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TV, इंटरनेट से आपके बच्चों पर क्या असर पड़ रहा है?

न्बच्चों की जब भी बात चलती है, तो हम खेलने-कूदने की बात करते हैं, स्कूल की बात करते हैं, उनके दोस्तों और छोटी-मोटी आदतों की बात करते हैं. एक और चीज़ है, जिसे लेकर हम बच्चों को डांटते तो खूब हैं, लेकिन कभी रुककर थोड़ी देर सोचते नहीं कि जो हो रहा है, क्यों हो रहा है. स्क्रीनटाइम. स्क्रीनटाइम आज के बच्चों की ज़िंदगी की सच्चाई है. उनकी क्लासेज़ ऑनलाइन हैं. दोस्त भी ऑनलाइन हैं. और एंटरटेनमेंट भी ऑनलाइन है. बचा वक्त, टीवी के सामने. जहां बच्चों के पास खेलने के लिए जगह नहीं है, वहां बच्चे ज़्यादा वक्त टीवी और फोन के सामने बिताते हैं. और ये अनुभव उनकी पर्सनैलिटी को प्रभावित भी करता है. तो आज इसी की बात होगी कि आपके बच्चे टीवी और फोन पर क्या देखते हैं और उसका उनकी मनःस्थिति पर क्या असर पड़ता है.

..तो स्क्रीनटाइम अच्छा है!

टीवी या फोन की स्क्रीन को इग्नोर करना किसी वयस्क के लिए भी बहुत मुश्किल होता है. हम खुद अपने दिन का एक अच्छा खासा हिस्सा अपने फोन के हवाले किए रहते हैं. ऐसे में बच्चों से ये उम्मीद करना कि वो स्कूल के बाद अपना पूरा वक्त किताबों या मैदान को दे दें, गलत होगा. बच्चे टीवी देखेंगे ही. और अगर आपके पास फोन है, तो उसमें भी उनकी दिलचस्पी होगी ही. कोविड लॉकडाउन ने डेढ़ साल के लिए हम सबको घरों में कैद किया, तो बच्चे भी हमारे साथ थे. तब फोन ही था, जिस पर ज़्यादातर बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज़ हुईं. खासकर उन घरों में, जहां कंप्यूटर या लैपटॉप्स इतने शॉर्ट नोटिस पर खरीदने की सहूलियत मां-बाप के पास नहीं थी. जब हमने पंचायत में दुनिया के अलग अलग कोनों में बसे भारतवंशियों और उनके बच्चों से बात की, तो हमें हॉन्गकॉन्ग से एक बच्ची पीहू ने बताया कि उसे स्केटबोर्डिंग वीडियोज़ देखना भी पसंद है. वो खुद भी स्केटबोर्डिंग करती है, सीख भी रही है. मेलबर्न से पूजा और वृत्तांत ने हमें बताया कि काफी ऑनलाइन कॉन्टेंट ऐसा भी है, जो अच्छी आदतें डेवलप करने में मदद कर रहा है.

यही अनुभव कई और बच्चों और माता-पिताओं का था. बच्चे को करीकुलर एक्टिविटीज़ के साथ-साथ नई भाषाएं तक ऑनलाइन वीडियोज़, सीरीज़, कार्टून्स और टीवी प्रोगराम्स से सीख रहे हैं. यहां तक जिस स्क्रीनटाइम की चर्चा हुई है, उसे ज़्यादातर माता-पिता अपने बच्चों के लिए सही मानते हैं. दिक्कत वहां से शुरू होती है, जब हम ऐसे कॉन्टेंट की बात करते हैं, जिसका मकसद प्रत्यक्ष तौर पर खालिस एंटरटेनमेंट होता है. ज़्यादातर कार्टून्स और बच्चों के सीरियल इसी श्रेणी में आते हैं. और इन्हीं को लेकर ज़्यादातर माता-पिता चिंतित मिले.

दिक्कत कब होती है?

जब बच्चों के कार्यक्रमों पर हमने रीसर्च की, तो हमें उन कार्यक्रमों में कुछ पैटर्न देखने को मिले. इन पर गौर करके हम ये पकड़ पाते हैं कि सीरीज़ या कार्टून निर्माता ने किस तरह से बच्चों को अप्रोच करने की कोशिश की है. और ये भी समझ पाते हैं कि बच्चे इन्हें पसंद क्यों करने लगते हैं. हमने बच्चों के साथ नादान और भोला शब्द को इस तरह मथ दिया है कि हम उनके व्यक्तित्व की जटिलताओं को पकड़ नहीं पाते. बच्चा अपने आसपास के वातावरण में एक ज़िंदगी जीता है. मिसाल के लिए उसका घर और स्कूल. इस ज़िंदगी में उसे कई सारे इंस्ट्रक्शन्स लेने होते हैं. मम्मी बताती हैं कि खेलने कब जाना है, वापस कब आना है. लेकिन पापा कहते हैं कि खेलने तभी जा सकते हो, जब होमवर्क पूरा हो. होमवर्क में क्या करना है, स्कूल में टीचर बताती हैं.

