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पाकिस्तान को कच्छ में ऐसा क्या मिला कि कश्मीर में घुसने की ग़लती कर बैठा?

आज 22 सितंबर है और आज की तारीख़ जुडी है भारत और पाकिस्तान के बीच हुए 1965 के युद्ध के युद्ध विराम से. युद्ध, जिसको हम अपने तारीख़ के 05 अगस्त वाले शो में कवर कर चुके हैं. आज बताएँगे कि 22 सितंबर का इस जंग से क्या रिलेशन है और जानेंगे जंग के पहले और बाद की टाइमलाइन.

# कच्छ का रण-

रण. जिसका अर्थ युद्ध भी होता है और रेगिस्तान भी. 1965 में भारत पाकिस्तान के बीच असल जंग भले कश्मीर में लड़ी गयी हो, लेकिन इसकी नींव अप्रैल 1965 में गुजरात के ‘कच्छ के रण’ में ही रख दी गई थी. यहाँ क्या हुआ था ये जानने से पहले ‘कच्छ के रण’ की जियोग्राफी जान लीजिये. गुजरात में समंदर किनारे का जिला है कच्छ. इसके उत्तर-पूर्व में एक नमकीन दलदली इलाका है जिसे रण कहते हैं. तो ये हुआ ‘कच्छ का रण’, जो लगभग 23,300 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. सिकन्दर के वक़्त ये एक विशाल झील जैसा था. साल 1819 के भूकंप में उत्तरी रण बीच से थोड़ा उभर आया. सो बीच का हिस्सा सूखा है जबकि इसके किनारे का हिस्सा दलदली है. गर्मी के महीनों में जब दलदल सूख जाता है तब नमक के कण रौशनी में चमकने लगते हैं.

‘कच्छ के रण’ की पश्चिमी सीमा पाकिस्तान से मिलती है. 9 अप्रैल, 1965 को कच्छ के रण में पाकिस्तान की तरफ से हमला कर दिया गया था. झगड़े की शुरुआत हुई पाकिस्तान की बनाई एक 18 मील लम्बी सड़क से. ये सड़क कई जगहों पर इंडियन बॉर्डर के डेढ़ मील अंदर तक जाती थी. जब इंडियन फ़ोर्सेज़ को इसका पता चला तो कूटनीतिक स्तर पर इसका विरोध किया गया. जवाब में पाकिस्तानी कमांडर अज़हर ने इस इलाके में गश्त और बढ़ा दी. इधर मार्च आते-आते भारत ने कन्जरकोट से आधा किमी दूर ‘सरदार’ चौकी बना ली. इस पर पाकिस्तान के कमांडर मेजर जनरल टिक्का खान ने ब्रिगेडियर अज़हर को हिन्दुस्तान की इस नई चौकी पर हमला करने का हुक्म दे दिया.

9 अप्रैल रात दो बजे पाकिस्तानी ने भारत की ‘सरदार’ चौकी के अलावा ‘जंगल’ चौकी और ‘शालीमार’ चौकी पर भी हमला कर दिया. शालीमार चौकी पर भारतीय जवान, पाकिस्तानी सैनिकों का मुकाबला नहीं कर पाए, हालांकि सरदार चौकी पर पाकिस्तानियों को कड़ी टक्कर दी गयी. 14 घंटे बाद ब्रिगेडियर अज़हर ने गोलाबारी रोकने के आदेश दिए.

इस बीच सरदार चौकी की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी 3 किमी पीछे विजय कोट चौकी पर आ गए. पाकिस्तानियों को भी इसका पता नहीं चला और वो भी वापस लौट गए. शाम को पीछे आ चुके भारतीय जवानों को जब लगा कि सरदार चौकी पर कोई भी पाकिस्तानी सैनिक नहीं है तब उन्होंने वापस सरदार चौकी पर कब्ज़ा कर लिया. बिना लड़े.

दोनों तरफ भारी फ़ोर्स तैनात थी. 24 अप्रैल को पाकिस्तानी ब्रिगेडियर इफ्तिकार जुनजुआ की अगुवाई में पाकिस्तानियों ने ‘सेरा बेत’ चौकी पर कब्ज़ा कर लिया. और भारतीय सैनिकों को पीछे हटना पड़ा. अगले दो दिनों में भारतीय सैनिकों को बियर बेत की चौकी भी खाली करनी पड़ी.

