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वीकेंड लॉकडाउन कोरोना की तीसरी लहर से बचाने में कितना कारगर साबित होगा?

देश में पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से कोरोना वायरस के मामलों में उछाल आया है उससे यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि हम कोरोना की तीसरी लहर के करीब पहुंच चुके हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक बीते 24 घंटों में देश भर में कोरोना के 37 हजार 379 नए मामलों के साथ 124 मौत दर्ज की गईं हैं. एक हफ्ते पहले 28 दिसंबर 2021 को कोरोना के 6 हजार 358 नए मामले सामने आए थे.

यानी महज सात दिन के भीतर कोरोना के नए मामले छह गुना तक बढ़ चुके हैं और फिलहाल भविष्य में इस आंकड़े  के बढ़ने की आशंका बताई जा रही है. अभी देश में कोरोना के कुल 1 लाख 71 हजार 830 एक्टिव केस मौजूद हैं.

बात अगर ओमिक्रोन वेरिएंट की करें तो महाराष्ट्र में स्थिति चिंताजनक है. महाराष्ट्र में पिछले 24 घंटों में ओमिक्रोन के 58 नए मामले सामने आये हैं जिससे महाराष्ट्र में ओमिक्रोन की कुल मामलों की संख्या 568 पहुंच गई है, जोकि देश में सबसे ज्यादा है.

ओमिक्रोन के मामले में दूसरे नंबर पर है राजधानी दिल्ली जहां बीते एक दिन में ओमिक्रोन के 31 नए मामले सामने आए हैं. दिल्ली में ओमिक्रोन के कुल मामलों की बात करें तो यह संख्या 382 पहुंच चुकी है. देशभर में बीते 24 घंटों में 192 नए मामलों के साथ ओमिक्रोन के कुल 1892 मामले सामने आ चुके हैं. कुल 23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ओमिक्रोन अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है.

ये आकंड़ें काफी हैं एक आम इंसान को कोरोना की भयावहता समझाने के लिए. केंद्र और राज्यों की सरकारें लगातार नए प्रतिबंध लागू कर रही हैं. दिल्ली ने अब नाइट कर्फ्यू के साथ साथ वीकेंड लॉकडाउन लगाने की भी घोषणा कर दी है. मार्केट का क्या हाल है, आप अखबारों के बिज़नेस पन्ने पर देख ही रहे हैं. अभी से कई सेक्टर्स में मांग कम हो गई है. जिसके और गिरने की पूरी संभावना है.

कई राज्यों ने अपने यहां आने वाली उड़ानों की संख्या को कम करने के आदेश दे दिये हैं. स्कूल बंद किए जा रहे हैं. शादी और अंतिम यात्रा जैसे कार्यक्रमों में आने वाले लोगों की संख्या को सीमित किया जा रहा है. इसका मतलब ये है कि केंद्र और राज्य की सरकारें समझ रही हैं कि संक्रमण का खतरा है. लेकिन क्या इन सरकारों को चला रहे नेताओं को संक्रमण का डर सता रहा है? जवाब है, कतई नहीं.

तभी तो कोरोना की तीसरी लहर के खतरे के बीच बिना कोविड प्रोटोकॉल के रैलियां, सड़कों पर भीड़ के बीच रोड शो अब भी आम बात है.  कुछ ऐसा ही नजारा दिखा आज पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर और त्रिपुरा में जहां पीएम मोदी ने अलग-अलग कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के बाद जनसभा को संबोधित किया. अक्सर पीएम मोदी के चेहरे से मास्क नदारद रहता है जिसको लेकर लोग पीएम मोदी की आलोचना करते हैं.

मणिपुर में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला. मणिपुर के बाद मोदी ने त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में एक रैली में हिस्सा लिया. रैली में जुड़ी भीड़ कोरोना नियमों को धता बताकर ओमिक्रोन के खतरे को दावत दे रही थी और तो और खुद राज्य के सीएम बिप्लव देव ने भी मास्क नहीं लगाया था. यहां ये बताना ज़रूरी है कि आज के कार्यक्रम के कुछ हिस्से ऐसे थे, जिनमें पीएम मोदी और सीएम विप्लव देव मास्क लगाए दिखे.

लेकिन ऐसे भी मौके थे, जब उन्होंने मास्क नहीं लगाया हुआ था और उनके इर्द गिर्द लोग थे. जबकि ये ज़रूरी है सार्वजनिक स्थान पर पीएम और सीएम जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों हमेशा मास्क लगाएं. क्योंकि जब ये स्वस्थ रहेंगे, तभी तो किसी आपदा के समय अपनी ज़िम्मेदारियों को निभा पाएंगे. यहां बात छींटाकशी की नहीं है. पीएम और सीएम का हमेशा मास्क पहने रहना उनके निजी स्वास्थ्य के साथ साथ, उनके स्टाफ की सेहत को का प्रश्न है. इसी के साथ ये किसी आपदा के समय उनकी उपलब्धता का प्रश्न भी है.

