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गोरखपुर: बच्चों की लाश पर अब खेला जा रहा घिनहा खेल

गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में 7 से 12 अगस्त के बीच इन्सेफ्लाइटिस से जूझ रहे 23 बच्चों की मौत पर बहुत कुछ कहा और बका जा चुका है. हादसे के बाद किंकर्तव्यविमूढ़ दिख रही सरकार ने जब मुंह खोला, तो स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह के सौजन्य से हमें पता चला कि अगस्त में तो ज्यादा बच्चे मरते ही हैं. मेडिकल कॉलेज और सरकार, दोनों कह रहे हैं कि बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसी वाक्य में ‘अगर’ लगाकर कहते हैं कि ऐसा हुआ है, तो जघन्य है.

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12 अगस्त की शाम को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए सीएम योगी और स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ के पास हर मौत की वजह थी. उन्हें सब पता था कि किसकी मौत किडनी फेल होने की वजह से हुई और किसकी खून की कमी से. पर ये तय है कि ऑक्सीजन की कमी वजह नहीं है. वो अलग बात है कि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली फर्म पुष्पा सेल्स के मालिक मनीष भंडारी के ठिकानों पर छापे मारकर जांच की जा रही है. हो न हो, ये अंतरात्मा की आवाज है. उधर, मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. राजीव मिश्रा पर पत्नी के जरिए घूस लेने का आरोप है. रिपोर्ट्स के मुताबिक मिश्रा के कमीशन के चक्कर में ही पुष्पा सेल्स को ऑक्सीजन सप्लाई का ठेका मिला और मिलता रहा.

बीआरडी के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. राजीव मिश्रा (बाएं) और स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह (दाएं)
बीआरडी के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. राजीव मिश्रा (बाएं) और स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह (दाएं)

इस भसड़ में हम असल मुद्दे से भटक रहे हैं. हम मासूमों की मौत से दूर भाग रहे हैं. पिछले कई महीनों से ये मामला उठाने वाले गोरखपुर के स्थानीय पत्रकारों को छोड़ दें, तो मे़डिकल कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन से सरकार तक, कोई अपनी शक्ल आइने में देखने लायक नहीं है. सबसे छोटे ताबूत ही सबसे भारी होते हैं. देखिए उन माता-पिता को, जिनके बच्चे मारे गए हैं. दर्द से चीखते-चीखते उनकी आवाज गायब हो जा रही है. फट पड़ने की कगार तक पहुंच चुकी आंखों में अब और दर्द की जगह नहीं है. एक-एक करके उठ रहीं बच्चों की लाशें गिनने से पहले हम खुद ही क्यों नहीं शर्म से मर जाते हैं.

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जांच से ज्यादा ब्लेम गेम चल रहा है

सरकार कहती है उसने मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को सस्पेंड कर दिया. वही पूर्व प्रिंसिपल कहता है कि उसने तो सस्पेंड किए जाने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था. ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली एजेंसी कह रही है कि वो तो छ: महीने से पेमेंट करने के लिए कह रही थी, लेकिन किसी ने सुना नहीं. वो ये भी कह रही है कि ऑक्सीजन सप्लाई बंद करने के परिणाम उन्हें पता हैं और बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई है. सरकार के पास एक-एक बच्चे की मौत का कारण है. फिर भी जांच चल रही है. कमेटियां बना दी गई हैं. एजेंसी, पूर्व प्रिंसिपल, मेडिकल कॉलेज… सबके खिलाफ जांच चल रही है. पर किसलिए? जब सारे जवाब अंटी में पड़े हैं, तो किस बात की जांच चल रही है.

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योगी जी, स्वच्छ भारत का प्रचार किसी और मंच पर कर लीजिएगा

12 अगस्त की अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीएम योगी कुछ ठोस कहने के बजाय मानवता की सेवा का पाठ पढ़ाते रहे. ऐसे बतिया रहे थे, जैसे किसी चुनावी रैली में हों. बहुत देर तक बताते रहे कि गोरखपुर में सांसद रहने के दौरान उन्होंने कितना कुछ किया. योजनाएं बनवाईं, जागरुकता फैलाई. सीएम बने, तो तीन बार बीआरडी का दौरा कर आए. अपने चार महीने के कार्यकाल में ही इन्होंने इतना कुछ कर लिया है कि इनकी गलती नहीं दी जा सकती.

योगी 9 अगस्त को भी बीआरडी गए थे, लेकिन किसी ने कुछ बताया ही नहीं. इन्हें कौन समझाए कि हर जगह ‘नायक’ फिल्म की शूटिंग नहीं हो रही होती है. योगी ने बताया कि इंसेफ्लाइटिस गंदगी और मच्छरों की वजह से फैलता है. बच्चों की मौत इसलिए हुई, क्योंकि वो सफाई से नहीं रह रहे थे. पर चाचा ये बीमारी तो पूर्वांचल को 40 सालों से खा रही है. इस दौरान कांग्रेस की सरकार थी, सपा और बसपा की थी और थी तो बीजेपी की भी. नंबर बनाने वाली इसी राजनीति की वजह से तो आज ये हाल है.

