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एक कत्ल ने पूरे अमेरिका की सांसें रोक दीं!

आज शुरुआत करेंगे एक इंसान के अपने आख़िरी पलों में कहे एक वाक्य से. वो वाक्य, जो उसने एक पुलिस अफ़सर द्वारा अपना दम घोंटे जाते वक़्त कहा था. वो वाक्य, जिसके तीन शब्द उसके जीवन के आख़िरी तीन शब्द बन गए. ये तीन शब्द आपको 244 साल पहले आज़ाद हुए एक देश का ऐसा कुरूप चेहरा दिखाते हैं जो उसके दावों से उलट न तो महान है और न गौरवशाली. बल्कि इनसे उलट ये तीन शब्द आपको दुनिया के सबसे महान कहे जाने वाले लोकतंत्र के उन 401 सालों का इतिहास बताता है, जो अमानवीयता और दोहरे मानकों से पटा पड़ा है.

क्या थे ये तीन शब्द?
ये तीन शब्द थे- आई कान्ट ब्रीद. माने, मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं. इसे कहने वाले का नाम था, एरिक गार्नर. उम्र, 43 साल. रिहाइश, न्यू यॉर्क. एरिक को अस्थमा की परेशानी थी. इतनी कि उन्हें बागवानी विभाग की अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी थी. वो चलते-चलते खांस उठते थे. कुछ कदम चलने में उनकी सांस फूल जाती थी. एरिक का पुलिस से ख़ूब पाला पड़ता था. करीब 30 बार अरेस्ट हो चुके थे वो. क्यों अरेस्ट हुए थे? इसलिए हुए थे कि पुलिस कहती थी, वो टैक्स बचाने के मकसद से खुली सिगरेट बेचते हैं. एरिक का कहना था कि पुलिस उनका शोषण करती है. 2007 में एरिक ने पुलिस विभाग की शिकायत भी की थी कोर्ट में. इस शिकायत के मुताबिक, पुलिस के एक अधिकारी ने सड़क पर उनकी तलाशी ली. तलाशी के बहाने बीच सड़क पर उनके मलाशय में उंगली डाली.

I Cant Breathe
आई कान्ट ब्रीद. आन्दोलन बन गया. (फोटो: एपी)

17 जुलाई, 2014 को क्या हुआ?
एरिक की शिकायतों का कोई असर नहीं पड़ा. पुलिस उन्हें तंग करती रही. और इसी बैकग्राउंड में आई 17 जुलाई, 2014 की तारीख़. उस दिन दोपहर बाद करीब साढ़े तीन बजे होंगे. एरिक का किसी से झगड़ा हो रहा था. वहां से गुज़र रहे पुलिसवालों की नज़र पड़ी एरिक पर और वो एरिक की ओर बढ़े. उन्होंने एरिक को घेर लिया. कहने लगे, तुम लूज़ सिगरेट बेच रहे हो. ये सुनकर एरिक झल्ला पड़े. उन्होंने कहा-

हर बार मुझे देखते ही तुम लोग मुझसे भिड़ जाते हो. मैं थक गया हूं इससे. यहां खड़ा हर आदमी तुमको बता देगा कि मैंने कुछ नहीं किया. कुछ नहीं बेचा मैंने. प्लीज, मुझे अकेला छोड़ दो.

पुलिस अफ़सर ने एरिक के साथ क्या किया?
एरिक की विनती सुनकर क्या पुलिसवालों पर कुछ असर पड़ा? नहीं. इन पुलिसवालों में डेनियल पेंटालियो नाम का एक अफ़सर था. उसने एरिक को हथकड़ी लगाने की कोशिश की. एरिक ने अपना हाथ झटक लिया. जवाब में पेंटालियो ने अपनी बांह से एरिक का गला जकड़कर उन्हें ज़मीन पर पटकने की कोशिश की. फिर चार अफ़सरों ने एरिक पर ज़ोर आजमाइश करते हुए उन्हें ज़मीन पर पटक दिया. पेंटालियो की बांह अब भी एरिक के गले को घेरे हुए थी. जूडो में इस तरह गर्दन को लपेटना चॉकहोल्ड कहलाता है. इस पॉज़िशन में जिसकी गर्दन पकड़ी जाती है, उसको सांस लेने में दिक्कत होती है.