बाद में 1 जून 1965 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैरोल्ड विल्सन ने दोनो पक्षों के बीच लड़ाई रुकवा कर विवाद को हल करने के लिए एक कोर्ट बना दी.

हैरल्ड विल्सन, ब्रिटेन के प्रधान मंत्री. लेबर पार्टी के नेता. प्रधान मंत्री बनने के बाद इन पर आरोप लगा कि ये रूस के एजेंट हैं. कारण कि युवा अवस्था में विल्सन रूस के कई दौरे कर चुके थे और खुद को पक्का सोशलिस्ट बुलाते थे. ब्रिटिश इंटेलिजेन्स एज़ेंसी MI5 ने इस बात की तहक़ीक़ात भी की थी. हालांकी उन्हें बाद में क्लीन चिट दे दी गई थी. इन्हीं हैरल्ड विल्सन ने मध्यस्थता की कोशिश की थी. ब्रिटेन तब अमेरिका का साझेदार था. और अमेरिका परोक्ष रूप से पाकिस्तान का समर्थन करता था. लेकिन ऐसा माना जाता है कि नेहरू की सोशलिस्ट नीति से प्रभवित होकर विल्सन ने दोनों देशों को बररबर रखा और पाकिस्तान को कोई विशेष महत्व नहीं दिया. तब जबकि पाकिस्तान ये मानकर चल रहा था कि ब्रिटेन उसका समर्थन करेगा. बहरहाल जो फैसला आया उसके मुताबिक़ कच्छ के रण की दस फ़ीसद ज़मीन, यानी क़रीब 900 वर्ग किलोमीटर का इलाका, पाकिस्तान को दे दिया गया.

# कच्छ से कश्मीर-

पाकिस्तान को लग रहा था कि 62 की लड़ाई में चीन के हाथों हारा भारत अभी युद्ध के लिए तैयार नहीं है, ऊपर से कच्छ में मिली इस छोटी जीत के बाद पाकिस्तान का हौसला और बढ़ गया था.

फ़ारूख़ बाजवा अपनी किताब ‘फ़्रॉम कच्छ टू ताशकंद’ में लिखते हैं-

कच्छ की लड़ाई से पाकिस्तानी सेना को कम-से-कम सीमित स्तर पर ही सही, भारतीय सेना की क्षमता को आज़माने का मौका मिला.

भारत के तत्कालीन उप सेनाध्यक्ष जनरल कुमारमंगलम ने कहा-

भारत के लिए कच्छ की लड़ाई सही दुश्मन के साथ ग़लत समय पर ग़लत लड़ाई थी. इस लड़ाई में पाकिस्तान भारत पर भारी पड़ा लेकिन इसकी वजह से पाकिस्तान को ये ग़लतफ़हमी हो गई कि अब कश्मीर की लड़ाई उनके लिए एक केकवॉक साबित होगी.

# ऑपरेशन जिब्राल्टर-

पाकिस्तान के नेता खासकर तत्कालीन विदेशमंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने पाकिस्तानी राष्ट्र्पति और सेनाध्यक्ष जनरल अयूब खान पर दबाव डाला कि वे कश्मीर पर हमले का आदेश दें. जनरल याह्या खान और टिक्का खान का भी मानना था कि कश्मीरी अवाम भारत से आजाद होकर पाकिस्तान में विलय करना चाहती है. और पाकिस्तानी सैनिक जब घुसपैठ करेंगे तो कश्मीरी अवाम घुसपैठियों का साथ देगी. आखिरकार अयूब खान ने ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ का आदेश दे दिया. 5 अगस्त, 1965 को क़रीब 25000 पाकिस्तानी सैनिक कश्मीरियों की आम वेशभूषा में एलओसी पार कर कश्मीर में घुस आये. हुआ उलटा. पाकिस्तान के घुसपैठियों को कश्मीरियों ने पहचान लिया और उनका साथ देने की बजाय घुसपैठ की सूचना भारतीय सैनिकों को दे दी. हाजीपीर, पीओके का वो इलाका जहां से पाकिस्तानी लगातार घुसपैठ कर रहे थे. ये इलाका जैसे ही भारतीय सेना के कब्जे में आया भारतीयों का पूरे युद्ध पर पलड़ा भारी हो गया था. अब पाकिस्तानी फर्दर घुसपैठ नहीं कर पा रहे थे. बल्कि हिंदुस्तान अब लाहौर एयरपोर्ट पर भी हमले की स्थिति में आ गया था. हालांकि अब तक पाकिस्तान हार की कगार पर था. लेकिन पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी और नेता नहीं चाहते कि उनकी अवाम की नज़र में उनकी भद्द पिटे. इसी कवायद में एक और आपरेशन शुरू किया गया. ऑपेरशन ‘ग्रैंड स्लैम’. पंजाब के खेमकरण सेक्टर में पाकिस्तान की तरफ़ से हमला कर दिया गया. हिन्दुस्तान की फ़ौज इस इलाके में हमले के लिए तैयार नहीं थी. पाकिस्तान यहां से युद्ध जीत भी जाता, लेकिन उसने एक ग़लती कर दी. ऐन मौके पर पाकिस्तानी सेना का कमांडर बदल दिया गया. इस पूरे युद्ध और उसके परिणाम के बारे में हमने अपने 05 अगस्त के तारीख में विस्तार से बात की है. जिसका लिंक हमने आपको डिस्क्रिप्शन में दे दिया है.

