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अफगानिस्तान: भारत को तालिबान से बातचीत करनी चाहिए या नहीं?

आम को लीची से मुहब्बत है. लेकिन लीची को प्यार है, अमरूद से. ऐसी कहानियां हिंदी फ़िल्मों में प्रेम त्रिकोण कहलाती हैं. आज जो क़िस्सा हम आपको सुनाने जा रहे हैं, वो भी ऐसे ही एक ट्रायंगल से जुड़ी है. इसमें तीन किरदार हैं. कल्पना कीजिए, इन तीनों के नाम हैं- अब्बा, डब्बा और जब्बा. अब्बा की जब्बा से दुश्मनी थी. उसे हराने के लिए अब्बा ने डब्बा से हाथ मिलाया. इस मदद के बदले अब्बा ने डब्बा को ख़ूब पैसे दिए. डब्बा ने अब्बा की मदद भी की. लेकिन साथ-के-साथ, वो जब्बा से बेपनाह मुहब्बत भी करता रहा. कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा ये है कि डब्बा और जब्बा के इश्क़ की ख़बर अब्बा समेत सारे ज़माने को थी. मगर फिर भी ये विचित्र लव ट्राएंगल सालों तक चलता रहा. फिर हुआ ये कि अब्बा लड़ते-लड़ते थक गया. उसने लड़ाई को अलविदा कहा और मैदान छोड़कर निकल गया. अब डब्बा की पांचों उंगलियां घी में हैं.

ये है असली कहानी

इस ट्रायंगल के तीनों पात्रों का असली नाम है- अमेरिका, पाकिस्तान और तालिबान. और उनके त्रिकोणीय शाहकार की सरज़मीं है, अफ़गानिस्तान. वहां पिछले कुछ महीनों से जंग छिड़ी हुई है. इस जंग में फिलहाल तालिबान का पलड़ा भारी दिख रहा है. तालिबान को मिल रही जीत से सबसे ज़्यादा फ़ायदे में है, पाकिस्तान. और सबसे ज़्यादा घाटे में हैं, अफ़गान जनता और भारत. ख़बर है कि पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी अफ़गान वॉर के बहाने वहां भारतीय ठिकानों को निशाने बनाने की योजना बना रही है.

आज एक कालजयी पंक्ति से शुरुआत करते हैं. ये पंक्ति कही थी, पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी के पूर्व चीफ़ जनरल हामिद गुल ने. 2014 में एक टॉक शो में बातचीत के दौरान हामिद गुल ने फ़रमाया था- जब इतिहास लिखा जाएगा, तो दर्ज होगा कि ISI ने अमेरिका की मदद से अफ़गानिस्तान में सोवियत को हराया. इसकी अगली पंक्ति में लिखा होगा कि ISI ने अमेरिका की मदद से अमेरिका को हराया.

इस कथन का क्या तात्पर्य है? इस पंक्ति का वास्ता है, पाकिस्तान के एक अनोख़े टैलेंट से. पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान का पड़ोसी है. बदक़िस्मती से अफ़गानिस्तान में दशकों से अराजकता बनी हुई है. इस अराजकता ने पाकिस्तान को एक सुनहरा अवसर दिया. अवसर ये कि वो अफ़गानिस्तान से जुड़े मामलों में अपनी भौगोलिक स्थिति को भुनाए. जिओग्रफ़िक लोकेशन के चलते अफ़गानिस्तान से जुड़े मामलों में बड़ा स्टेक होल्डर बन जाए.

इस अवसर को भुनाने की मुख्य शुरुआत हुई, अफ़गानिस्तान में सोवियत संघ की एंट्री से. ये तब की बात है, जब अमेरिका और सोवियत कोल्ड वॉर नाम का एक गेम खेल रहे थे. इस गेम के दर्जनों मैदानों में से एक ग्राउंड था, अफ़गानिस्तान. यहां सोवियत को बढ़त मिल गई. अमेरिका उसे पछाड़ना चाहता था. उसे अफ़गानिस्तान में सोवियत विरोधी गतिविधियों को हवा देने के लिए एक बेस की ज़रूरत थी. ये बेस बना, पाकिस्तान. अमेरिका ने उसे अरबों डॉलर की फंडिंग दी. बदले में पाकिस्तान ने अफ़गानिस्तान के भीतर सोवियत विरोधी मुजाहिदीनों की फ़ौज बनाने में अमेरिका की मदद की. सोवियत को अफ़गानिस्तान से निकलना पड़ा. इसके साथ ही, सोवियत के विघटन ने भी रफ़्तार पकड़ी. अमेरिका कोल्ड वॉर का विजेता बन गया.

