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चीन की किस कमज़ोर नस पर है भारत का कंट्रोल?

आपने जादूगरनी वाली वो कहानी सुनी है, जिसमें उसकी जान तोते में बंद होती है. ऐसा ही एक तोता चीन का भी है. समंदर का एक रास्ता है, जिसमें उसकी जान बसती है. ये रास्ता चीन की जीवनरेखा है. उसके उद्योग और कारोबार इसी रास्ते पर निर्भर हैं. इस पतली सी गरदन वाले रास्ते की चाभी है भारत के पास. चीन को लंबे समय से ये डर सताता आया है कि किसी दिन लड़ाई हुई, तो भारत ये रास्ता बंद कर देगा. ऐसा हुआ, तो चीन का सारा कामकाज ठप हो जाएगा. ऐसा न हो, इसके लिए चीन लंबे समय से हाथ-पांव मार रहा है. उसकी कोशिश है एक इमरजेंसी रूट बनाना. क्या चीन अपनी इस कोशिश में कामयाब हो गया है, विस्तार से बताते हैं आपको.

ये मामला समझने से पहले थोड़ा भूगोल की बात करते हैं

समझते हैं कि नक्शे पर हम जहां हैं, वहां क्यों हैं? भारत से करीब साढ़े पांच हज़ार किलोमीटर दूर पूर्वी अफ्रीका का एक देश है- मेडागास्कर. समझिए कि ये कुंभ के मेले में बिछड़ा हमारा भाई है. हमारा ये बिछड़ना न हुआ होता, तो शायद हम एशिया में ही न होते.

हमारे बिछड़ने की ये कहानी करोड़ों बरस पुरानी है. तब की कहानी, जब दुनिया में गोंडवाना नाम का एक सुपरकॉन्टिनेंट हुआ करता था. आज से तकरीबन 18 करोड़ साल पहले गोंडवाना में दरार आ गई. इसके कई हिस्से टूटकर अलग हो गए. इनमें गोंडवाना के पूरब का भी एक हिस्सा था. इसी हिस्से में थे मेडागास्कर और भारत. फिर इनके बीच भी विभाजन हुआ और दोनों एक-दूसरे से अलग हो गए. मेडागास्कर अफ्रीका में रह गया और भारत वाला हिस्सा उत्तरपूर्वी दिशा में खिसकते हुए वहां पहुंचा, जहां हम आज हैं.

Madagascar
लाल घेरे में मेडागास्कर देश. (गूगल मैप्स)

हिंद महासागर में इंडिया का ऑटो एज रहा है

इस विभाजन ने हमें एक बड़ा तोहफ़ा दिया. इसने हमें एक महासागर की सबसे प्राइम लोकेशन पर लाकर बिठा दिया. वो महासागर, जिसके साथ हमारी पहचान यूं गुंथी कि दुनिया ने इस समंदर का नाम भी हमारे नाम पर रख दिया. अरबों ने इस समंदर को कहा, बहर-अल-हिंद. अरबी में बहर का मतलब सागर होता है. बहर-अल-हिंद का मतलब हुआ, हिंदुस्तान का सागर. इंडियन ओशन. हिंद महासागर.

इंडियन ओशन के बीचोबीच बसा है भारत. हमारे एक तरफ है अफ्रीका. दूसरी तरफ हैं मलयेशिया, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश. अपनी इस लोकेशन के कारण हमेशा से ही हिंद महासागर में एक स्वाभाविक बढ़त रही है हमारी. ये हमारा होम टर्फ है. मगर हमारी इस बढ़त को कम करने की फिराक़ में है चीन. पिछले दो दशकों से वो यहां सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है चीन. उसकी ये कोशिशें हमारे लिए बड़ा चेलैंज है. मगर इसके बावजूद कुछ मामलों में हम चीन पर भारी हैं.

Indian Ocean
हिंद महासागर. (गूगल मैप्स)

कैसे, बताते हैं. हिंद महासागर दुनिया के सबसे अहम, सबसे व्यस्त समुद्री रूट्स में है. मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और पूर्वी एशिया को यूरोप और अमेरिका से जोड़ने वाला सबसे अहम समुद्री रास्ता है ये. इसी हिंद महासागर में पड़ती है- मलक्का जलसंधि. करीब 800 किलोमीटर लंबा समंदर का ये रास्ता इंडोनेशिया, मलयेशिया और सिंगापोर के बीच में पड़ता है. यही मलक्का जलसंधि चीन की लाइफलाइन है.

