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तो क्या रिज़र्व बैंक को लगता है कि लोग बैंकों से अपना पैसा निकालने लग जाएंगे?

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी RBI. इसे बैंकों का बैंक का बैंक कहा जाता है. क्यूं कहा जाता है? इसलिए, क्यूंकि जिस तरह बाक़ी बैंक्स हमको पैसे देते हैं, और उसपर ब्याज़ वसूलते हैं और हमसे पैसे लेते हैं उसपर ब्याज़ देते हैं. ठीक वैसे ही आरबीआई बैंक्स को पैसे देता है, उसपर ब्याज़ वसूलता है और बैंक्स से पैसे लेता है, उसपर ब्याज़ देता है. जिस दर पर रिजर्व बैंक दूसरे बैंकों को पैसा उधार देता है उसे रेपो रेट कहा जाता है. जिस दर पर दूसरे बैंक अपना पैसा रिजर्व बैंक में रखते हैं और उस पर ब्याज कमाते हैं उसे रिवर्स रेपो रेट कहा जाता है.

आज रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट की बात इसलिए क्यूंकि RBI के हेड, यानी गवर्नर ने 7 अगस्त को प्रेस कॉन्फ्रेंस की और मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) की बैठक में हुए फैसलों की जानकारी दी. आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने बताया कि रेपो रेट में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है. फिलहाल रेपो रेट 4 फीसदी है. इसके अलावा रिवर्स रेपो (3.35 फीसदी) में भी कोई बदलाव नहीं किया गया है.

शक्तिकांत दास (तस्वीर: PTI)
शक्तिकांत दास (तस्वीर: PTI)

वैसे फरवरी से अब तक रिजर्व बैंक रेपो रेट में 115 बेसिस पॉइंट की कटौती कर चुका है. RBI की प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ी बातों के बारे में हमने इंडिया टुडे हिंदी के संपादक, अंशुमन तिवारी से बात की. जिसे हम एक सीरीज़ के रूप में आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं. पहले भाग में जानते हैं, उन्होंने RBI के रेपो रेट में कोई बदलाव न करने के बारे में क्या कहा-

अंशुमन तिवारी
अंशुमन तिवारी

इस बार बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं थी. उसकी दो वजहे हैं. इस पॉलिसी से लगता है कि रिज़र्व बैंक धीमे-धीमे यथास्थिति को स्वीकार करने की स्थिति में आ गया है. बाज़ार में भी बहुत ज़्यादा लोग इस बात को मान रहे थे कि रिज़र्व बैंक अधिकतम अगर इस पर कटौती कर सकता था तो 25 बेसिस प्वाइंट की, या 0.25% की कटौती कर सकता था. लेकिन उसे कोई बहुत ज़्यादा फ़ायदा नहीं होने वाला है. और ऐसी गहरी मंदी के बीच में रिज़र्व बैंक ने ब्याज दरों में जो इतनी ज़्यादा कटौती पिछले 3 महीनों में कर दी है. तीन-चार चरणों में. क़रीब 140 – 135 बेसिस प्वाइंट की कटौती हो चुकी है. तो भारत में ब्याज दरें अगर आप काग़ज़ी तौर पर देखें तो न्यूनतम स्तर पर हैं. रेपो रेट भी न्यूनतम स्तर पर है. ऑल टाइम लो है. भारत में इतना कम रेपो रेट कभी नहीं था. 4% के आस पास.

तो बाज़ार में, ब्याज दरों के हिसाब से, जितना अधिकतम किया जा सकता था, रिज़र्व बैंक ने वो कर दिया है. और इसके बाद अब ब्याज दरों में कटौती न करना, इस बात का संकेत है कि रिज़र्व बैंक के पास अब विकल्प बहुत सीमित हैं. एक तरीक़े से थोड़ी हताशा या थकान सी दिखती है रिज़र्व बैंक की कोशिशों में. क्योंकि उसे लगता है कि बहुत कुछ हो चुका है लेकिन उसका नतीजा कोई नहीं आया है. इसलिए आज RBI गवर्नर ने दो-तीन ऐसे संकेत दिए जो ये बताते हैं कि जिस तरीक़े की कोशिश की गई थी अप्रैल-मई-जून में, वो सारी की सारी कोशिशें जुलाई में आके सिर के बाल खड़ी हो गईं. सब ध्वस्त हो गया. रिज़र्व बैंक गवर्नर ने कहा कि जो हमें ग्रीन शूट्स दिखाई पड़े थे, जो उम्मीद की किरण दिखाई पड़ी थी थोड़ी बहुत, वह सब-जून जुलाई में आकर बैठ गई हैं.

पिछले कुछ समय में ऐसे बदला है RR और RRR. (ग्राफ़िक्स: PTI)
पिछले कुछ समय में ऐसे बदला है RR और RRR. (ग्राफ़िक्स: PTI)

ब्याज दरों में कटौती रोकने का या उसे पॉज़ देने का मतलब ये है कि रिज़र्व बैंक को लगता है कि इतनी कम ब्याज़ दरें होने के बावजूद आर्थिक विकास दर नहीं आ रही है, लोग कर्ज़ देने को तैयार नहीं हैं, तो और ब्याज दरें घटा देने से कोई लाभ नहीं होगा. बल्कि उल्टा नुक़सान होगा. अब आप कहेंगे नुक़सान कैसे होगा? नुक़सान ऐसे होगा कि वो जो डिपॉजिटर्स हैं, जिनका पैसा बैंकों में रखा हुआ है. जिन्होंने एक साल, दो साल, तीन साल के लिए पैसा रखा है. पिछले तीन-चार सालों में उनका रिटर्न इतनी तेज़ी से गिरा है. इस साल मार्च से लेकर अभी तक FD के रेट्स में लगातार कटौती हुई है. तो रिज़र्व बैंक को ये समझ में आया कि अगर कर्ज़ की मांग नहीं बढ़ रही है, तो कम से कम डिपॉजिटर्स को ही नुक़सान न होने दिया जाए. नहीं तो वो अपना पैसा निकालकर बैंकों से बाहर जाने लगेंगे. तो इसलिए एक यथास्थितिवादी पॉलिसी की उम्मीद थी, कम से कम ब्याज दरों के मोर्चे पर. वैसी ही यथास्थिति दिखाई देती है.

RBI की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में और क्या-क्या महत्वपूर्ण बातें थीं, और उनका क्या मतलब था जानेंगे आने वाले भागों में.


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