Eric Garner
एरिक गार्नर (फोटो: फेसबुक)

…और एरिक मर गए
ये चॉकहोल्ड किसी के लिए भी रिस्की हो सकता है, फिर एरिक को तो गंभीर अस्थमा था. उन्हें सांस लेने में दिक्क़त होने लगी. एरिक गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे- आई कान्ट ब्रीद, आई कान्ट ब्रीद. एक स्वर में, बिल्कुल छटपटाते हुए ठीक आठ बार एरिक ने यही वाक्य दोहराया- आई कान्ट ब्रीद. और फिर वो बेहोश हो गए. कुछ मिनटों बाद वहां ऐम्बुलेंस आई. ये पता होते हुए कि एरिक दम घुटने से बेहोश हुए हैं, ऐम्बुलेंस के लोगों ने न उन्हें ऑक्सीजन दिया, न उनका कोई इमरजेंसी उपचार किया. बेहोश एरिक बस स्ट्रेचर पर लादकर ऐम्बुलेंस में डाल दिए गए. कुछ मिनटों बाद जब ऐम्बुलेंस रिचमंड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर पहुंची, तो एरिक दुनिया से जा चुके थे.

कुछ सवाल, कुछ संयोग
क्या ये मौत महज एक दुर्घटना थी? क्या पुलिस और संदिग्ध के बीच का ये एपिसोड संयोग था? क्या ये संयोग था कि 1994 में पुलिस विभाग ने चॉकहोल्ड करने पर बैन लगा दिया था, मगर फिर भी पुलिसवाले खुलेआम इसका इस्तेमाल कर रहे थे? क्या ये भी संयोग था कि मरने वाले एरिक अश्वेत थे और उनका दम घोंटने वाला पुलिस अफ़सर पेंटालियो श्वेत था?

इन सवालों का जवाब कौन देगा?
इन सवालों का जवाब देगा वो मूवमेंट, जो एरिक की मौत से हतप्रभ लोगों ने अमेरिका में शुरू किया. इस मूवमेंट का नाम था- आई कान्ट ब्रीद. ये वाक्य अमेरिका की अफ्रीकन-अमेरिकन आबादी का नारा बन गया. उस आबादी का, जिसका एक सदस्य उन दिनों अमेरिका का राष्ट्रपति था.

2014 की घटना का ज़िक्र अब क्यों?
आप पूछेंगे, जुलाई 2014 की उस घटना का ज़िक्र हम आज क्यों कर रहे हैं? इसलिए कर रहे हैं कि अमेरिका में गुलामी प्रथा ख़त्म होने के 155 साल बाद भी अमेरिकी सिस्टम में काले-गोरों के बीच फ़र्क करने की परंपरा ख़त्म नहीं हुई है. अमेरिकी आबादी का एक बड़ा धड़ा आज भी सफ़ेद चमड़ी को श्रेष्ठ मानने के उसी शर्मनाक इतिहास में यकीन करता है, जिस इतिहास की उम्र अभी आने वाले अगस्त में 401 बरस हो जाएगी. इसी धड़े ने अमेरिका में एक अश्वेत को अपना ताज़ा शिकार बनाया है. इस शिकार हुए आदमी का नाम था जॉर्ज़ फ़्लॉयड. 46 साल के जॉर्ज रहने वाले तो ह्यूस्टन के थे, लेकिन बेहतर ज़िंदगी की तलाश पांच साल पहले उन्हें मिनेसोटा प्रांत के मिनियेपोलिस शहर में ले आई. यहां एक रेस्तरां में बाउंसर की नौकरी भी मिल गई उन्हें. जॉर्ज सोचते थे, कुछ दिनों में कर्मशल ड्राइविंग का लाइसेंस बनवा लूं तो ट्रक चलाऊंगा. कमाई और अच्छी हो जाएगी.

