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चार हिंदी फिल्मों के वो रिफ्रेशिंग मर्द किरदार, जिनको महिला राइटर्स ने लिखा और कमाल कर डाला

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक पोस्ट खूब वायरल हो रहा है. निक्टोफिलिया नाम के ट्विटर हैंडल से किए गए इस ट्वीट को खूब रीट्वीट और लाइक किया जा रहा है. इस पोस्ट में चार फिल्मों के स्क्रीनशॉट्स नत्थी हैं. इन तस्वीरों में इरफान खान, शाहरुख खान, ऋतिक रौशन-अभय देओल-फरहान अख्तर और फवाद खान नज़र आ रहे हैं. इसके कैप्शन में सिर्फ चार शब्द लिखे हैं- Men written by women. यानी वो फिल्मी मर्द किरदार, जो महिलाओं ने लिखे. यही चार शब्द उस पोस्ट को खास बनाते हैं. किसी तरह का कन्फ्यूज़न न रहे, इसलिए आप वो ट्विटर पोस्ट देखिए-

ये ‘पीकू’, ‘डियर ज़िंदगी’, ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ और ‘खूबसूरत’ फिल्म के सीन्स के स्क्रीनग्रैब हैं. इस पोस्ट में बड़ी सिंपल सी बात लिखी हुई है, जिसका मर्म हर कोई अपनी समझ के हिसाब से समझ सकता है. हमें क्या लगा वो हम आपको बता रहे हैं.

आम तौर पर हिंदी सिनेमा के अधिकतर किरदार मर्द ही लिखते हैं. क्योंकि जिस इंडस्ट्री में ये सारे काम होते हैं, उसमें पुरुष लोग ज़्यादा होते हैं. वो मर्दों को वैसे ही दिखाते हैं, जैसा उन्हें लगता है कि मर्द होते होंगे. या जैसे वो खुद हैं. मगर इस ट्विटर पोस्ट में ये बताया गया है कि जब महिलाओं को मौका मिला, किसी पुरुष किरदार को लिखने का, तो उन्होंने कैसे लिखा? महिलाओं द्वारा लिखे फिल्मी मेल कैरेक्टर्स, पुरुषों द्वारा लिखे मर्द किरदारों से किन मायनों में अलग हैं?

हिंदी फिल्मों के पुरुष हमेशा से कर्ता-धर्ता रहे हैं. जैसे कहा जाता है कि सिनेमा समाज का आइना होता है. यानी सिनेमा में वही दिखाया जाता है, जो किसी सोसाइटी में हो रहा होता है. हमारी सोसाइटी में मर्दों को एक खास किस्म का सुपरपावर प्राप्त है, जिसे कहते हैं पेट्रियार्की. हिंदी में उसे पितृसत्ता कहा जाता है. इसका मतलब ये कि सत्ता पुरुषों के हाथ में रहेगी. महिलाएं वहीं करेंगी, जो पुरुष उसे करने देगा. हमारी हिंदी फिल्में भी इस आइडिया को फॉलो करती हैं. फिल्म का हीरो, हीरोइन को प्यार करता है. भले हीरोइन उसके प्यार को रेसिप्रोकेट करे या ना करे. जैसे वो शाहरुख का वो गाना है न- ‘तू हां कर या ना कर, तू है मेरी किरण’. हीरोइन किसी मुश्किल में है, तो वो खुद को नहीं बचा सकती. कोई हीरो ही उसकी मदद कर सकता है. हीरोइन सिर्फ इसलिए है ताकि कहानी के अंत में उस लड़के का प्यार स्वीकार फिल्म को हैप्पी एंडिंग दे सके. फिल्म के आखिर में इस तरह की चीज़ों को जस्टिफाई भी कर दिया जाता है. क्योंकि यहां जो कुछ भी हो रहा है, वो पुरुष के नज़रिए से हो रहा है.

90 के दशक में हिंदी सिनेमा में महिला पर्सपेक्टिव उतना ही देखने को मिलता था, जितनी इस फोटो में जूही चावला दिख रही हैं.
90 के दशक में हिंदी सिनेमा में महिला पर्सपेक्टिव उतना ही देखने को मिलता था, जितनी इस फोटो में जूही चावला दिख रही हैं.

