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जूते बनाने वाले परिवार के एक लड़के ने कैसे क्रांति लाई और देश का राष्ट्रपति बन गया?

दिमाग पर सत्ता का हावी होना आपको पत्थरिदल बना सकता है.

ये बात किसने कही है, ये तो नहीं पता. लेकिन इतना पता है कि अगर आज की कहानी का सार समझना हो तो एक पंक्ति काफ़ी होगी.

ये कहानी एक सामान्य परिवार से शुरू होती है. मुल्क़ की सरकार संसाधनों की लूट में व्यस्त थी. जनता पर उसका कतई ध्यान नहीं था. आम लोग भूखे मर रहे थे. जिस परिवार का ज़िक्र हो रहा है, उसके मुखिया ने जूते बनाने का काम पकड़ लिया. लेकिन इतनी बचत नहीं होती थी कि बच्चों की सही परवरिश कर सकें. फिर वे अपना क़स्बा छोड़कर राजधानी आ गए. हालांकि, जगह की रद्दोबदल उनका नसीब नहीं बदल पाई. कई बार उन्हें भूखे पेट फुटपाथ पर सोना पड़ता था. क्योंकि उनके पास किराया चुकाने लायक पैसे नहीं होते थे. वे इतने कुख़्यात हो चुके थे कि कोई उन्हें अपने घर में रहने तक नहीं देता था.

इसी परिवार में एक लड़का भी था. उसने पढ़ाई को छोड़कर क्रांति का रास्ता चुना. तानाशाही को उखाड़ने में पूरा ज़ोर लगा दिया. उसकी क्रांति सफ़ल हुई. वो पहले आम लोगों का नायक बना और बाद में देश का राष्ट्रपति. ये पद अभी भी उसके पास बरकरार है. लेकिन ‘नायक’ की उपाधि छिन चुकी है. कभी तानाशाहों के ख़िलाफ़ झंडा बुलंद करने वाला वो लड़का अब उसी तानाशाही का झंडाबरदार है.

ये कहानी सेंट्रल अमेरिका के देश निकारागुआ और वहां के राष्ट्रपति डेनियल ओर्टेगा की है. निकारागुआ और ओर्टेगा का इतिहास क्या है? ओर्टेगा के हृदय-परिवर्तन की वजह क्या है? और, आज हम ये कहानी आप तक क्यों पहुंचा रहे हैं? ये तो बताएंगे ही.

साथ में, आपको लिए चलेंगे पोलैंड और बेलारूस की सीमा पर. जहां हज़ारों की संख्या में शरणार्थी जमा हैं. जमा देने वाली ठंड के बीच. दोनों देश उन्हें अपने यहां से दूर करने में जुटे हैं. इन शरणार्थियों की कहानी क्या है? और, इस विवाद में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का नाम क्यों आ रहा है?

सबसे पहले निकारागुआ की लोकेशन देख लीजिए. ये नॉर्थ अमेरिका और साउथ अमेरिका के बीच में पड़ता है. इसके ऊपर की तरफ़ होंडुरास है, जबकि दक्षिण में इसका पड़ोसी है कोस्टा रिका.

लोकेशन के बाद अब इतिहास की बात.

बाहर की दुनिया को निकारागुआ के बारे में पता चला, 16वीं सदी की शुरुआत में. वो ऐज़ ऑफ़ डिस्कवरी का युग था. उस दौरान यूरोप के देश नई ज़मीनें तलाश रहे थे. 1492 में क्रिस्टोफ़र कोलम्बस ने अमेरिका को खोज लिया था. इसके बाद भी उसका अभियान चलता रहा. 1502 में अपने चौथे खोजी अभियान में कोलम्बस ने होंडुरास पर क़ब्ज़ा किया था. इसी दौरान उसके बेड़े ने निकारागुआ के तट पर भी डेरा डाला था. उस समय तक ये जगह अज्ञात थी.

