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कोविड-19 महामारी से निपटने में किस तरह औंधे मुंह गिरी सरकार?

कोविड-19 (Covid-19) की दूसरी लहर ने देश की सरकार और पूरे तंत्र की नाकामियों को बेनकाब करके रख दिया है. अस्पताल में बिस्तरों की कमी है और श्मशान लाशों से पटे जा रहे हैं. मरीज़ों की सांस फूल रही है और ऑक्सीजन की किल्लत में दम तोड़ रहे हैं.

इंडिया टुडे मैग्ज़ीन ने इस बार के अंक में ‘नाकामियों की त्रासदी’ नाम से कवर स्टोरी की और सरकार की नाकामियों को पूरी तरह उजागर कर दिया. उन्हीं के आधार पर टटोलने की कोशिश करते हैं कि किन मोर्चों पर कमी, नाकामी, लापरवाही के चलते महामारी ने इतनी ज़िंदगियां लील लीं.

डॉक्टरों की कमी

भारत में प्रति 10 हज़ार लोगों पर 9 डॉक्टर हैं. जर्मनी में ये आंकड़ा 42 है. ब्रिटेन में 28, अमेरिका में 26 और चीन में 20. यानी बड़े देशों में प्रति 10 हज़ार लोगों पर सबसे कम डॉक्टर भारत में ही हैं.

दिसंबर 2020 तक देश में करीब 12.89 लाख डॉक्टर ही थे. जो कि चीन से करीब तीन गुना कम है.

अब देश के सबसे ज़्यादा संक्रमण वाले 5 राज्यों की बात करते हैं. ये टेबल देखकर समझिए कि इन राज्यों में एक डॉक्टर पर औसतन कितने लोगों के इलाज़ का ज़िम्मा है.

Doctors
डेटा सोर्स – विश्व बैंक, लोकसभा.

बिहार के गोपालगंज जिले को पिछले साल सितंबर में केंद्र की ओर से कुल 3 वेंटिलेटर मिले थे. कोविड को देखते हुए  केंद्र ने करीब 2 हज़ार करोड़ रुपये लगाकर 60 हज़ार वेंटिलेटर मंगाए. गोपालगंज के 3 वेंटिलेटर भी इन्हीं 60 हज़ार में शामिल थे. लेकिन इस साल अप्रैल में गोपालगंज में जब कुछ मरीज़ों को वेंटिलेटर पर रखने की ज़रूरत आई तो स्वास्थ्यकर्मियों की कमी के कारण वेंटिलेटर इस्तेमाल में ही नहीं लाए जा सके. एनेस्थीसिया का डॉक्टर ही उपलब्ध नहीं था. ये उदाहरण दर्शाता है कि देश में एक नहीं, बल्कि हर मोर्चे पर स्वास्थ्य सेवाओं में किस स्तर की कमी है. चादर एक ओर से सिलो तो दूसरी ओर से फट जाती है. देश के 47 फीसदी जिले ऐसे हैं, जहां एक मेडिकल कॉलेज तक नहीं है.

बिस्तरों की कमी

पिछले साल नवंबर में जब दिल्ली में कोविड-19 के रोज़ साढ़े 8 हज़ार से अधिक केस आ रहे थे, तो मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती होने के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा था. ऐसे में 4 अस्थायी कोविड सेंटर स्थापित किए गए. इनमें ITBP की ओर से छतरपुर में संचालित कम से कम एक हज़ार ऑक्सीजन बेड के साथ 10 हज़ार बेड वाला अस्पताल भी शामिल था. धौला कुआं और कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज में भी इसी तरह के अस्पताल खोले गए थे.

लेकिन फरवरी में जब मामले नीचे आने लगे तो दिल्ली सरकार ने मान लिया कि वे कोविड पर जीत हासिल कर चुके हैं और ये अस्थायी अस्पताल हटा दिए गए. कोविड की दूसरी वेव आई और सारी व्यवस्था चरमराकर गिर पड़ी. अस्पताल में बेड पाने के लिए एक बार फिर मारामारी मच गई.

Covid Beds
तमाम राज्यों ने पिछले साल बनाए अस्थायी कोविड अस्पताल ये सोचकर डिसमेंटल कर दिए कि अब तो कोविड पर जीत हासिल कर चुके हैं. तभी कोविड की दूसरी वेव आ गई. (फाइल फोटो- PTI)

यही हाल कमोबेश बाकी राज्यों का भी रहा. उत्तर प्रदेश ने करीब डेढ़ लाख बिस्तरों के 500 से अधिक कोविड अस्पताल स्थापित करने का दावा किया था. लेकिन फरवरी की शुरुआत में उनके पास 17 हज़ार कोविड बिस्तरों के साथ केवल 83 अस्पताल थे. सबसे ज़्यादा संक्रमण वाले शहरों में से एक पुणे में जनवरी में ही 800 बेड वाला अस्पताल बंद कर दिया गया था.