अफगानिस्तान का चैप्टर बंद

अमेरिका को अफ़गानिस्तान में दिलचस्पी बस सोवियत के चलते थी. सोवियत की शिकस्त के बाद उसने अफ़गानिस्तान का चैप्टर बंद कर दिया. अमेरिका ने भले ये अध्याय बंद कर दिया हो, मगर पाकिस्तान ने ये चैप्टर खुला रखा. उसने अफ़गानिस्तान में जारी गृह युद्ध का फ़ायदा उठाने की ठानी. पाकिस्तान ने सोचा कि अगर वो मुजाहिदीनों के एक धड़े को सपोर्ट करे और वो धड़ा जीत जाए, तो अफ़गानिस्तान में एक सुपर फ्रेंडली सरकार बन जाएगी. इससे एक तरफ़ तो पाकिस्तान की क्षेत्रीय ताकत बढ़ेगी. दूसरा, कश्मीर जैसी जगहों पर भारत को घेरने के लिए उसे एक पार्टनर भी मिल जाएगा.

इसी मंशा से पाकिस्तान ने मुजाहिदीनों के एक धड़े को सपोर्ट करना शुरू किया. इस धड़े का नाम था, तालिबान. पाकिस्तान ने तालिबान को हथियार दिए. प्रशिक्षण दिया. उसे जिताने में पाकिस्तान ने ख़ूब मेहनत की. इसी मेहनत का रिज़ल्ट था कि सितंबर 1996 में तालिबान ने काबुल को जीत लिया. अफ़गानिस्तान में तालिबान की सरकार बन गई.

तालिबानी हुकूमत वाले इस अफ़गानिस्तान ने सपोर्ट दिया, अल-क़ायदा को. तालिबानी समर्थन के चलते अल-क़ायदा ने अफ़गानिस्तान को अपना मुख्यालय बना लिया. तालिबान और अल-क़ायदा, इन दोनों का टॉप मददगार था- पाकिस्तान. पाकिस्तानी सेना और ISI, दोनों की लीडरशिप का तालिबान और अल-क़ायदा से गहरा याराना था. ये दोस्ती बढ़िया फल-फूल रही थी कि एक बड़ी घटना हुई. सितंबर 2001 में अल-क़ायदा ने अमेरिका में आतंकी हमले करवाए. बदला लेने के लिए अमेरिका ने अल-क़ायदा और तालिबान से जंग छेड़ दी. अक्टूबर 2001 में उसने अफ़गानिस्तान पर हमला कर दिया.

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अफगानिस्तान लंबे वक्त से हिंसा झेल रहा है. फोटो सोर्स- आजतक

पाकिस्तान का अनोखा टैलेंट

इससे आगे जो हुआ, वो पाकिस्तान के अनोखे टैलेंट की मिसाल है. अमेरिका ने अफ़गानिस्तान पर किए गए अपने हमले को नाम दिया, वॉर अगेन्स्ट टेरर. यानी, आतंकवाद के खिलाफ़ छेड़ी गई जंग. इस जंग में अमेरिका का क्षेत्रीय पार्टनर था, पाकिस्तान. वो पाकिस्तान, जो ख़ुद ही टेरर के सबसे बड़े समर्थकों और निर्यातकों में से एक है. ख़ैर, ये विरोधाभास तो फिर भी कुछ नहीं. असली खेल तो ये हुआ कि अमेरिका की मदद के नाम पर पाकिस्तान एक हाथ से अमेरिकी फंड लेता. दूसरे हाथ से तालिबान और अल-क़ायदा जैसे अमेरिका विरोधी आतंकियों को मदद देता.

