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अक्षय कुमार ने हैदराबाद रेप विक्टिम पर जो ट्वीट किया, वो इन 4 कारणों से बहुत दिक्कत भरा है

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अक्षय कुमार को उनके फैंस और बाकी सोशल मीडिया की जनता ने घेर लिया है. और अबकी बार अक्षय कुमार बुरे फंसते नज़र आ रहे हैं. हालांकि इस घटना को शिक्षा की तरह लेकर अब वो अपने और अपनी फिल्मों के स्तर उस तरह से सुधार सकते हैं. ऐसी उम्मीद लोग उनसे कर रहे हैं.

# हुआ क्या है-

हैदराबाद. 28 नवंबर की सुबह एक लड़की की जली हुई लाश मिली. रचना (बदला हुआ नाम) की. वो एक वेटनरी डॉक्टर थी. 26 साल की. बाद में पता चला कि उनका गैंगरेप करके जला दिया गया था.

इस घटना को लेकर पूरे देश में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. अलग-अलग शहरों में लोग सड़कों पर इकट्ठा होने लगे. आज भी जहां एक तरफ संसद में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध को लेकर चर्चा हो रही है, वहीं राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर लड़के -लड़कियां अपना विरोध जता रहे हैं. उधर पूरे सोशल मीडिया को भी इस घटना ने अपनी जद में ले लिया. गुस्सा वहां भी कम न था.

सेलिब्रिटीज़ भी इस दुखद घटना को लेकर अपनी-अपनी राय व्यक्त करने लगे. दोषियों के लिए कैपिटल पनिशमेंट की बातें. महिलाओं के लिए बेहतर सुरक्षा की बातें और आगे नए कठोर नियम बनाने और लागू करने की बातें होने लगीं.

ये सभी बातें एक बहुत ही वीभत्स घटना से निकली हुई कुछ छोटी-छोटी बेहतर बातें थीं. इन्हीं ‘अभिव्यक्तियों’ में से एक थी सेलिब्रेटी अक्षय कुमार का ट्वीट.

# अक्षय कुमार का ट्वीट-

अक्षय के ट्वीट का स्क्रीन शॉट
अक्षय के ट्वीट का स्क्रीन शॉट

चाहे हैदराबाद में रचना (बदला हुआ नाम) हों, तमिलनाडु में रेखा (बदला हुआ नाम) हों या या रांची में कानून की छात्रा के साथ हुआ गैंगरेप हो, हम एक समाज के रूप में खत्म होते जा रहे हैं. निर्भया जैसे वीभत्स केस को हुए सात साल हो चुके और हमारा नैतिकता का पर्दा अब भी लगातार तार-तार हो रहा है. हमें कड़े क़ानून की ज़रूरत है. ये सब रुकना चाहिए.

ये है अक्षय के ट्वीट का अक्षरशः अनुवाद. प्रथम दृष्टया लगता है कि उन्होंने बात सही ही कही है. इसलिए इसपर असहमत होने या विवाद खड़ा होने की बात आती ही नहीं. लेकिन फिर भी आ रही है. और इस ट्वीट को लेकर जो विवाद खड़े हुए हैं, वो कहीं से भी अनुचित नहीं लग रहे. चलिए जानते हैं क्यों, जो अक्षय ने किया वो एक बहुत सतही सा ट्वीट लगता है.

# क्या था लोगों का रिएक्शन-

हालांकि उनके ज़्यादातर फैंस उनके इस ट्वीट का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन कुछ लोगों को उनकी कुछ बातों से दिक्कत थी. हमें लोगों के विरोध के 4 आयाम दिखे. चारों ही जायज़ लगते हैं-

1) कठोर कानून बनाने को लेकर- लोगों का मानना था कि कठोर नियमों/कानून से नहीं, जो नियम हैं उनके लागू करने से परिवर्तन संभव है.

'कठोर कानून' वाली बात पर लोगों की दो स्तर पर आपत्तियां थीं. दोनों ही जायज़.
‘कठोर कानून’ वाली बात पर लोगों की दो स्तर पर आपत्तियां थीं. दोनों ही जायज़.

2) कठोर कानून बनाने को लेकर- लोगों का ये भी मानना था कि कठोर नियम से बेहतर है समाज के रूप में इवॉल्व होने की.

नियम कठोर करना आपका एक समाज के रूप में फेल हो जाना दर्शाता है.
नियम कठोर करना आपका एक समाज के रूप में फेल हो जाना दर्शाता है.

3) दोहरे पन को लेकर- लोग अक्षय कुमार को इस बात पर भी कोस रहे थे कि आपको जब प्रधानमंत्री से बात करने का मौका मिला तब तो आप ‘आम कैसे खाते हैं’ सरीखे बचकाने सवालों में अटक कर रह गए थे.

