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जब अटल ने बोला - मैं भी अटल हूं, देखता हूं कि कब तक मुझे सांसद नहीं बनाओगे

बात 1939 की है. तब अटल बिहारी वाजपेयी 15 साल के थे. ग्वालियर में ही आर्य कुमार सभा की एक साप्ताहिक बैठक में पहुंचे हुए थे. आर्य कुमार सभा के ही एक कार्यकर्ता भूदेव शास्त्री ने अटल से पूछा – शाम को क्या करते हो? अटल बोले – कुछ खास नहीं. सामने से भूदेव बोले- तो फिर तुम आरएसएस की शाखा में क्यों नहीं जाते. अटल ने उनका प्रस्ताव मान लिया और वो उस संगठन के संपर्क में आ गए जिसके रास्ते पर चलकर उनको देश के सबसे बड़े पद तक पहुंचना था. इतिहास रचना था.

खैर ये सिर्फ शुरुआत थी. क्योंकि वो कुछ सालों के लिए एक तरह से स्टडी लीव पर चले गए. ग्वालियर में ग्रैजुएशन किया, फिर पहुंच गए कानपुर. एमए करने और वकालत पढ़ने. वो इसलिए क्योंकि ग्वालियर में पोस्ट ग्रैजुएशन के लिए कोई कॉलेज नहीं था. पर पढ़ाई पूरी हो पाती. उससे पहले ही उनको नई जिम्मेदारी मिल गई. 15 अगस्त 1947 को संगठन ने लखनऊ से राष्ट्रधर्म नाम की मासिक पत्रिका शुरू की. अटल को उसका सहायक संपादक बनाया गया. और यहां अटल के बॉस थे दीनदयाल उपाध्याय. अटल ने इसमें जमके मेहनत की, जिसका नतीजा ये हुआ कि 14 जनवरी 1948 को मकर संक्रांति के मौके पर आरएसएस ने साप्ताहिक अखबार पांचजन्य की शुरुआत की. अटल को अखबार का संपादक बनाया गया. हालांकि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर बैन लग गया और ये अखबार बंद हो गया. मगर अटल ने लिखना बंद नहीं किया. वो लखनऊ में स्वधर्म नाम के एक प्रकाशन से जुड़ गए. फिर अटल ने दैनिक मिलाप के साथ काम किया, मगर 1950 में वो दिल्ली चले गए. क्योंकि अब कुछ और करने का वक्त आ गया था. घर वापसी की घड़ी आ गई थी.

अटल लखनऊ में राष्ट्रधर्म पत्रिका में सहायक संपादक थे.
अटल लखनऊ में राष्ट्रधर्म पत्रिका में सहायक संपादक थे.

1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आरएसएस के सहयोग से भारतीय जनसंघ की स्थापना की. संघ ने अपने कुछ कार्यकर्ताओं को संघ को सौंपा. इनमें सबसे मुख्य थे दीनदयाल उपाध्याय, जिनके लिए मुखर्जी कहते थे कि अगर मेरे पास तीन दीनदयाल जैसे सहयोगी होते तो मैं देश की राजनीति का चेहरा बदल देता. कुछ इसी तरह से दीनदयाल की नजर अटल पर थी. उन्होंने अटल को भी अपने साथ ले लिया. कुछ दिन बाद वो मुखर्जी के सहायक बन गए. वो मुखर्जी की खास तौर पर कश्मीर के मसले पर मदद करने लगे. हालांकि 1953 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कश्मीर में मौत हो गई. जनसंघ के लिए ये एक बहुत बड़ा झटका था. वो इसलिए क्योंकि मुखर्जी के बाद ऐसा कोई आदमी नहीं था जो जनसंघ के विचारों को संसद में रख सके. ऐसे वक्त में पार्टी के महासचिव दीनदयाल उपाध्याय की नजर गई अटल बिहारी पर. उन्हें पता था कि अटल ही वो शख्स हैं जो संसद में उनकी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं. ये चल ही रहा था कि 1954 में लखनऊ में उपचुनाव की बारी आ गई. वो इसलिए क्योंकि वहां की सांसद विजयलक्ष्मी पंडित (जवाहरलाल नेहरू की बहन) को संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का राजदूत बना के भेज दिया गया था. जनसंघ ने अटल को चुनावी मैदान में उतार दिया.

28 साल के अटल ने इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कड़ी मेहनत करते हुए करीब 150 से भी अधिक जनसभाएं कीं. मगर कांग्रेस उस वक्त अपने चरम पर थी. अटल के पुराने सहयोगी और बीजेपी नेता लालजी टंडन बताते हैं –

कांग्रेस के पास सब संसाधन थे. हमारे पास कुछ नहीं. साइकिल से जुलूस निकाले गए थे. इक्का पे लाउडस्पीकर लगाया जाता था और तब प्रचार होता था.

