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DU इशू: RSS की शह में यहां गुंडे पल रहे हैं

करीब पांच साल पहले की बात है. जब देश में कांग्रेस का पतन हो रहा था. जब मोदी की तथाकथित हवा चलनी शुरू हुई थी. और SRCC कॉलेज ने मोदी को एक लेक्चर के लिए बुलाया था. लेफ्ट पार्टियों ने हंगामा किया. घर छोड़े हुए जिन लड़कियों को महज एक साल हुआ था, वो अपनी पॉलिटिक्स तलाश रही थीं. कुछ लड़कियां उस प्रोटेस्ट में थीं. एक जूनियर भी थी. प्रोटेस्ट के वक़्त लाठीचार्ज हुआ. जूनियर प्रोटेस्ट में देखी गई थी, मगर हॉस्टल वापस नहीं आई. सभी कॉलेज के स्टूडेंट्स, टीचर, हॉस्टल के लोग बेचैन हो गए. बाद में मालूम पड़ा पुलिस ने सभी को डीटेन कर लिया था. वापस आई तो परेशान थी. उससे किसी लड़के ने कहा था, “याद है दिल्ली की उस लड़की (निर्भया) के साथ क्या हुआ था? (हाथ में पकड़ा डंडा दिखाते हुए) वैसे ही (वजाइना में) घुसा दूंगा.”

आज मुड़कर देखती हूं तो लगता है जिस तरह आज उमर खालिद या किसी भी व्यक्ति को बोलने का अधिकार है, वैसे ही SRCC को मोदी को बुलाने का अधिकार था. अगले व्यक्ति को बोलने न देना ‘असहिष्णुता’ कहलाती है. मगर विरोध प्रदर्शनों का मतलब और मक़सद महज हंगामा नहीं होता.

SRCC वाले वाकये के कुछ दिनों बाद हमारे कॉलेज ने एनुअल लेक्चर के लिए जस्टिस मार्कंडेय काटजू को बुलाया. काटजू ने कहा (जिस अंदाज़ में वो कहते हैं), “ये यूनिवर्सिटी अपने बच्चों को मोदी जैसे व्यक्ति का लेक्चर सुनवाती है, आप लोग मोदी को अपना हीरो मानते हैं! आप बेवकूफ हैं.”

उसी समय उनकी बात काटते हुए एक प्रफेसर खड़ी हुईं, और इस तरह बोलीं कि 1000 लोगों के हॉल में उन्हें माइक की जरूरत नहीं पड़ी, “माफ़ करिएगा सर, मगर हमारे कॉलेज में बोलने के पहले अपने तथ्य दुरुस्त कर लें. हमारी लड़कियां वहां से जान बचाकर आई हैं.” ये लोग जो मोदी का विरोध कर रहे थे, अगले दिन काटजू का विरोध कर रहे थे. इसलिए नहीं कि विरोध करना उनका रोज का काम था. बल्कि इसलिए कि जिस चीज में वे विश्वास करते हैं, जो उन्हें सही लगता है उसके लिए लड़ना उन्हें जरूरी लगता था.

दिल्ली विश्वविद्यालय एक ओपन कैंपस है. पूरे शहर में कॉलेज हैं. एक कॉलेज में जो होता है, दूसरे में उसकी हवा भी नहीं होती. और यहां हर अच्छे-बुरे फैसले के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन चलते रहते हैं. वो मीडिया में नहीं आते. हर तरह के विमर्श होते हैं, सेमिनार होते हैं. इसी यूनिवर्सिटी में लेफ्ट पार्टियां कभी जीतती नहीं देखी जातीं. पिछले तीन सालों से यहां ABVP का कब्ज़ा है. उसके कुछ सालों पहले तक NSUI का कब्ज़ा था. लेफ्ट पार्टियों का यहां जो भी अस्तित्व है, इन्हीं विरोध प्रदर्शनों में जीवित है.

