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चीनी ऐप सिर्फ गूगल-एपल पर बैन, दूसरे ऐप स्टोर पर लाइफ अब भी झिंगालाला!

भारत में चीन के 59 ऐप पर बैन लगाने के कुछ घंटों के भीतर ही ये ऐप गूगल प्ले स्टोर और एपल प्ले स्टोर पर दिखने बंद हो गए. सरकार ने भले ही बैन का ऐलान कर दिया हो, लेकिन लोग इंटरनेट पर मौजूद हजारों अनाधिकृत वेबसाइट्स पर मौजूद एपीके (APK) के जरिए टिकटॉक और शेयरइट जैसे पॉपुलर ऐप डाउनलोड कर पा रहे हैं.

गूगल-एपल पर असर, लेकिन बाकी ऐप स्टोर पर अब भी दिख रहे हैं ये ऐप

सरकारी आदेश पर भले ही गूगल और एपल ने झटपट उन ऐप का अपने ऐप स्टोर से सफाया कर दिया हो, लेकिन कई बैन ऐप अब भी दूसरे ऐप स्टोर्स पर दिख रहे हैं. मिसाल के तौर पर वीवो के मोबाइल में प्री इंस्टॉल वी स्टोर से बैन ऐप वी मेट और क्लीन मास्टर को डाउनलोड किया जा सकता है. इसी तरह शाओमी के प्ले स्टोर पर भी लाइकी ऐप डाउनलोड किया जा सकता है. शाओमी स्टोर पर वीगो वीडियो और यूसी ब्राउजर भी डाउनलोड के लिए उपलब्ध दिखा. हो सकता है बाकी कंपनियां भी आगे जाकर इन ऐप को प्लेटफॉर्म से हटा लें.

लोग हजारों ऐप स्टोर से करते हैं डाउनलोड

गूगल और एपल के ऐप स्टोर यकीनन ऐप डाउनलोड करने के लिए सबसे पॉपुलर ऐप स्टोर हैं. लेकिन इनके अलावा भी सैकड़ों ऐप स्टोर हैं, जिनसे लोग ऐप डाउनलोड करते हैं. मोबाइल फोन कंपनियां भी अब अपना ऐप स्टोर मोबाइल के साथ डाउनलोड करके देती हैं. मिसाल के तौर पर वीवो के मोबाइल में वी स्टोर, शाओमी के मोबाइल में गेट ऐप्स, सैमसंग का गैलेक्सी स्टोर, हुवावे का ऐप गैलरी और ओपो का ऐप मार्केट. इसके अलावा अमेजन जैसी थर्ड पार्टी कंपनी के ऐप स्टोर्स से भी ऐप डाउनलोड किए जा सकते हैं.

बिजनेस ऑफ ऐप्स वेबसाइट के अनुसार, जहां दिसंबर 2019 में गूगल प्ले स्टोर पर ऐप की संख्या 20 लाख 70 हजार थी. वहीं थर्ड पार्टी ऐप कंपनियों- जैसे अमेजन ऐप स्टोर पर 4 लाख 8 हजार, गेजजार पर 8 लाख 50 हजार, ऐपटॉयड पर 7 लाख और ओपेरा मिनी मोबाइल स्टोर पर 3 लाख ऐप मौजूद थे. इसी तरह एपल के ऐप स्टोर पर जहां 20 लाख से ज्यादा ऐप हैं, वहीं गेटजार पर 8 लाख 50 हजार और ऐपलैंड पर 1 लाख 30 हजार आईओएस ऐप मौजूद हैं. ऐसे में किसी भी ऐप को पूरी तरह थर्ड पार्टी प्लेटफॉर्म से हटावा पाना मुश्किल भरा काम है.

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टिकटॉक और शेयरइट जैसे 59 ऐप को भारत सरकार ने किया बैन

आखिर क्यों मुश्किल है बैन करना

इंटरनेट पर किसी भी वेबसाइट या एप को बैन करने के दो ही तरीके हैं-

– थर्ड पार्टी सर्विस प्रोवाइडर को कहकर – किसी भी ऐप को बैन करने के सरकार गूगल या एपल से कह कर उसे ऐप स्टोर से हटाने को कह देती है. जैसा कि 59 बैन ऐप के मामले में हुआ है. बड़ी कंपनियों ने ऐप को अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया है.

– इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से कह कर – देश में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध कराने वाली कंपनियों को बैन वेबसाइट्स और ऐप को रोकने के लिए कहा जाता है. ये कंपनियां अपने सर्वर से बैन वेबसाइट्स के आईपी अड्रेस (जिसको डालकर वेबसाइट तक पहुंचा जाता है) को चलने से रोक देते हैं. यह चूहे-बिल्ली के खेल की तरह है. कई वेबसाइट लगातार अपना आईपी अड्रेस बदल कर इससे बचती रहती हैं. ऐसे में इंटरनेट कंपनियों को मौजूद हर मुमकिन आईपी अड्रेस को ब्लॉक करना होता है.

एपीके (APK) का चक्कर

एपीके का मतलब होता है एंड्रॉयड पैकेड किट या एंड्रॉयड एप्लिकेशन पैकेज. यह इंटरनेट पर मौजूद एक डेटा पैकेज होता है, जिसके जरिए किसी भी एप्लिकेशन को डाउनलोड किया जा सकता है. चाहे वह एप्लिकेशन किसी ऐप स्टोर पर मौजूद हो या नहीं. असल में इंटरनेट एक कनेक्टेड दुनिया है. ऐसे में कोई भी एक वेबसाइट पर ऐसे पैकेज डालकर उन्हें डाउनलोड के लिए उपलब्ध करा सकता है. जो इसे उपलब्ध कराता है, उसका कंप्यूटर ही इस APK का होस्ट सर्वर बन जाता है. इस APK फाइल को कई भी डेटा फाइल की तरह दूसरे के साथ ब्लूटुथ, मेसेज या ईमेल के जरिए भी शेयर कर सकते हैं.

क्यों खतरनाक है एपीके

एपीके चूंकि अनाधिकृत सर्विस है, ऐसे में इसे डाउनलोड करना काफी खतरनाक होता है. इन एपीके में ही कोई हैकर एक मालवेयर या बग इंस्टॉल कर सकता है. ऐसे में जब कोई भी यह एपीके डाउनलोड करता है, मोबाइल हैक होने का खतरा बना रहता है. इनके जरिए मोबाइल में मौजूद पर्सनल डेटा को आसानी से चुराया जा सकता है. मतलब मशहूर ऐप के एपीके के जरिए लोगों के मोबाइल में सेंध लगाना ज्यादा आसान होता है. टिकटॉक चूंकि भारत में सबसे ज्यादा डाउनलोड किए जाने वाले ऐप्स में से एक है, ऐसे में जब यह आधिकारिक तरीके से डाउनलोड के लिए मौजूद नहीं होगा, तो लोग इसे एपीके के जरिए डाउनलोड करेंगे और इससे सिक्योरिटी को खतरा बढ़ेगा.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

एक्सपर्ट्स का मानना है कि बैन को लेकर अभी सरकार की तरफ से भी कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है कि वह इसे किस तेजी और सख्ती से लागू करने का मूड बना रही है. टेक अनालिसिस फर्म टेक आर्क के फाउंडर फैसल कवूसा ने ‘दी लल्लनटॉप’ को बताया कि सरकार के इस फैसले से कंफ्यूजन की वजह से एपीके डाउनलोड यकीनन बढ़ेगा. एपीके डाउनलोड करने से लोग साइबर अटैक के आसान शिकार बन सकते हैं. ऑफिशियल ऐप पर लगातार अपडेट मिलने से वह सेफ रहता है, जबकि एपीके पर कोई अपडेट नहीं होता और यूजर डेटा हमेशा ही रिस्क में रहता है.

बेंगलुरु के टेक एक्टिविस्ट अनिवार अरविंद ने भी कहा कि सरकार ने आखिर ऐसा फैसला किन कारणों से लिया है. चूंकि फैसले के लिए आईटी एक्ट के सेक्शन 69ए का सहारा लिया गया है, तो यह बात शायद ही साफ हो पाए कि किस परिस्थिति में सरकार को ऐसा फैसला लेना पड़ा.

इंटरनेट एक्टिविस्ट निखिल पहवा ने ‘दी लल्लनटॉप’ से कहा कि सरकार के पास आईटी एक्ट के सेक्शन 69ए के तहत किसी भी वेबसाइट या ऐप पर बैन लगाने के अधिकार हैं. इसके लिए सरकार को किसी को बताने की भी जरूरत नहीं है कि उसने बैन क्यों लगाया. वक्त-वक्त पर सरकार इस तरह के बैन लगाती रहती है. इस बार बाकायदा लिस्ट निकाल कर सरकार भारत के लोगों और चीन को एक पॉलिटिकल मेसेज देना चाहती है, जो एक नई बात है. कुल मिलाकर यह लड़ाई अब ऑफलाइन बैटल फील्ड से ऑनलाइन बैटल फील्ड तक आ चुकी है. यह कहां रुकेगी, इसके बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता.

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