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दो साल की बच्ची पर बनी इस इंडियन फिल्म ने विदेश में दो अवॉर्ड जीत लिए हैं

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इस बार इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) का 47वां साल है और इसे कुछ वक्त याद रखा जाने वाला है. क्योंकि इसके इंडियन पैनोरमा सेक्शन की ओपनिंग फिल्म ‘न्यूड’ को सरकार ने फेस्टिवल से बाहर कर दिया था. बिना ज्यूरी को बताए. ‘न्यूड’ की जगह ओपनिंग फिल्म बनाई गई विनोद कापरी की ‘पीहू’. वाद-विवाद के बीच फेस्ट खत्म हुआ और ‘पीहू’ दुनिया के दूसरे फिल्म फेस्टिवल्स की तरफ बढ़ गई. और मोरक्को में हुए ट्रांस-सहारन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में इसने दो अवॉर्ड जीत लिए हैं. बेस्ट फीचर फिल्म (इंटरनेशनल कॉम्पिटीशन) और बेस्ट फिल्म (पीपल्स चॉइस) के.

‘पीहू’ एक थ्रिलर है. इस पूरी फिल्म में सिर्फ एक कैरेक्टर है. वो है 2 साल की एक बच्ची जो कहानी में पूरे समय घर पर अकेली होती है. इस दौरान वो क्या-क्या करती है, इसी से शहरी जीवन की और दूसरी कई इंसानी विवेचनाएं निकलती हैं. फिल्म के डायरेक्टर विनोद कापरी काफी टाइम पत्रकार रहे हैं. डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाते रहे हैं. 2014 में उन्होंने अपनी डॉक्यूमेंट्री I Can’t Take This Shit Anymore के लिए नेशनल अवॉर्ड जीता था. 2015 से वो फिल्में बना रहे हैं. उस साल उनकी पहली फीचर फिल्म ‘मिस टनकपुर हाज़िर हो’ आई थी. अब दूसरी फीचर चर्चा में है. IFFI विवाद के समय हमने उनसे उनसे ढेर सारी बातें की थीं. वो सब आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं.

अब ‘पीहू’ को मिले अवॉर्ड्स के सिलसिले में हमने उनसे फिर बात की.

फिल्म की एक स्क्रीनिंग के दौरान डायरेक्टर विनोद और पीहू की इकलौती एक्टर.

फिल्म की एक स्क्रीनिंग के दौरान डायरेक्टर विनोद और पीहू की इकलौती एक्टर.

#1. ‘पीहू’ में ऐसा क्या है जो उसे यूनिवर्सल बनाता है, कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले लोग उसमें दिलचस्पी लेते हैं?

विनोद – लाख में से एक शख्स होता है, जिसे शादी नहीं करनी होती, घर नहीं बसाना होता. सभी बच्चे भी पैदा करते हैं. ये एक यूनिवर्सल फिनॉमिना है. जहां भी परिवार हैं और उनमें संवादहीनता है, ‘पीहू’ उन सब की कहानी कहती है. परिवारों का जो विघटन है, जो शक-शुबहा है, जो छोटी-छोटी बातें हम दिल से लगा लेते हैं, वैसे दुनिया भर के लोगों के अनुभव रहे हैं. इसीलिए पूरे फेस्टिवल सर्किट में लोग इससे जुड़ाव महसूस कर रहे हैं, देख रहे हैं.

#2. फिल्म को जहां-जहां दिखा रहे हैं, वहां कैसी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं?

विनोद – हम फिल्म को कई जगह ले गए. वैंकूवर, पाम स्प्रिंग्स (कैलिफोर्निया – अमेरिका), तेहरान वगैरह. हर जगह हमारी तारीफ हुई. जर्मनी के स्टटगार्ड का एक वाकया यादगार रहा. वहां फिल्म के प्रीमियर के एक हफ्ते बाद एक कपल ने मुझे फेसबुक पर मैसेज किया. ये जोड़ा बेल्जियम से जर्मनी फिल्म देखने आया था. उन्होंने मुझे बताया कि वो चार साल से शादीशुदा हैं. ‘पीहू’ देखने के बाद घर पहुंचकर उन्होंने एक-दूसरे को सॉरी कहा. इसे मैं अपनी कहानी की सबसे बड़ी जीत मानता हूं.

'पीहू' का एक दृश्य, जिसमें घर कुछ बिखरा सा नज़र आ रहा है. (फोटोः यूट्यूब स्क्रीनग्रैब)

‘पीहू’ का एक दृश्य, जिसमें घर कुछ बिखरा सा नज़र आ रहा है. (फोटोः स्क्रीनग्रैब)

#3. बच्चों के लालन-पालन को लेकर भारत और पश्चिमी देशों की सेंसेबिलिटीज़ अलग हैं, अलग तौर तरीके हैं. वहां के कानून भी काफी अलग हैं. आपकी फिल्म में एक हिंदुस्तानी परिवार में एक छोटी बच्ची मुसीबत में फंसती है. पश्चिम में दर्शकों ने इस बात को कैसे लिया?