ऑक्सीजन की आपूर्ति में भूल

सरकार 2020 की कोविड वेव से ये सबक नहीं ले पाई कि मेडिकल ऑक्सीजन की सप्लाई कितनी ज़रूरी है. हालांकि उत्पादन फरवरी 2021 में 700 मीट्रिक टन से बढ़कर 9 हज़ार मीट्रिक टन रोज़ाना हो गया. लेकिन फिर भी देश में ऑक्सीजन की किल्लत बनी रही. लोगों ने ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ दिया. ये शर्मनाक स्थिति है. 27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में अनुमान लगाया गया था कि देश के 6 राज्यों में रोज़ करीब 1765 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की कमी है. नाकाफ़ी उत्पादन, लॉजिस्टिक की दिक्कतें, कंटेनर-सिलेंडर की कमी आदि ने इस समस्या को और विकराल बना दिया. लेकिन पिछले साल अक्टूबर-नवंबर में पहली वेव कमज़ोर पड़ गई थी. फिर इस साल मार्च से दूसरी वेव शुरू हुई. इस बीच सरकार इन समस्याओं का समाधान युद्धस्तर पर खोज सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

पिछले साल केंद्र ने अक्टूबर में योजना तैयार की थी कि देश भर में 162 ऑक्सीजन प्लांट लगाए जाएंगे, लेकिन इस साल अप्रैल तक इनमें से बमुश्किल 30 से 35 ही इंस्टॉल हो पाए. इनमें से भी सभी ऑपरेशनल नहीं थे.

Oxygen (2)
कोविड की दूसरी वेव में मेडिकल ऑक्सीजन की कमी से देश में तमाम मरीज़ों ने दम तोड़ दिया. लोग सिलेंडर के लिए दर-दर भटकते रहे लेकिन ऑक्सीजन नहीं मिली. (फाइल फोटो- PTI)

कालाबाज़ारी

कोविड के इलाज के लिए ज़रूरी दवाइयों को स्टॉक करने में भी सरकार पूरी तरह नाकाम रही. इसकी वजह से कालाबाज़ारी को ज़ोर मिला, दवाइयों और इंजेक्शन के दाम आसमान छूने लगे. इंडिया टुडे में इसी से जुड़ा एक किस्सा छपा है.

महाराष्ट्र के ठाणे में रहने वाले नरेश इंदुलकर के एक रिश्तेदार अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती थे. उन्हें फौरन रेमिडिसिविर के तीन वॉयल की ज़रूरत थी. बहुत ढूंढा, नहीं मिला. आख़िर एक मेडिकल स्टोर पर मिला तो कीमत बताई 22 हज़ार रुपये. जबकि यही रेमिडिसिविर खुदरा कीमत पर 1800 रुपये का मिलता है. बाद में इंदुलकर को उनकी सोसायटी के एक परिचित ने 3 वॉयल दिए. वे परिचित भी इसे महंगे दामों पर ही ख़रीद कर लाए थे. लेकिन जब उनके पास 3 वॉयल बचे रह गए तो भलमनसाहत में इंदुलकर को कम दाम पर ही दे दिया.

इस वाकये से कोविड काल में दवाइयों और इंजेक्शन वगैरह की कालाबाज़ारी को समझा जा सकता है. इस दिशा में 3 काम तत्काल किए जाने की ज़रूरत है.

1. रेमिडिसिविर और दूसरे दवाइयों का उत्पादन बढ़ाया जाए. उनके वितरण की प्रणाली को दुरुस्त किया जाए.

2. दवा उत्पादन के लिए ज़रूरी हर कच्चे माल और हर दूसरी चीज का आयात आसान किया जाए.

3. तीसरी वेव को अभी से ध्यान में रखकर प्लानिंग की जाए.

इन सब मोर्चों पर सरकार कोई अडवांस प्लानिंग करने में, दूसरी वेव की तैयारी करने में नाकाम रही. नतीजा हमारे-आपके सामने है. स्वास्थ्य मंत्रालय के 8 मई तक के आंकड़ों के मुताबिक देश में 37 लाख से अधिक एक्टिव केस हैं. 2 लाख, 38 हज़ार से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं.


वेंटिलेटर और ऑक्सीजन की कमी पर मोदी सरकार के दावों का सच सुनकर गुस्सा आएगा

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