पीएम के बाद अब ज़रूरी है कि देश के दूसरे नेताओं की खबर ली जाए. आज सुबह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर जानकारी दी वो कोविड पॉजिटिव पाए गये हैं और उन्होंने खुद को घर में क्वारंटीन कर लिया है. कोविड पॉजिटिव होने से एक दिन पहले अरविंद केजरीवाल उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे.

पूरी जनसभा में कोविड प्रोटोकॉल की धज्जियां कैसे उड़ाईं गई इसकी एक बानगी है केजरीवाल समेत मंच पर बैठे नेताओं के चेहरे पर मास्क का न होना. 2 जनवरी को भी कुछ ऐसा ही हुआ, सुबह अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में कोरोना संक्रमण पर एक महत्वपूर्ण प्रेस कांफ्रेंस की और दोपहर होते-होते केजरीवाल रैली करने पहुंच गये यूपी की राजधानी लखनऊ रैली. आखिर नेताओं को सबसे जरूरी बात कब समझ में आयेगी कि भीड़ के बीच कोरोना का वायरस तेजी से फैलता है.

बात अगर रैलियों में आने वाली भीड़ की हो तो समाजवादी विजय रथ यात्रा भी कहां पीछे रहने वाली है. बीते रविवार, माने 2 जनवरी को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ में गोसाईगंज स्थित महुराकलां गांव में नवनिर्मित परशुराम मंदिर में पूजा अर्चना की. पूजा के बाद अखिलेश का विजय रथ निकला सड़कों पर. चारों तरफ भीड़ ही भीड़ थी जो लगातार कोविड प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा रही थी. स्वयं अखिलेश यादव ने न तो चेहरे पर मास्क पहना था और न ही सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखा.

रैली में आई भीड़ की इन तस्वीरों को देश के नेता अपनी ताकत दिखाने के लिए सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर भी करते हैं. एक ऐसी ही तस्वीर AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर की. तस्वीर में आगे की एक या दो लाइन छोड़ दी जाएं तो किसी के भी चेहरे पर मास्क नहीं है और सोशल डिस्टेंसिंग को तो आप भूल ही जाइए.

अब सवाल ये कि राज्य और केन्द्र की सरकारें जनता के पैसों से बड़े-बड़े विज्ञापन देकर बताती हैं कि कोविड प्रोटोकॉल का पालन करें. किसी को फोन करने पर भी आपको याद दिलाया जाता कि कोरोना का खतरा बना हुआ है फिर चुनाव प्रचार के वक्त ये सारा ज्ञान खुद को और अपनी पार्टी के नेताओं को क्यों नहीं दिया जाता है.

वैसे चुनाव का जिक्र हो रहा है तो आपको बताते दें कि इस देश में एक केन्द्रीय निर्वाचन आयोग भी है जिसका काम देश में चुनाव कराना होता है. रैलियों में आने वाली भीड़ पर लगातार सवाल उठ रहे हैं लेकिन चुनाव आयोग का ध्यान भीड़ पर नहीं देश के लोगों को वैक्सीन लगवाने पर है. 3 जनवरी को चुनाव आयोग ने पांच राज्यों पंजाब, यूपी, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर वैक्सीनेशन की रफ्तार तेज करने की बात कही है. आयोग का कहना है पांचों राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले नागरिकों को दोनों डोज़ लग जाने चाहिए जिससे रैलियों में आने वाली भीड़ खतरे का कारण न बने.

हमारा भी यही मानना है कि जल्द से जल्द टीकाकरण अभियान पूरा हो जाए लेकिन जब तक टीकाकरण नहीं होता तब तक रैलियों  में आने वाली भीड़ और उससे पैदा होने वाले खतरे की जिम्मेदारी किसकी है? चुनाव आयोग की, राज्य सरकारों की, केन्द्र सरकार की या रैली करने वाली पार्टी की? क्या कोरोना के बीच प्रचार के विकल्प नहीं तलाशने चाहिए? बिहार चुनाव की शुरुआत में हमने देखा था कि कई पार्टियों ने डिजिटल रैलियां की थीं. चुनाव आयोग को भी इस तरह की व्यवस्था के बारे में विचार करना चाहिए.

