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भारत के आज़ाद होने की रात ब्रिटेन का सबसे ताकतवर आदमी कौन सी फिल्म देख रहा था?

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तारीख- 14 अगस्त, 1947
जगह- लंदन, इंग्लैंड

ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी लंदन. यहां हाउसेज़ ऑफ पार्लियामेंट के उत्तर की तरफ थेम्स नदी के किनारे साल 1859 से खड़ा मशहूर घंटाघर- बिग बेन. घड़ी ने रात के साढ़े आठ बजाए होंगे. आधी रात होने में अभी वक़्त था. मगर आज की कहानी का स्टार इग्लैंड नहीं है. वो जगह है लंदन से करीब 6,707 किलोमीटर दूर बसा एक शहर. वो भी ब्रिटिश साम्राज्य की एक राजधानी है. वहां की घड़ियां आधी रात का घंटा बजाने वाली हैं.

जगह- नई दिल्ली
14-15 अगस्त, 1947 की दरमियानी रात. 11 से 12 के बीच का समय. 

मौसम में बारिश बाद की उमस थी. नई दिल्ली का किंग्सवे कैंप. यहां वायसरॉइज़ हाउस. आगे चलकर इसे नया नाम मिलने वाला है- राष्ट्रपति भवन. बाकी हिंदुस्तान से बिल्कुल अलग मूड. यहां शांति थी. 47 साल के अर्ल माउंटबेटन पत्नी एडविना के साथ बॉब होप की नई आई फिल्म देख रहे थे- माय फेवरिट ब्रूनेट. हीरो रोनी जेक्सन को फांसी चढ़ाया जाने वाला है. और वो रिपोर्टर्स को फांसी के फंदे तक पहुंचने की अपनी कहानी सुनाता है. कहानी में एक लड़की है. जो अपनी खूबसूरत अदाओं से आदमियों को एक खतरनाक साज़िश का हिस्सा बना देती है. फिल्म की चॉइस चाहे जो हो. सच ये था कि आज ब्रिटिश साम्राज्य, जिसके नुमाइंदे थे वायसरॉय माउंटबेटन, 200 सालों से ज़्यादा समय से चली आ रही अपनी साज़िश का अंत कर रहा था. अपनी सत्ता छोड़ रहा था. मगर जाते-जाते, अंग्रेज़ों ने इसी दिल्ली से भारत को काटकर दो नए देश बना दिए. जैसे दुर्गा सप्तशती की कहानी का रक्तबीज. जिसके खून की छीटें जी जाती थीं.

अभी कुछ मिनट थे आधी रात होने में. पर्यायवाची- भारत आज़ाद होने में. माउंटबेटन ने कभी बाद में इन घड़ियों की कहानी बताई. कि वो सोच रहे थे-

चंद और, चंद और मिनट. अभी कुछ और मिनटों तक मैं इस धरती का सबसे ताकतवर इंसान हूं.

और ठीक आधी रात माउंटबेटन की ये ताकत चली गई. यश चोपड़ा ने सालों बाद ‘वक़्त’ बनाई. वरना बलराज साहनी पर आया वो गाना, तब यहां माउंटबेटन के बैकग्राउंड में कितना ऐप्ट रहता-

आदमी को चाहिए वक़्त से डरकर रहे
कौन जाने किस घड़ी वक़्त का बदले मिज़ाज
वक़्त से दिन और रात
वक़्त से कल और आज
वक़्त की हर शै ग़ुलाम
वक़्त का हर शै पे राज

न्यू यॉर्क टाइम्स ने अपनी एक स्टोरी में 14 और 15 अगस्त, 1947 का ये सारा घटनाक्रम बड़े विस्तार से बताया है. वायसरॉय हाउस के अंदर खामोशी थी. मगर इससे थोड़ी दूर ‘चैंबर ऑफ कॉन्स्टिट्यूऐंट असेंबली’ के भीतर सैकड़ों लोग बैठे भारत के आज़ाद होने की घड़ी देख रहे थे. ये जगह अब भारत की संसद कहलाने वाली थी. यहीं पर रात के ठीक बारह बजे जवाहरलाल नेहरू, आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री, अपना मशहूर भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टनी’ दे रहे थे. बाहर सड़कों पर, गलियों में मंदिर की घंटियों का समवेत संगीत- टन टन. लोग पटाखे फोड़ रहे थे. भीड़ इतरा रही थी. चौक-चौराहों पर अलग किस्म का रावण दहन हो रहा था. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पुतले फूंके जा रहे थे.

अगले दिन. 15 अगस्त, 1947 को. भारत के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद. और, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू. दोनों को वायसरॉय हाउस में न्योता गया. जब वो आए, तो माउंटबेटन अपने स्टडी रूम में थे. बाहर पत्रकारों का तांता. देश-विदेश के. बेस्ट ऐंगल से तस्वीर खींचने की कोशिश करते हुए. ये सारी तस्वीरें हिस्ट्री थीं. यहीं पर बतौर राष्ट्रपति प्रसाद माउंटबेटन को कहने वाले थे. कि अब वो भारत के गवर्नर जनरल का पद स्वीकार करें. मगर प्रसाद इतने थके हुए थे कि इस इनविटेशन की लाइन पूरी नहीं बोल सके. उनकी मदद को आगे आए नेहरू. उन्होंने पंक्ति पूरी की. माउंटबेटन ने खुशी-खुशी अपनी मंजूरी भी दे दी. मोमेंट एन्जॉय करने के लिए माउंटबेटन ने टोस्ट किया. हाथ में ग्लास लेकर माउंटबेटन ने कहा- टू इंडिया. पास में खड़े नेहरू अपना ग्लास ऊंचा करके बोले-

टू किंग जॉर्ज सिक्स्थ.

क्या कॉन्ट्रास्ट था. हिंदुस्तान में अंग्रेजों का सबसे बड़ा नुमाइंदा ‘टू इंडिया’ का जाम उठा रहा है. और सालों से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत करने वाला भारत का प्रधानमंत्री बनकर ब्रिटेन के राजा के नाम टोस्ट कर रहा है. वही नेहरू, जिन्होंने कुछ सालों पहले श्रीलंका में एक दावत में शरीक होने से इनकार कर दिया था. बस इस बात पर कि वहां अंग्रेजों के राजा और वहां की सरकार के नाम पर जाम उठाया जाता.

तब और अब में फर्क था. तब नेहरू गुलाम थे. अब आज़ाद देश के प्रतिनिधि. गुलामी खत्म हो गई थी. अब किंग जॉर्ज और नेहरू, हिंदुस्तानी और अंग्रेज, बराबर हो गए थे. इसी बराबरी की तो लड़ाई थी.


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