लालजी टंडन अटल बिहारी वाजपेयी के पुराने सहयोगी रहे हैं.
लालजी टंडन अटल बिहारी वाजपेयी के पुराने सहयोगी रहे हैं.

यही वजह थी कि अटल कांग्रेस के एसआर नेहरू को हरा नहीं पाए और खुद तीसरे नंबर पर रहे. दूसरे नंबर पर रहे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के त्रिलोक सिंह. कुछ यूं रहा था रिजल्ट –

एसआर नेहरू – 49,324 वोट

त्रिलोकी सिंह – 34,578 वोट

अटल बिहारी वाजपेयी – 33,986 वोट

अटल करीब 15,000 वोटों से अपना पहला चुनाव हारे. मगर ये उनका आखिरी चुनाव नहीं था. लखनऊ ने उन्हें उनके पहले चुनाव में दगा दी. मगर भविष्य में यही लखनऊ उस पर जमके प्यार बरसाने वाला था. 1991 से लेकर 2004 तक. मगर इस प्यार के बरसने से पहले 1957 में लखनऊ ने अटल की फिर क्लास लगाई. उनको फिर झटका दिया. इस चुनाव में अटल थ्री इन वन चुनाव लड़ रहे थे. माने वो तीन जगहों से किस्मत आजमा रहे थे. लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर. इन तीन जगहों से अटल के लड़ने का फैसला खुद दीनदयाल उपाध्याय ने लिया था. वो इसलिए क्योंकि वो चाहते थे कि अटल हर हाल में लोकसभा पहुंचें.

सभा को संबोधित करते हुए दीनदयाल
सभा को संबोधित करते हुए दीनदयाल

ऐसा ही हुआ भी. मगर अटल लखनऊ नहीं, बलरामपुर से सांसद बने. सबसे बुरी हार उन्हें मिली मथुरा में, जहां उनकी जमानत जब्त हो गई. मगर लखनऊ ने उन्हें हराया जरूर, मगर इज्जत के साथ. वो दूसरे नंबर पर रहे. उन्हें 33.44% वोट मिले. वो कांग्रेस के पुलिन बिहारी बैनर्जी से करीब 12 हजार वोटों से हारे. रिजल्ट ये रहा –

पुलिन बिहारी – 69,519
अटल बिहारी – 57,034
फजल अब्बास- 28,542

इस हार के बाद जनसंघ के कार्यालय पर मौजूद लोग हार-जीत का विश्लेषण कर रहे थे. इस बीच अटल उठे और बोले – चलो बनर्जी जी के घर. अटल को घर के सामने देख पुलिन बिहारी के घर मौजूद लोग हड़बड़ा गए. अटल घर के अंदर पहुंचे और बोले, दादा जीत की बधाई. चुनाव में तो बहुत कंजूसी की, लेकिन अब न करो. कुछ लड्डू-वड्डू तो खिलाओ. दादा अटल के इस बर्ताव से इतना प्रभावित हुए कि उनको गले लगा लिया. फिर लड्डू भी आया. अटल ने खुद अपने हाथ से बैनर्जी को लड्डू खिलाया और आशीर्वाद लिया.

लखनऊ से दो बार गच्चा खाने के बाद अटल एक लंबे अंतराल के बाद ही लखनऊ वापस आए. सीधा 1991 में. उन्होंने यहां से लड़ने पर एक बयान दिया. बोले –

आप लोगों ने क्या सोचा था, मुझसे पीछा छूट जाएगा. तो मैं बता दूं यह होने वाला नहीं. मेरो मन अनत कहां सुख पावे, लखनऊ मेरा घर है. इतनी आसानी से मुझसे रिश्ता नहीं तोड़ सकते. मेरा नाम भी अटल है. देखता हूं कि कब तक मुझे सांसद नहीं बनाओगे.