उसने अमेरिका से ही पैसे लेकर अमेरिका के दुश्मनों की मदद की. सुनिश्चित किया कि अमेरिका ये युद्ध न जीत पाए. अमेरिकी हमलों से बचने के लिए जब तालिबानियों और अल-क़ायदा आतंकियों को सुरक्षित पनाह की ज़रूरत हुई, तो पाकिस्तान ने बांहें फैलाकर उनका स्वागत किया. उसने अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन ओसामा को अपने यहां शरण दी. तालिबान को हरा पाने में अमेरिका की नाकामी का एक बड़ा कारण पाकिस्तान ही था.

दो दशक तक अफ़गानिस्तान में खपने के बाद अब अमेरिका की वहां से वापसी हो गई है. अफ़गान सरकार बैकफ़ुट पर है. तालिबान फिर से अफ़गानिस्तान को जीतने की राह पर है. यानी, बैक टू 2001 वाला पवैलियन. कंप्लीट देज़ा वू. इस पूरी एक्सरसाइज़ में सबसे ज़्यादा फ़ायदा किसे हुआ है? जवाब है, पाकिस्तान. अफ़गानिस्तान से अमेरिका की वापसी ने पाकिस्तान की बरसों पुरानी तमन्ना पूरी कर दी है. अब अपने दोस्त तालिबान के मार्फ़त उसकी अफ़गानिस्तान में चल सकेगी. वो अफ़गानिस्तान का गार्डियन, उसका गोलकीपर बन सकेगा. अपनी इस मज़बूत स्थिति के मार्फ़त पाकिस्तान पूरा करेगा ऐंटी-इंडिया प्रोपैगेंडा.

क्या है ये प्रॉपैगेंडा?

पाकिस्तान अफ़गान चरमपंथियों का मददगार है. ये बात किसी से नहीं छुपी थी. यही वजह है कि अफ़गान की सिविलियन सरकार के साथ उसके रिश्ते तल्ख़ थे. वहीं भारत तालिबान को मान्यता नहीं देता था. वो अफ़गानिस्तान में लोकतंत्र के रास्ते शांति-व्यवस्था बनाने का हिमायती था. भारत के सामरिक हित भी इस स्टैंड के मुफ़ीद थे. अगर अफ़गानिस्तान की अराजकता कट्टरपंथ और आतंकवाद को शह देती. कश्मीर को अलग करने की कोशिश करने वाले आतंकी संगठन अगर अफ़गानिस्तान के रास्ते भी सक्रिय हो जाते, तो भारत की मुश्किल बढ़ जाती.

यानी एक स्थिर, संप्रभु और लोकतांत्रिक अफ़गानिस्तान भारतीय हितों के भी अनुरूप था. इसीलिए भारत ने अफ़गानिस्तान में सिविलियन सरकार को सपोर्ट दिया. मगर अफ़गानिस्तान में तालिबान को मिल रही बढ़त से भारत की 20 सालों की मेहनत पर पानी फिरता दिख रहा है.

क्यों है ये आशंका?

अफ़गानिस्तान और भारत के बीच बहुत पुरानी दोस्ती रही है. मगर 90 के दशक में वहां तालिबान की जीत के बाद दोस्ती का स्कोप नहीं रहा. भारत ने तालिबान को मान्यता नहीं दी. अक्टूबर 2001 में अमेरिका द्वारा किए गए हमले के बाद तालिबान के हाथ से सत्ता निकल गई. इसके बाद भारत की फिर से अफ़गानिस्तान में एंट्री हुई. हमने अफ़गानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए ख़ूब पैसा दिया. वहां 22 हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा का निवेश किया.

हमने वहां सड़कें, बांध, बिजली की ट्रांसमिशन लाइन्स बनाईं. स्कूल और अस्पताल बनाए. अफ़गान संसद की बिल्डिंग का निर्माण किया. भारत ने वहां 400 से ज़्यादा प्रॉजेक्ट्स खड़े किए. अफ़गानिस्तान के 34 में से एक भी प्रांत ऐसा नहीं, जहां हमारी परियोजनाएं ना हों. उसका कोई ऐसा हिस्सा नहीं, जो भारतीय निवेश से अछूता हो. यहां तक कि अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता होने के बाद भी भारत ने अफ़गान सरकार में भरोसा बनाए रखा. अभी नवंबर 2020 और फ़रवरी 2021 में भी भारत ने यहां कई नई परियोजनाओं का ऐलान किया था. मगर अब इन सभी प्रॉजेक्ट्स के भविष्य पर ख़तरा मंडरा रहा है.