मगर महिलाएं जब कोई किरदार लिखती हैं, तो हमें उसमें उनका नज़रिया देखने को मिलता है. वो पुरुषों को उसी तरह से लिखती हैं, जैसे वो उन्हें देखती-समझती हैं. या जैसे वो एक आदर्श समाज में पुरुषों को देखना चाहती हैं. कुछ बेसिक चीज़ें हैं, जो आपको किसी महिला द्वारा लिखित या डायरेक्टेड फिल्मों में देखने को मिलती हैं.

1) महिलाएं इंडीपेंडेंट होती हैं, जो अपने फैसले खुद ले पाएं.
2) वो पुरुषों को एक कंपैनियन की तरह देखती हैं. जो उनकी लड़ाई खुद न लड़े, बल्कि उन्हें अपनी लड़ाई लड़ने दे. उनका मसीहा न बने, बस उनके साथ खड़ा रहे.
3) पुरुष उन्हें समझे, ना कि अपनी समझ उनके ऊपर थोपे.
4) पुरुष की सोच सैकड़ो-हज़ारों वर्षों से चले आ रहे घिसे-पिटे सामाजिक बंधनों से मुक्त रहे.
5) सबसे ज़रूरी ये कि पुरुष किसी महिला को अपने बराबर का समझे. न कम न बेसी.

जैसा कि हमने पहले बताया ये सबसे बुनियादी चीज़ें हैं, जो हमें महिला द्वारा लिखे पुरुष पात्रों में देखने को मिलती हैं. और हैरत की बात ये कि हमें आज भी ये चीज़ें कहकर बतानी पड़ रही हैं.

अब जैसे ‘पीकू’ के राणा चौधरी को लीजिए. टैक्सी कंपनी का मालिक होने के बावजूद राणा खुद पीकू और उसके पिता भास्कर बैनर्जी को कलकत्ता लेकर जाता है. वो भास्कर के नखरों से परेशान होता है. मगर उसके भीतर एक सहनशीलता है. वो भास्कर से नाराज़ होने की बजाय उन्हें समझने की कोशिश करता है. उनसे बातें करता है. नुस्खे बताता है. और आखिर में उनका दिल जीत लेता है. क्योंकि राणा की ही सलाह पर भास्कर साइकिल चलाने के दौरान स्ट्रीट फूड से लेकर हर तरह का खाना खाने लगते हैं. इससे उनका कॉन्स्टिपेशन हमेशा के लिए दूर हो जाता है. वो सिर्फ भास्कर को नहीं, पीकू और उसके पिता के बीच का इक्वेशन भी सही से समझता है और कहीं भी मैंसप्लेन करने की कोशिश नहीं करता. पीकू से उसका एक कनेक्शन बनता है, जो अधिकतर मौकों पर अनकहा ही रहता है. फिल्म के आखिर में बैडमिंटन खेलते वक्त तक.

इस किरदार में एक मच्योरिटी है. लाइफ को देखने का मज़ेदार नज़रिया है. लोगों को समझने का हुनर है. प्रेम करने का तरीका है. मर्द होने का सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स नहीं है. वो एक साधारण आदमी है. ‘पीकू’ को लिखा था जूही चतुर्वेदी ने और डायरेक्ट किया था शूजीत सरकार ने. ‘पीकू’ का ट्रेलर आप यहां देख सकते हैं-

इस पोस्ट में नज़र आ रही दूसरी फिल्म है ‘डियर ज़िंदगी’. इस फिल्म में शाहरुख खान ने जहांगीर खान नाम के एक साइकोलॉजिस्ट का रोल किया है. इस रोल की तारीफ इसलिए हुई क्योंकि पहले तो शाहरुख एक ऐसा किरदार प्ले कर रहे थे, जो उनकी उम्र के आसपास है. और इस फिल्म में आलिया के साथ उनका कोई रोमैंटिक एंगल नहीं था. मगर इन मटिरियलिस्टिक चीज़ों से इतर भी जहांगीर एक बड़ा एस्पिरेशनल कैरेक्टर साबित होता है. एस्पिरेशनल कैरेक्टर यानी वो किरदार जिनके जैसा आप बनना चाहते हों.