अज्ञात से ज्ञात होने यानी नामकरण में दो दशक और लगे. 1522 के साल में स्पेन का जहाजी जिल गोंज़ोलेज़ डविला इसके तट पर उतरा. उस अज्ञात भूमि पर कबीले रहते थे. कबीले के मुखिया का नाम निकारा था. उस इलाके में झीलों और पानी के दूसरे स्रोतों की बहुतायत थी. स्पेनिश भाषा में पानी के लिए ‘गुआ’ शब्द का इस्तेमाल होता है. इसी के आधार पर डविला ने उस जगह को निकारागुआ का नाम दिया.

साल 1524 में स्पेन ने फ़्रैंसिस्को हर्नाण्डेज़ डि कोडोबा के नेतृत्व में धावा बोला. पांच साल के भीतर मूल निवासियों को लगभग ख़त्म कर दिया गया. इस तरह से निकारागुआ स्पेन का उपनिवेश बना.

स्पेन का शासन 1821 तक चला. बीच-बीच में ब्रिटेन ने भी टांग अड़ाने की कोशिश की. हालांकि, वो कभी निर्णायक अधिकार हासिल नहीं कर पाए. स्पेन के जाने के तुरंत बाद मेक्सिको की एंट्री हुई. 1823 में यूनाइटेड प्रॉविंसेज़ ऑफ़ सेंट्रल अमेरिका की स्थापना हुई. इसमें निकारागुआ के अलावा चार और देश थे – होंडुरास, अल सल्वाडोर, ग्वाटेमाला और कोस्टा रिका. ये संगठन सफ़ल नहीं हो पाया. अंदर की राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं के चलते इसका टूटना तय था. 1838 में तय हुआ कि गुट में शामिल देश अलग हो सकते हैं. उसी बरस निकारागुआ पूर्णरुपेण आज़ाद हो गया.

आज़ादी के बाद की पॉलिटिक्स को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा. कहां तक? वहीं तक जहां पर आज़ादी गुम हुई थी. यानी 1524. स्पेन ने शासन की शुरुआत में दो बड़े शहर बसाए. एक था ग्रेनाडा और दूसरा था लियोन. ये दोनों शक्ति का केंद्र बने रहे. 1819 में स्पेन ने तीसरे शहर मैनागुआ की स्थापना की. लेकिन दो साल बाद ही उनका बोरिया-बिस्तर बंध चुका था.

आज़ाद होने के बाद ग्रेनाडा और लियोन का रुतबा अचानक से बढ़ गया. ये दो अलग-अलग विचारधाराओं को रिप्रज़ेंट करने लगे थे. ग्रेनाडा कंज़र्वेटिव पार्टी का गढ़ बना, जबकि लियोन डेमोक्रेटिक या लिबरल पार्टी का. इन दोनों के बीच सत्ता को लेकर लड़ाई चलती रही.

फिर साल आया 1854 का. लिबरल धड़े ने एक किराये का गुंडा बुलाया. अमेरिका से. उसका नाम था विलियम वॉकर. लिबरल्स ने कहा, हम पैसे देंगे, आप ग्रेनाडा का घमंड तोड़ दो. वॉकर राज़ी हो गया. अक्टूबर 1855 में उसने अपने आदमियों के साथ ग्रेनाडा को जीत लिया. ग्रेनाडा के कंज़र्वेटिव हार चुके थे. उनकी सुपारी देने वाले लिबरल्स की हालत पहले से ही पस्त थी. तो, निकारागुआ का किंग कौन हुआ? विलियम वॉकर. उसके सामने कोई चुनौती नहीं थी. इसका फायदा उठाकर उसने ख़ुद को निकारागुआ का राष्ट्रपति घोषित कर दिया. कुछ महीने बाद अमेरिका ने इस सरकार को मान्यता भी दे दी. लिबरल्स बराबर रोटी पाने के चक्कर में पूरी रोटी गंवा चुके थे.

