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80 साल पहले समुद्र में मरे एक अज्ञात नौसैनिक की पहचान कैसे की गई?

1 सितंबर, 1939. जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया. पोलैंड को ब्रिटेन और फ़्रांस का सपोर्ट था. उन्हें भी जर्मनी के ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान करना पड़ा. उस समय ऑस्ट्रेलिया भी ब्रिटिश साम्राज्य का डोमिनियन था. वो स्वत: युद्ध में शामिल हो चुका था. ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री रॉबर्ट गॉर्डन मेन्ज़ीज ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा,

‘मेरे प्यारे देशवासियों, मैं आज बड़े दुख के साथ एक सूचना देने आया हूं. पोलैंड पर जर्मनी ने हमला कर दिया है. इसके नतीजे में ग्रेट ब्रिटेन ने जर्मनी के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया है. अब ऑस्ट्रेलिया भी युद्ध में शामिल है. किसी लोकतांत्रिक लीडर के लिए ये ऐलान करने से बड़ी कोई चुनौती नहीं हो सकती.’

ऑस्ट्रेलिया के दस लाख से अधिक सैनिकों ने सेकंड वर्ल्ड वॉर में हिस्सा लिया. इनमें से हज़ारों लोग कभी ज़िंदा नहीं लौट पाए. कुछ परिवार तो इतने बदकिस्मत थे कि उन्हें अपने चहेतों की लाश देखने तक का मौका नहीं मिला. ऐसी ही एक घटना नवंबर 1941 में घटी थी. पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तट पर. जब जर्मन रेडर जहाज कोमोरान के हमले में ऑस्ट्रेलिया ने अपना सबसे खास युद्धपोत गंवा दिया.

उसका नाम था, HMAS सिडनी 2. HMAS का फ़ुल फ़ॉर्म होता है, हिज/हर मेजेस्टीज़ ऑस्ट्रेलियन शिप. ‘सिडनी 2’ नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि इसी नाम का एक जहाज पहले भी ऑस्ट्रेलिया के पास था. वो जहाज पहले विश्व युद्ध में काफी काम आया था.

नवंबर 1941 के हमले में ऑस्ट्रेलियाई जहाज पूरी तरह तबाह हो गया. उस जहाज में 645 नौसैनिक सवार थे. हमला इतना भीषण था कि उनमें से एक भी व्यक्ति ज़िंदा नहीं बचा. जहाज का भी कोई अता-पता नहीं चला. हमले के तीन महीने बाद की बात है. समंदर से एक लाश किनारे की तरफ़ आई. देखने पर पता चला कि उसने लंबे समय तक किनारा ढूंढ़ने की कोशिश की थी. लेकिन अंत में भूख-प्यास और हताशा से उसकी मौत हो गई.

ये सिडनी 2 का इकलौता नौसैनिक था, जिसके अवशेष बाहर आए थे. चेहरे से उसकी पहचान मुश्किल थी. उसकी लाश को वहीं दफ़ना दिया गया. और, मक़बरे को नाम दिया गया, ‘द अननोन सेलर’. यानी, अज्ञात नौसैनिक. इसे ऑस्ट्रेलिया के समुद्री इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य माना जाता है.

होते-होते आठ दशक बीत गए. इस दौरान 2008 में जहाज के कुछ हिस्से मिले. लेकिन इससे सैनिक की पहचान नहीं साबित हुई. सरकार लगातार कोशिश करती रही. वो कोशिश अब जाकर सफ़ल हुई है. तकनीक और वैज्ञानिक खोजों के ज़रिए.

80 बरस बाद उस अज्ञात नौसैनिक को एक नाम मिला है. थॉमस वेल्बी क्लार्क. उसकी पहचान कैसे पूरी हुई? उसके जहाज के साथ आख़िर हुआ क्या था? साथ में जानेंगे, ऑस्ट्रेलिया के पर्ल हार्बर की कहानी.