बहरहाल इस बदलाव के चलते पाकिस्तानी फ़ौज अगले 24 घन्टे तक आगे नहीं बढ़ सकी. हिंदुस्तानी फौज़ को मौका मिल गया रसद और अतिरिक्त सेना लाने का. अब पाकिस्तानी खेमकरण से आगे बढ़ते लेकिन कुछ ही दूरी पर असल गांव नाम की जगह पर हिंदुस्तानी फौज़ पूरी ताकत से अड़ गई थी. यहां हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच सेकंड वर्ल्ड वॉर ( War ) के बाद सबसे बड़ी टैंक की लड़ाई लड़ी गई. पाकिस्तानी सेना के सैकड़ों टैंक नष्ट कर दिये गए. 32 टैंक कब्ज़े में ले लिए गए. ये टैंक अमेरिका के दिये पैटन टैंक थे. तबसे इस जगह को पैटन नगर के नाम से जाना जाता है.

अमेरिकी अख़बार में भारत के लाहौर पहुँचने की ख़बर.
अमेरिकी अख़बार में भारत के लाहौर पहुँचने की ख़बर.

तो अब पाकिस्तान समझ चुका था कि इतिहास में ये लड़ाई ‘भारत के हाथों पाकिस्तान की बुरी हार’ के शीर्षक से लिखी जाएगी. इसलिए उसकी तरफ़ से हुई युद्ध रोकने की कोशिशें.

# युद्ध विराम-

तो 20 सितंबर आते-आते तय हो गया था कि पाकिस्तान संघर्ष विराम चाहता है. भारत के ऊपर भी सीजफायर का दबाव बढ़ने लगा. भारत को लगा कि जंग शुरू करने का उसका मकसद पूरा हो गया है. सेना प्रमुख ने PM शास्त्री से भी कहा कि भारतीय सेना भी अपना ज्यादातर गोला-बारूद खर्च कर चुकी है. भारत के कई टैंक भी बर्बाद हुए हैं. ऐसे में बेहतर यही होगा कि संघर्षविराम का प्रस्ताव मान लिया जाए. सेना की सलाह पर शास्त्री ने UN के दिए सीजफायर प्रपोजल पर हामी भर दी. मगर ये सच नहीं था. रेकॉर्ड्स बताते हैं कि इस समय तक भारत ने फ्रंटलाइन के लिए रिजर्व अपने गोला-बारूद का बस 14 फीसद हिस्सा ही खर्च किया था. जहां तक तोपों की बात है, तो पाकिस्तान के मुकाबले उसके पास दोगुने टैंक थे. पाकिस्तान बदतर हालत में था.

हमारी कुलिग स्वाति अपने एक आर्टिकल में लिखती हैं, कि उधर पाकिस्तान में फुल नौटंकी चल रही थी. अयूब ने भुट्टो को UN भेजा. वहां भुट्टो पूरे तमाशाई अंदाज में बोले-
अगर जरूरत पड़ी, तो पाकिस्तान आने वाले हजार सालों तक ये जंग जारी रखेगा.