विनोद – पश्चिम में लोगों ने पीहू के मुसीबत में फंसने पर आपत्ति नहीं ली. लेकिन फिल्म देखकर उन्होंने ये सवाल ज़रूर किया कि आप भारतीयों के घर बहुत गंदे होते हैं क्या? तब मैंने उन्हें समझाया कि ‘पीहू’ में नज़र आ रहा घर कहानी की मांग के मुताबिक दिखता है. आमतौर पर भारतीय घर साफ रहते हैं. रात को अगर देर तक पार्टी चली है, सुबह का वक्त है और मेड नहीं आई है, तो घर अस्त-व्यस्त ही रहेगा. पीहू के साथ होने वाली घटनाएं पश्चिम में भी लोगों को उतनी ही स्वाभाविक लगीं, जितनी यहां के दर्शकों को.

#4. किसी फेस्टिवल में जब ‘पीहू’ फॉरेन फिल्म की तरह दिखाई जाती है और जब वो ‘इंडियन फिल्म कैटेगरी’ में दिखाई जाती है, तो उसके रिसेप्शन में क्या फर्क आता है?

विनोद – फेस्टिवल में आने वाले लोग खालिस फिल्म देखने आते हैं. इसलिए कैटेगरी से फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन एक बात जो बाहर के दर्शकों को अलग लगी, वो ये कि इस फिल्म में गाने वगैरह क्यों नहीं हैं. ‘पीहू’ कई लोगों को ‘बॉलीवुड फिल्म’ लगी ही नहीं.

 

‘पीहू’ का टीज़रः

#5. हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं कि कोई अचानक सामने आकर कह सकता है कि इस फिल्म की अमुक बात से मैं ‘आहत’ हूं और इसके चलते फिल्में बैन तक हो जाती हैं. आपको कभी लगा कि ‘पीहू’ के साथ ऐसा हो सकता है?

विनोद – बिल्कुल हो सकता है. IFFI से पहले लॉन्च हुए ‘पीहू’ के टीज़र में पीहू फ्रिज में बंद होती नज़र आती है. कई लोगों ने मेरी ट्विटर वॉल पर NCPCR को टैग कर के ट्वीट लिखे. NCPCR माने नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स. लोगों ने कहा कि इस फिल्म में बच्चों का शोषण हो रहा है, इस फिल्म को बैन होना चाहिए. और कुछ वक्त के लिए मैं डर भी गया कि कहीं मेरी फिल्म बैन न हो जाए. कोई भरोसा नहीं कि आज की तारीख में कोई ये कह दे कि बच्चों से काम कराना तो अपराध है और फिल्म तो एक अकेली बच्ची को खतरे में दिखाती है. इसलिए फिल्म को बैन कर देना चाहिए. कोई ये नहीं समझना चाहता कि मेकिंग के दौरान हम कितनी सावधानियां बरतते हैं.

#6. फिल्म बनाते वक्त क्या ये दिमाग में रहता है कि कोई ऐसी चीज़ शामिल ही न की जाए जिसके चलते फिल्म डिब्बे में बंद हो जाए? क्या आप भी ‘हाथ संभालकर’ काम करते हैं?

विनोद – अब तक तो नहीं, लेकिन आइंदा जब भी मैं काम करूंगा तो ये बात ज़हन में ज़रूर रहेगी कि कहीं फलाने सीन के चलते मेरी फिल्म बैन न हो जाए. और ये डर हर फिल्मकार के मन में है. ‘शोले’ में धर्मेंद्र शराब पीकर मंदिर के पीछे से शंकर जी आवाज़ में बात करते हैं. आप इस सीन को आज करके देख लीजिए. किसी की मजाल है कि फिल्म इस सीन के साथ रिलीज़ हो जाए. सिनेमाहॉल जला दिए जाएंगे. एक समाज के तौर पर हम समय में पीछे जाने लगे हैं, पिछड़ रहे हैं. जो तस्वीरें हम तालिबान के राज की देखते थे, वो अब हमारे यहां शुरू हो गया है.

शोले का वो सीन जिसमें धर्मेंद्र शंकर जी के मंदिर के पीछे शराब पीकर पहुंच जाते हैं
शोले का वो सीन जिसमें धर्मेंद्र शंकर जी के मंदिर के पीछे शराब पीकर पहुंच जाते हैं

#7. आप ऐसे कॉम्प्रोमाइज़्ड माहौल में काम करना चाहेंगे?

विनोद – डर तो रहेगा. लेकिन उस डर के चलते आप अपनी कहानी नहीं कहेंगे, ऐसा नहीं होगा. काम तो हम करेंगे. जो उसका हश्र होगा, देखा जाएगा. आप देखिए ईरान में माजिद मजीदी बैन हुए, बावजूद इसके ऑस्कर तक गए. फिल्में बनाई जाएंगी. बहुत हुआ तो यही होगा कि भारत में रिलीज़ नहीं होगी. कभी कोई रास्ता निकल भी आएगा. ‘एन इनसिग्निफिकेंट मैन’ आखिर रिलीज़ हुई ही. और ‘पद्मावती’ भी रिलीज़ होनी ही चाहिए.

#8. ‘पीहू’ को हम सिनेमाघर में कब देख पाएंगे?

विनोद – हमें अब भी फिल्म फेस्टिवल के लिए न्यौते मिल रहे हैं. ओमान, अर्जेंटीना और जर्मनी से. जहां-जहां लोग चाहेंगे हम फेस्टिवल प्रीमियर करते रहेंगे. भारत में फिल्म मार्च 2018 तक रिलीज़ होगी.

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