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जब हार के बावजूद भारतीय जनता पाकिस्तानी टीम के लिए खड़े होकर तालियां बजा रही थीं

भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच यानी भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा इवेंट. सड़कें वीरान हो जाती हैं. ऑफिस में झूठ बोल के छुट्टियां मांगने वालों की तादाद अचानक से बढ़ जाती है. भारत में तो जैसे राष्ट्रीय त्यौहार ही आ जाता है. इस खेल से इतनी भावनाएं जुड़ी हैं लोगों की के मैदान पर हुई हार-जीत सीधे व्यक्तिगत जीवन पर असर डालती है. जीत की ख़ुशी में लोग पल्ले से पैसे खर्च कर के मोहल्ले भर को मिठाइयां खिलाते हैं. हार के ग़म में टीवी से लेकर किसी का सर तक तोड़ डालते हैं. खिलाड़ियों के पुतले फूंक देते हैं. उनके घरों पर पथराव तक कर आते हैं. ऐसे ही तीखे जज्बातों से लबरेज़ ये खेल जब चिर-प्रतिद्वंदी पाकिस्तान से खेला जाता है, तो उम्मीदें आसमान छू रही होती है.

लेकिन हर बार तो भारत ही नहीं जीत सकता न! कभी-कभी हार भी कबूलनी पड़ती है. ऐसे में मायूस, हताश, निराश दर्शकों का रवैया कैसा हो! चेन्नई के लोगों ने बताया था 18 साल पहले.

दर्शकों के हिंसक हो जाने का नज़ारा कोई दुर्लभ सीन नहीं है भारत में.
दर्शकों के हिंसक हो जाने का नज़ारा कोई दुर्लभ सीन नहीं है भारत में.

एमए चिदंबरम स्टेडियम, चेन्नई (28 से 31 जनवरी 1999)

पाकिस्तान की टीम भारत दौरे पर आई थी. दो टेस्ट मैच खेले गए. पहला चेन्नई में था. अगला टेस्ट दिल्ली में हुआ. आपको याद दिला दें कि दिल्ली वाला टेस्ट मैच वही फेमस मैच था, जिसमें अनिल कुंबले ने अकेले पूरी पाकिस्तान टीम को आउट किया था. सारे दस विकेट झटक लिए थे. ये दिलचस्प बात है कि वही अनिल कुंबले आज की तारीख में भारत के कोच हैं. बहरहाल, बात हो रही थी 1999 के चेन्नई टेस्ट की.

पल-पल पाला बदलता मैच

मैच ठीक उसी तरह चला जिस तरह के मैच की भारत-पाकिस्तान से उम्मीद हुआ करती है. कभी इधर तो कभी उधर. एक सेशन में भारत हावी होता दिखाई देता, तो अगला ही सेशन पाकिस्तान के नाम दर्ज हो जाता. पाकिस्तान ने टॉस जीतकर बल्लेबाज़ी चुनी. कप्तान वसीम अकरम का ये फैसला गलत साबित होता नज़र आने लगा, जब 91 रन पर उनके पांच विकेट गिर गए. लेकिन उसके बाद युसूफ योहाना (मुहम्मद युसूफ), मोईन ख़ान और खुद वसीम अकरम ने मिल कर थोड़ी अच्छी क्रिकेट खेली और पाकिस्तान के स्कोर को सम्मानजनक मुकाम तक ले गए. पहली पारी ख़त्म होने पर पाकिस्तान का स्कोर था 238.

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जवाब देने उतरी भारत की टीम अच्छी शुरुआत को बड़े स्कोर में तब्दील करने में नाकाम रही. द्रविड़ और गांगुली की अर्धशतकीय पारियों की बदौलत जैसे-तैसे 254 रन जोड़ लिए टीम इंडिया ने. पाकिस्तान के स्कोर से सिर्फ 16 रन ज़्यादा. कुल मिलाकर मामला बराबरी पर छूटा. जब पाकिस्तान दूसरी पारी में खेलने उतरा तो ज़्यादा फोकस्ड था. शाहिद अफ्रीदी ने शतक जड़ दिया. 141 रन ठोक डाले. एक समय स्कोर 4 विकेट पर 275 हो गया था. पाकिस्तानी टीम बेहद मज़बूत स्थिति में दिख रही थी. तभी वेंकटेश प्रसाद का कातिल स्पेल आया. देखते ही देखते वो पाकिस्तान के 5 विकेट खा गए. पूरी पाकिस्तान की टीम 286 रन बना कर लुढ़क गई. एक तरफ़ा होते जा रहे मैच में अब जान पड़ चुकी थी.

आख़िरी पारी में भारतीय टीम ने वही किया जो उस दौर में अक्सर करती थी

चौथी पारी में जब भारत बैटिंग करने उतरा तो घरेलु दर्शकों को जीत की पूरी उम्मीद थी. उन्हें पूरा भरोसा था कि सचिन, द्रविड़, गांगुली, लक्ष्मण, अज़हर जैसे स्टार खिलाड़ियों से सजी भारतीय टीम आसानी से 271 रन का टार्गेट चेज़ कर लेगी. लेकिन पाकिस्तानी टीम के इरादे कुछ और ही थे. पाकिस्तानी पेस बैटरी वकार यूनुस-वसीम अकरम और स्पिनर सकलेन मुश्ताक ने मिल कर भारत के टॉप ऑर्डर की कमर तोड़ दी. देखते ही देखते टॉप के पांच बल्लेबाज़ पवेलियन लौट चुके थे और स्कोर बोर्ड पर चमक रहे थे सिर्फ 82 रन.