Atal Bihari Vajpayee (24)

हालांकि ये तो चुनावी बयान था. असल में तो अटल लखनऊ को लेकर बड़े आशंकित थे. वो 1954 और 1957 की हार नहीं भूले थे. इसका किस्सा सुनाते हुए लालजी टंडन बताते हैं कि –

अटल जी से हमने 1991 में लखनऊ से चुनाव लड़ने का अनुरोध किया तो वह बोले- क्या तुम लोग मुझे फिर से हरवाना चाहते हो. हालांकि, उन्होंने सबका अनुरोध स्वीकार किया. वह 1991 में लखनऊ और मध्य प्रदेश के विदिशा से चुनाव लड़े. इस पर लोगों ने पूछा कि दोनों जगह जीत गए तो कहां की सीट छोड़ेंगे? उन्होंने जवाब दिया- जहां से ज्यादा वोट मिलेंगे, वह सीट रखूंगा. लखनऊ वाले उनकी अपेक्षा पर खरे उतरे. एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीते और फिर विदिशा की सीट छोड़ दी. तब से अटल जी लगातार लखनऊ से लोकसभा चुनाव लड़े और जीतते रहे.

जब एक सर्वे से नाराज हो गए अटल

1991 के लोकसभा चुनाव की ही बात है. एक प्रमुख अखबार ने सर्वे छापा कि अटल अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से बहुत पीछे चल रहे हैं. सर्वे से वाजपेयी जी बहुत नाराज हुए. उस दिन वे लखनऊ में ही थे. शाम को जब वे कार्यकर्ता सम्मेलन में पहुंचे तो यह अनुमान लगाया जा रहा था कि वे अखबार के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करेंगे. लेकिन उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि एक सर्वे आया है, जिसमें बताया गया कि मैं बहुत पीछे चल रहा हूं. कार्यकर्ता सतर्क हो जाएं. अभी मैं पिछड़ा हुआ हूं.

Atal Bihari Vajpayee (18)

हालांकि जब 1991 चुनाव का रिजल्ट आया तो सारे सर्वे, आंकड़े धरे रह गए. वो इसलिए क्योंकि अटल 1 लाख 15 हजार से भी ज्यादा वोटों से जीते थे. ये रहा था रिजल्ट –

अटल बिहारी वाजपेयी – 1,94,886 वोट
रंजीत सिंह – 77,583 वोट
हीरू सक्सेना – 59,385 वोट

फिर बारी आई 1996 के चुनाव की. ये चुनाव वैसे भी बड़ा चुनाव था क्योंकि लखनऊ की जनता को नहीं पता था कि वो देश के प्रधानमंत्री को अपना नेता चुनने जा रहे हैं. शायद इसीलिए इस बार चुनाव भी मजेदार हुआ. वो इसलिए क्योंकि इस बार अटल जी को हराने के लिए विपक्षियों ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को यहां उतार दिया था. समाजवादी पार्टी से मैदान में थे अब के यूपी के कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर. एक से एक बड़े साहित्यकार भी अटल के खिलाफ दिल्ली-मुंबई से लखनऊ में कैंपेन करने आए थे. कहा जाता है कि लखनऊ के बड़े उद्योगपति सहारा प्रमुख सुब्रत राय ने राजबब्बर की काफी मदद की थी. ये वही चुनाव था जब लखनऊ की जनता ने पहली बार हैलिकॉप्टर के जरिए चुनाव प्रचार होते देखा. मगर अटल के आगे ये सारा भौकाल धरा रह गया. अटल को 52.25% वोट मिले. वो फिर करीब 1 लाख 20 हजार वोटों से जीते. ये रहा था रिजल्ट –

अटल बिहारी वाजपेयी – 3,94,865 वोट
राज बब्बर – 2,79,194 वोट
वेद प्रकार ग्रोवर – 42,993 वोट

राजबब्बर ने जोरशोर से प्रचार किया था अटल के खिलाफ मगर वो हारे थे.
राजबब्बर ने जोरशोर से प्रचार किया था अटल के खिलाफ मगर वो हारे थे.

अटल इसी जीत के बदौलत 13 दिन के लिए ही सही, प्रधानमंत्री बने. यही वजह थी कि अटल के लिए लखनऊ कुछ वैसा ही हो गया जैसे गांधी परिवार के लिए रायबरेली था. अब उनके और लखनऊ के रिश्ते के लिए ये भी कहा जा सकता था कि –

लखनऊ इज अटल, अटल इज लखनऊ.

