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खुद की कुर्सी बचाने के लिए भारत विरोधी स्टैंड ले रहे हैं ओली?

इस ख़बर की शुरुआत एक पहेली से करते हैं. बताइए, वो क्या चीज है जो नेपाल, श्रीलंका और मालदीव्ज़ जैसे देशों में कॉमन है? वो क्या चीज है, जिसने इन देशों में चीन को अपर-हैंड दिलाया? इस पहेली का जवाब छुपा है कुछ नामों में. उन नामों के साथ जुड़ी हिस्ट्री में. वो हिस्ट्री, जो बताती है कि इट्स ऑल अबाउट द लीडर्स. देश को डुबोने के लिए एक लीडर काफी होता है.

टेक्स्टबुक उदाहरण नंबर एक: मालदीव्ज़
सबसे पहले क़िस्सा हिंद महासागर में बसे द्वीपीय देश मालदीव्ज़ से. यहां एक राष्ट्रपति हुए, अब्दुल्ला यामीन. 2013 से 2018 के अपने कार्यकाल में अब्दुल्ला यामीन ने दो प्रमुख काम किए. पहला, भारत के नज़दीकी रहे मालदीव्ज़ को चीन के पाले में ले गए. दूसरा, चीन से भारी-भरकम कर्ज़ लेकर मालदीव्ज़ को पेइचिंग का ग़ुलाम बना दिया. उन्होंने मालदीव्ज़ की करीब 17-18 पर्सेंट ज़मीन लीज़ पर चीन को दे दी. मालदीव्ज़ को चीन के कर्ज़ जाल में फंसाने के बदले उन्होंने ख़ुद भी ख़ूब पैसा कमाया. 2018 में चीन की लाख कोशिशों के बावजूद यामीन के हाथों से सत्ता निकल गई. उनकी जगह आए इब्राहिम मुहम्मद सोलिह. नई सरकार ने यामीन पर भ्रष्टाचार का मुकदमा चलवाया. मनी लाउंड्रिंग के केस में यामीन को पांच साल जेल की सज़ा मिली. यामीन ख़ुद तो गए मगर मालदीव्ज़ पर करीब साढ़े बाइस हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ लाद गए.

Pm Modi And Ibrahim Mohamed Solih
पीएम मोदी के साथ मालदीव्ज़ के राष्ट्रपति इब्राहिम मुहम्मद सोलिह (फोटो: एपी)

टेक्स्टबुक उदाहरण नंबर दो: श्रीलंका
अब्दुल्ला यामीन की ही कैटगरी में आते हैं महिंदा राजपक्षे. 2005 से 2015 के बीच बतौर राष्ट्रपति दो कार्यकाल पूरे किए राजपक्षे ने. उनकी सत्ता चीन के लिए बहुत शुभ रही. राजपक्षे चीन से कर्ज़ मांगते जाते और चीन कर्ज़ देता जाता. श्रीलंका के सिर पर चीन का कर्ज़ हो गया करीब 83 हज़ार करोड़ रुपया. इसी कर्ज़ के कारण दिसंबर 2017 में श्रीलंका को अपना हंबनटोटा बंदरगाह चीन के सुपुर्द करना पड़ा. नवंबर 2019 में राजपक्षे दोबारा PM बन गए. आशंका है कि हंबनटोटा की तरह आगे भी श्रीलंका की अपनी संप्रभुता चीन के हाथों गिरवी रखनी होगी.

Mahinda Rajpakshe With Modi
पीएम मोदी के साथ श्री लंका के पीएम महिंदा राजपक्षे (फोटो: एपी)

नेपाल चैप्टर…
हमने शुरुआत में कहा था-दिस स्टोरी इज़ ऑल अबाउट द लीडर्स. ऐसे लीडर, जो अपने हित मज़बूत करने के लिए अपने देश को चीन के डेब्ट ट्रैप में फंसा रहे हैं. इस कैटगरी की ताज़ी एंट्री हैं- खड्ग प्रसाद शर्मा ओली. नेपाल के प्रधानमंत्री. जिन्होंने 28 जून को भारत पर इल्ज़ाम लगाया. बोले, भारत उन्हें सत्ता से हटाने की साज़िश रच रहा है. ओली ने कहा-

हाल के दिनों में हो रही बौद्धिक चर्चाएं, नई दिल्ली से आ रही मीडिया रिपोर्ट्स, नेपाल स्थित भारतीय दूतावास की गतिविधियां और काठमांडू के अलग-अलग होटेल्स में हो रही मीटिंग्स. इन सबको देखते हुए ये समझना कतई मुश्किल नहीं कि मुझे सत्ता से हटाने की सरेआम साज़िश रची जा रही है. मगर साज़िश करने वाले कामयाब नहीं होंगे.

पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?
ये पहली बार नहीं, जब ओली ने भारत विरोधी बयान दिया हो. वो पिछले कई महीनों से लगातार भारत-विरोधी बातें कर रहे हैं. जानकारों के मुताबिक, जिस अनुपात में ओली की ज़मीन खिसक रही है. उसी अनुपात में वो भारत-विरोधी अजेंडे पर धार चढ़ा रहे हैं. भारत-विरोध की उनकी इस पॉलिटिक्स का कारण क्या है? ओली किस तरह नेपाल की संप्रभुता को दांव लगा रहे हैं? आगे के हिस्से में हम इन सारे सवालों के जवाब देंगे.

वन्स अपन अ टाइम…
ये कहानी शुरू हुई 2015 में. इस साल सितंबर महीने में नेपाल को उसका नया संविधान मिला. इसके बाद देश में चुनाव हुए. इसी चुनाव में जीतकर पहली बार प्रधानमंत्री बने के पी शर्मा ओली. तारीख़ थी- 11 अक्टूबर, 2015. प्रधानमंत्री बनने से पहले ओली विदेश मंत्री जैसे कई अहम पदों पर रहे थे. उन दिनों वो भारत के दोस्त समझे जाते थे. प्रधानमंत्री बनने के बाद वो दोस्ती गायब हो गई. करीब 10 महीने लंबे ओली के इस कार्यकाल में दो मुख्य घटनाएं हुईं. दोनों ऐसी घटनाएं, जिनका आपस में गहरा राब्ता था.

क्या थीं ये घटनाएं?
पहला, सितंबर 2015 में शुरू हुआ इकॉनमिक ब्लॉकेड.
दूसरा, नेपाल की चीन से बढ़ती नज़दीकियां.

जिऑग्रफी…
इसके लिए आपको नेपाल का भूगोल समझना होगा. नेपाल एक लैंड-लॉक्ड देश है. माने, इसकी सीमाएं चारों तरफ विदेशी ज़मीन से घिरी हैं. स्वतंत्र कारोबार के लिए इसके पास अपना कोई समुद्री तट नहीं. यानी, इसे कारोबार और ज़रूरी सप्लाई के लिए अपने पड़ोसी देशों पर निर्भर रहना होगा. पड़ोसी देश, माने भारत और चीन. भारत का नाम पहले लिया, क्योंकि भारत के साथ इसकी सबसे लंबी सीमा है. करीब 1,850 किलोमीटर लंबी. ये सीमाएं जुड़ी हैं पांच भारतीय राज्यों से. ये राज्य हैं- बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड. यानी दक्षिण, पूरब और पश्चिम तीनों दिशाओं में भारत. उत्तर की दिशा में नेपाल से सटा है तिब्बत. जिसपर चीन का कब्ज़ा है.

Nepal
नेपाल (स्क्रीनशॉट: गूगल मैप्स)

फ़ायदा भी, नुकसान भी…
इस भौगोलिक स्थिति के कारण कई मामलों में भारत पर निर्भर है नेपाल. इस निर्भरता के फ़ायदे भी हैं और नुकसान भी. फ़ायदा ये कि नेपाल और भारत बहुत पुराने दोस्त हैं. सांस्कृतिक जुड़ाव है दोनों के बीच. करीब 80 लाख नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं. उनके करीब 32 हज़ार गोरखा सिपाही भारतीय सेना का हिस्सा हैं. ये फ़ायदा था. अब नुकसान पर आते हैं. पेट्रोल-डीज़ल से लेकर गैस और अनाज़, सारी ज़रूरी चीजों की सप्लाई के लिए भारत पर निर्भर करता है नेपाल. ऐसे में अगर भारत नाराज़ हो, तो नेपाल की मुसीबत.

ब्लॉकेड…
2015 में भी ऐसा ही हुआ. नेपाल के तराई इलाकों में मधेशी आबादी रहती है. मधेशी अधिकारों के प्रति भारत की हमदर्दी है. इन मधेशियों को नेपाल के नए संविधान से शिकायत थी. उनका कहना था कि संविधान में उनके साथ भेदभाव हुआ है. उन्होंने इसका विरोध करना शुरू किया. नेपाल के इस आंतरिक हंगामे का असर पड़ा भारत से सटी उसकी सीमा पर. यहां एक अनकहा आर्थिक ब्लॉकेड शुरू हुआ. सप्लाई लेकर नेपाल जाने वाले ट्रक सीमा के पार खड़े रहे. इसी साल अप्रैल में नेपाल के अंदर एक बड़ा भूकंप आया था. नेपाल को ज़रूरी सप्लाई की सख़्त ज़रूरत थी. इतनी डेस्परेट स्थिति में हुए इकॉनमिक ब्लॉकेड ने वहां ज़रूरी चीजों की किल्लत पैदा कर दी. नेपाल में भारत के लिए नाराज़गी बढ़ी. और इस नाराज़गी ने पिछले कुछ समय से करीब आ रहे नेपाल और चीन के बीच नज़दीकियां बढ़ा दीं.