सचिन का संघर्ष

ऐसे कठिन समय में एक बार फिर टीम का तारणहार बन के उतरे सचिन रमेश तेंडुलकर. पहली पारी में ज़ीरो पर आउट होना उन्हें काफी अखर गया था शायद. इस बार वो दृढनिश्चय के साथ क्रीज़ पर उतरे प्रतीत होते थे. उनको साथ मिला विकेटकीपर नयन मोंगिया का. दोनों ने मिल के टीम के डूबते जहाज को उबारा. स्कोर 218 तक ले गए. यहां मोंगिया आउट हो गए. सचिन ने फिर भी हार नहीं मानी. वो जूझते रहे. पाकिस्तानी गेंदबाज़ी से भी और अपने पीठ के दर्द से भी. पीठ में ऐंठन आने के बावजूद सचिन उस टेस्ट मैच में डटें रहे. 405 गेंदे खेलीं. 136 रन बनाए.

उस मैच में अकेले जान लड़ाते सचिन तेंडुलकर.
उस मैच में अकेले जान लड़ाते सचिन तेंडुलकर.

आज भी ये पारी सचिन की चुनिंदा बेहतरीन पारियों में गिनी जाती है. अफ़सोस कि ये मैच न जिता सकी.

सचिन आउट मतलब गेम फिनिश

हां ये वही ज़माना था. सचिन के आउट होने पर लोग मैच जीतने की उम्मीद छोड़ दिया करते थे. कम से कम इस मैच में तो ये बात सही ही साबित हुई. अपने बेहतरीन संघर्ष से सचिन टीम को जीत के मुहाने तक ले आए थे. जब सचिन आखिरकार आउट हुए टीम इंडिया को जीतने के लिए सिर्फ 17 रनों की ज़रूरत थी. बाकी बल्लेबाज़ों से ये न हो पाया. अगले 4 रनों में पूरी टीम घर वापसी करवा आई. पाकिस्तान ने मैच 12 रनों से जीता.

चेन्नई के दर्शकों ने जो किया उससे रोंगटे खड़े हो गए

एक जीता हुआ मैच हार जाने का दुःख क्या होता है ये किसी भी रैंडम भारतीय क्रिकेटप्रेमी को रोक कर पूछ लीजिए. वो डिटेल में बताएगा आपको. और उस पर मैच अगर पाकिस्तान से हारा हो तो कहना ही क्या! दुःख का एवरेस्ट आ उतरता है दर्शकों के कंधों पर. उस समय एमए चिदंबरम स्टेडियम में मौजूद दर्शकों की क्या हालत हुई होगी इसका अंदाज़ा लगाना कोई ज़्यादा मुश्किल काम नहीं है. उसके बावजूद उन्होंने जो किया उसने क्रिकेट के सम्मान में बेतहाशा इज़ाफ़ा किया.

मैच जीतने के बाद ख़ुशी से बावली हुई पाकिस्तानी क्रिकेट टीम में विक्ट्री लैप लिया. पूरे स्टेडियम का दौड़ते हुए चक्कर लगाना शुरू किया. और……

और चेन्नई के दर्शकों ने उनके सम्मान में खड़े होकर पूरे दिल से तालियां बजाई. तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा स्टेडियम गूंजता रहा. ऐसी बेमिसाल हौसलाअफज़ाई की पाकिस्तानी टीम को भी उम्मीद नहीं रही होगी. आज भी वो दृश्य याद कर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

हरिवंशराय बच्चन से शब्द उधार लेकर कहना ही पड़ेगा: "ये महान दृश्य है".
हरिवंशराय बच्चन से शब्द उधार लेकर कहना ही पड़ेगा: “ये महान दृश्य है”.

दुश्मनी सिर्फ मैच जारी रहने तक. उसके बाद तो सिर्फ खेल की तारीफ़ होनी चाहिए. ये उम्दा सबक चेन्नई की जनता ने उस दिन तमाम खेलप्रेमियों को सिखाया. आज जब भारत-पाक मैच को युद्ध जैसा बना दिया जाता है. महा-टक्कर, महा-मुकाबला जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं. तो ऐसे में ज़रूरत महसूस होती है चेन्नई जैसी सेंसिबल जनता की, जो खेल का आनंद सिर्फ खेल की तरह ले सकें. उसे जंग में तब्दील न करे. कल मैच देखते वक़्त ये बात याद रखिएगा दोस्तों. भारत जीतता है तो पटाखे ज़रूर फोडिए. लेकिन अगर पाकिस्तान जीतती है तो उसके लिए तालियां बजाने में भी कोई हर्ज नहीं होना चाहिए. खेल तो आखिर खेल ही है ना!

इस वीडियो को देखिए और चेन्नई की जनता से कुछ स्पोर्ट्समैनशिप सीखिए:


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