जहांगीर, जिसे आलिया भट्ट का निभाया कायरा का किरदार जग नाम से बुलाता है. इसलिए हम भी उसे जग ही बुलाएंगे. फिल्म की स्टोरी के हिसाब से जग के मेटाफोरिकल मायने भी हैं. मगर अभी हम उस किरदार की बात कर रहे हैं न कि फिल्म की इसलिए अपना फोकस जहांगीर पर रखेंगे.

जहांगीर से जब हमारी पहली मुलाकात होती है, तब हमें वो ठहराव वाला आदमी लगता है. उसमें नाइंटीज़ वाले शाहरुख का छिछलापन नहीं था. उसमें एक संवेदनशीलता थी, जो एक थेरेपिस्ट से आप एक्सपेक्ट करते हैं. वो मानसिक स्वास्थ्य को रियल इशू मानता था. यही चीज़ उसे कायरा को समझने में मदद करती है. मगर जग ने कभी भी कायरा को समझाया नहीं, उसे चीज़ें करके खुद समझने दिया. कुर्सी पर बैठकर ट्राय करने और फिर उसे खरीदने वाला फंडा दिया. वो पूरी फिल्म में सिर्फ एक गाइड के तौर पर नज़र आता है, जो कायरा समेत कई लोगों को जकड़न और अपनी कुंठाओं से निकलने का रास्ता बताता था. वो एक किरदार के तौर पर इतना ज़्यादा सुलझा हुआ था कि फिल्म की नायिका कायरा भी एक बार को उसके प्रति आकर्षित हो जाती है. ‘डियर ज़िंदगी’ को गौरी शिंदे ने लिखा और डायरेक्ट किया है.

फिल्म 'डियर ज़िंदगी' के एक सीन में शाहरुख खान और आलिया भट्ट.
फिल्म ‘डियर ज़िंदगी’ के एक सीन में शाहरुख खान और आलिया भट्ट.

उस पोस्ट में तीसरी तस्वीर है फिल्म ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ से. इस फिल्म पर हमेशा से एलीटिस्ट होने के इल्ज़ाम लगते रहे हैं. मगर फिल्म के कैरेक्टर्स का पिक्चराइजेशन हमेशा से चर्चा और कुतुहल का विषय रहा है. कटरीना का निभाया ‘लैला’ शायद उनके करियर का बेस्ट रोल है. मगर इसके कुछ कैरेक्टर ट्रेट्स बड़े रेगुलर हैं. हमारे यहां बनने वाली फिल्मों में मुख्यत: लड़का, लड़की को हर मुसीबत से निकालने का ठेका लेता है. डैमसेल इन डिस्ट्रेस टाइप सिचुएशन रहती है. मगर फिर आती हैं वो फिल्में जिनमें लड़कियां, लड़कों का जीवन सुधारती हैं. ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ एक ऐसी ही फिल्म थी. लैला और अर्जुन दो ऐसे ही किरदार थे. फिल्म में लैला अर्जुन को पैसे कमाने की लत छुड़ाकर जीवन जीना सिखाती है. मगर वो अर्जुन के ऊपर अपनी चॉइस या आइडिया थोपती नहीं है. अर्जुन वो मर्द नहीं है, जिसे अपने भीतर की कमियां नहीं दिखती. उसे अपनी दिक्कतें पता हैं, बस वो उसे प्रॉपर पर्सपेक्टिव में नहीं देख पा रहा. क्योंकि उसकी आंखों पर पास्ट का पर्दा लगा हुआ है. लैला उसे वो पर्सपेक्टिव देती है. उसकी गांठें खोलने में मदद करती है. उसे उसके कल से निकालकर आज में ले आती है. अर्जुन का सामना जब अपने जीवन के सबसे बड़े डर से होता है, फिर उसका हर डर जाता रहता है. इसके बाद वो अपने भीतर हो रहे बदलाव को खुले मन से स्वीकार करता है.