मलक्का चीन के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों?

चीन अपनी ज़रूरतों के लिए कच्चा तेल खरीदता है. तेल की इस खेप का ज़्यादातर हिस्सा वो फ़ारस की खाड़ी, वेनेजुएला और अंगोला से आयात करता है. उसके द्वारा इंपोर्ट किए गए इस तेल का 80 पर्सेंट हिस्सा इसी रास्ते से होकर चीन आता है. मतलब चीन की इंडस्ट्रीज़, उसके कारखाने इसी जलसंधि से होकर आने वाले जहाज़ों पर निर्भर हैं. इतना ही नहीं, चीनी नौसेना के जहाज़ भी साउथ एशिया की तरफ आने के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं. यही निर्भरता चीन की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है. कमज़ोरी इसलिए कि इस जलसंधि की चाभी है भारत के पास.

कैसे? भूगोल से. हिंद महासागर में ही बसा है भारत का अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह. ये द्वीप मलक्का जलसंधि के ठीक ऊपर, उसके उत्तरी हिस्से में है. समंदर का ये इलाका मलक्का जलसंधि से होकर आने-जाने वाले जहाज़ों की मूवमेंट के लिहाज़ से बहुत सेंसेटिव है. इसलिए कि मलक्का जलसंधि बहुत पतली है. जैसे कीप का निचला हिस्सा होता है न, वैसा ही पतला. यहां वैसे ही जहाज़ों की आवाजाही धीमी और तंग है. ऐसे में अगर किसी दिन टेंशन बहुत बढ़ी, तो चीन को तंग करने के लिए भारत को ज़्यादा कुछ नहीं करना होगा. इंडियन नेवी को अपने कुछ जहाज़ जलसंधि के ऊपर की तरफ, अंडमान सी में खड़े कर देने होंगे. इससे इस रास्ते का ऊपरी सिरा ब्लॉक हो जाएगा. चीन जाने वाली सप्लाई रुक जाएगी.

Andaman And Nicobar Islands
अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह. (गूगल मैप्स)

चीन को बहुत लंबे समय ये डर सताता है. इस डर की एक और वजह है. जलसंधि के निचले हिस्से में सिंगापोर बसा है. उसकी अमेरिका से दोस्ती है. दोनों साथ-साथ समुद्र अभ्यास भी करते रहते हैं. अमेरिका और चीन में तनाव है. ऐसे में किसी रोज़ बात बहुत बिगड़ी, तो सिंगापोर की मदद से अमेरिका इस जलसंधि के पूर्वी हिस्से को ब्लॉक कर सकता है. माने चीन के सिर पर दोतरफ़ा तलवार लटकती रहती है.

ऐसा हुआ, तो चीन क्या करेगा?

उसके आगे सबसे नज़दीकी विकल्प है सुंडा स्ट्रेट. मगर वो इतना पतला और उथला है कि बड़े जहाज़ उसमें चल नहीं सकते. इसके अलावा लोमबोक और मकासार जलसंधियां. मगर चीन को वो रूट लंबा पड़ जाएगा. इस रास्ते इंपोर्ट करने पर चीन को हर साल 220 बिलियन डॉलर की एक्स्ट्रा लागत चुकानी होगी. मतलब, मलक्का जलसंधि की ब्लॉकेज चीन अफॉर्ड नहीं कर पाएगा.

इस सारे जोड़-घटाव के बाद तस्वीर में एंट्री होती है चीन के सबसे महत्वाकांक्षी प्रॉजेक्ट BRI की. BRI माने बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव. वो परियोजना, जिसके तहत चीन एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बना रहा है. इसमें ज़मीन और समुद्र, दोनों के रूट हैं. इसी BRI प्रॉजेक्ट का हिस्सा है- क्रा इसमस नहर. इसे थाई कनाल भी कहते हैं. ये क्रा इसमस थाइलैंड का इलाका है. ये मलक्का जलसंधि के ही रास्ते में पड़ता है. इसके पूरब में थाइलैंड की खाड़ी और पश्चिम में अंडमान सी पड़ता है.