पश्चिम बंगाल में चार निगमों आसनसोल, सिलीगुड़ी, चंदननगर और बिधाननगर के चुनाव 22 जनवरी को होने हैं. राज्य में बीजेपी के अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने कोरोना की तीसरी लहर के बीच चुनाव की तारीखों पर राज्य चुनाव आयोग से पुनर्विचार करने का आग्रह किया था. राज्य चुनाव आयोग ने पुनर्विचार किया और तय हुआ कि चुनाव पहले से ही निर्धारित 22 जनवरी को ही होंगे.

आयोग का तर्क है कि जहां चुनाव होने हैं वहां कोरोना संक्रमण की दर कोलकाता की तुलना में काफी कम है. साथ ही चुनाव आयोग का कहना है कि उनकी तरफ से रोड शो, पदयात्रा पर रोक रहेगी और कोविड प्रोटोकॉल का पालन किया जाएगा. बात अगर प्रोटोकॉल की हो तो राज्य चुनाव आयोग बंगाल में विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान उमड़ी भीड़ के वीडियो देख सकता है.

किस तरह से विधानसभा चुनाव में कोविड प्रोटोकॉल को तोड़ा गया था और बंगाल समेत देश भर ने कोरोना की दूसरी लहर का सामना किया था. कम से कम तीसरी लहर के खतरे को देखते हुए स्थानीय चुनाव को तो कुछ दिन के लिए टाला जा सकता  है. ऐसा कई टिप्पणीकारों का मानना है.

अब टीकाकरण की बात कर लेते हैं.

3 जनवरी 2022 यानी कल से देशभर में बच्चों को वैक्सीन के पहला टीका लगने की शुरुआत हुई. कोविन की वेबसाइट पर मौजूद डाटा के मुताबिक, देश में अकेले 3 जनवरी को 15 से 17 साल के बच्चों को लगभग 42 लाख वैक्सीन के टीके लगे. यहां 15 से 17 का मतलब 17 वें साल में चल रहे बच्चों से भी है. बीते सोमवार की सुबह से देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चों को  कोवैक्सीन लगाते हुए तस्वीरें सामने आने लगी थीं.

सबसे ज्यादा बच्चों को वैक्सीन मध्य प्रदेश में लगी जहां सीएम शिवराज सिंह चौहान ने खुद राजधानी भोपाल में वैक्सीनेशन प्रोग्राम में हिस्सा लिया.  एमपी में पहले दिन 7 लाख 71 हजार 615 बच्चों को कोरोना का पहला टीका लगा हालांकि पहले दिन 15 लाख बच्चों के वैक्सीनेशन का लक्ष्य तय किया गया था. मध्य प्रदेश के बाद गुजरात में साढ़े पांच लाख से ज्यादा की संख्या में बच्चों को कोविड का पहला डोज़ दिया गया है.

बच्चों को ज्यादा से ज्यादा वैक्सीन लगे इसके लिए गुजरात सरकार ने एक हफ्ते में 36 लाख से ज्यादा बच्चों को पहला टीका लगाने का टारगेट रखा है. तीन राज्य ऐसे भी हैं जिनमें तीन लाख से ज्यादा बच्चों को वैक्सीन का पहला डोज़ दिया गया है. आंध्र प्रदेश में 4 लाख 87 हजार 269 तो कर्नाटक में चार लाख से ऊपर और राजस्थान में साढ़े तीन लाख बच्चों को कोविड के टीके के पहली खुराक दी जा चुकी है.

हालांकि कुछ बड़े राज्य ऐसे भी हैं जहां बच्चों के टीकाकरण की रफ्तार थोड़ी सुस्त दिखाई दी. जैसे उत्तर प्रदेश जहां पहले दिन लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा बच्चों को ही पहला टीका लग पाया है. यूपी के बाद महाराष्ट्र है जहां पहले दिन एक लाख 81 हजार बच्चों को कोवैक्सीन की पहली डोज़ दी गई है. बिहार में और तमिलनाडु में डेढ़ लाख से ऊपर तो पश्चिम बंगाल में बच्चों के टीककरण की संख्या सिर्फ एक लाख का आंकड़ा पार कर पाई.

यहां हम फिर एक बात को दोहराना चाहते हैं. जो हम कई बार पहले के बुलेटिन में आपको बता चुके हैं. कि कई लोग बिना नंबर आए तीसरी डोज़ ले रहे हैं. कोई चोरी से, कोई बिना दस्तावेज़ तो कोई दस्तावेज़ बदलकर. ऐसा बिलकुल न करें. अपनी बारी का इंतज़ार करें.


2022 में इन घटनाओं पर पूरी दुनिया की नज़र बनी रहेगी

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