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बदहाल अर्थव्यवस्था के बीच चढ़ते शेयर मार्केट और बढ़ते विदेशी भंडार को भी उम्मीद से न देखें

7 अगस्त की RBI की प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर दी लल्लनटॉप ने इंडिया टुडे हिंदी के संपादक अंशुमन तिवारी से विस्तारपूर्वक बात की. इन बातों को हम एक सीरीज़ के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं. पहले भाग में हमने आपको बताया कि रेपो रेट क्या होता है और RBI के रेपो रेट में कोई बदलाव न करने के क्या मायने और प्रभाव हैं. दूसरे भाग में हमने जाना कि RBI ने रीसेंट पास्ट में जो रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में अंधाधुंध कटौती की है, उसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा. और भारत की आर्थिक विकास दर के नेगेटिव होने के क्या मायने हैं. तीसरे भाग में हमने अंशुमन से मोरेटोरियम, लोन रीस्ट्रक्चरिंग और गोल्ड लोन को लेकर RBI की पॉलिसी के बारे में जाना.

अब चौथे भाग में उन दो चीज़ों के बारे में बातें, जो RBI की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ी भी हुई हैं और प्रथम दृष्टया पॉज़िटिव भी लगती हैं. पहली है, विदेशी मुद्रा भंडार. जिसके बारे में शक्तिकांत दास ने बताया कि वो इस बार ‘भी’ बढ़ी है. अब हमने विदेशी मुद्रा भंडार के बढ़ने को ‘पॉज़िटिव’ न कहकर ‘पॉज़िटिव लगती है’ क्यूं कहा? अंशुमन की बातें सुनकर-

अंशुमन तिवारी
अंशुमन तिवारी

फ़ॉरेन रिज़र्व बढ़ने का सीधा रिश्ता आप बाज़ार में लिक्विडिटी से देख सकते हैं. रिज़र्व बैंक ने बड़े पैमाने पर पिछले दिनों में डॉलर की ख़रीद की है. जो ऑलरेडी रिपोर्टेड है. क्यूंकि इंपोर्ट तो हो नहीं रहा, इसलिए डॉलर की डिमांड नहीं है. इंपोर्ट्स इंडिया के गिरे हुए हैं. क्योंकि अर्थव्यवस्था में मंदी है. स्लोडाउन है. क्योंकि प्रोडक्शन हो नहीं रहा है. ऐसे में जो डॉलर बाज़ार में उपलब्ध हैं, वो डॉलर आ कहां से रहे हैं? वो दो तरह से आ रहे हैं.

एक तो, बड़े पैमाने पर पूंजी आयी रिलायंस के FDI इन्वेस्टमेंट के कारण. FDI, जो रिलायंस जियो में आया. वो पैसा बाज़ार में आया था. इसके अलावा FII यानी जो फ़ॉरन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स हैं, जो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से सस्ती पूंजी, ज़ीरो पर्सेंट, एक पर्सेंट पर उठाकर, भारतीय शेयर बाज़ार में लगा रहे थे, और ख़रीद रहे थे, वो पूंजी बाज़ार में आई थी. रिज़र्व बैंक ने उन डॉलरों की ख़रीद की है और उससे फॉरेक्स रिज़र्व को भरा है. और उसके भरने का नतीजा यह है कि फॉरेक्स रिज़र्व अब ऊपर जा रहा और उसके बदले रिज़र्व बैंक ने बाज़ार में रुपया छोड़ा है, लिक्विडिटी छोड़ी है. जो बैंक्स में चैनलाइज़ हो रही है.

तो फ़ॉरेन रिज़र्व या विदेशी मुद्रा भंडार के दृष्टिकोण से कोई चुनौती नहीं है. और यह चुनौती पिछले तीन चार साल में रही भी नहीं है.

रुपया स्थिर है. थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे है. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के जो फंडामेंटल्स हैं, जो बुनियादी चुनौतियां हैं, वो ज़्यादा बड़ी हैं. वो आने वाले समय में रुपए पर दबाव बढ़ा सकती हैं. जैसे कि ज़ीरो से नीचे की विकास दर, जैसे कि बैंकों की ख़राब होती सेहत, जैसे कि घटती खपत, जैसे कि बढ़ती महंगाई. ये जो चीज़ें हैं, इन चीज़ों का असर ज़्यादा है. तो फॉरेक्स रिज़र्व के स्तर पर कोई समस्या नहीं है. और अभी तो कोई इंपोर्ट ही नहीं हो रहा है. आप ध्यान से देखें तो पहली बार ऐसा हुआ जब भारत में सोने और क्रूड का इंपोर्ट भी गिर गया. जो सामान्य परिस्थितियों में हमेशा बढ़ता रहता है. उसकी वजह ये है कि कोई मांग नहीं थी मार्केट में. लॉक-डाउन था. 3 महीनों तक कोई कामकाज ही नहीं हुआ. तो क्रूड का इंपोर्ट भी नहीं हुआ, और गोल्ड के इंपोर्ट में भी कमी आई.