ये प्यार एक बार पिर 1998 में रंग लाया. इस बार अटल के खिलाफ मैदान में आए थे प्रसिद्ध फिल्मकार मुजफ्फर अली. तब के चुनाव प्रचार का एक किस्सा है जो सबको जानना चाहिए. दरअसल एक ही दिन लखनऊ के बख्शी का तालाब में दोनों जन प्रचार करने पहुंच गए. बख्शी का तालाब में वाजपेयी और मुजफ्फर अली का काफिला आमने-सामने आ गया. बीजेपी कार्यकर्ता नारेबाजी करने लगे. वाजपेयी जी तुरंत अपनी गाड़ी से बाहर आए और कार्यकर्ताओं से कहा कि पहले मुजफ्फर अली जी का काफिला जाएगा. और वैसा ही हुआ. वाजपेयी की इसी सादगी की ही तो दुनिया कायल थी. और इन्हीं अदाओ पर लखनऊ भी फिदा था. तभी तो जनता ने उनको इस बार और बड़े अंतर से चुनाव जितवाया. मुजफ्फर अली लाख लखनऊ की विरासत नहीं सहेज पाने की तोहमत अटल बिहारी पर लगाते रहे, मगर जनता तो अटल पर कुर्बान थी. अटल 2 लाख 15 हजार से भी ज्यादा वोटों से चुनाव जीते. ये रहा था रिजल्ट –

अटल बिहारी वाजपेयी – 4,32,738 वोट
मुजफ्फर अली – 2,15,475 वोट

1998 में लखनऊ से लड़े थे मुजफ्फर अली.
1998 में लखनऊ से लड़े थे मुजफ्फर अली.

फिर 1999 के चुनाव में कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ पैराशूट प्रत्याशी उतारा. जम्मू कश्मीर के राजा कर्ण सिंह को. कांग्रेस ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया. दरअसल वो अटल बिहारी वाजपेयी को नहीं बल्कि पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को हराना चाहते थे. मगर लखनऊ तो तब तक इस गुमान में आ चुका था कि हम प्रधानमंत्री चुन रहे हैं. तो इतनी आसानी से कैसे हराया जा सकता था अटल को. रिजल्ट आए तो एक बार फिर साफ हो गया कि लखनऊ का अटल प्रेम इतनी आसानी से नहीं खत्म होने वाला. अटल करीब 1 लाख 40 हजार वोटों से चुनाव जीते. ये रहा था रिजल्ट –

अटल बिहारी वाजपेयी – 3,62,709
डॉ. कर्ण सिंह – 2.39,085 वोट
भगवती सिंह – 78,826 वोट

कश्मीर के राजा कर्ण सिंह भी अटल को हरा नहीं पाए थे.
कश्मीर के राजा कर्ण सिंह भी अटल को हरा नहीं पाए थे.

लखनऊ ने जो सोचकर अटल को वोट दिया था, वैसा ही हुआ भी. अटल बिहारी वाजपेयी एक बार फिर प्रधानमंत्री बने. फिर आया वो 2004 का चुनाव जिसमें बीजेपी इंडिया शाइनिंग के रथ पर सवार होकर सत्ता में फिर से वापसी की तैयारी कर रही थी. ये वही चुनाव था जिसमें अटल ने कहा था – थका हूं, मगर रिटायर नहीं हुआ हूं. ये बात आधी सही साबित हुई और आधी गलत. आधी सही इसलिए क्योंकि वो लखनऊ से चुनाव जीते. मगर देश में इंडिया शाइनिंग का नारा नहीं चला. इस बार उनके सामने थे सुप्रीम कोर्ट के प्रख्यात वकील राम जेठमलानी. मगर उनसे ज्यादा अटल को टक्कर दी मधु गुप्ता ने. हालांकि ये टक्कर भी नाम मात्र थी. वो इसलिए क्योंकि अटल इस बार भी करीब 2,20,000 वोटों से जीते थे. ये रहा था रिजल्ट –

अटल बिहारी वाजपेयी – 3,24,714 वोट
मधु गुप्ता – 1,06,337 वोट
राम जेठमलानी – 57,683 वोट

राम जेठमलानी भी आए थे अटल के खिलाफ चुनाव लड़ने मगर वो तीसरे नंबर पर रहे.
राम जेठमलानी भी आए थे अटल के खिलाफ चुनाव लड़ने मगर वो तीसरे नंबर पर रहे.

अटल का ये लखनऊ से आखिरी चुनाव था और लखनऊ ने उनको दगा नहीं दी. 1991 से चला आ रहा उनका और लखनऊ का इश्क इस बार भी बरकरार रहा. 2009 में वो चुनाव नहीं लड़े. उनके पुराने सहयोगी लालजी टंडन चुनाव मैदान में उतरे. मगर लखनऊ में अटल का किस कदर जलवा था उसे ऐसे समझिए कि लालजी टंडन अटल की तस्वीर और उनके खड़ांव लेकर चुनाव प्रचार कर रहे थे. अटल ने उनके लिए अपील भी की थी. अब अटल की अपील लखनऊ की जनता कैसे टाल सकती थी. लालजी टंडन भी चुनाव जीते.


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