Thailand
लाल घेरे में थाईलैंड देश. (गूगल मैप्स)

चीन थाइलैंड को साथ लेकर यहां एक नहर बनाना चाहता है. इस नहर के बन जाने के बाद चीनी जहाज़ों पर मलक्का जलसंधि से आने-जाने की मज़बूरी नहीं रहेगी. वो बंगाल की खाड़ी और अंडमान सी पार करते हुए इस नहर के रास्ते साउथ चाइना सी में पहुंच जाएंगे.

ये नहर बनाने की प्लानिंग आज की नहीं है

करीब 300 साल पुरानी है ये. 17वीं सदी में थाइलैंड के राजाओं से लेकर 19वीं सदी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तक, सबने इस नहर का सपना देखा. मगर इसे बना नहीं पाए. इसकी सबसे बड़ी वजह है क्रा इसमस इलाके की जिऑग्रफी. ये बड़ा संकरा और पहाड़ी इलाका है. समुद्री मालवाहक जहाज़ इतने विशालकाय होते हैं. उनकी मूवमेंट के मुताबिक नहर बनाने में बहुत ख़र्च आता. इसके अलावा पर्यावरण से जुड़ी चिंताएं भी थीं.

फिर पिक्चर में आया चीन. उसने थाइलैंड से कहा कि वो इस नहर योजना में निवेश करेगा. मगर थाइलैंड में इसके लिए आम सहमति नहीं बन पाई. इसके पीछे सिंगापोर और मलयेशिया जैसे रीज़नल पावर्स का भी दबाव था. मलक्का जलसंधि में अपनी लोकेशन के कारण सिंगापोर और मलयेशिया ख़ूब पैसा कमाते हैं. अगर नहर बन जाती, तो उनका प्रभुत्व ख़त्म हो जाता. एक वजह चीन के प्रति आशंका भी थी. डर था कि नहर के बहाने चीन थाइलैंड पर हावी हो जाएगा.

Xi Jinping
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग (फोटो: एपी)

चीन के पक्ष में स्थिति बदलनी शुरू हुई 2014 में

इस साल थाइलैंड में एक सैन्य तख़्तापलट हुआ. अमेरिका ने इसकी निंदा की. चीन ने इस मौके को लपका और थाइलैंड में पैठ बनानी शुरू कर दी. चीन ने इस प्रॉजेक्ट के लिए थाइलैंड में ख़ूब लॉबी बनाई. इसका नतीजा दिखा 2019 में. इस साल थाइलैंड की सरकार ने अपनी नैशनल सिक्यॉरिटी काउंसिल और नैशनल इकॉनमिक ऐंड सोशल डिवेलपमेंट बोर्ड से इस नहर पर सर्वे करने को कहा. सरकार ने निर्देश दिया कि नहर बनने पर थाइलैंड को होने वाले अनुमानित आर्थिक फ़ायदे का ब्योरा दिया जाए. ये पैसा दिखाकर नहर के सपोर्ट में माहौल बनाने की कोशिश थी. ताकि लोगों से कहा जाए कि नहर बन गई, तो थाइलैंड को जादू की छड़ी मिल जाएगी.

ऐसा लग रहा था कि थाइलैंड चीन को नहर बनाने की परमिशन देगा ही देगा. मगर फिर 4 सितंबर को थाइलैंड से एक अलग मिजाज़ की ख़बर आई. इसके मुताबिक, थाइलैंड ने चीन को इस प्रॉजेक्ट की मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया है. न्यूज़ एजेंसी ANI समेत कई भारतीय वेबसाइट्स ने थाइलैंड द्वारा इस नहर परियोजना को रद्द किए जाने की बात कही है. इन रिपोर्ट्स के मुताबिक, थाइलैंड ने इस योजना से जुड़ा फिज़िबिलिटी टेस्ट किया. इसमें राजनैतिक और आर्थिक, दोनों स्तरों पर इसे घाटे का सौदा माना गया. ख़बरों के मुताबिक, थाइ कनाल को रद्द करने के अलावा थाइलैंड ने चीन से पनडुब्बी खरीदने का निर्णय भी फिलहाल टाल दिया है.

हम फिर से दोहरा रहे हैं कि रद्द किए जाने वाली ये रिपोर्ट भारतीय मीडिया में चल रही है. हमने इसकी पुष्टि के लिए बैंकॉक पोस्ट और नेशन थाइलैंड जैसी स्थानीय वेबसाइट्स चेक किए. ये विडियो किए जाने तक हमें थाइ मीडिया में ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली. इस बारे में कोई भी अपडेट आने पर हम आपको ज़रूर बताएंगे.