ख़बर आई है कि ISI, तालिबान की मदद से भारत के बनाए इन्फ्रास्ट्रक्चर को टारगेट करने की योजना बना रहा है. रिपोर्ट्स का दावा है कि बीते दिनों 10 हज़ार से ज़्यादा पाकिस्तानी तालिबान की ओर से लड़ने के लिए अफ़गानिस्तान में दाख़िल हुए हैं. इन लोगों को ISI ने भारतीय प्रॉजेक्ट्स को निशाना बनाने की ख़ास हिदायत दी है.

बीते दिनों में ऐसे कुछ हमले हो भी चुके हैं. मसलन, 5 जुलाई को यहां हेरात प्रांत से एक ख़बर आई. पता चला कि तालिबान ने यहां हारी नदी के पास स्थित 42 मेगावॉट क्षमता वाले सलमा डैम पर हमला किया. इस बांध को ‘इंडिया-अफ़गानिस्तान फ्रेंडशिप डैम’ भी कहा जाता है. इस बांध के निर्माण में करीब 1,800 करोड़ रुपए की लागत आई. लगभग 1,500 मज़दूरों और इंजिनियरों ने 10 साल की मेहनत से ये बांध बनाया. ये डैम अफ़गानिस्तान में किए गए हमारे सबसे महंगे निवेशों में से एक था. 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद इसके उद्घाटन समारोह में शामिल हुए थे. 5 जुलाई को तालिबान ने इस बांध पर कब्ज़ा कर लिया.

भारतीयों को जान का खतरा

तालिबानी विस्तार के चलते अफ़गानिस्तान में भारत की मौजूदगी पर ख़तरा बढ़ गया है. ये ख़तरा प्रॉजेक्ट्स के अलावा जान का भी है. इसी को लेकर 29 जून, 2021 को काबुल स्थित भारतीय दूतावास ने अपनी अडवाइज़री जारी की. इसमें भारतीय नागरिकों को अफ़गानिस्तान में हो रही हिंसा के मद्देनज़र सावधान किया गया था. कहा गया था कि भारतीय नागरिक इस हिंसा के असर से बचे नहीं रहेंगे. बल्कि उनके ऊपर अगवा किए जाने का गंभीर ख़तरा है.

इसके बाद ख़बर आई कि अफ़गानिस्तान में काम कर रहे कई भारतीयों को सुरक्षा कारणों से वापस भेजा जा रहा है. फिर 11 जुलाई को ख़बर आई कि भारत ने कंधार स्थित वाणिज्यिक दूतावास से अपना स्टाफ़ निकाल लिया है. वहां काम कर रहे करीब 50 स्टाफ़ को हिंदुस्तान पहुंचा दिया गया है.

भारतीय नागरिकों को अगवा किए जाने या मारे जाने की आशंकाएं काल्पनिक नहीं हैं. ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं. मसलन, मई 2018 में तालिबान ने बग़लाम प्रांत से सात भारतीय कर्मियों को अगवा कर लिया था. ये सभी काम पर जाने के दौरान रास्ते में किडनैप कर लिए गए थे. ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से जुड़ी आशंकाओं का एक दुखद रूप पिछले हफ़्ते सामने आया. ख़बर आई कि भारत के जाने-माने फ़ोटो-जर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी कंधार प्रांत में मारे गए. दानिश अफ़गान फोर्सेज़ की एक टीम के साथ सफ़र कर रहे थे. इस टीम पर हमला हुआ और तालिबानी हमले में दानिश मारे गए.