जिन्हें हम लेफ्ट पार्टियों का विरोध प्रदर्शन कहते हैं, असल में हर बार लेफ्ट पार्टियों तक सीमित नहीं होता. आपकी जानकारी के लिए बता दूं, यूनिवर्सिटी के 80 से ज्यादा कॉलेजों में से कई कॉलेज के पास वोट करने का अधिकार नहीं है. अधिकतर गर्ल्स कॉलेज ने हर साल होने वाले हंगामे के चलते खुद को यूनिवर्सिटी इलेक्शन के लिए ओपन नहीं किया है. MA लेवल पर कई डिपार्टमेंट ऐसे हैं, जिनके स्टूडेंट्स को पता ही नहीं है कि वोट करना कैसे है. ये जो सभी लोग आपको तस्वीरों में पिटते हुए दिखते हैं, ये अपनी लेफ्ट पार्टी के लिए नहीं लड़ रहे होते. ये लड़ रहे होते हैं क्योंकि इन्हें लगता है इनके साथ गलत हुआ है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में लेफ्ट पार्टियों का हाल अच्छा नहीं है. कांग्रेस और RSS से उन्हें पैतृक धन नहीं मिलता. वो आपस में चंदा करते हैं. कुछ प्रफेसर डोनेट करते हैं. तब लेफ्ट पार्टियों के पास इतना पैसा आता है कि वो अपने बैनर छाप पाते हैं. आम आदमी पार्टी की स्टूडेंट विंग CYSS कुछ करती नहीं दिखाई देती. इसकी वजह उसका एक नई पार्टी होना है या छात्रों में उसकी अस्वीकार्यता है, मालूम नहीं.

ये जो स्टूडेंट और प्रफेसर वहां सुबह चार्ट पेपर पर नारे लिख रहे होते हैं, उन्हें इस बात से मतलब नहीं होता कि ‘पाकिस्तानी आतंकियों’ को हम घुसपैठ में कैसे मदद करें. या किस तरह हम ISI के काम आ सकें. उन्हें इस बात से मतलब होता कि एक छात्र के तौर पर उनके अधिकारों का हनन हुआ है. और लेफ्ट पार्टियों द्वारा आयोजित किए गए विरोध प्रदर्शनों के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं होता अपना विरोध जताने का.

चारा नहीं होता. नहीं होता क्योंकि विश्वविद्यालय एडमिन की खिड़कियां खाली पड़ी रहती हैं. स्टूडेंट की मार्कशीट पर 74 की जगह 47 नंबर चढ़ जाते हैं और स्टूडेंट खिड़की से खिड़की घूमते रहते हैं. यूनिवर्सिटी कुछ नहीं करती. क्लासरूम में टीचर गलत पढ़ाते हैं, यूनिवर्सिटी को ख़त लिखा जाता है मगर कुछ नहीं होता. ब्यूरोक्रेसी को अगर मायने मिलते हैं, तो दिल्ली विश्वविद्यालय की बिल्डिंग में मिलते हैं.

 

एक पढ़ने लिखने की इच्छा रखने वाला स्टूडेंट निराश है, हताश है. उसके पास सड़कों पर उतरने के अलावा कोई चारा नहीं है. उसे पढ़ने दीजिए, विमर्श करने दीजिए. अगर उमर खालिद या शेहला राशिद को बुलाकर उनसे बात करना चाहते हैं तो करने दीजिए न. यूनिवर्सिटी तो वो जगह होनी चाहिए जहां ओवैसी और सुब्रमण्यम स्वामी, दोनों को बोलने की इजाज़त हो. जहां राहुल गांधी की स्पीच हो तो मोदी की भी स्पीच हो. मगर दिल्ली विश्वविद्यालय में मसला केवल एक ख़ास तरह के लोगों को न बोलने देने का है. उमर खालिद पर देशद्रोह का आरोप था. देश की अदालत ने उन्हें बरी किया. एक छात्र नेता, जिसका ‘हेरोइज्म’ काफी हद तक मीडिया ने गढ़ा, उसके चार शब्द बोल लेने से सत्तारूढ़ पार्टी का क्या घटेगा?