HMAS सिडनी 2 पहले ब्रिटेन की रॉयल नेवी का हिस्सा था. तब उसे HMS फ़ायटन के नाम से जाना जाता था. 1934 में इसे ऑस्ट्रेलिया ने खरीद लिया. फिर इसका नाम बदल दिया गया. ऑस्ट्रेलिया पहुंचने से पहले ये जहाज अफ़्रीका में जारी लड़ाई में हिस्सा ले चुका था. जिस दिन सेकंड वर्ल्ड वॉर शुरू हुआ, उस दिन जहाज पर्थ के पास फ़्रेमेन्टल में विश्राम कर रहा था.

लड़ाई शुरू होते ही जहाज हरक़त में आया. जुलाई 1940 में कलेब्रिया की लड़ाई में इसने इटली को भारी नुकसान पहुंचाया. फिर भूमध्यसागर में इसने दुश्मन जहाजों को पीछे हटने पर मज़बूर कर दिया. इन मोर्चों पर सिडनी को मामूली नुकसान पहुंचा था. इसकी बहादुरी की चर्चा हर तरफ़ फैल चुकी थी.

जब फ़रवरी 1941 में HMAS सिडनी वापस अपने मुल्क़ लौटा तो पूरा शहर उसके स्वागत में खड़ा था. स्कूलों में छुट्टी दे दी गई थी, ताकि वे अपने नायकों का दीदार कर सके. इस अभियान के बाद सिडनी को एस्कॉर्ट करने और निगरानी रखने के काम में लगा दिया गया.

नवंबर 1941 की बात है. HMAS सिडनी को एक ज़िम्मेदारी दी गई. उसे सैनिकों को सिंगापुर ले जा रहे एक जहाज को एस्कॉर्ट करना था. फिर उसे वापस अपने अड्डे पर लौट आना था. लेकिन जब कई दिन बीत जाने के बाद बेस पर कोई ख़बर नहीं आई तो सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया.

ऑपरेशन के दौरान उन्हें पांच जर्मन नावें दिखी. इनमें सवार सैनिकों को हिरासत में ले लिया गया. पूछताछ में पता चला कि ये लोग जर्मन जहाज कोमोरान के नौसैनिक थे. उन्होंने घात लगाकर सिडनी को डुबा दिया था. हालांकि, डूबने से पहले सिडनी ने कोमोरान को भी तबाह कर दिया था. इसलिए, उसमें सवार सैनिक अपनी जान बचाकर भाग रहे थे.

इसके बाद सरकार ने ऑस्ट्रेलियाई नौसैनिकों के परिवारवालों को चिट्ठी भेजनी शुरू की.

फ़रवरी 1942 में एक लाश बाहर आई. शुरुआती जांच में कहा गया कि ये नौसैनिक HMAS सिडनी का नहीं है. हालांकि, बाद में ये दावा ग़लत साबित हुआ.

अब जाकर आधिकारिक पुष्टि हो सकी है. ये साफ़ हो चुका है कि वो सैनिक HMAS सिडनी पर सवार था. और, उसका नाम थॉमस वेल्बी क्लार्क था. वर्षों तक डीएनए टेस्टिंग के बाद ये पुष्टि हो पाई है.

नाम पता चलने से क्लार्क के बारे में और भी जानकारी बाहर आई है.

मसलन, उसके पिता कैटल फ़ार्मर थे. क्लार्क की मां के पूर्वज स्कॉटलैंड से ऑस्ट्रेलिया आए थे. क्लार्क ने अपने कैरियर की शुरुआत अकाउंटेंट के तौर पर की थी. फिर वो सेना में आए और बाद में रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी का हिस्सा बने. उन्हें अगस्त 1941 में HMAS सिडनी पर पदस्थापित किया गया था. उस समय उनकी उम्र महज 21 साल थी.

इस मौके पर ऑस्ट्रेलिया के नेवी चीफ़ वाइस एडमिरल माइक नूनां ने कहा,

‘उनका अंतहीन सफ़र पूरा हो चुका है. उनकी आत्मा को अब शांति मिल जाएगी.’

अब इतनी कहानी हो गई तो एक और सुनते जाइए.

अभी तक आपने एक पर्ल हार्बर की कहानी सुनी है. 07 दिसंबर 1941. जापान का हवाई के अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर हमला. तड़के सुबह सोये जवानों को संभलने का मौका तक नहीं मिला. अमेरिका ने अपने दो हज़ार से अधिक सैनिक खो दिए. उस समय तक अमेरिका सेकेंड वर्ल्ड वॉर में शामिल नहीं हुआ था.

