लोगों की तरफ से होता है. फिर भी मैच हो जाता है. हम बताते हैं ये कैसे होता है. क्रिकेट के नाम पर पाकिस्तान के खिलाफ भड़काउ बातें कहकर नेताजी अपना एजेंडा साध लेते हैं. सच्चे देशभक्त साबित हो जाते हैं. फिर उनके ही करीबी लोग मैच करवाकर बीसीसीआई का खज़ाना भी भरते रहते हैं. बीसीसीआई की अपनी वित्तीय मजबूरियां भी होती हैं. इस आधे अधूरे कैंसिल कल्चर और पॉलिटिक्स पर वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली ने हमें बताया,

ICC के कमिटमेंट से BCCI पीछे हटेगा तो नुकसान होगा. मान लीजिए कि अगर आप ये मैच बायकॉट करते हैं तो फिर आप दो पॉइंट दे देंगे पाकिस्तान को बिना खेले. आपने न केवल उनको पॉइंट दिया बल्कि अपने दो पॉइंट भी खो देते हैं. जो आगे चलकर आपको परेशान करते हैं. दूसरा ये कहना कि BCCI पुल आउट कर लेगा, नहीं हो पाएगा. क्योंकि कमिटमेंट के बाद अगर आप ICC टूर्नामेंट से पीछे हटते हैं तो फिर आपको फाइन भी देना पड़ेगा. फिर ये ट्रेंड बन जाएगा. पता चला कि आपने एक टूर्नामेंट अपने यहां किया और पाकिस्तान ने पुलआउट कर लिया. फाइन भर दिया. इसलिए BCCI के लिए ये फैसला लेना बहुत मुश्किल होगा. कहने के लिए ये बहुत आसान होता है लेकिन ये होता नहीं है. या तो आप पहले से निर्णय ले लीजिए कि हम नहीं खेल रहे. ICC आपको फाइन कर देगा कि आप नहीं खेल रहे. लेकिन इतना नजदीक जाकर आप स्पॉन्सर्स को भी नुकसान कर रहे हैं. उनकी क्या गलती है?

अब राजीव शुक्ला जैसे हैं. वो अपोजिशन (कांग्रेस) के हैं. जब वो यहां बैठेंगे तो उनके साथ प्रेसिडेंट या सेक्रेटरी बीजेपी के होंगे. जो भी सेटअप हो. लेकिन जब वो वहां पर जाते हैं तो फिर वे BCCI के होते हैं. वे पुराने मेम्बर हैं. वरिष्ठ हैं. तो वहां पर वे ये पॉलिटिक्स नहीं ला सकते. वहां पर उन्हें देखना होगा कि BCCI के क्या इंट्रेस्ट हैं?

मैच से पहले के बिल्डअप में बाज़ार अपनी भूमिका निभाता है. क्रिकेट में मैच से पहले, मैच के बीच में और मैच के बाद तो विज्ञापन होते ही हैं. हर ओवर के बाद भी ऐड चलते हैं. भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट जैसे जटिल माहौल में होता है, उसे भुनाने के लिए बाज़ार भी तैयारी करता है. जब जब भारत-पाकिस्तान के बीच मैच होता है, तब तब एक लंबा इंफॉर्मेशन कैंपेन भी चलता है. समाचार चैनल खास कवरेज करते हैं. पुराने मुकाबलों की याद दिलाते हैं. मैच का प्रसारक चैनल और दूसरे विज्ञानपदाता नए एड कैंपेन चलाते हैं. ये दुनिया कैसे बदल रही है, इसे समझने के लिए हमने बात की सुरेश त्रिवेणी से. सुरेश ने ही 2015 में मौका-मौका वाले ऐड्स डायरेक्ट किए थे. सुरेश से हमने पूछा कि 24 अक्टूबर को हुए भारत पाकिस्तान मैच से पहले चले एड कैंपेन्स और दूसरे कार्यक्रमों को लेकर वो क्या सोचते हैं. सुरेश ने कहा,

हमारे देश को ईवेंट बहुत पसंद हैं. और इंडिया-पाकिस्तान के बीच मैच एक बड़ा ईवेंट होता है. लेकिन क्या हम इंडिया पाकिस्तान के मैच में हर बार एक ही तरह का बर्ताव करेंगे? भारत एक वक्त क्रिकेट की दुनिया में अंडरडॉग होता था. हम कभी कभार जीतते थे. इसीलिए हमारे लिए उस रिकॉर्ड का बड़ा महत्व था कि फलां टीम को हमने आज तक वर्ल्डकप में जीतने नहीं दिया. आज हम क्रिकेट सुपरपावर हैं. जो दुनिया में अमेरिका का मुकाम है, वो क्रिकेट में हमारा है. लेकिन इंडिया-पाकिस्तान मैच को लेकर हमारा अप्रोच वही है.