एकबार फिर लौटते हैं, अफ़गानिस्तान में भारत के भविष्य पर. हमारे सामरिक और क्षेत्रीय हितों के लिए अफ़गानिस्तान ज़रूरी है. कुछ महीने पहले ख़बर आई थी कि अफ़गानिस्तान में आतंकी संगठनों के बीच एक भारत विरोधी नेक्सस बन रहा है. इसमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद जैसे भारत विरोधी संगठन तो हैं ही. इनके अलावा, तालिबान और IS-ख़ोरासान जैसे संगठन भी हैं. ये सब मिलकर भारत को गैंग-अप करने की फ़िराक में हैं. न केवल अफ़गानिस्तान के भीतर. बल्कि, इनकी योजना कश्मीर पर हमला तेज़ करने की भी है. आपको 25 मार्च, 2020 को काबुल स्थित शोर बाज़ार गुरुद्वारे पर हुआ हमला याद है? इसमें 25 सिख मारे गए थे. इस हमले के पीछे इन्हीं आतंकियों का हाथ था. इस हमले में मुख्य भूमिका थी, हक्कानी नेटवर्क की.

ये हक्कानी नेटवर्क क्या है?

ये एक आतंकी संगठन है. इसका गठन किया था, सोवियत से जंग लड़ने वाले एक अफ़गानी मुजाहिदीन वॉरलॉर्ड जलालुद्दीन हक्कानी ने. सोवियत-अफ़गान वॉर के समय जलालुद्दीन हक्कानी युनिस ख़ालिस वाले गुट हेज़्ब-ए-इस्लामी का सदस्य था. सोवियत की वापसी के बाद जलालुद्दीन ने अपना संगठन बनाया. फिर जब 1994 के बाद तालिबान का उभार हुआ, तो हक्कानी तालिबान से मिल गया. तालिबान द्वारा बनाई गई सरकार में हक्कानी ट्रायबल ऐंड बॉर्डर अफ़ेयर्स मिनिस्टर बना.

तालिबानी नेटवर्क में पाकिस्तानी सेना और ISI के साथ सबसे करीबी रिश्ते हक्कानी नेटवर्क के ही हैं. इसका सबसे मज़बूत बेस है, अफ़गानिस्तान की दक्षिणपूर्वी सीमा के पास, नॉर्थ वजीरिस्तान इलाके में. अफ़गान वॉर के दौरान हुए सबसे हाई-प्रोफाइल, सबसे भीषण हमलों के पीछे हक्कानी नेटवर्क का ही हाथ है. ये अफ़गान में सक्रिय आतंकवाद का सबसे ख़तरनाक चेहरा है. ऐसे ख़ूंखार आतंकी ग्रुप को पाकिस्तानी सेना अपना सहयोगी कहती है.

हक्कानी नेटवर्क केवल अफ़गानिस्तान में ही पाकिस्तानी हितों की रक्षा नहीं करता. बल्कि भारत के खिलाफ़ भी आतंकवाद प्रायोजित करता है. 2008 में इसी संगठन ने काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर आत्मघाती हमला करवाया था. इस हमले में 50 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. 2014 में भी हक्कानी नेटवर्क ने हेरात स्थित भारतीय डिप्लोमैटिक मिशन को टारगेट किया था.

यानी, तालिबान के शासन वाला अफ़गानिस्तान भारत के लिए बारूद के ढेर जैसा है. इस हाल में अफ़गानिस्तान के भीतर भारत की मौजूदगी में बहुत जोख़िम है. परेशानी ये है कि अफ़गानिस्तान से निकलकर भारत की परेशानियों हल नहीं होंगी. ऐंटी-इंडिया अजेंडे में पाकिस्तान द्वारा अफ़गानिस्तान को शामिल किए जाने से हमारी आंतरिक सुरक्षा को भी ख़तरा है.

इसीलिए कई एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि भारत को समय रहते तालिबान के साथ वार्ता शुरू कर देनी चाहिए थी. जानकारों का कहना है कि भारत का रुख प्रैक्टिकल नहीं रहा. भारत ने अफ़गानिस्तान की बदलती स्थितियों को कैलकुलेट करने में धीमापन दिखाया. रूस जैसी शक्तियां तालिबान को एंगेज़ कर रही थीं. उनसे बातचीत कर भविष्य की तैयारी कर रही थीं. लेकिन भारत तालिबान से वार्ता में हिचकिचाता रहा. इस हिचकिचाहट के बीच अफ़गानिस्तान की स्थितियां तेज़ी से बदलती गईं.