आम 2

 

हालांकि अक्षय ने जो इंटरव्यू लिया वो पूरी तरह स्क्रिप्टेड रहा होगा. लेकिन फिर भी अव्वल तो उसे कैंडिड बनाने का पूरा प्रयास किया गया था. और दूसरा किसी स्क्रिप्ट में, किसी प्रोजेक्ट में आप होना चाहते हैं या नहीं, ये नितांत रूप से आपका निजी निर्णय है.
हालांकि अक्षय ने जो इंटरव्यू लिया वो पूरी तरह स्क्रिप्टेड रहा होगा. लेकिन फिर भी अव्वल तो उसे कैंडिड बनाने का पूरा प्रयास किया गया था. और दूसरा किसी स्क्रिप्ट में, किसी प्रोजेक्ट में आप होना चाहते हैं या नहीं, ये नितांत रूप से आपका निजी निर्णय है.

4) दोहरे पन को लेकर- लोगों का एक सीरियस कंसर्न उनकी कथनी-करनी के अंतर को लेकर भी था. उनका मानना था कि अक्षय कुमार, और उनकी फ़िल्में ऐसी चीज़ों को प्रमोट करती हैं. इसके सबूत के तौर पर लोगों ने अक्षय के कुछ gif, कुछ डायलॉग भी शेयर किए.

लोगों ने बाकयदा उनके डायलॉग्स निकाल दिए. ये सिद्ध करने के वास्ते कि अक्षय की कथनी और करनी में अंतर है.
लोगों ने बाकयदा उनके डायलॉग्स निकाल दिए. ये सिद्ध करने के वास्ते कि अक्षय की कथनी और करनी में अंतर है.

हालांकि कुछ लोग कह रहे थे कि अक्षय कुमार की फिल्मों को इस ‘प्रमोशन’ के लिए दोष देना सही नहीं है. लेकिन हमें लगता है कि इस चौथे पॉइंट पर हमें विस्तार से बात करनी चाहिए. कि क्यूंकि अक्षय कुमार ने जो लिखा है उसे रियल/रील लाइफ में भी इंप्लीमेंट करना चाहिए. चलिए जन लीजिए इसमें हमारा क्या टेक है-

# कथनी और करनी के बीच अंतर-

ये सदियों से चली आ रही बात है. और आज भी उतनी ही रेलवेंट- आप क्या बोलते हैं, इससे ज़्यादा ये मायने रखता है कि आप क्या करते हैं. खास तौर पर जब आप एक स्टार हैं. एक इनफ्ल्यूएंसर हैं. आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं कि आपकी फिल्मों वाली चीज़ें कोई नहीं अपनाएगा. अगर ऐसा होता तो ‘कबीर सिंह’ वाली बहस अब तक न चल रही होती. ‘पति पत्नी और वो’ के सीन को पहले म्यूट और डिलीट न किया जाता. ‘मैंने प्यार किया’ के बाद फ्रेंड्स वाली कैप्स बिकनी नहीं शुरू हो जातीं. ‘प्यार किया तो डरना क्या’ या ‘बंधन’ जैसी मूवीज़ के बाद गांव-गांव में जिम न खुल गए होते. साधना कट बाल न होते. ‘नो मीन्स नो’ एक डायलॉग से एक सोशल मूवमेंट न हो गया होता.

सलमान खान की 'प्यार किया तो डरना क्या' की बॉडी हो, या 'तेरे नाम' की हेयर स्टाइल, या मैंने प्यार किया की कैप. इतनी कॉपी हुई कि फिनॉमिना बन गई.
सलमान खान की ‘प्यार किया तो डरना क्या’ की बॉडी हो, या ‘तेरे नाम’ की हेयर स्टाइल, या मैंने प्यार किया की कैप. इतनी कॉपी हुई कि फिनॉमिना बन गई.

ठीक है कि आपने लिखे का भी उतना ही फर्क पड़ता है. इसलिए ही तो बड़ी बड़ी कंपनियां आपको ट्वीट करने के भी पैसे देती हैं. इसलिए ही तो सोशल मीडिया में एक ‘इनफ्ल्यूएंसर’ जैसा कॉन्सेप्ट आया है, जो पैसे लेकर ‘अप्रत्यक्ष’ रूप से ब्रांड्स का विज्ञापन करते हैं.

# थैंक्स फॉर स्मोकिंग –

एक हॉलीवुड मूवी आई थी 2005 में. ‘थैंक्स फॉर स्मोकिंग’. उसमें बताया गया था कि शराब, सिगरेट जैसी वर्जित चीज़ों के विज्ञापन नहीं किए जा सकते इसलिए इनकी एक लॉबी होती है. जिनके द्वारा स्टार्स हायर किए जाते हैं. किसी पब्लिक प्लेस में किसी विशिष्ट ब्रांड की सिगरेट या शराब पीने के लिए. क्यूं? ताकि सटल सा मैसेज लोगों के दिमाग में जाए.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसे छोटे-छोटे सटल हिंट बिना लाउड हुए देखने वालों के सबकॉन्शियस माइंड में असर करते हैं.