Nepal Earthquake
नेपाल भूकंप, 2015 (फोटो: एपी)

इसमें किसका घाटा?
ये नज़दीकियां बढ़ाने के आर्किटेक्ट बने प्रधानमंत्री ओली. उन्होंने चीन को नेपाल का नया भारत बनाने की तैयारी शुरू कर दी. नया भारत, माने भारत का विकल्प. मार्च 2016 में चीन के साथ व्यापारिक संधि की. तिब्बत को सेंट्रल नेपाल से जोड़ने वाले रेलवे लिंक को मंज़ूरी दी. 2015-16 के बीच नेपाल में जितना विदेशी निवेश हुआ, उसका करीब 42 प्रतिशत अकेले चीन ने किया. पश्चिमी सेति बांध. पोखरा एयरपोर्ट. ऊपरी त्रिशूली पनबिजली परियोजना. ऐसे कई इन्फ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा प्रॉजेक्ट्स में चीन की फंडिंग आई. साथ-साथ, चीन के ‘बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव’ में भी शामिल हो गया नेपाल.

ओ तारणहारे…
इस सरकार में दो पावर सेंटर्स थे. एक, ओली. दूसरे, पुष्प कमल दहल. शुरू में सब ठीक रहा. मगर फिर खटास बढ़ने लगी. दहल सपोर्ट वापस लेना चाहते थे. लेकिन कहते हैं कि चीन ने दहल पर दबाव बनाया और ओली को बचाया. उस वक़्त तो बच गए ओली. मगर फिर जुलाई 2016 में उनकी कुर्सी चली गई. नेपाली कांग्रेस पार्टी और कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल माओइस्ट के प्रेशर में उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा. इस्तीफ़े की वजह थीं शिकायतें. विपक्षियों का कहना था कि ओली नए संविधान पर जारी गतिरोध को ख़त्म करने में नाकाम रहे हैं. मगर इन आरोपों से इतर ओली का कहना था कि उन्हें भारत ने हटवाया है.

बंदा परवर थाम लो जिगर, फिर वही दिल लाया हूं…
अगस्त 2016 में सत्ता से निकले ओली की वापसी हुई फरवरी 2018 में. वो फिर से नेपाल के प्रधामंत्री बने. ओली के जीतने की मुख्य थीम थी राष्ट्रवाद. उनकी कम्यूनिस्ट पार्टी ने भारत-विरोधी अभियान पर ज़ोर दिया. नेपाल को चीन के करीब लाने का वायदा किया. ओली और चीन की आपसी अंडरस्टैंडिंग के कारण चीन ने नेपाल में हाथ खोलकर निवेश करना शुरू किया. ये दोस्ती कितनी मज़बूत है, इसका एक नज़ारा दिखा अक्टूबर 2019 में. इस महीने चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग नेपाल दौरे पर आए. 1996 में जियांग ज़ेमिन की नेपाल यात्रा के बाद ये पहली बार था, जब चीन के राष्ट्रपति ने नेपाल में कदम रखा था. इस यात्रा के दौरान दोनों देशों में करीब 20 बड़े समझौते हुए. इनमें कनेक्टिविटी, सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, द्विपक्षीय कारोबार, नेपाली सामान की चीनी बंदरगाहों तक पहुंच, शिक्षा और पर्यटन जैसी चीजें शामिल थीं. चीन ने कहा कि वो अगले दो साल में नेपाल को करीब 3,800 करोड़ रुपये देगा.

Oli Jinping
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली (फोटो: एपी)

जब घिरी काली घटा, तुम याद आए…
ये तो हुई ओली की प्रो-चाइना पॉलिसी. अब समझते हैं कि भारत के प्रति उनका विरोध दिनोदिन बढ़ क्यों रहा है? ओली के इस ऐंटी-इंडिया स्टैंड में एक दिलचस्प संयोग है. कैसा संयोग? ये संयोग है आनुपातिक. उधर नेपाल में ओली की सत्ता कमज़ोर हो रही है. और इधर उनके भारत-विरोधी बयान तेज़ हो रहे हैं? ये अनुपात कैसे काम कर रहा है, इसको समझिए.

फिर वही रात है…
इतिहास फिर से ख़ुद को दोहरा रहा है. ओली के हालात कमोबेश बिल्कुल पिछली बार की तरह हैं. कैसे, यूं समझिए. ओली के राजनैतिक दल का नाम है- नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी. शॉर्ट में, NCP. इसके दो मुखिया हैं. एक, ओली. दूसरे, पुष्प कमल दहल. जिनका प्रचलित नाम है प्रचंड. पार्टी के जॉइंट चेयरपर्सन होने के अलावा ओली प्रधानमंत्री हैं. उनके ऊपर दोनों में से एक पद छोड़ने का दबाव है.