George Floyd
जॉर्ज फ़्लॉयड (फोटो: एपी)

क्या हुआ 25 मई को?
सबकुछ ठीक चल रहा था कि फिर आई 25 मई, 2020 की तारीख़. मिनियेपोलिस पुलिस विभाग को एक फ़ोन आया. फ़ोन करने वाले ने कहा कि उसे एक आदमी पर जालसाजी करने का शक़ है. कॉल के जवाब में पुलिस की एक टीम उस बताई हुई जगह पर पहुंची. यहां उनकी मुलाकात हुई जॉर्ज फ़्लायड से. फ़ोन करने वाले आदमी ने इन्हीं की शिकायत की थी. पुलिस ने जॉर्ज को हथकड़ी लगाकर पकड़ने की कोशिश की. जॉर्ज ने इसका विरोध किया. विरोध के जवाब में डेरेक चॉविन नाम के एक पुलिस अधिकारी ने जॉर्ज के साथ ज़बरदस्ती की और उन्हें ज़मीन पर पटक दिया. ये दृश्य ऐसा था कि सड़क पर खड़ी एक कार के पिछले पहिये के पास ज़मीन पर जॉर्ज पड़े थे. और उनके ऊपर चढ़े डेरेक चॉविन ने अपने बायें पैर से जॉर्ज का गला दबाया हुआ था. जानते हैं, डेरेक ने कितनी देर तक जॉर्ज का गला दबाए रखा? पूरे सात मिनट तक. इसमें शुरुआती पांच मिनट के बाद जॉर्ज का शरीर शिथिल पड़ चुका था. उसमें कोई हरकत नहीं हो रही थी. तब भी डेरेक उनके ऊपर चढ़े रहे. फिर पुलिस ने ऐम्बुलेंस बुलवाई. मगर अब जान कहां थी जॉर्ज में कि उन्हें बचा लिया जाता. वो मर गए थे. मालूम है, मरने से पहले जॉर्ज ने क्या कहा था. रोते-छटपटाते हुए वो डेरेक से कह रहे थे-

मैं मरने वाला हूं. मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं. मां, ओ मां, मेरा पेट दुख रहा है. मेरी गरदन दुख रही है, सब दुख रहा है. प्लीज, मुझे पानी दे दो. प्लीज, मत मारो मुझे.

George Floyd
जॉर्ज फ़्लॉयड और उनके ऊपर चढ़े डेरेक चॉविन (फोटो: एपी)

आई कान्ट ब्रीद…
2014 में एरिक गार्नर. 2020 में जॉर्ज फ़्लायड. दोनों ही अश्वेत. दोनों ही अमेरिकी नागरिक. दोनों की हत्या के जिम्मेदार पुलिसवाले. और इन समानताओं से आगे दोनों के आख़िरी शब्द वही, आई कान्ट ब्रीद.

एरिक और उनके साथी पुलिसवालों ने जॉर्ज फ़्लॉयड के साथ जो किया, उसे वहां से गुज़र रहे कुछ लोगों ने अपने मोबाइल में कैद कर लिया. उनके मोबाइल से निकले विडियो वायरल हो गए. इसने अमेरिका में हंगामा मचा दिया. ‘आई कान्ट ब्रीद’ का नारा लगाते लोग पुलिस से भिड़ गए. पुलिस ने ज़ोर आज़माइश करके प्रदर्शन को ख़त्म कराने की कोशिश की. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर रबड़ बुलेट्स और आंसू गैस छोड़ा. इससे भीड़ और भड़क गई. लोगों ने पुलिस स्टेशन फूंक दिया. कुछ और जगहों पर भी आगजनी हुई. लोगों की नाराज़गी को देखते हुए इस मामले की जांच FBI को सौंप दी गई. आरोपी पुलिसवाले बर्ख़ास्त कर दिए गए हैं. मगर प्रदर्शनकारी शांत होने को राज़ी नहीं हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने मिनेसोटा के गवर्नर टिम वॉल्ज को मदद का आश्वास देते हुए कहा है कि अगर ज़रूरत पड़ी, तो सेना को भेजा जाएगा. ट्रंप ने अपने ट्वीट में प्रदर्शनकारियों को धमकी दी है कि अगर लूटिंग शुरू होगी, तो शूटिंग भी शुरू हो जाएगी. ट्विटर ने ट्रंप के इस ट्वीट पर भी फ्लैग लगाया. ट्विटर के मुताबिक, ट्रंप का ये ट्वीट हिंसा का महिमामंडन करता है.