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जिस यूनिवर्सिटी में ABVP और NSUI की क्लियर जीत होती है, क्या उसमें लेफ्ट पार्टियां विरोध भी न करें? यही बात सत्तारूढ़ लेफ्ट पार्टियों पर लागू होती है. जहां लेफ्ट का साम्राज्य है, वहां ABVP को विमर्श की इजाज़त नहीं मिलती. विरोध के अलावा क्या तरीका है उनके पास अपनी असहमति जताने का?

ABVP students stall seminar, turn violent at Ramjas College from Debalin Roy on Vimeo.

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां इंजीनियरिंग और डॉक्टरी की पढ़ाई करने अधिकतर बच्चे घर छोड़ते हैं. चार-पांच सालों में ठुक-पिट कर नौकरी करने के लिए तैयार हो जाते हैं. उनकी कैंपस लाइफ का मतलब मेस का बुरा खाना, क्लास में लेट होना, रात को पार्टी करना और हॉस्टल के नियम तोड़ना तक सीमित रह जाता है. उनकी पॉलिटिक्स देश की पॉलिटिक्स तय नहीं करती. असल में उनकी पॉलिटिक्स होती ही नहीं है. क्योंकि उनके छात्र जीवन में कभी कोई विरोध होता ही नहीं है. यूनिवर्सिटी इसलिए भी यूनिवर्सिटी होती है क्योंकि वो आपको सवाल करना सिखाती है. ये कोई ताज्जुब की बात नहीं कि ‘फेस्ट’ के मौसम के अलावा कभी किसी बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में लाठीचार्ज हुआ हो.

दिल्ली विश्वविद्यालय में लाठी चार्ज हुआ क्योंकि यहां छात्र सोचने-समझने की शक्ति रखते हैं. सवाल करने की ताकत रखते हैं. यहां स्टूडेंट केवल तीन साल बाद होने वाले प्लेसमेंट के बारे में नहीं सोचते. मगर जब ऐसे विरोधों को दबाया जाता है, छात्रों से महज उनका अधिकार ही नहीं, उनकी सोचने-समझने की शक्ति को भी कुचला जाता है.

याद दिला दूं, हम सब कभी न कभी विरोध में होते हैं. असहमतियां जताते हैं. और ये मसला लेफ्ट या राइट का नहीं, बहुसंख्यकवाद का होता है. मसलन JNU या केरल के विश्वविद्यालयों में, जहां लेफ्ट पार्टियां जीतती आई हैं, वहां राइट विंग के विचारकों को जगह मिलना मुश्किल हो जाता है. जहां हम अल्पसंख्यक होंगे, वहां हम विरोध में होंगे.

अमित शाह ने बीते दिन उत्तर प्रदेश में विरोधी पार्टियों को ‘कसाब’ का नाम दिया है. सिर्फ इसलिए क्योंकि वो विरोध में हैं. वैसे ही बड़ी आसानी से विरोध कर रहे छात्रों को पाकिस्तानी आतंकी कहा जा सकता है. कहा जा ही रहा है. JNU में भी कहा गया था. बीजेपी और आरएसएस लगातार अपने हित को देश का हित कहते हैं. और अपने विरोधियों को देश विरोधी.

जिस ‘देश हित’ का भाला लेकर आज ABVP के गुंडे अपने साथी छात्रों और प्रफेसरों की छाती पर चढ़े भोंकने के लिए तैयार बैठे हैं, असल में देश का सबसे बड़ा नुकसान कर रहे हैं.

लेकिन देश किसी एक पॉलिटिकल पार्टी की बपौती नहीं है. न ही यूनिवर्सिटी. लेकिन बनने की ओर है. और याद रहे, कभी आप भी विरोध में होंगे. इसलिए विरोध की संस्कृति को ख़त्म न करें.


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