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कोरोना फ्रंट वॉरियर्स, जो कचरे से लेकर इंफेक्टेड PPE किट्स तक की साफ-सफाई से जुड़े हैं

कोरोना वायरस के ख़िलाफ फ्रंट वॉरियर्स में पुलिस और मेडिकल स्टाफ का नाम दमदारी से लिया जाता है. लेकिन इतनी ही दमदारी से नाम सामने रखने के हकदार हैं हमारे सफाईकर्मी और सैनिटेशन के काम से जुड़े तमाम अन्य वर्कर. ये लोग हमारे घर से लेकर हॉस्पिटल्स तक का कचरा साफ करते हैं. कई लोग सिर्फ कचरा नहीं उठाते, बल्कि इसके प्रबंधन के काम से भी जुड़े हैं.

दी लल्लनटॉप लगातार ऐसे लोगों से बात कर रहा है, जो किसी न किसी तरह से कोरोना वायरस के ख़िलाफ लड़ाई में योगदान दे रहे हैं. इस बार हमने सैनिटेशन वर्कर्स से बात की. बातचीत इन बातों के इर्द-गिर्द रही..

# पहचान और परिवार.

कबसे काम. कितना काम.

आमदनी.

इस वक्त के जोख़िम.

एक ‘कचरे वाले’ के अनुभव.

“क्या ये हमेशा इसी तरह रहेगा?”

नाम – बीना

काम – सफाई कर्मचारी

जगह – देहरादून

बीना 24 साल से साफ-सफाई का काम कर रही हैं. तीन बेटियां हैं. तीनों की शादी हो चुकी है. ये वक्त तो किसी तरह निकल जाएगा. बीना को चिंता है आने वाले वक्त की. कहती हैं –

“घर पर बात होती है कि क्या ये हमेशा ऐसा ही रहेगा? घर में मेरे बूढ़े सास-ससुर हैं. देवर-देवरानी के छोटे बच्चे हैं. मैं तो दिन भर गंदगी के बीच रहती हूं. वापस आकर घर में पैर रखते डर लगता है कि कहीं मेरी वजह से कुछ गड़बड़ न हो जाए. लेकिन काम भी नहीं रोक सकते. एक कॉलेज का काम था मेरे पास. मार्च से वो भी बंद है. फुटकर काम ही बचे हैं.”

बीना जिस कॉलेज में सफाई करती थीं वहां से करीब 7 हज़ार रुपए मिलते थे. अभी तनख़्वाह रुकी नहीं हैं. लेकिन कहती हैं कि जिस तरह से मुश्किल खिंचती जा रही है, डर लग रहा है.

क्या सफाई वालों को समाज ने फ्रंट वॉरियर मान लिया है? कुछ बदला है? बीना कहती हैं –

“ये सारी बातें (फ्रंट वॉरियर वगैरह) तो डॉक्टरों के लिए ही सही हैं. बाकी सफाई वालों को लेकर अंतर तो बड़े लोगों में रहता है. कॉलेज में काम करने के नाते काफी वक्त नई उमर के बच्चों के बीच बिताती हूं. वो तो दोस्त की तरह बात करते हैं. हीनभावना तो बड़ों से मिलकर होती है.”

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कम तनख़्वाह बाकी तमाम पेशों की तरह सफाईकर्मियों की भी बड़ी समस्या है. बीएमसी के सफाई कर्मचारियों ने 13 मई को तनख़्वाह बढ़ाने की मांग पर प्रदर्शन भी किया था. (फोटो- PTI)

“सफाई में गड़बड़ी से कोई केस आया हो तो बताओ”

नाम – मंजीर

काम – सफाई कर्मचारी

जगह – वाराणसी

“आप बताओ..कोरोना के जितने भी केस आ रहे हैं, वो इंसान की ख़ुद की गड़बड़ी से आ रहे कि नहीं आ रहे. कहीं से ऐसा आया क्या कि वहां पर कचरा पड़ा था तो इंफेक्शन हो गया. हमें बुरा लगता है, जब कोई कहता है कि हमारे शहर से वायरस फैल रहा है. कुछ लोगों की नासमझी की वजह से शहर में दिक्कत हो गई.”

मंजीर बनारस में अस्सी घाट और आस-पास के क्षेत्र में साफ-सफाई का काम करते हैं. करीब 4-5 साल से. महीने का 5 से 6 हज़ार रुपए निकाल लेते हैं. वो कहते हैं –

“सोचो इंसान इतना तेज़ाब और तमाम चीज़ों से रगड़-रगड़कर सफाई कराता है, तब ये हाल है. नई-नई बीमारियां आई जा रही हैं. ये सब ना होता, तो क्या हाल होता? अब लोगों को ये महसूस हो रहा है कि हमारा काम भी कितना ज़रूरी है.”