लेकिन इस हमले के बाद सब बदल गया. हमले के समय अमेरिकी राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट खाना खा रहे थे. उन्हें जब फ़ोन पर इसकी जानकारी मिली तो वो बौखला गए. अगले दिन उन्होंने संसद को संबोधित किया. रूज़वेल्ट ने कहा,

कल यानी सात दिसंबर, 1941 का दिन हमेशा बदनामी के चादर में लिपटा रहेगा. जापान ने यूनाइटेड स्टेट्स पर जान-बूझकर और बिना जानकारी के हमला किया. इस हमले का मुक़ाबला करने में चाहे कितना वक़्त लगे, अमेरिका के लोग अपनी संकल्प-शक्ति के दम पर जीत हासिल करके रहेंगे.

अमेरिका ने सेकेंड वर्ल्ड वॉर में उतरने का ऐलान कर दिया था. उधर जर्मनी के हमलों से ब्रिटेन की हालत खराब थी. पर्ल हार्बर की ख़बर सुनने के फौरन बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने रूज़वेल्ट को फोन किया.

चर्चिल ने पूछा, ‘मिस्टर प्रेसिडेंट, ये मैं क्या सुन रहा हूं?’

रूज़वेल्ट ने जवाब दिया, ‘ये सच है. अब आप अकेले नहीं हैं. हम सब एक ही नाव में सवार हैं.’

चर्चिल ने प्रेस के साथ बात की. उनके चेहरे पर खुशी पसरी हुई थी. उन्होंने कहा,

‘मैं बता नहीं सकता कि मुझे कितनी राहत मिली है. अमेरिका और ब्रिटेन अब एक साथ लड़ेंगे. ये ऐतिहासिक है. ईश्वर का शुक्रिया.’

अमेरिका आया और अंतत: मित्र राष्ट्रों की जीत हुई. जापान और उसके सहयोगियों को हार का सामना करना पड़ा और उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. पर्ल हार्बर की घटना ने सेकंड वर्ल्ड वॉर का परिणाम बदलकर रख दिया था.

ये थी अमेरिका के पर्ल हार्बर की कहानी. बहुत कम लोग जानते हैं कि एक पर्ल हार्बर ऑस्ट्रेलिया के साथ भी हुआ था. लेकिन उसे समय के साथ भुला दिया गया. क्या थी वो घटना?

पर्ल हार्बर की घटना के ढाई महीने बाद की बात है. तारीख़ थी, 19 फ़रवरी 1942. ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी छोर पर एक शहर है, डार्विन. ये समंदर के किनारे पर बसा है. इस वजह से इंडोनेशिया, तिमोर, फ़िलीपींस जैसे इलाकों में सैनिक और साजो-सामान पहुंचाने के लिए ये परफ़ेक्ट बेस था. सरकार ने उसी हिसाब से इसको डेवलप भी किया था. जापान को लगा कि अगर इंडो-पैसिफ़िक में आगे बढ़ना है तो इस बेस को तबाह करना होगा.

इसी प्लान के तहत फ़रवरी 1942 में डार्विन पर हमले की योजना बनी. 19 तारीख़ की सुबह 9 बजकर 58 मिनट पर पहला बम गिरा. इसके बाद 40 मिनट तक हमला होता रहा. दो सौ से अधिक जापानी एयरक्राफ़्ट्स ने मिलकर डार्विन को धुआं-धुआं कर दिया था. जापान ने सिविलियन इलाकों को भी नहीं छोड़ा था. बाद के दिनों में भी जापान ने ऑस्ट्रेलिया पर 60 से अधिक हवाई हमले किए, लेकिन डार्विन से भयानक कुछ नहीं था.

जब हमला खत्म हुआ, तब तक आठ जहाज डूब चुके थे. इनमें एक अमेरिकी युद्धपोत भी था. 22 एयरक्राफ़्ट बर्बाद हो चुके थे. दर्ज़नों इमारतें धूल-धूसरित हो चुकीं थी. इस हमले में दो सौ से अधिक जानें भी गईं थी. उस समय डार्विन की आबादी लगभग चार हज़ार थी. उनमें से आधे लोग शहर छोड़कर भाग गए.