वॉकर बहुत दिनों तक शासन नहीं कर पाया. 1850 के दशक में कैलिफ़ोर्निया में सोने के खदान मिलने लगे. इससे गोल्ड रश की शुरुआत हुई. इससे पूरब की तरफ़ ले जाने के लिए छोटे रूट की दरकार थी. निकारागुआ की नदियां और झीलें इसके लिए मुफीद थे. इस अवसर को साधने के लिए न्यू यॉर्क के कॉर्नेलिस वॉन्डरबिल्ट ने एक शिपिंग कंपनी खोली. उनका धंधा चलने लगा. जैसे ही विलियम वॉकर के हाथ में सत्ता आई, उसने वॉन्डरबिल्ट के जहाजों पर बैन लगा दिया. इससे वो नाराज़ हो गया. 1857 में वॉन्डरबिल्ट के पैसे और पड़ोसी देशों के बाहुबल की मदद से विलियम वॉकर को गद्दी से उतार दिया गया.

वॉकर ने इसका बदला लिया. उसने ग्रेनाडा को जला दिया और भागकर अमेरिका पहुंच गया. वहां उसने किताब लिखी. कुछ बरस बाद वो वापस होंडुरास आया. होंडुरास और निकारागुआ के कुछ इलाकों पर ब्रिटेन का शासन था. उनका काम शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था. वो ख़ून-खराबा नहीं चाहते थे. ब्रिटिश आर्मी ने वॉकर को पकड़ कर होंडुरास के हवाले कर दिया. 12 सितंबर 1860 को उसे गोलियों से उड़ा दिया गया.

उधर, निकारागुआ में क्या चल रहा था? वहां समझ आ गया था कि मिलकर रहने में ही भलाई है. 1857 में उन्होंने मैनागुआ को स्थायी राजधानी बना लिया.

अगले तीन दशक तक सब ठीक चला. वो शांतिकाल था. लेकिन कहते हैं ना कि ये दौर भी गुज़र जाएगा. शांतिकाल गुज़रा और 1893 में लिबरल पार्टी के ज़ेलाया लोपेज़ ने तख़्तापलट कर दिया. लोपेज़ की नीतियां अमेरिकी हित के लिए सही नहीं थी. इसलिए, 1909 में अमेरिका ने अपने सैनिकों को भेजकर ज़ेलाया को हटा दिया. उसकी जगह पर कठपुतली सरकार बिठा दी गई. अमेरिका ने निकारागुआ में अपना मिलिटरी बेस बना दिया था. उस समय सेंट्रल अमेरिका में बनाना वॉर भी चल रहा था. जो कोई यूनाइटेड फ़्रूट कंपनी के व्यापार में बाधा बन रहा था, उसे ठिकाने लगा दिया जाता था. भले ही वो कोई सरकार ही क्यों न हो.

1927 में निकारागुआ में विद्रोह हुआ. गुरिल्ला नेता अगस्तो सीज़र सैन्डिनो ने राष्ट्रपति मोकान्डा के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी. उन्होंने बिगुल फूंकने से पहले एक मैनिफ़ेस्टो जारी किया था. सैन्डिनो ने लिखा था,

मैं अपने देश को बचाने के मिशन पर निकला हूं. मैं राजनैतिक झुकाव को नज़रअंदाज़ कर आपका स्वागत करता हूं. बस एक शर्त है. आपको स्वच्छ मन के साथ आना होगा. याद रखिए, आप सभी लोगों को कुछ समय के लिए मूर्ख बना सकते हैं, लेकिन हमेशा के लिए नहीं.

सैन्डिनो इस जंग में बीस साबित हुए. 1933 में अमेरिका को निकारागुआ से निकलना पड़ा. जाते-जाते उसने चुनाव करवाया. इसमें सैन्डिनो के साथी रहे हुआन सकासा की जीत हुई.