मगर ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ का सबसे प्रोग्रेसिव किरदार है कबीर. ये फिल्म बस हीरो-हीरोइन का रोल-रिवर्सल करती है. इसलिए चीज़ें ज़्यादा हिट करती हैं. जो काम अब तक हमारी फिल्मों में हीरो किया करते थे, वो ZNMD में हीरोइनें करती हैं. फिल्म में एक सीन है, जब अपने बैचलर ट्रिप पर स्पेन गए कबीर के होटल में उसकी मंगेतर नताशा पहुंच जाती है. वो इनसिक्योर फील करती है. वो कबीर से कहती है कि उसे दूसरी लड़कियों के साथ देखकर उसे अच्छा नहीं लगा. इसके जवाब में कबीर कहता है कि अगर नताशा अपनी कज़िन तान्या के साथ किसी बैचलर ट्रिप पर जाएगी, तो इस चीज़ से उसे कोई दिक्कत नहीं है. नताशा पूछती है, अगर वो अपने होटल में दूसरे लड़कों के साथ घूमे, तो कबीर को कैसा लगेगा. कबीर कहता है कि उसे इस चीज़ से भी कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि उसे नताशा पर यकीन है.

बाद में कबीर अपने दोस्तों के पूछने पर बताता है कि नताशा वो लड़की नहीं है, जिससे उसे प्यार हुआ था. वो जिस नताशा को जानता था, वो अपने काम को लेकर पैशनेट थी. लाइफ में कुछ करना चाहती थी. मगर ये नताशा सिर्फ उसके साथ शादी करना चाहती है. शादी के नाम पर वो हर चीज़ से कॉम्प्रोमाइज़ करने को तैयार है. अपने करियर के साथ भी. इसलिए वो तय करता है कि नताशा से शादी नहीं करेगा.

‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ को ज़ोया अख्तर ने रीमा कागती के साथ मिलकर लिखा था. इस फिल्म को डायरेक्ट ज़ोया अख्तर ने किया था. ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ का ट्रेलर आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं-

उस पोस्ट में नज़र आने वाली आखिरी फिल्म है ‘खूबसूरत’. ये वैसे तो एक महिला प्रधान फिल्म थी. मगर इस फिल्म में फवाद खान के निभाए युवराज विक्रम सिंह राठोर के किरदार की तारीफ हुई. क्योंकि वो रेगुलर हिंदी फिल्म हीरो से एक अन-कन्वेंशनल कैरेक्टर तक का सफर तय करता है. राजघराने से आने वाले इस लड़के ने बड़ी स्ट्रिक्ट लाइफ जी है. उसे बचपन से सिखाया गया कि कैसे बिहेव करना है. क्या बात करनी है. कैसे कपड़े पहनने हैं. तिस पर उसकी फैमिली एक गहरे सदमे से गुज़र रही है. ये चीज़ उन्हें दुनियावी होने से रोकती है. फिर उसकी लाइफ में एक लड़की आती है, जिसे इन चीज़ों की बिल्कुल परवाह नहीं. पहले तो विक्रम उससे दूर भागता है. मगर एक समय के बाद उसे रियलाइज़ होने लगता है कि इतना परफेक्ट होने में कुछ नहीं रखा. वो ऊपरी तौर पर तो वैसा ही दिखता है. मगर उसके भीतर चीज़ें बदलने लगती हैं. इसमें कैटलिस्ट का काम करती है वो लड़की यानी डॉ. मिली, जिसका रोल सोनम कपूर ने किया है. जब आप बदलाव को लेकर ओपन होते हैं, यही आपके भीतर होने वाला सबसे बड़ा बदलाव होता है. यहां से उस किरदार की एक अलग यात्रा शुरू होती है. जिसे देखकर ऐसा लगता है मानों वो फिल्म खत्म होने के बाद भी वो कहीं जारी रही होगी.

‘खूबसूरत’ को जूही चतुर्वेदी ने इंदिरा बिष्ट के साथ मिलकर लिखी थी. इस फिल्म को डायरेक्ट किया था शशांक घोष ने.


वीडियो देखें: स्वास्तिका मुखर्जी ने बॉडी पॉज़िटीविटी पर पोस्ट लिखा है, सब तारीफ क्यों कर रहे हैं?

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