Indian Media Report
इंडियन मीडिया रिपोर्ट.

ये ख़बर सही है या नहीं, अभी ये नहीं पता. मगर इस ख़बर के आने से पहले आख़िरी बड़ी अपडेट ये थी कि थाइलैंड की एक संसदीय समिति सितंबर महीने में इस प्रॉजेक्ट से जुड़ी अपनी सिफ़ारिश सामने रखेगी. इस पार्लियामेंट्री कमिटी ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी हो, ऐसी कोई ख़बर अभी सामने नहीं आई. ऐसे में स्पष्ट नहीं है कि प्रॉजेक्ट रद्द किए जाने वाली ख़बर का आधार क्या है.

क्या इस नहर के बनने में थाइलैंड का नफ़ा ही नफ़ा है?

जवाब है, नहीं. नहर बनने पर थाइलैंड के आगे पूरे इलाके में अलग-थलग होने का ख़तरा था. इसके अलावा थाइलैंड की राष्ट्रीय एकता को लेकर भी चिंताएं हैं. उसके तीन दक्षिणी प्रांतों के मुस्लिम विद्रोह पर आमादा हैं. अगर नहर बन जाती है, तो देश के दो टुकड़ों में बंट जाने का अंदेशा है. इसमें एक तरफ होगा उत्तरी थाइलैंड. दूसरी तरफ इनसर्जेंसी ग्रस्त दक्षिणी थाइलैंड. इन दोनों के बीच खुदी नहर देश को दो हिस्सों में बांट देगी. ये थाइलैंड की राष्ट्रीय एकता के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. इसके अलावा थाइलैंड में चीन की दखलंदाज़ी बढ़ने का ख़तरा तो है ही. एक बार नहर बन जाने पर चीन थाइलैंड का परमानेंट पार्टनर बन जाएगा. उसका प्रभाव केवल नहर तक नहीं रहेगा. उसका प्रभुत्व थाइलैंड की संप्रभुता के लिए भी चुनौती बन सकता है.

अब आख़िर में भारत के हित पर आते हैं?

क्या इस नहर के बनने पर भारत को कोई ख़तरा है? जवाब है, नहीं. हमारे पास अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह है. हिंद महासागर में चीन के विस्तार को काउंटर करने के लिए भारत वहां अपना सैन्य ढांचा मज़बूत कर रहा है. हमारी एयरफोर्स और नेवी वहां अपना इन्फ्रास्ट्रचर और दुरुस्त करने में जुटी हुई है. भारत यहां अपनी एयरफोर्स के लिए नए एयरस्ट्रिप बना रहा है. नेवल स्ट्रक्चर भी अपग्रेड किया जा रहा है. इंडियन ओशन की इस लोकेशन पर चीन की किसी भी बदमाशी से निपटने में सक्षम हैं हम. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम यहां अपने खिलाफ़ घेराबंदी कर रहे चीन के आगे सुस्त हो जाएं.

Indian Navy In Indian Ocean
हिंद महासागर में भारतीय नौसेना. (फोटो: एएफपी)

इंडियन ओशन में भारत को चारों तरफ से घेरने के लिए चीन अलग-अलग देशों में अपने नौसैनिक ठिकाने बना रहा है. चीनी कंपनियां 30 से भी ज़्यादा देशों के साथ इस तरह का करार कर चुकी हैं. इसमें से कहीं चीन के पास पूरे का पूरा बंदरगाह है. मसलन, पाकिस्तान स्थित ग्वादर पोर्ट. कहीं वो बंदरगाह बना रहा है. जैसे, म्यांमार स्थित क्यायूक्प्यू पोर्ट. कहीं चीन ने लोन स्ट्रैटजी के तहत बंदरगाह को कब्ज़े में ले लिया. जैसे- श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट. इसके अलावा बांग्लादेश के चितगांव पोर्ट जैसे बंदरगाहों की भी मिसाल है, जिन्हें विकसित करने में चीन ने निवेश किया है. इंडियन ओशन में अपनी पारंपरिक बढ़त को बरकरार रखने के लिए भारत को चीनी विस्तारवाद का जवाब खोजना होगा.


विडियो- इनर मंगोलिया में लोग चीन के खिलाफ़ प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?

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