ये मानने के पर्याप्त कारण थे कि निकारागुआ में अमेरिका दखल खत्म हो चुका है. लेकिन ऐसा था नहीं. 21 फ़रवरी 1934 को सैन्डिनो अपने पिता और भाईयों के साथ प्रेसिडेंशियल पैलेस गए. लौटते समय उनकी गाड़ी को नेशनल गार्ड ने गेट पर ही रोक दिया. उन्हें किडनैप कर ले जाया गया. बाद में सैन्डिनो की लाश मिली.

इस हत्याकांड के पीछे जो आदमी था, वो दो साल बाद तख़्तापलट करने वाला था. वो भी अमेरिका की मदद से. वो था, जनरल सिमोज़ा गार्सिया.

सिमोज़ा 1936 में राष्ट्रपति बना. इसके बाद निकारागुआ में सिमोज़ा परिवार का शासन अगले 44 बरस तक चला. इसी तानाशाही शासन के दौरान डेनियल ओर्टेगा का जन्म हुआ था. जब वो बड़ा हुआ तो उसने एक विरोधाभास देखा. एक तरफ़ सिमोज़ा परिवार की अय्याशी थी, वहीं दूसरी तरफ़ उसके परिवार को दो वक़्त का खाना तक नहीं मिल रहा था. ये सब एक ही दौर में एक ही जगह पर हो रहा था.

ओर्टेगा ने इसका विरोध करने का प्रण लिया. 1959 में उसकी मुलाक़ात कार्लोस फ़ोंसेका से हुई. इसी मुलाक़ात के दौरान ओर्टेगा को अगस्तो सैन्डिनो के बारे में पता चला. फ़ोंसेका ने बाद में सैन्डिनिस्टा नेशनल लिबरेशन फ़्रंट (FSLN) की स्थापना की. ये पार्टी सैन्डिनो की विचारधारा में विश्वास रखती थी. ओर्टेगा पढ़ाई छोड़कर पार्टी में शामिल हो गया.

उसके सफ़र का बड़ा पड़ाव आया, साल 1967 में. पार्टी में पैसे की तंगी चल रही थी. इस वजह से लड़ाई धीमी पड़ रही थी. उसने इसके लिए राजधानी में एक बैंक को लूट लिया. ओर्टेगा का आदेश था कि जो कोई बीच में आए, उसे मार दो. हालांकि, ये लूट सफ़ल नहीं रही. ओर्टेगा को सात बरस तक जेल में टॉर्चर सहना पड़ा. उस दौर को भी गुज़रना था. वो गुजरा सात बरस बाद क्रिसमस के दिन.

तारीख़ थी, 25 दिसंबर 1974. मैनागुआ में एक बिजनेसमैन होज़े मारिया कैस्टिला के घर पार्टी रखी गई थी. इसमें अमेरिकी राजदूत टर्नर शेल्टन को भी बुलावा दिया गया था. पूरे रंग पर चल रही पार्टी में अचानक से हलचल मच गई. कई गुरिल्ला लड़ाके वहां घुस आए थे. उन्होंने पहरे पर खड़े गार्ड्स के साथ-साथ मेज़बान की भी हत्या कर दी. इसके बाद लड़ाकों ने सभी मेहमानों को बंधक बना लिया. अमेरिकी राजदूत उस समय तक पार्टी से जा चुके थे.

किडनैपर्स FSLN के कार्यकर्ता थे. उन्होंने 26 क़ैदियों की रिहाई और लगभग सात करोड़ रुपये की फिरौती मांगी. सरकार इसके लिए राज़ी हो गई. FSLN के कार्यकर्ताओं को रिहा करके क्यूबा भेज दिया गया. इनमें से एक डेनियल ओर्टेगा भी था.