देज़ा वू…
NCP की सबसे ताकतवर बॉडी है, इसकी स्टैंडिंग कमिटी. यहां ओली अल्पसंख्यक हैं. ये पैनल पिछले कुछ महीनों से लगातार ओली पर एक पद छोड़ने का दबाव बढ़ा रहा है. प्रचंड समेत इस कमिटी के कई सदस्य खुलकर ओली विरोधी बयान दे रहे हैं. इस दबाव को काउंटर करने के लिए ओली कर रहे हैं भारत-विरोधी अजेंडे का इस्तेमाल. लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा पर भारत से भिड़ना. दशकों पुराने सीमा विवाद को बातचीत से सुलझाने की जगह इसे नेपाली अस्मिता का सवाल बनाना. नया राजनैतिक मानचित्र लाना. उसे संसद में पास कराना. जानकारों के मुताबिक, ये सब सत्ता बचाने की ख़ातिर कर रहे हैं ओली. वो साबित करना चाहते हैं कि भारत के खिलाफ़ खड़े होने, उससे बैर मोल लेने का माद्दा बस उनके पास है. ओली अपने पिछले कार्यकाल में भी इसी तरह ऐंटी-इंडिया स्टैंड को दूहने की कोशिश कर चुके हैं. तब भी सत्ता को जाते देखकर उन्होंने भारत विरोध बढ़ा दिया था.

Pushpa Kamal Dahal Prachanda
पुष्प कमल दहल प्रचंड. (फोटो: एएफपी)

‘सूत्रों’ के हवाले से…
ओली को लग रहा है, भारत के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलना उन्हें बचा लेगा. इस आत्मविश्वास के बूते वो अपनी पार्टी को भी नज़रंदाज़ कर रहे हैं. मसलन, अभी 26 जून की मिसाल लीजिए. इस दिन NCP की स्टैंडिंग कमिटी ने एक बैठक बुलाई. मीटिंग का वेन्यू तय हुआ ओली का आधिकारिक आवास. ओली मीटिंग में आने की बात कहकर गायब हो गए. गायब इसलिए हुए कि उन्हें पता था मीटिंग में वो घेरे जाएंगे. अब ख़बर है कि पार्टी उनकी छुट्टी करने की तैयारी कर रही है.

चीन कौन सा बेहतर ऑप्शन है?
ऐसा नहीं कि नेपाल में भारत से नाराज़गी रखने वाले अकेले ओली ही हैं. वहां भारत से बहुत सारी शिकायतें हैं. आम लोगों में भी और नेताओं में भी. मगर एक बड़ा वर्ग मानता है कि भारत से बिल्कुल बिगाड़ लेना समाधान नहीं है. आप तीन दिशाओं में घिरे अपने पड़ोसी के साथ बिल्कुल वास्ता ख़त्म नहीं कर सकते. वो भी चीन जैसे देश के बूते. चीन पहले खुले हाथों कर्ज़ देता है. फिर उस कर्ज़ की वसूली में आपको रेहन रख लेता है.

‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’
ओली समझें न समझें. नेपाल की राजनैतिक पार्टियां इस ख़तरे को अच्छी तरह समझ रही हैं. नेपाली कांग्रेस जैसे राजनैतिक दल प्रो-चाइना पॉलिसी पर कई बार अपना संशय जता चुकी हैं. ओली के भारत पर लगाए आरोपों को भी विपक्ष ने नकार दिया है. उनका कहना है कि पार्टी में मचे अंतर्कलह को रोकने में नाकाम रहे ओली भारत पर झूठा इल्ज़ाम लगा रहे हैं. विपक्ष के मुताबिक, ओली की सरकार वैसे भी गिरने ही वाली है. ऐसे में ओली विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं. सोच रहे हैं, भारत पर उंगली उठाकर जनता की सहानुभूति हासिल करें. दिखाएं कि भारत विरोधी स्टैंड लेने के कारण उनकी सत्ता जा रही है.

चीन के इरादे किसी से नहीं छुपे. ऐसे में नेपाल के साथ रिश्ते सुधारने का जिम्मा अकेले नेपाल का नहीं है. जिम्मेदारी भारत की भी है. कन्स्ट्रक्टिव बातचीत से विवाद सुलझाना. नेपाल की शंकाओं और शिकायतों को समझना. उसका भरोसा जीतने की कोशिश करना. द्विपक्षीय सहयोग का विस्तार करना. इन सबमें भारत का भी हित है. जैसे भारत से दुश्मनी मोल लेना नेपाल को डुबाएगा. ऐसे ही नेपाल को खो देना भारत के लिए भी समझदारी वाली बात नहीं कही जाएगी.


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