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ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ऐसी छोटी सी पीठ क्यूं कहा जा सकता है, जिसमें बहुत सारे लोग सवार हैं?

7 अगस्त की RBI की प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर दी लल्लनटॉप ने इंडिया टुडे हिंदी के संपादक अंशुमन तिवारी से विस्तारपूर्वक बात की. इन बातों को हम एक सीरीज़ के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं. पहले भाग में हमने आपको बताया कि रेपो रेट क्या होता है और RBI के रेपो रेट में कोई बदलाव न करने के क्या मायने और प्रभाव हैं. दूसरे भाग में हमने जाना कि RBI ने रीसेंट पास्ट में जो रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में अंधाधुंध कटौती की है, उसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा. और भारत की आर्थिक विकास दर के नेगेटिव होने के क्या मायने हैं. तीसरे भाग में हमने अंशुमन से मोरेटोरियम, लोन रीस्ट्रक्चरिंग और गोल्ड लोन को लेकर RBI की पॉलिसी के बारे में जाना. चौथे भाग में  उन दो चीज़ों के बारे में बातें कीं, जो RBI की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ी भी हुई हैं और प्रथम दृष्टया पॉज़िटिव भी लगती हैं. विदेशी मुद्रा भंडार और शेयर मार्केट. अंतिम भाग में हम कृषि आधारित और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बात करेंगे, और अंशुमन जी से इस प्रेस कॉन्फ्रेंस पर फ़ाइनल कमेंट भी लेंगे.

‘ख़रीफ़ की फसल’ अच्छी होने की उम्मीद को लेकर अंशुमन जी ने बताया-

अंशुमन तिवारी
अंशुमन तिवारी

रबी की फसल अच्छी रही. ख़रीफ़ की बुवाई अच्छी रही है. इसे लेकर हम थोड़ी उम्मीद बांध सकते हैं लेकिन इससे ज़्यादा उम्मीद के लिए शायद तर्क पर निर्भर होना पड़ेगा. उसकी वजह ये है कि भारत की GDP के वैल्यूएशन में ग्रामीण इलाक़ों का हिस्सा केवल 20% है. इंडिया की 80% इकॉनमी अर्बन और सेमी-अर्बन इकॉनमी है. जब तक यहां से डिमांड नहीं आएगी, आप बहुत अच्छी ग्रोथ नहीं ला सकते हैं. अगर एग्रीकल्चर में अपनी बेस्ट ग्रोथ भी आ जाती है, 4-4.5 प्रतिशत की, फिर भी भारत की GDP की ग्रोथ रेट 1-2 प्रतिशत से ऊपर नहीं निकल पाएगी. ग्रामीण इलाक़ों की स्थिति ऐसी है कि एक छोटी सी पीठ पर बहुत सारे लोग सवार हैं. रूरल इकॉनमी का साइज़ बहुत छोटा है, उसपर निर्भरता बहुत बड़ी है. ऑलरेडी भारत की 40-44 प्रतिशत वर्क फ़ोर्स कृषि पर निर्भर है. अब 25-30 प्रतिशत लोग और शहरों से निकलकर, अपना काम छोड़कर, माइग्रेंट लेबर, वापस कृषि पर निर्भर होने पहुंच गए. तो वहां पर लेबर की ओवर सप्लाई है. 60-70 प्रतिशत लोग वहां पर डिपेंडेंट हो गए हैं. अभी एग्रीकल्चर इकॉनमी किस शेप में होगी, कितने लोगों को रोज़गार दे पाएगी, ज़िंदगी कितनी और कितनों की बेहतर कर पाएगी, उनकी कमाई कितनी रहेगी, ये कह पाना मुश्किल है. अभी हम जिन चीज़ों को पॉज़िटिव मान रहे हैं या जिनको ग्रीन शूट्स मान रहे हैं, वो केवल फसल के आंकड़े हैं. वो इस बात के आंकड़े हैं कि रबी की उपज अच्छी हुई है और ख़रीफ़ की बुवाई अच्छी हुई है.

और एक चीज़ यहां ध्यान रखना ज़रूरी है, कि भारत में आवश्यकता से अधिक अनाज उत्पन्न होता है, और किसान उसमें हमेशा गंवाता है. तो अभी हमें ये देखना पड़ेगा कि रबी और ख़रीब मिलाकर नवंबर में प्राइसेस की पोज़ीशन क्या बनाती हैं. क्यूंकि बड़ी मुश्किल से हम 2018-19 में एग्रीकल्चर डिफ़्लेशन से बाहर आए थे. नहीं तो भारत की एग्रीकल्चर ने 2017 से 2019 के अंत तक, बल्कि 2020 की शुरुआत तक, बड़े पैमाने में एग्रीकल्चर में डिफ़्लेशन देखी थी. यानी जितनी उत्पादन लागत थी, उससे कम क़ीमतें बाज़ार में थीं, और उससे भी कम क़ीमतें किसानों को मिल रहीं थीं.

हमने जाते-जाते अंशुमन जी से पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर फ़ाइनल कमेंट देने को कहा. उन्होंने शक्तिकांत दास की बातों को सारगर्भित करते हुए बताया-

आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने एक तरह से ये कहा कि जो हम कर सकते थे वो हमने कर दिया, अब बॉल सरकार के कोर्ट में है, शमां वित्त मंत्रालय के सामने रख दी गई है. अगला उच्चारण उधर से आएगा.

वित्त मंत्रालय और सरकार तय करे कि कैसे उबरा जा सकता है मंदी से, हम जितना कर सकते थे- ब्याज़ दरों में कटौती के आधार पर, बैंकों में पैसा डालने के आधार पर, लघु उद्योगों को पैसा देने की सुविधाओं के आधार पर – वो सब कुछ हो चुका है. ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि इसी बीच में 20 लाख करोड़ का आत्मनिर्भर आर्थिक पैकेज भी आया है, जिसके बाद भी RBI को लग रहा है कि भारत की आर्थिक विकास दर नकारात्मक रहेगी.

तो अब बड़ी ज़िम्मेदारी सरकार की है. सरकार को कुछ नया करना पड़ेगा. तीन महीने, चार महीने में हमने ऐसा कुछ भी होते नहीं देखा जिससे RBI के प्रयासों से इकॉनमी में बड़ा बदलाव आ जाए. शायद मुंबई से निकला संकेत दिल्ली तक आ गया होगा. प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री आने वाले समय में कुछ नए उपायों की घोषणा करेंगे, इसकी उम्मीद की जा सकती है.


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