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चलिए आपकी सारी बात मान लेते हैं, पर…

योगी ने कहा कि बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई. मान लिया. सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा कि अगस्त में तो ज्यादा मौतें होती ही हैं. मान लिया. पैसों की भूखी एजेंसी ने ऑक्सीजन की सप्लाई बंद कर दी. मान लिया. डॉ. राजीव मिश्रा एजेंसी से कमीशन लेते थे. ये भी मान लिया. फिर? अब बताएंगे कि बच्चों की मौत कैसे हुई? आपकी सारी बातें मान ली, तो ये भी मान लेंगे. क्या एक बार भी अपनी गलती मानने का कलेजा नहीं है? और सरकार चुनी किसलिए है? यही सिस्टम सुधारने के लिए या लाशें गिनने के लिए! अपनी अर्थी पर लादकर कोई कुछ नहीं ले जाता है. सरकारें यहीं धरी की धरी रह जाएंगी. चाटते रहना कुर्सी धर के.

सरकारी हॉस्पिटल: कमीशनखोरी और लूट के अड्डे

बीआरडी हादसे के बाद तो मान लेना चाहिए कि अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, दलाल और पैसों के लिए भूखे-नंगे लोग बैठे हैं. वाहियात हैं वो लोग, जो डॉक्टर को भगवान बताते हैं. ऑक्सीजन, एंबुलेंस, दवाइयां… हर चीज के ठेके तो सेट हैं. ठेके किसे मिलेंगे, उन पर कमीशन कितना आएगा, कौन काम करेगा और कौन नहीं… सब तो फिक्स है. फुलप्रूफ सिस्टम तो तिलंडे में चला गया न. इन ठेकों से लोकल लोगों को हटा क्यों नहीं दिया जाता? क्यों हॉस्पिटल्स की निगरानी नहीं होती? क्यों ऑडिट नहीं होते हैं बिल और दूसरे दस्तावेज.

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60-60 लाख का बकाया चल रहा है, डॉक्टर 50-50 हजार कमीशन के लिए मरे जा रहे हैं. दलाल की तख्ती टांगकर कोई और दुकान क्यों नहीं खोल लेते. जब पता है कि पूर्व प्रिंसिपल डॉ. राजीव मिश्रा कमीशन ले रहे थे, तो इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया कि ये कमीशनखोरी कहां तक जा रही है. जाहिर सी बात है कि राजीव मिश्रा अकेले तो मलाई काट नहीं रहे होंगे. ऐसे अस्पतालों में ऐसे इलाज से तो बेहतर है कि इंसान घर में पड़ा-पड़ा मौत का इंतजार करता रहे. क्योंकि इन मौतों के असल जिम्मेदारों को तो मौत आने से रही.

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आज इंसेफ्लाइटिस है… कल कुछ और होगा… हम जान देते रहेंगे

गोरखपुर के स्थानीय पत्रकार पिछले साल अगस्त से ये मुद्दा उठा रहे थे कि बीआरडी में ऑक्सीजन सप्लाई की समस्या है. पत्रकार चेतावनी दे रहे थे और सरकारें कान में तेल डाले सो रही थीं. क्षेत्र सीएम का है, लेकिन गड़बड़ियां माइक्रो लेवल पर हो रही हैं. यकीनन सरकार तब जिम्मेदार है, जब वो दोषियों पर कोई एक्शन न ले. लेकिन दोषियों को पकड़ने के लिए भी तो सरकार कुछ करेगी. एक इंसेफ्लाइटिस है, जिससे 40 सालों से पूरा पूर्वांचल नहीं निपट पा रहा है. 34 जिलों के आंकड़े बताते हैं कि हर साल करीब पांच हजार लोगों की मौत हो जाती है इस बीमारी से. आज ये है. कल कोई और होगी. तो वोट देने के बाद क्या जनता सीधे कफन की दुकान पर खड़ी हो जाए!

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मान लें कि हॉस्पिटल्स से भ्रष्टाचार दूर नहीं हो सकता

सरकार न जाने क्यों ये लुकाछिपी खेल रही है. पिछले सालों के आंकड़े दिखाकर जितनी बेहयाई से कह दिया गया कि अगस्त में ज्यादा मौतें होती ही हैं, उतनी ही बेशर्मी से ये पर्चे भी छपवा देने चाहिए कि सरकार सरकारी अस्पतालों से भ्रष्टाचार दूर नहीं कर सकती. क्यों जनता बेकार में अपना खून जलाए. क्यों पत्रकारों को कागज काले करने पड़ें. क्यों मरीजों में ये उम्मीद जगे कि वो ठीक हो सकते हैं, फिर से जी सकते हैं.

एक बड़ा मंच सजा है. स्वांग हो रहा है. कुछ दिन खूब हल्ला होगा. फिर इससे मन भर जाएगा और हम वापस राष्ट्रवाद और वंदे मातरम पर शिफ्ट हो जाएंगे. इस शोर में ये खुशफहमी मत पाल लेना कि सरकार हमारी माई-बाप है. न न… वो तो कुछ और है, जिसके हाथों से खून टपक रहा है.


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