“जला दी जाती है हर एक पीपीई किट”

नाम –  रिंकू

काम – सफाई कर्मचारी

जगह – वाराणसी

रिंकू बीएचयू के मेडिकल कॉलेज में सफाई कर्मी के तौर पर कम करते हैं. 2010 से यहीं काम कर रहे हैं. कहते हैं –

“हमारे लिए एक तरह से ज़्यादा कुछ बदला नहीं है. हमें तो पहले भी सफाई करनी थी, अभी भी. अच्छी बात ये है कि मास्क-ग्लव्स लगाने की आदत पहले से रही है. बार-बार हाथ धोने की आदत पहले से रही है.”

रिंकू डॉक्टरों की पीपीई किट्स को जलाने की व्यवस्था से भी जुड़े हैं. बताते हैं –

“इस्तेमाल होने के बाद हर एक पीपीई किट जला दी जाती है. शहर भर के अस्पतालों से निकलने वाली पीपीई किट्स का निस्तारण करने के लिए टीम बनी है. वो हर अस्पताल से किट कलेक्ट कर शहर के बाहर ले जाकर जलाती है. अस्पताल में सफाईकर्मियों का काम रहता है ये ध्यान देना कि किट जिस काली पन्नी में इकट्ठा हो रही हैं, वो बाकी कचरे से अलग रहे. इस्तेमाल हो चुकी किट्स के अस्पताल से चले जाने  तक कोई दिक्कत न हो. बाकी इसे हटाने का काम वही टीम करती है, जो जलाती है.” 

“लोग तो कहते हैं किचन भी सेनिटाइज़ कर दो”

नाम – कन्हैया कुमार

काम – सफाई सुपरवाइज़र

जगह – भोपाल

कन्हैया कुमार मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में डोर टू डोर कचरा कलेक्शन वाली गाड़ियों के सुपरवाइज़र का काम देखते हैं. इनसे हमें मोटा-मोटा ये आइडिया मिला कि सफाई का सिस्टम किस तरह काम कर रहा है? कन्हैया ने बताया –

“सफाई और सेनिटाइज़ेशन की व्यवस्था वार्ड बेसिस पर बनती है. फिलहाल ऑन ऐन एवरेज एक वार्ड में 7-8 लड़के हैं. कोई वार्ड बड़ा है तो 10 हो सकते हैं. 6, 7 या 8 गाड़ियां एक वार्ड में लगी रहती हैं. इस वक्त एक-एक पिकअप गाड़ी बढ़ाई गई है. सेनिटेशन के लिए. लड़कों की सैलरी 5 से 6 हज़ार रुपए तक रहती है. रोज का रोज पेमेंट रहता है. इस वक्त सबके पास मास्क और ग्लव्स हैं.”

सेनिटेशन का काम कैसे हो रहा है? इस पर कन्हैया कुमार बताते हैं –

“दवा तो हम नगर दफ़्तर से उठाते हैं. जिन वार्ड से कोई पॉज़िटिव केस आया है, वहां एक या दो लड़के दवा छिड़काव के लिए अलग से रखे हैं. ये सिर्फ मास्क-ग्लव्स नहीं, पूरा सूट पहनते हैं. सेनिटाइज़ेशन में दिक्कत हमारी तरफ से नहीं आती. दिक्कत लोगों की तरफ से आती है, जो समझते नहीं कि ये कोई मच्छर मारने वाली दवा नहीं है कि कहीं भी छिड़कवा लो. कहते हैं कि हमारे कमरे में, किचन भी सेनिटाइज़ कर दो. बड़ी मुश्किल से समझाते हैं कि ये ऐसी दवा नहीं है कि घर के अंदर-अंदर छिड़कवा लो.”

सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करना आसान नहीं होता. जिस गंदगी से हम तौबा कर लेते हैं, वही गंदगी उन्हें साफ करनी होती है. लेकिन हमने जितने भी सफाई कर्मियों से बात की, उनमें एक कॉमन बात निकलकर आई. उनका मन कहीं न कहीं इस बात को लेकर तसल्लीबख़्श है कि इस मुश्किल वक्त में जिस तरह डॉक्टर, पुलिस का काम ज़रूरी है, उसी तरह उनका भी. वो समाज के ज़रूरी अंग हैं. ये बात उन्हें उस हीनभावना को कम करने में भी मदद कर रही है, जो लगातार इतने साल तक मन में घर करती गई है.


लखनऊ KGMU के सफाई कर्मचारियों की सैलरी कटी, तो उन्होंने काम से बहिष्कार कर दिया!

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