डार्विन में कोई टेलीफ़ोन नहीं था. इसलिए जानकारी बाहर जाने में लंबा समय लग गया. इस दौरान सैनिकों और नागरिकों में पैनिक फैल गया. ये डर बाकी आबादी तक न पहुंचे, इसलिए सरकार ने असली नुकसान को छिपाए रखा.

एक समय तक लग रहा था कि ऑस्ट्रेलिया जापान के क़ब्ज़े में आ जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 1942 के अंत तक जापान को अलग-अलग मोर्चों पर हार मिलने लगी थी. इसलिए, वे ऑस्ट्रेलिया को जीतने के प्लान पर आगे नहीं बढ़ पाए.

ऑस्ट्रेलिया और वर्ल्ड वॉर के इस चैप्टर को यहीं पर विराम देते हैं. अब चलते हैं अमेरिका.

ओक्लाहोमा स्टेट. अमेरिका के मैप पर देखेंगे तो साउथ की तरफ़ पड़ता है.

ओक्लाहोमा में 18 नवंबर को एक क़ैदी को मौत की सज़ा दी जानी थी. सब तय हो चुका था. बस शाम के पांच बजने की देर थी. लेकिन ऐन मौके पर सज़ा रोक दी गई. पता चला कि स्टेट के गवर्नर केविन स्टिट ने मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदल दिया है.

ये पूरा मामला क्या है? और, सज़ा में बदलाव के पीछे की पूरी कहानी क्या है?

साल 1999. ओक्लाहोमा के एडमंड इलाके में एक बिजनेसमैन पॉल हॉवेल की हत्या कर दी गई. इस मामले में जूलियस जोन्स को गिरफ़्तार किया गया. उसके ऊपर मुकदमा चला. 2002 में अदालत ने उसे दोषी करार दिया. जोन्स को मौत की सज़ा सुुनाई गई. इसके बाद रिव्यू और अपील का लंबा दौर चला. आख़िरकार, अंतिम तारीख़ आ ही गई. 18 नवंबर को जोन्स को ज़हरीला इंजेक्शन दिया जाना तय हुआ.

लेकिन इसके ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट होने लगे. दरअसल, प्रोटेस्ट 2018 से ही चल रहे हैं. उस साल जून में एक डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ रिलीज़ हुई. द लास्ट डिफ़ेंस. इसमें जूलियस ज़ोन्स की कहानी भी दिखाई गई थी. इसमें सवाल उठाए गए थे कि ज़ोन्स को सही ट्रायल नहीं मिला. एक आशंका ये भी जताई गई थी कि अश्वेत होने की वजह से ज़ोन्स को फंसाया गया हो.

इसके बाद चर्चा शुरू हुई. कई सेलिब्रिटीज़ ने ज़ोन्स की सज़ा कम करने की मांग भी की थी.

एक तो ये दबाव था. दूसरी वजह अक्टूबर 2021 की एक घटना से है. ओक्लाहोमा अमेरिका के उन 27 राज्यों में से एक है, जहां मौत की सज़ा अभी भी बरकरार है. 2015 में इस पर अस्थायी रोक लगा दी गई थी. 28 अक्टूबर 2021 को मौत की सज़ा पर लगी रोक हटा ली गई. उस दिन जॉन मैरियन ग्रांट नाम के एक क़ैदी को सज़ा दी जानी थी. जब उसे ज़हरीला इंजेक्शन दिया गया तो उसने उल्टी कर दी. कई मिनटों तक छटपटाने के बाद उसकी जान निकली. इसको लेकर सज़ा की अमानवीयता पर बहस शुरू हो गई.

बढ़ते दबाव के बीच गवर्नर केविन स्टिट ने मौत की सज़ा पर रोक लगा दी. उन्होंने जोन्स की सज़ा को उम्रक़ैद में बदल दिया है. हालांकि, इस दौरान उसे कभी पैरोल नहीं मिलेगी.


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