Trump Tweet
जॉर्ज फ़्लॉयड को लेकर डॉनल्ड ट्रंप का ट्वीट (फोटो: ट्विटर)

इतिहास क्या बताता है?
ये वर्तमान है. इसकी जड़ें जुड़ी हैं अमेरिकी इतिहास से. वो इतिहास, जिसमें गुलामों की खरीद-फ़रोख़्त का लंबा अतीत है. 2019 में न्यू यॉर्क टाइम्स ने इस गुलामी प्रथा के 400 साल पूरे होने पर एक ख़ास रिपोर्ट की थी. इसका नाम था- प्रॉजेक्ट 1619. इस रिपोर्ट को पुलित्ज़र अवॉर्ड भी मिला है. इस रिपोर्ट के शुरुआत शब्द जानना चाहेंगे? ये शुरुआत कुछ यूं है. समंदर की एक तस्वीर है, जिसमें लहरों के पार क्षितिज दिख रहा है. तस्वीर के ऊपर लिखा है-

साल 1619 के अगस्त महीने में इसी क्षितिज पर एक जहाज़ उभरा था. ये जगह थी, वर्जिनिया बंदरगाह के नज़दीक स्थित पॉइंट कम्फ़र्ट. इस जहाज़ में 20 से ज़्यादा अफ़्रीकी लोग थे, जिन्हें गुलाम बनाकर यहां लाया गया था. इन्हें अंग्रेज़ कोलोनिस्ट्स के हाथों बेच दिया गया. इस धरती पर आगे चलकर जो देश बना, उसका कोई भी पहलू उस गुलामी प्रथा से अछूता नहीं. वो प्रथा, जो आगे आने वाले कई दशकों तक यहां काबिज़ रही. इस दिन के 400 बरस पूरे होने की ये घड़ी वो अवसर है, जब आख़िरकार ये कहानी पूरी सच्चाई और ईमानदारी से सुना ही दी जानी चाहिए.

Nyt 1619 Project
प्रॉजेक्ट 1619 (फोटो: न्यू यॉर्क टाइम्स)

गुलाम, अमेरिकी इतिहास का अहम हिस्सा
इस कहानी में जिन 20 गुलामों का ज़िक्र हुआ, उनके साथ ही अमेरिका की लंबी गुलामी प्रथा की शुरुआती हुई. कहां से लाए गए थे ये 20 लोग? अमेरिका स्थित जेम्स टाउन के साम्राज्यवादियों ने इन लोगों को समुद्री लुटेरों से खरीदा था. उन लुटेरों से, जो इन अफ़्रीकियों को पुर्तगाल के एक जहाज से लूट लाए थे. ये 20 लोग उन लाखों अफ्रीकियों में थे, जिन्हें आगे आने वाले सालों में उनके घरों से जबरन उठाकर, जंज़ीरों में बांधकर, ज़हाज़ों में चूहों की तरह भरकर अमेरिका में लाया जाना था. क्यों? ताकि वो यहां की ज़मीनों को उपजाऊ बनाएं. अपनी जी-तोड़ मेहनत से वहां फसलें उगाएं. और उनके मालिक अपने गुलामों की मेहनत के बल पर कमाए गए पैसे से फिर और गुलाम खरीदें.

कानून ने कहा- गुलाम का बच्चा भी गुलाम होगा
गुलामों ने अपनी मेहनत से अमेरिका को बनाया. कारखानों में बनने वाले कपड़े के लिए कपास उगाने से लेकर उसे रंगने वाला नील तक, सब यही गुलाम उगाते थे. वो चीनी, जो उनके मालिकों की चाय मीठी करने से लेकर उनकी चाय-टाइम कुकीज़ तक की अहम सामग्री थी, वो चीनी जिस गन्ने से बनती थी, वो गुलामों के शोषण के सबसे दुखद प्रतीकों में से है. 1662 में बनाए गए वर्जीनिया लॉ ने गुलामी को हेरेडेटरी कर दिया. माने, एक गुलाम मां का बच्चा भी गुलाम माना जाएगा. इस क़ानून में एक लाइन है-

इस देश में पैदा हुए सारे बच्चे बंधुआ या आज़ाद, क्या माने जाएं ये उनकी मां के स्टेटस से तय होगा.