मैं नहीं कहता कि मौका-मौका से अच्छा कोई एड नहीं है. लेकिन विज्ञापन वक्त के साथ साथ समाज में आ रहे बदलाव का दस्तावेज़ भी होने चाहिए. जैसे हमारा बजाज कैंपेन था. उम्मीद से भरे एक भारत का कैंपेन. आज भी बजाज एड बनाता है, लेकिन नए तरह के. जहां तक इंडिया पाकिस्तान के मैच से पहले चलने वाले एड्स की बात है, तो हमें सात साल पुराने नैरेटिव को अब छोड़ देना चाहिए. भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा है. तो राइवलरी रहेगी. और ये राइवलरी अच्छी है. क्योंकि आपको हर बार बेहतरीन क्रिकेट देखने को मिलेगा. ऐड्स को भी नए तरह से रोमांच को गढ़ना चाहिए. हमें थोड़ा इंवेंटिव होना होगा. बड़ा बनना ही है तो एल्डर ब्रदर बनो. बड़े भाई. बुली अप्रोच से काम नहीं चलेगा.

यहां तक आते आते आप समझ गए होंगे कि इंडिया-पाकिस्तान के खेल से पहले का जो उन्माद आप महसूस करते हैं, या देखते हैं. उसके कारण क्या हैं. बंटवारे का दंश है. वो युद्ध हैं, जिनमें हमने हजारों जवानों को खोया. आतंकवाद के चलते रिस रहा खून भी है. लेकिन बात बस इतनी ही नहीं है.

शमी को बनाया निशाना

एक राजनीति है, जो अपने लिए मौका ढूंढती है. और एक बाज़ार है, जो इन भावनाओं में मुनाफे की तलाश करता है. चूंकि हम इन बातों को नहीं समझते, या अनदेखा करते हैं, इसीलिए हम देखते हैं कि जो मोहम्मद शमी 2015 और 2019 के एक दिवसीय वर्ल्ड कप में इंडिया के सेकंड हाइएस्ट विकेट टेकर होते हैं, तीन-तीन मैचों में लगातार चार-चार विकेट लेते हैं, वही मुहम्मद शमी जब 24 अक्टूबर के रोज़ पाकिस्तान के खिलाफ करिश्मा नहीं कर पाए, तो बेहद बुरी तरह ट्रोल होते हैं. उनके मुसलमान होने को, उनकी वफादारी पर सवाल की तरह पेश किया जाने लगता है. इस बात के लिए जगह ही खत्म हो जाती है, कि शमी एक खिलाड़ी हैं. जो अच्छा खेल सकते हैं. लेकिन हमेशा नहीं.

24 अक्टूबर के रोज़ विराट कोहली के 57 रन छोड़ दें तो एक भारतीय बैटर या बोलर नहीं था, जो मैच में कुछ भी कर पाया हो. हमारे बैटर शुरुआत से दबाव में रहे. और उससे कभी उबरे ही नहीं. ऐसा नहीं है कि भारत ने छोटे टारगेट डिफेंड नहीं किए. लेकिन कल न बुमराह की चली और चक्रवर्ती की. पाकिस्तान की टीम मैच शुरू होने से लेकर खत्म होने तक हमसे बेहतर खेलती रही. इसीलिए जीत गई. लेकिन हार का ठीकरा शमी के सिर है!

ठीकरे और सिर से याद आया, शमी के साथ-साथ नंबर कश्मीर से बाहर देश के अलग अलग हिस्सों में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों का भी आया. पंजाब के संगरूर और खरार में छात्रों ने जश्न मना रहे छात्रों को पीटा. संगरूर वाले मामले में पुलिस रात में ही हॉस्टल पहुंची और दोनों पक्षों को शांत कराया. सुबह होते होते कश्मीरी और यूपी-बिहार-हरियाणा के छात्रों ने अपने अपने किए के लिए माफी मांग ली और बात खत्म की.

श्रीनगर में पटाखे फूटे. लोगों को जश्न मनाते हुए देखा गया. इसे लेकर पूरे भारत में कड़ी प्रतिक्रिया हुई. और इस प्रतिक्रिया में आपत्ति से लेकर धमकी तक सब कुछ शामिल था. महबूबा मुफ्ती ने इसपर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया कि पाकिस्तान की जीत पर खुशी मना रहे कश्मीरियों को निशाने पर क्यों लिया जा रहा है? क्या हम भूल गए हैं कि जम्मू कश्मीर के विभाजन और विशेष दर्जे के हटने पर कैसे मिठाइयां बांटी गईं. महबूबा मुफ्ती ठीक वही काम कर रही हैं, जिसके खिलाफ हम इस शो में अभी तक दलीले देते आए हैं. महबूबा विराट का उदाहरण दे रही हैं. लेकिन क्या महबूबा ने एक पल के लिए ये सोचा कि वो विराट का उदाहरण देते हुए खुद को ही गलत साबित कर रही हैं. विराट की दी बधाई उनके एक पेशेवर खिलाड़ी होने की निशानी है. विराट के किए में ज़रा भी पॉलिटिक्स नहीं थी. क्या यही बात श्रीनगर में चल रहे जश्न के बारे में कही जा सकती है?