UN में ये भाषण देने के बाद भुट्टो ने एक और ड्रामा किया. उन्होंने अयूब खान को वहीं से फोन मिलाया. अयूब ने फोन पर कहा कि सीजफायर के लिए हां कह दो. इसके बाद जाकर भुट्टो ने हामी भरी. असल में भुट्टो ये दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि वो संघर्षविराम के पक्ष में नहीं हैं. कि पाकिस्तान को भारत से समझौता नहीं करना चाहिए. जबकि असलियत ये थी कि उस समय पाकिस्तान के सामने हथियार डालने के अलावा कोई और विकल्प बचा ही नहीं था. वो हथियार नहीं डालता, तो उसका और नुकसान होता. भुट्टो ये सब अच्छी तरह जानते थे. फिर उन्होंने ये तमाशा किया क्यों? क्योंकि वो इस जंग से राजनैतिक फायदा उठाने की फिराक में थे. तभी तो पाकिस्तान लौटते ही उन्होंने आंखों में आंसू भरकर ये ऐलान किया कि सीजफायर का आइडिया अयूब का था. और उनके ही कहने पर उन्होंने (यानी भुट्टो ने) UN में सीजफायर पर सहमति दी. भुट्टो बहुत चालाकी से इस सीजफायर (यानी अपमान) का सारा भार अयूब के कंधों पर डाल चुके थे. 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की देख-रेख में भारत और पाकिस्तान ने संघर्षविराम का ऐलान कर दिया. तय हुआ कि 5 अगस्त तक दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के इलाके से निकल जाएंगी.

ऐसे में पाकिस्तान जानता था आगे युद्ध में भारत बहुत भारी पड़ने वाला है. इसलिए, पाकिस्तान तत्काल सीजफायर चाहता था और दूसरी तरफ़ भारतीय सेना के तमाम अधिकारी सीजफायर के विरोध में थे. लेकिन बढ़ते इंटरनेशनल डिप्लोमेटिक प्रेशर की वजह से भारत को भी झुकना पडा और 22 सितंबर को, यानी आज के दिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें दोनों देशों से बिना शर्त युद्धविराम के लिए कहा गया. और अगले दिन युद्ध समाप्त हो गया.

# कौन जीता, कौन हारा-

पैंसठ की लड़ाई में दोंनो सेनाओं को हुए नुक्सान और जीते गए इलाकों के मामले में हिन्दुस्तान पाकिस्तान से कहीं ठीक स्थिति में रहा. लिहाजा जीत भारत की हुई थी. लेकिन पाकिस्तान अक्सर इसे नकारता रहा है.

युद्ध के दौरान भारत और पाकिस्तान दोनों को हुए नुकसान के बारे में कई न्यूट्रल एनालिसिस किये गये हैं. अमेरिका की फ़ेडरल रिसर्च डिवीज़न द्वारा की गयी ‘कान्ग्रेस कंट्री लाइब्रेरी’ की स्टडीज के मुताबिक़-

युद्ध सैन्य रूप से अनिर्णायक था. दोनों देशों के पास एक-दूसरे के बंदी सैनिक थे और एक-दूसरे के जीते गए इलाके भी. नुकसान अपेक्षाकृत पाकिस्तानी खेमे में ज्यादा था. पकिस्तान के 20 विमान, 200 टैंक नष्ट कर दिए गये थे और 3,800 पाकिस्तानी सैनिक मार दिए गए थे. पाकिस्तान की सेना भारत का सामना तो कर रही थी, लेकिन अगर लड़ाई जारी रहती तो पाकिस्तान को और ज्यादा नुकसान होता और अंतिम हार का सामना फिर भी करना पड़ता. जो शायद और बुरी होती. हालांकि ज्यादातर पाकिस्तानी अपनी सैन्य हार को स्वीकार करने से पीछे हटते रहे और जितना नुक्सान उन्होंने उठाया उसका ठीकरा जनरल अयूब खान और सरकार पर फोड़ते रहे.

TIME मैगज़ीन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत ने 690 वर्ग कि.मी. का पाकिस्तानी इलाका जीत लिया था जबकि पाकिस्तान ने कश्मीर और राजस्थान में करीब 250 वर्ग कि.मी. भारतीय ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था.

डेविन टी. हैगरटी अपनी एक किताब में लिखते हैं कि-

हमलावर भारतीय सेना ने पाकिस्तान सेना से मुकाबला किया और 22 सितम्बर को जब संयुक्त राष्ट्र की पहल पर युद्ध विराम की घोषणा हुई तबतक भारत लाहौर के बाहरी इलाकों तक पहुँच चुका था. और पाकिस्तान को स्पष्ट हार का सामना करना पडा था.