प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ी दूसरी पॉज़िटिव बात है, शेयर मार्केट. हाल के समय में रिज़र्व बैंक ने जब भी प्रेस कॉनफ़्रेंसेज़ की, उस दौरान और उसके बाद शेयर बाज़ार हमेशा तेज़ी से गिरा है. लेकिन अबकी ऐसा देखने में नहीं आया. मार्च एंड के बाद से, शेयर मार्केट अपेक्षा से कहीं तेज़ी से रिकवर हुआ है. शेयर मार्केट की तेज़ी, कोरोना और लॉक डाउन के बावज़ूद कैसे संभव है? सवाल ये भी है कि जबकि RBI ने इस बार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसी पैकेज की घोषणा नहीं की, कोई राहत नहीं दी, न ही वर्तमान और भविष्य को लेकर उसके द्वारा दिखाई गई तस्वीर दिखने में रंगीन थी. तो भी इधर RBI प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहा था, उधर शेयर मार्केट क्यूं बम-बम था? इसके बारे में अंशुमन तर्क देते हैं-

बाज़ार की प्रतिक्रिया आपेक्षित ऐसी इसलिए हैं क्योंकि बाज़ार को राहत मिली ऐसी पॉलिसी से. अगर रिज़र्व बैंक गवर्नर एक मोरेटोरियम डिक्लेयर कर देते, तो आज बैंकों की हालत देखते बनती. बैंक निफ़्टी की बुरी पिटाई होती आज बाज़ार में. अगर रिज़र्व बैंक गवर्नर ये रीस्ट्रक्चरिंग की बात नहीं लाते और इस लोन के साथ ये शर्त लगाते कि जो रीस्ट्रक्चरिंग होने वाली है, स्टैंडर्ड लोन माने जाएंगे. NPA नहीं माने जाएंगे. तो बैंक शेयरों की ज़बरदस्त पिटाई होती. अगर रिज़र्व बैंक गवर्नर ब्याज दरों में और कटौती की घोषणा करते तो शायद बाज़ार में उसका नकारात्मक प्रभाव जाता. क्योंकि बैंक के मुनाफ़े में और बैंकों का जो इंटरेस्ट मार्जिन है उसमें असर पड़ता. तो इस हिसाब से इस पॉलिसी पर स्टॉक मार्केट संतुष्ट इसलिए हुआ क्योंकि पहली बार, इन तीन महीनों में, रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने वास्तविकता स्वीकार करने का साहस दिखाया.

एक तरफ़ प्रेस कॉनफ़्रेंस हो रही थी दूसरी तरफ़ सेंसेक्स हिरण बना था. (ग्राफ़िक्स: PTI)
एक तरफ़ प्रेस कॉनफ़्रेंस हो रही थी दूसरी तरफ़ सेंसेक्स हिरण बना था. (ग्राफ़िक्स: PTI)

और जो राजनैतिक तौर पे कहा जा रहा है कि ग्रीन शूट्स आ रहे हैं और देश में सब कुछ ठीक होने लगा है और प्री-कोविड की स्थितियां आ गई है और जो दावे किए जा रहे हैं उसके विपरीत भारत के केंद्रीय बैंकर से, बैंकिंग रेगुलेटर से जो अपेक्षा थी, कि वो देश को धोखे में या भ्रम में न रखें, वह उसे वास्तविकता दिखा सके. कि जुलाई में कॉन्ट्रैक्शन हुआ है, इस साल नेगेटिव ग्रोथ रेट रहने वाली है, ब्याज दर कम होने के बाद क्रेडिट की मांग नहीं बढ़ रही है, लोग क़र्ज़ लेने को तैयार नहीं हैं, क्रेडिट की ग्रोथ अट्ठावन साल के लोएस्ट लेवल पर है- ये सारे जो क्लियरिंग फैक्ट्स हैं, जो वास्तविकताएं हैं, उसे दिखाया गया. अब इसकी रोशनी में जब शेयर बाज़ार ने इस पॉलिसी को देखा तो उसे समझ में आया कि रिज़र्व बैंक वास्तविकता के आधार पर नीति तय कर रहा है किसी दबाव में नहीं. और इसलिए शेयर बाज़ार की प्रतिक्रिया वैसी नहीं रही जो आमतौर पर होनी चाहिए थी.

इसका अगला भाग, अंतिम भाग है, जिसमें हम कृषि आधारित और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बात करेंगे.


वीडियो देखें-

जानिए शेयर मार्केट में पैसा डालना फिलहाल कितना मुनाफे वाला है?

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