महान अमेरिकी संविधान ने क्या किया?
क्या आगे आने वाले महान अमेरिकी संविधान ने इन गुलामों को कोई राहत दी? नहीं. अमेरिका का डेक्लरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस कहता है-

सारे मनुष्य बराबर हैं. उन्हें बनाने वाले ईश्वर ने उन्हें कुछ ऐसे अधिकार दिए हैं, जिन्हें उनसे नहीं छीना जा सकता है. इनमें जीवन का, आज़ादी का अधिकार भी शामिल है.

मगर डेक्लरेशन ऑफ़ इंडिपेंडेंस के ये शब्द, वो शब्द जिनपर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की नींव रखी गई, उस राष्ट्र की नींव जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़कर आज़ादी हासिल की थी, उसकी इस गारंटी से बाहर रखा गया गुलामों को. शायद इसलिए कि गुलामों का शोषण अमेरिका की संपन्नता के लिए ज़रूरी समझा गया.

American Declaration Of Independence
अमेरिका का डेक्लरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस (फोटो: हिस्ट्री.स्टेट.जीओवी)

कब ख़त्म हुई गुलामी प्रथा?
संविधान ने गुलामी की ये प्रथा ख़त्म की 1865 में. जब अमेरिकी संविधान के अंदर 13वां संशोधन हुआ. इसे अबोलिशन ऑफ़ स्लेवरी कहते हैं. तो क्या उसके बाद बराबरी आ गई? नहीं. अमेरिका में अश्वेत कमतर ही समझे जाते रहे. उनके रहने के इलाके अलग थे. उनके बच्चों अलग स्कूल में जाते थे.

क्या पूरी तरह से बदल गया है अमेरिका?
आप कहेंगे, ये सब तो अतीत की बातें हैं. अब तो अमेरिका बहुत बदल गया है. 2008 में इसी अमेरिका ने अफ़्रीकी-अमेरिकी समुदाय के बराक ओबामा को राष्ट्रपति चुना. यकीनन अमेरिका में बदलाव तो आया है. मगर पूरी तरह नहीं. वहां आज भी आबादी का एक हिस्सा श्वेत श्रेष्ठता की मानसिकता में भरोसा रखता है. अश्वेतों के प्रति पूर्वाग्रह आम है. अश्वेतों को आसानी से अपराधी समझ लिया जाता है. वो आज भी नस्लभेद का शिकार बनते हैं. अश्वेतों के प्रति पुलिस डिपार्टमेंट का पूर्वाग्रह तो कई बार सामने आ चुका है.

वन कन्ट्री, टू सिस्टम्स
आपको याद है. 2 मई को इसी मिनेसोटा प्रांत में लॉकडाउन ख़त्म करने की मांग करते हुए कई लोग हाथ में मशीनगन लिए स्टेट कैपीटोल बिल्डिंग में घुस गए थे. पुलिस ने उनके साथ कोई सख़्ती नहीं की. उन्हें चुपचाप अपनी मनमानी करने दी. लेकिन इसी मिनेसोटा में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या से नाराज़ प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने रबड़ बुलेट्स चलाईं. उनपर आंसू गैस के गोले दागे. सिस्टमैटिक पक्षपात के पीछे शायद एक बड़ी वजह भेदभाव का इतना पुराना इतिहास है. उस मानसिकता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि 21वीं सदी में भी जाने का नाम नहीं ले रहीं. इन सबके बीच अच्छी बात बस इतनी है कि अमेरिका की श्वेत आबादी का एक बड़ा धड़ा अफ़्रीकी अमेरिकियों के साथ खड़ा है.


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