# ताशकंद समझौता-

युद्ध तो रुक गया था. लेकिन भारत और पाकिस्तान दोनों एक दूसरे की सीमा के अन्दर के कई इलाकों पर काबिज़ थे. सेनायें अभी भी बॉर्डर पर तैनात थीं. स्थितियां अभी भी तनावपूर्ण थीं. ऐसे में अमेरिका और सोवियत संघ के आग्रह पर जनवरी 1966 को समझौते के लिए भारत और पाक के नेताओं को ताशकंद में आमंत्रित किया गया. ताशकेंत या ताशकंद उज्बेकिस्तान में है. तब उज्बेकिस्तान सोवियत यूनियन का हिस्सा था हालांकि अब अलग आज़ाद देश है. समझौते की मेजबानी की सोवियत के तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसियन ने. समझौते में तमाम सामान्य मुद्दे थे. मसलन दोनों देश अब लड़ेंगे नहीं. और 25 फ़रवरी, 1966 तक दोनों सेनायें अपनी पहले वाली सीमाओं तक पीछे हट जायेंगे. पहले वाली यानी 5 अगस्त, 1965 के पहले की. कहा गया कि दोनों देशों में फिर से डिप्लोमेटिक रिलेशन और बातचीत कायम होगी. व्यापार और ट्रांसपोर्ट शुरू किया जाएगा. पाकिस्तान की तरफ से जो समझौते का मसौदा आया था उसमें लिखा था,

“दोनों देशों के बीच सभी मुद्दे शांतिपूर्ण तरीके से संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत हल किए जाएंगे.” शास्त्रीजी ने ज़ोर दिया कि इस टाइप्ड मसौदे में अयूब अपने हाथ से जोड़े, “बिना हथियारों का सहारा लिए हुए.”

लेकिन मामला जीते गए इलाकों को लेकर अटका था. शास्त्री जी ने कहा कि हाजीपीर का कब्ज़ा हमारी सैन्य मजबूरी थी. उस इलाके से पाकिस्तान घुसपैठ कर रहा था. अयूब खान का कहना था कि वो छम्ब और राजस्थान का जीता हुआ इलाका वापस कर देंगे. लेकिन हिन्दुस्तान को भी जीते गए पाकिस्तानी इलाके से कब्ज़ा छोड़ना होगा. 3 जनवरी से लेके 10 जनवरी तक ताशकंद में अयूब खान और शास्त्री जी के बीच कई बैठकें हुईं. आख़िरकार 10 जनवरी, 1966 को शास्त्री जी ने बेमन ये शर्तें मान लीं और ट्रीटी पर दस्तखत कर दिए.

भारत के प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री, पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुहम्मद अयूब खान और सोवियत प्रधान मंत्री अलेक्सी कोश्यिन की ताशकंद सम्मेलन के दौरान 10 जनवरी, 1966 को रिलीज़ की गई तस्वीर. (AFP)
भारत के प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री, पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुहम्मद अयूब खान और सोवियत प्रधान मंत्री अलेक्सी कोश्यिन की ताशकंद सम्मेलन के दौरान 10 जनवरी, 1966 को रिलीज़ की गई तस्वीर. (AFP)

#शास्त्री जी की मौत-

10 जनवरी को ट्रीटी पर साइन करने के बाद 12 घंटे भी नहीं बीते शास्त्री जी को दिल का दौरा पडा और उनका देहांत हो गया.

हालांकि शास्त्री जी के परिवार ने इसे सामान्य मौत नहीं माना. उनके मुताबिक़ शास्त्रीजी के शरीर पर नीले चकत्ते पड़े हुए थे. ये एक हत्या थी. बाद में कई जांचें भी हुईं लेकिन उनसे कुछ भी साफ़ नहीं हुआ. शास्त्री जी की मौत कैसे हुई ये आज भी एक रहस्य बना हुआ है.

इधर शास्त्री जी के दस्तखत के बाद सीज फायर लागू तो हो गया था लेकिन सीजफायर के साथ-साथ तनातनी भी जारी रही. और पांच साल बाद 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक और युद्ध लड़ा गया. तारीख़ में क़भी उसकी भी बात करेंगे. अभी के लिए शुक्रिया.


ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे शिवेंद्र के साथ मिलकर लिखी गई है.


पिछला वीडियो देखें: जब RAW एजेंट्स ने सिर्फ़ बालों से पाकिस्तान का न्यूक्लियर बम ढूंढ निकाला था-

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