इसीलिए हमारी ही तरह बच्चों में भी इच्छा होती है कि वो किसी कहानी के नायक हों. प्रोटैगोनिस्ट हों. इसीलिए उन्हें वो सीरियल भी पसंद आते हैं जिनमें बच्चे नायक होते हैं, या फिर कहानी उनके इर्द-गिर्द घूमती है. अब ये नायक ज़रूरी नहीं कि सबसे ताकतवर हो, लेकिन वो कहानी की धुरी ज़रूर होता है. मिसाल के लिए पॉ पट्रोल या फिर शिन चैन. शिन चैन एक नॉर्मल बच्चे की कहानी लगती है. कोई सुपर पावर नहीं. बस एक बच्चा जिसका घर है, कुत्ता है और उसी के अडवेंचर सीरीज़ में दिखाए जाते हैं.

बच्चों के डर को भुनाता कॉन्टेंट

दूसरी चीज़ जिस पर हमारा ध्यान थोड़ा कम जाता है, वो है एक बच्चे के डर. बच्चों के शरीर का आकार छोटा होता है. गली में घूमता एक कुत्ता भी उन्हें बहुत बड़ी मुसीबत लग सकता है. अपने एनवायरमेंट में बच्चों को सर्वाइव करने के लिए मानसिक रूप से काफी मशक्कत करनी पड़ती है. चाहे कोई प्रत्यक्ष खतरा न हो, लेकिन कई डर चुपके-चुपके मन में जगह बनाते रहते हैं. डांट खाने का डर, चोट लगने का डर, किसी जानवर का डर या फिर स्कूल में बुलिंग का डर. इसीलिए वो सुपर पावर या सुपर पावर वाले किसी दोस्त की कामना करने लगते हैं. और इसी चीज़ को टार्गेट किया जाता है माशा एंड द बियर में. एक बच्ची है, जिसका दोस्त एक भालू है, जो उसे हर मुसीबत से बचाता है. या फिर सेल्फी विद बजरंगी. इसमें बच्चे की मदद के लिए बजरंग बली हैं. या फिर छोटा भीम. इसमें बच्चा ही सबसे ताकतवर है.

कभी कभी बच्चे ऐसे माहौल में बड़े होते हैं, जहां वो खुद को असहाय पाते हैं. हमें लगता है कि बच्चा नहीं समझ रहा कि मम्मी-पापा के बीच क्या बात हो रही है. लेकिन वो देख रहा होता है और अपनी समझ बना रहा होता है. तब एक इच्छा पैदा होती है कि काश हम चीज़ें बेहतर कर पाते, इस सिचुएशन से सबको निकाल पाते. तब भी बच्चे सुपरहीरोज़ की तरफ देखते हैं. कि अगर ये होता, या इसकी पावर्स मेरे पास होतीं, तो मैं क्या करता या करती.

हम मानें न मानें, ज़्यादातर ऑनलाइन कॉन्टेंट इन्हीं सारी बातों को ध्यान में रखकर बड़ी बारीकी से क्राफ्ट किया जाता है. तभी वो अपनी टार्गेट ऑडियंस माने बच्चों पर इतनी मज़बूत पकड़ बना पाता है. इसीलिए जितने पेरेंट्स इस विचार में लगे रहते हैं कि उनका बच्चा आखिर फोन में घुसकर फलानी सीरीज़ ही क्यों देखता है, उन्हें अपने बच्चों से बात करने के तरीके तलाशने होंगे.

इंटरनेट यूज़ की समीक्षा 

बच्चों के लिए कॉन्टेंट बनाने और परोसने वाले ज़्यादातर कॉन्टेंट क्रिएटर्स और प्लेटफॉर्म्स के लिए बड़े सख्त नियम हैं. कुछ कॉन्टेंट क्रिएटर्स और प्लेटफॉर्म्स जैसे यूट्यूब ने खुद बनाए हैं. और कुछ अलग अलग देशों की सरकारों ने. दुनिया में ज़्यादातर देशों में बच्चों के लिए बन रहे कॉन्टेंट में हिंसा और सेक्शुअल कॉन्टेंट पर सख्त रोक है और उल्लंघन पर कार्रवाई भी हो सकती है. लेकिन ऑनलाइन दुनिया में सीधा फायदा हमेशा नहीं मिल पाता. मिसाल के लिए हम चाहते हैं कि बच्चे तक फिल्टर्ड कॉन्टेंट पहुंचे. लेकिन हमारी टीवी या फोन पर जो प्रोफाइल लॉग्ड इन है, वो हमारी खुद की है. फिर बच्चे और कई बार बुज़र्ग भी कई बार ये कह नहीं पाते कि उन्हें किस तरह का कॉन्टेंट यूट्यूब या दूसरे किसी प्लेटफॉर्म पर सजेशन्स में दिख रहा है.

