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मैरिजुआना (ड्रग्स) को लीगल कर देने वाले राष्ट्रपति जब जाएंगे तो दुख होगा

10 दिसंबर को ‘मानव अधिकार दिवस’ मनाया जाता है. एक को गए तीन महीने हो गए एक को आने में अभी बहुत टाइम है. और वैसे भी अभी प्राथमिकताएं कुछ और हैं. ये अधिकार थोड़े पीछे धकेल दिए गए हैं. शायद हमें पहले किन्हीं और ज़रूरी लक्ष्यों की और ले जाया जा रहा है, ये बाद में मिलेंगे.

ये और बात है कि दुनिया में, या किसी भी सभ्यता में सर्वोत्तम अवस्था वो होगी जब कोई सत्ता, शासक सबसे ज्यादा ध्यान मानव अधिकारों को सबसे ऊंचा रखने पर देगा. उनसे कोई भी समझौता वो अपनी प्रजा के लिए नहीं होने देगा.

अभी, भारत में ऐसा नहीं है.

न जाने कब होगा.

होज़े मुजीका याद आते हैं. अभी ज़िंदा हैं लेकिन जिस दिन मरेंगे बहुत दुख होगा. मृत्यु दुख करने वाली चीज़ नहीं है. नींद है. आनी है, आएगी. अच्छी चीज़ है. लेकिन होज़े जब जाएंगे तो दुख होगा.

उन्हें हमने दुनिया के सबसे ग़रीब राष्ट्रपति के तौर पर जाना. हालांकि उनसे रईस कोई नहीं था. ज्ञान में सबसे रईस थे. जिंदादिली में सबसे रईस थे. दिल उनसे बड़ा किसी का न था/है.

अपने काल में उन्होंने मैरिजुआना (ड्रग्स) को गैर-कानूनी से कानूनी कर दिया था.

उनके ऐसा करने से लाखों लोग अपनी इंसानी गरिमा को पा गए.

जो लोग ये ड्रग्स बेचते थे, वो अपराधियों की श्रेणी से तुरंत बाहर आ गए. तस्करी की ज़रूरत न रही. हत्याएं करने की ज़रूरत न रही. जेलें, जो ऊरुग्वे में इंसानों से भरी जा रही थीं, वो वैसे होनी बंद हो गईं.

जो ड्रग्स लेते थे, उन्हें गरिमा मिली कि वे अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले रहे हैं ऐसे मुल्क में रहते हैं. वे ड्रग्स ले सकें, सीमित मात्रा में ले सकें और जब लगे कि ज्यादा ले रहे हैं तो सरकार निशुल्क परामर्श शिविर लगवाएगी. अस्पताल में भर्ती करवाकर नशा दूर करने में मदद करेगी.

इससे एकदम विपरीत धुव्र पर फिलीपीन्स के राष्ट्रपति दुतेर्ते खड़े हैं. वे सत्ता में आने के एक साल में 7000 से ज्यादा नागरिकों की हत्याएं करवा चुके हैं. ड्रग्स रोकने के नाम पर. उनके बारे में बात नहीं करना चाहूंगा.

एक बार वाइस चैनल का एक नौजवान मुजीका का इंटरव्यू करने गया. वो टटोलना चाहता था कि इस आदमी ने अपने देश में ड्रग्स को लीगलाइज़ कर दिया, ऐसा कैसे हो सकता है, ज़रूर कुछ और भी होगा ही. उसने हर तरह से पूछा और कुछ निकाल न पाया. फिर उसने पूछा मैं अपने साथ वीड लेकर आया हूं क्या मैं पी सकता हूं. इस पर मुजीका बोले, हां बिल्कुल. मैं जो करना चाहता हूं मैं करूं और तुम जो करना चाहते हो तुम करो. तुम स्वतंत्र हो. फिर बोले, और ये वाली वीड क्यों पीते हो, रुको मैं अंदर से तुम्हारे लिए और अच्छी वाली लेकर आता हूं.

मुजीका की एक और बात भूली नहीं जाती. वे पहले हिंसा के जरिए क्रांति लाने वाले रास्ते पर चल रहे गुरिल्ला/लड़ाके थे.
लेकिन उन्होंने बाद में कहा कि कोई भी मकसद ऐसा नहीं हो सकता जिसके लिए युद्ध को न्यायोचित ठहराया जा सके.

ये बात हमेशा के लिए मेरे तंत्र में ठहर गई.

एक इंसान दूसरे इंसान की choice तय करने पर न आए.
एक इंसान संस्कृति की अपनी अभिलाषा दूसरों पर न थोपे.
एक इंसान भगवान का मैनेजर धरती पर दूसरों के लिए न बने.
एक इंसान अपने 50 किलो मांस और हड्डियों की हस्ती लेकर सौ आसमानों, सैकड़ों सूर्यों से भी परे किसी ईश्वर का अस्तित्व एक छोटे से मिट्टी-पानी के नश्वर गोले पर बचाए रखने की कोशिश करे तो करे, लेकिन किसी दूसरे के लिए भी इस गंभीरता को अनिवार्य बना देने की हिंसा न करे.
स्त्री पुरुष के और पुरुष स्त्री के शरीर पर अपने एकाधिकार और पवित्रता के बोध से ख़ुद को मुक्त करे.
हम विपरीत पहचान और रुझानों वाले इंसानों को उन्हीं की सहज अवस्था में प्रेम कर सकें.
एक इंसान दूसरे इंसानों के साथ रिश्तों में थोड़ा कम देखे, कम सुने, कम सोचे.

हम ख़ुद भूखे रहकर दूसरों को खिला सकें, खुद ठंड में रहकर दूसरों को ओढ़ा सकें, अपने मानवाधिकारों से पहले दूसरों के मानवाधिकारों के लिए खड़े हो सकें, लड़ सकें, मर सकें.

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