वो याद है, मोदी जी 2014 के चुनाव में वोट देने के बाद कैसे ब्लैक एंड वाइट कमल के साथ फोटो सेशन करवा रहे थे. भगवा वाले के साथ नहीं. क्यूं? क्यूंकि भगवा को ब्लैक एंड वाइट करने वाली ये राय करोड़ों रुपए लेने वाली एक विदेशी पीआर एजेंसी ने दी थी. क्यूंकि बैलेट मशीन में चिन्ह ब्लैक एंड वाइट होता है. सटल मैसेज.

ये कोई कोइंसिडेंट नहीं था कि मोदी के हाथ में भगुवा नहीं ब्लैक-एंड-वाइट कमल था.
ये कोई कोइंसिडेंट नहीं था कि मोदी के हाथ में भगुवा नहीं ब्लैक-एंड-वाइट कमल था.

तो आपको बचाने वालों का ये कहना कि फ़िल्में लोगों पर कोई प्रभाव नहीं डालतीं, एक आर्दश और बेहतरीन स्थिति तो है लेकिन वास्तिवक नहीं.

आप अगर ये कहते हैं कि ‘आपने स्क्रिप्ट नहीं लिखी’ या ‘मुझसे डायरेक्टर ने जो कहा मैंने बस वो किया’ तो भी आप बच नहीं सकते. मैगी में क्या इंग्रिडेंट्स थे, ये शायद ही माधुरी दीक्षित और अमिताभ बच्चन को पता था, लेकिन उन्हें घेरा गया था न? अदालतों ने उन्हें नोटिस भेजे न?

# तो अब-

अक्षय को इसे इग्नोर बेशक नहीं करना चाहिए. लेकिन इसको लेकर डिफेंसिव होने की भी ज़रूरत नहीं है. आप पास्ट की ‘ओनरशिप’ लीजिए. और फ्यूचर में और ज़्यादा सचेत रहिए. आप रियल और रील लाइफ दोनों से लोगों को प्रभावित कर सकते हैं. करते हैं. अस्तु, सॉरी बोलिए और आइंदा ऐसी फ़िल्में, ऐसे सीन, ऐसे गीत, ऐसे विज्ञापन करने से तौबा कीजिए. जो किसी धर्म, किसी जाति, किसी जेंडर, किसी रेस, किसी समाज को कमतर दिखाते हुए कोई हास्य पैदा करते हों. एक विलेन का कुछ ऐसा करना जस्टिफाईड है क्यूंकि उसके करैक्टर से हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें ‘क्या नहीं करना चाहिए’. ‘डर’ में शाहरुख़ की स्टॉकिंग फिर भी स्वीकार्य है. क्यूंकि हमें पता है कि वो ग़लत कर रहा है. लेकिन ‘रांझना’ में धनुष की नहीं. ‘अग्निसाक्षी’ में नाना पाटेकर का किरदार जो करता है वही शाहिद कपूर के किरदार का ‘कबीर सिंह’ में  करना नहीं सुहाता. नहीं सुहाना चाहिए. बस यही अंतर है.

आपको रांझना की स्टॉकिंग बुरी नहीं लगती तो आपको भी इवॉल्व होने की ज़रूरत है.
आपको रांझना की स्टॉकिंग बुरी नहीं लगती तो आपको भी इवॉल्व होने की ज़रूरत है.

सहमत, कि आप अपने पास्ट को नहीं सुधार सकते. लेकिन उसे स्वीकार करके अच्छे भविष्य को ओर एक और कदम बढ़ा सकते हैं. अपनी इंडस्ट्री के ही प्रोड्यूसर-डायरेक्टर ‘करण जौहर’ से शिक्षा लीजिए. जिन्होंने स्वीकारा कि ‘कुछ कुछ होता है’ एक सेक्सिस्ट मूवी थी, और तौबा की कि आइंदा ऐसा नहीं होगा.

# कोई देश महान नहीं होता, उसे महान बनाना पड़ता है-

हर कोई जन्म से ही पर्याप्त संवेदनशील होता है लेकिन किसी को भी, इसमें मैं भी शामिल हूं, नहीं पता होता होता कि उसकी संवेदनशीलता मिस-प्लेस्ड है. तो? अनुभव और अतीत की गलतियां. ट्रायल एंड एरर.

एक व्यक्ति एक समाज ऐसे ही तो इवॉल्व करता है. वो था न रंग दे बंसती का डायलॉग. ‘कोई देश महान होता नहीं, उसे महान बनाना पड़ता है’. यही किसी व्यक्ति, किसी समाज पर भी लागू होता है. हमारे समाज में जितनी जगह बुद्ध के लिए है उतनी ही अंगुलिमाल के लिए भी है. –

बीती ताहि बिसारिये, आगे की सुध ले.


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