तो हमें तकनीक के इस्तेमाल में थोड़ा स्मार्ट होना होगा. बस सोशल मीडिया अल्गॉरिदम के भरोसे मत रहें. देखना होगा कि बच्चे जब फोन चला रहे हैं, तो किस प्रोफाइल से लॉग्ड इन हैं. अगर वो आपकी प्रोफाइल है, तो क्या आपने बच्चों के लिए उस कॉन्टेंट को फिल्टर किया? बच्चों के इंटरनेट यूज़ पर ध्यान रखने का एक बढ़िया मॉडल हमें साउथ कोरिया में मिला. यहां माता-पिता और स्कूल दोनों नियमित समय पर इंटरनेट यूज़ की समीक्षा करते रहते हैं.

डिजिटल पढ़ाई पर गाइडलाइंस

जुलाई 2020 में भारत के शिक्षा मंत्रालय ने बच्चों की डिजिटल पढ़ाई को लेकर गाइडलाइन जारी की. इसे कहा गया प्रज्ञाता. डिजिटल पढ़ाई के शारीरिक और मानसिक असर को देखते हुए ये गाइडलाइन जारी की गई थीं. इनके मुताबिक-

पहली से आठवीं – हर रोज़ 30 से 45 मिनट की दो क्लासेज़.

नौंवी से बारहवीं – हर रोज़ 30 से 45 मिनट की चार क्लासेज़.

जुलाई 2020 में बीबीसी पर कमलेश की एक रिपोर्ट छपी. इसमें कमलेश अमेरिकन अकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के हवाले से बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर कुछ सलाह सामने रखते हैं –

# 18 महीने से कम उम्र के बच्चे स्क्रीन का इस्तेमाल ना करें.

# 18 से 24 महीने के बच्चे को माता-पिता उच्च गुणवत्ता वाले प्रोग्राम ही दिखाएं.

# 2 से 5 साल के बच्चे एक घंटे से ज़्यादा स्क्रीन का इस्तेमाल ना करें.

# छह साल और उससे ज़्यादा उम्र के बच्चों के स्क्रीन देखने का समय सीमित हो. सुनिश्चित करें बच्चे के पास सोने, फिजिकल एक्टिविटी और अन्य ज़रूरी कामों के लिए पर्याप्त समय हो.

ऑनलाइन कॉन्टेंट के बच्चों पर पड़ने वाले असर को लेकर हमने विशेषज्ञों से भी बात की है. मनोचिकित्सक डॉ यकिब अली ने कहा –

“इंटरनेट पर अलग-अलग कैटेगरी के कॉन्टेंट हैं. अगर सिर्फ यूट्यूब पर बात करें तो एक तरफ काफी अजीबोगरीब किस्म का कॉन्टेंट है. कुछ ऐसा कॉन्टेंट है, जिसमें एक बच्चा हमेशा कुछ खुराफात करता रहता है या ऐसा जिसमें कोई एक-दूसरे को मार रहा है. वहीं दूसरी तरफ एक रेंज ऑफ कार्टून है. फिर ऐसा कॉन्टेंट है, जो काफी प्रॉबलेमेटिक है, एडल्ट लैंग्वेज इस्तेमाल करता है. इन कॉन्टेंट का बच्चों पर कई तरह से असर पड़ रहा है. वो उन कैरेक्टर्स को कॉपी कर रहे हैं. उनकी बोर होने की क्षमता कम हुई है. जरा भी उनको लगा कि हम बोर हो रहे तो वो तुरंत फोन उठा लेते हैं.”

मनोचिकित्सक वंदना चौधरी कहती हैं कि –

“18 महीने से कम के बच्चों को तो स्क्रीनटाइम ज़रा भी नहीं देना चाहिए. लेकिन हम कुछ महीनों के बच्चों के हाथ में ही मोबाइल फोन थमा देते हैं. 18 महीने के बाद बच्चों को बहुत कम स्क्रीनटाइम दे सकते हैं लेकिन पेरेंट्स साथ में रहें. फिर 5 साल तक के बच्चों के लिए एक साल तक का स्क्रीनटाइम रख सकते हैं. अब अगर 5 साल तक के बच्चों पर स्क्रीनटाइम को लेकर नज़र रखी और उसे ज़रूरी गाइडेंस दिए तो 5 साल के बाद बच्चों में खुद वो समझ डेवलप होने लगेगी.”

तो कुल जमा बात ये है कि TV, इंटरनेट और फोन हमारी और हमारे बच्चों की ज़िंदगी की सच्चाई है. ज़रूरत है इनसे लड़ने की जगह इन्हें समझने की. सही विकल्प चुनने की. बस थोड़ा सा ध्यान लगाने पर आप देखेंगे कि ‘मासूम’ में सूरी ने डीके से कितनी खूबसूरत बात कही थी – जो सुख अपने बेटे को जवान होते देखकर आता है, वो अपनी जवानी में भी नहीं आता था.


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