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मोदी और राहुल, जिसके पास भी ये सर्टिफिकेट होगा, वो गुजरात चुनाव जीत जाएगा!

गुजरात चुनाव के लिए हो रहे चुनाव प्रचार में इन दिनों एक सर्टिफिकेट की लड़ाई चल रही है. बीजेपी और कांग्रेस, दोनों खुद से ही खुद को ये सर्टिफिकेट दे रही हैं. दोनों मुख्य पार्टियों के बीच खुद को ज्यादा गुजराती साबित करने की लड़ाई चल रही है. एक के कर्ता-धर्ता हैं नरेंद्र मोदी. दूसरे के मुखिया हैं राहुल गांधी. दोनों में होड़ है, खुद को ज्यादा गुजराती साबित करने की. आप दोनों नेताओं का चुनाव प्रचार देखिए. दोनों की बातें सुनिए. दोनों का अंदाज देखिए. गुजरात और गुजराती शब्द का इस्तेमाल भर-भरकर मिलेगा. नारों की शक्ल में एक-दूसरे को जवाब देते वक्त भी गुजराती वाली होड़ खूब दिख रही है. पहल की कांग्रेस ने. नारा दिया, विकास गांडो था अ यो छे. हिंदी में समझिए, तो विकास पागल हो गया है. विकास कोई नया शब्द नहीं है. मगर 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से देश में जब भी ‘विकास’ का नाम लिया जाता है, तो मोदी जी ही याद आते हैं. उनक पार्टी ने तो उन्हें ‘विकास पुरुष’ का तमगा भी दिया हुआ है.

हां, तो फिर क्या हुआ कि कांग्रेस के नारे के जवाब में बीजेपी खूब सारे वीडियो लाई. नारा दिया, ‘हू छू विकास, हू छू गुजरात’. माने, मैं ही विकास हूं और मैं ही गुजरात हूं. इस नारे की एक बड़ी वजह ‘गुजराती पहचान’ को कैश करने की बीजेपी की कोशिश थी. बीजेपी को दिखाना था कि राहुल बाहरी हैं, गुजराती तो मोदी हैं. बस मोदी ही क्यों, गुजरात के ही एक और लाल, अमित शाह इस समय बीजेपी के मुखिया भी हैं. जनता खूब देखती है ये सब. हमारे राज्य का, हमारे शहर का, हमारी जाति का, हमारे धर्म का कौन किस बड़ी जगह पर है. बीजेपी के इस वार का जवाब कांग्रेस ने भी इसी जुबां में दिया. बीजेपी के ‘हू छू गुजरात’ के जवाब में कांग्रेस ने कहा, हू छू पक्को गुजराती. लड़ाई गुजराती होने से आगे बढ़ गई. फोकस ‘पक्के गुजराती’ पर शिफ्ट कर दिया गया.

प्रतीकों पर खास ध्यान दिया जा रहा है. कभी गुजराती पगड़ी, कभी गुजराती खाना, तो कभी गुजराती जुबान, नेता इन तरीकों से लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहे हैं.

खुद को ज्यादा से ज्यादा गुजराती दिखाने के लिए प्रतीकों का भी खूब इस्तेमाल हो रहा है. कभी अमित शाह की तस्वीरें आती हैं. किसी पार्टी कार्यकर्ता के घक पर गुजराती खाना खाते हुए. तो कभी राहुल गांधी गुजराती पगड़ी बांधे दिखते हैं. नरेंद्र मोदी अक्सर अपनी रैलियों और सभाओं में गुजराती बोलते सुनाई पड़ते हैं. खाना, गुजराती बोलना और गुजरातियों ‘जैसा दिखने’ की ये लड़ाई इतिहास को भी नहीं बख्श रही. दोनों पार्टियों के नेता महात्मा गांधी और सरदार पटेल पर दावेदारी जताने की कोशिश कर रहे हैं. भारतीय इतिहास के ये दोनों बड़े नेता गुजरात से ताल्लुक रखते हैं. ये दोनों ही इंडियन नैशनल कांग्रेस के नेता थे, मगर बीजेपी किसी भी कीमत पर नहीं चाहती कि ये ‘कांग्रेस की प्रॉपर्टी’ बनकर रह जाएं. हमें मालूम नहीं कि आज की राजनीति पर गांधी और पटेल का कितना असर है. मगर जिस तरह से दोनों पार्टियां खुद को इन नेताओं की विरासत से जोड़ने की कोशिश कर रही है, उससे तो ये ही लगता है कि गांधी और पटेल, दोनों आज भी बड़े अहम हैं.

चुनाव प्रचार करते अमित शाह
चुनाव प्रचार करते अमित शाह

ये तो हुई प्रतीकों की बात. मगर कांग्रेस की रणनीति इससे भी आगे है. वो खुद को गुजरात के विकास के साथ भी जोड़ रही है. लोगों को बताया जा रहा है कि गुजरात की तरक्की में कांग्रेस ने कितनी मदद की. विज्ञापनों की मदद से लोगों को याद दिलाया जा रहा है कि IIM अहमदाबाद, नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन (NIT) और IIT जैसे संस्थान कांग्रेस की देन हैं. मसलन, कांग्रेस ने एक विज्ञापन जारी किया है. इसमें एक बाप-बेटे की बातचीत दिखाई गई है. बाप कहता है:

कांग्रेस ने विकास का इंजन बनाया. कांग्रेस ने इस इंजन में ईंधन भरा. 24 फीसद विकास दर हासिल कर इस विकास के इंजन को पूरी तेजी से चलाया. फिर बीजेपी के हाथ में आई सत्ता और विकास का ऐक्सीडेंट हो गया. अभी पिछले ही हफ्ते बीजेपी ने एक नया प्रोग्राम शुरू किया है. ये प्रोग्राम है एक नुक्कड़ नाटक. बीजेपी सभी 182 विधानसभा सीटों में जगह-जगह पर ये नुक्कड़ नाटक कराएगी. इसमें बीजेपी लोगों को बताएगी कि पिछले दो दशकों के अंदर गुजरात में कितना विकास हुआ है. जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें करीब आ रही हैं, वैसे-वैसे कांग्रेस और बीजेपी के बीच चल रही गुजरात की ये लड़ाई भी और दहकती जा रही है. नारों में सवाल-जवाब चल रहा है. एक इल्जाम लगाता है, दूसरा जवाबी इल्जाम लगाता है. ज्यादा गुजराती होने की इस होड़ में कौन जीतता है, ये तो 18 दिसंबर को ही मालूम चलेगा. तब, जब वोटों की गिनती होगी.


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