क्रिकेट की कड़वाहट

आखिर में अब बात इस सवाल पर कि एक ऐसा खेल, जिसे भारत और पाकिस्तान दोनों हद दर्जे तक पसंद करते हैं, उसमें से हम ये सारी कड़वाहट और उन्माद कैसे हटाएं. इसके लिए हमने बात की लेखक और अध्यापक मिहिर पंड्या से. मिहिर क्रिकेट को खूब पसंद करते हैं और उसपर लिखते रहे हैं. मिहिर ने दी लल्लनटॉप से कहा,

भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट ने बहुत अच्छे दिन भी देखे हैं. भारत-पाकिस्तान ने कैनडा में सहारा कप खेले हैं. 1999 में चेन्नई में सचिन की शानदार पारी जब टेस्ट नहीं बचा सकी, तब भी स्टेडियम ने खड़े होकर पाकिस्तान के लिए ताली बजाई. फिर 2003 में लाहौर में हमें वैसा ही स्वागत और प्यार मिला. हमें ये समझना होगा कि एक खिलाड़ी को तैयार होने में बहुत सारा तप लगता है. इसके बाद उसे किसी पहचान में बांधना, राष्ट्रवाद में उलझाना ठीक नहीं है. अगर नीरज चोपड़ा आकर कह रहे हैं कि खेल को खेल रहने दिया जाए और उसमें एजेंडा न खोजा जाए, तो वो हमारे पूरे समाज पर एक कॉमेंट है. अच्छी बात है कि नीरज ने साहस किया और अपनी बात रखी.

एक क्रिकेट टीम राष्ट्र की प्रतिनिधि हो सकती है, पर्यायवाची नहीं हो सकती. वो पहले खेल के प्रतिनिधि हैं, फिर देश के. बेहतर होगा कि हम आईपीएल जैसे प्रयोगों को और बढ़ावा दें. याद कीजिए पहले आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों की कितनी सराहना हुई थी. लेकिन इसके बाद हमने उन्हें बुलाना ही बंद कर दिया. आईपीएल जैसे प्रयोग खिलाड़ियों को राष्ट्रीयता से आगे जाकर खेलने और बेहतर होने का मौका देते हैं. ये खिलाड़ी वापस अपने देश जाते हैं तो हमारे देश के कल्चरल एंबैसडर बनके जाते हैं. पाकिस्तानी खिलाड़ी यहां आकर खेलेंगे तो हमारे बारे में अच्छी बातें वापस ले जाएंगे. हमारे सामने वेस्ट इंडीज़ का उदाहरण भी है. इस नाम का कोई देश नहीं है. लेकिन टीम है. और इसने बेहतरीन खिलाड़ी दिए हैं.

विजय लोकपल्ली ने भी एक तरीका सुझाया है. उन्होंने कहा,

देखिए पीछे, इंडिया-पाकिस्तान इतना खेल रहे थे आपस में कि पागलपन कम हो गया था. एक दूसरे के यहां जाकर खेल रहे थे. पाकिस्तान की टीम यहां आती थी. भारत की टीम वहां जाती थी. इतना कड़वापन नहीं था. लोग उसको क्रिकेट के नजरिए से देखते थे. किसी को बुरा नहीं लगता था कि आप पाकिस्तान से हार गए या पाकिस्तान आपसे हार गई. आपके खिलाड़ियों का वहां बहुत वेलकम होता था. वे यहां आते थे उनका यहां वेलकम होता था. लेकिन कई फैक्टर्स होते हैं, कई लोग होते हैं जो इसको को खराब करना चाहते हैं. ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वो ऐसे लोगों पर को आइसोलेट करे. लेकिन ये दोनों तरफ से होनी चाहिए. ये एकतरफा नहीं हो सकती.

24 अक्टूबर को एक क्रिकेट मैच हुआ था. हमें जितनी तैयारी के साथ उतरना था, हम उतरे. अपनी पसंद के खिलाड़ियों के साथ खेले. तो क्या हुआ, जो हम बड़ा स्कोर नहीं खड़ा कर पाए. तो क्या हुआ, जो हम 10 विकेट से हार गए. तो क्या हुआ अगर हमारे बीच कुछ ऐसे मूर्ख हैं, जो इतने प्यारे खेल पर लानत लाद देते हैं. हमारे बीच हैं विराट कोहली जैसे खिलाड़ी. जो खेलते हैं. और खेलते खेलते हार जाते हैं. लेकिन जीतने वाले बैटर रिज़वान को बधाई देना नहीं भूलते. गले लगाते हैं. ऐसे ही नहीं कोई बाबर ये कह देता कि मैं विराट कोहली को फॉलो करता हूं. इस अच्छे नोट पर अब हम अपनी बात को विराम देते हैं. इस उम्मीद के साथ, कि अब जब आप इंडिया पाकिस्तान मैच के दौरान होने वाले खेल को समझ गए हैं, तो अगले मैच में अपनी टीम को चीयर करेंगे, जीतने पर खुश होंगे, हारने पर उदास होंगे. लेकिन बात क्रिकेट की होगी, और क्रिकेट तक ही रहेगी.


भारत-पाकिस्तान मैच: 20 ओवर्स में हम मैच ही नहीं काफी कुछ हार गए!

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