बीते दिनों सूत्रों के हवाले से आ रही कई मीडिया रपटों में तालिबान पर भारत का रुख बदलने की बात कही गई. दावा किया गया कि अब भारत तालिबान से बातचीत की कोशिश कर रहा है. भारत ने बातचीत की इन कोशिशों को आधिकारिक तौर पर स्वीकार तो नहीं किया है. मगर ऐसी सीक्रेट टॉक की ख़बरें लगातार आ रही हैं. दावा है कि भारत से रिश्ते बनाने पर तालिबान के अलग-अलग धड़ों में राय बंटी हुई है.

तालिबान की मिलिटरी लीडरशिप और हक्कानी नेटवर्क जैसे धड़े पूरी तरह ऐंटी-इंडिया हैं. वहीं कुछ धड़े ऐसे भी हैं, जिन्हें लगता है कि भारत अफ़गानिस्तान के विकास में मदद कर सकता है. चीन के सिवाय भारत ही इकलौती क्षेत्रीय शक्ति है, जो अफ़गानिस्तान के पुनर्निर्माण में बड़ी भूमिका अदा कर सकती है. टिप्पणीकारों के मुताबिक, भारत अपने इसी पक्ष के सहारे वार्ता में आगे बढ़कर तालिबान से सुरक्षा संबंधी गारंटी लेने की कोशिश करेगा. भारत ये आश्वासन चाहेगा कि तालिबान भारत-विरोधी आतंकी संगठनों को अफ़गानिस्तान में न तो पनाह दे, न उन्हें किसी तरह की मदद मुहैया कराए.

तालिबान से बात हो कि नहीं?

आप में से कई लोग शायद तालिबान से वार्ता करने पर मुंह बनाएं. मगर फिलहाल अफ़गानिस्तान की जो हालत है, उसे देखते हुए ये फ़ैसला बिल्कुल प्रैक्टिकल लगता है. अमेरिका को अफ़गानिस्तान से रिहाई चाहिए थी, तो उसने तालिबान को बराबर में बिठाकर वार्ता की. वहां जो हिंसा और तबाही हो रही है, उसे रोकना हमारे वश में नहीं. ऐसे में बेहतर होगा कि हम भी अपने हित पर ध्यान दें. क्या है कि ये दुनिया परफ़ेक्ट तो है नहीं. और ना ही, पड़ोसी चुनना अपने हाथ में है.

जहां तक पाकिस्तान की बात है, तो उसने अपना रास्ता चुन लिया है. पाकिस्तान से लगातार तस्वीरें और विडियोज़ आ रहे हैं. वहां तालिबान को मिल रही बढ़त पर विजय जुलूस निकल रहे हैं. देश में कई जगहों पर मौलवी लोगों से तालिबान के लिए लामबंद होने की अपील कर रहे हैं. तालिबान के सपोर्ट में हथियार उठाने, उनके लिए चंदा देने की कॉल दे रहे हैं. क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि तालिबान की जीत इस्लाम की जीत है.

तालिबान के समर्थन में ख़ुलेआम रैलियां निकलना, ये पाकिस्तानी स्टेट की रज़ामंदी के बिना मुमकिन नहीं है. सोचिए, पाकिस्तान किन तालिबानियों को सपोर्ट कर रहा है. इसी के एक हमनाम संगठन, तहरीक़-ए-तालिबान-पाकिस्तान ने दिसंबर 2014 में पेशावर के एक स्कूल पर हमला किया था. उसने 132 बच्चों की क्रूर हत्या की थी. उस हमले के बाद पाकिस्तान के एक पूर्व आर्मी अफ़सर ने व्यथा में लिखा था-

मैं पक्के से नहीं कह सकता कि पाकिस्तान धर्म के नाम पर बना कि नहीं. हां, ये पक्के से कह सकता हूं कि ये धर्म के नाम पर तबाह ज़रूर हो रहा है.


वीडियो- दुनियादारी: अफ़गानिस्तान में इंडिया के नुकसान के पीछे तालिबान या पाकिस्तान?

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