क्यूबा में ओर्टेगा को ट्रेनिंग मिली. ट्रेनिंग के बाद वो वापस लौटा. 1979 में निर्णायक लड़ाई हुई. इसमें सिमोज़ा परिवार के आख़िरी राष्ट्रपति को अपदस्थ कर दिया गया. फिर मिलिटरी हुंटा बनाई गई. इसमें क्रांति के नौ नेताओं को जगह दी गई. डेनियल ओर्टेगा को इस हुंटा का मुखिया बनाया गया.

क्रांति होते ही अमेरिका ने अपना मन और धन शिफ़्ट कर दिया. अमेरिका ने ओर्टेगा के विरोधियों को पैसे और हथियार देना शुरू किया. उसने निकारागुआ पर कई आर्थिक प्रतिबंध भी लगा दिए.

ओर्टेगा 1984 में पहली बार चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बना. हालांकि, उसके रास्ते में कांटे पहले ही बिछाए जा चुके थे. 1990 तक चले सिविल वॉर में 50 हज़ार से अधिक लोग मारे गए. इसको ‘कोन्ट्रा वॉर’ के नाम से जाना जाता है. जब तक शांति हुई, ओर्टेगा का चार्म खत्म हो चुका था. 1990 के चुनाव में उसकी हार हुई. वो अगले 16 बरस तक सत्ता से बाहर रहा. 2006 के चुनाव में डेनियल ओर्टेगा की वापसी हुई. तब से अब तक ओर्टेगा निकारागुआ का राष्ट्रपति है.

आज हम निकारागुआ और डेनियल ओर्टेगा की कहानी क्यों सुना रहे हैं?

इसकी वजह है, राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम. रविवार, सात नवंबर को निकारागुआ में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए. इसमें डेनियल ओर्टेगा का भविष्य तय होने वाला था. ठीक-ठीक कहा जाए तो ओर्टेगा ने पहले ही अपना गेम सेट कर लिया था. उसने सात सबसे बड़े विपक्षी नेताओं को जेल में बंद करवा दिया था. अगस्त 2021 में चुनाव आयोग ने मुख्य विपक्षी पार्टी को अवैध बताकर चुनाव से बाहर कर दिया था. इसके अलावा, स्वतंत्र पत्रकारों और ऑब्ज़र्वर्स की एंट्री भी बैन कर दी गई थी.

इन वजहों से उसका जीतना तय माना जा रहा था. वही हुआ भी. जब नतीजे आए तो ओर्टेगा को 75 फीसदी से अधिक वोट मिले. इसके साथ ही उसके लगातार चौथी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ़ हो चुका है. इससे पहले उसने संविधान संशोधन करके आजीवन राष्ट्रपति बने रहने का सिस्टम लाया था.

ओर्टेगा की जीत पर पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका बेहद नाराज़ है. उसने कहा है कि चुनाव में धांधली हुई है. अगर ओर्टेगा ने गद्दी नहीं छोड़ी तो निकारागुआ पर प्रतिबंध लगाए जाएंगे. वहीं रूस ने ओर्टेगा का पक्ष लिया है. रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा है कि अमेरिका की धमकी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

ये तो हुई ग्लोबल पॉलिटिक्स की बात. ज़मीनी रिपोर्ट क्या कहती है?

वो ये कहती है कि डेनियल ओर्टेगा ने एक समय जिस तंत्र और परिवारवाद के ख़िलाफ़ क्रांति का बिगुल फूंका था, अब वो उसी की नकल करने लगा है.

मसलन, मुल्क़ की संपत्ति और शासन उसके चुने लोगों के क़ब्ज़े में है. उसकी पत्नी निकारागुआ की राष्ट्रपति है. कई दफ़ा वो कैबिनेट मीटिंग्स को हेड भी करती है.

डेनियल ओर्टेगा एक समय तक ग़रीबों का मसीहा था. अब वो अमीरी का सिंबल बन चुका है. महंगी गाड़ियां, आलीशान घर और क़ीमती साज़ो-सामान उसका अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं. वो भी तब जब देश की अधिकांश आबादी ग़रीबी की गिरफ़्त में है.

एक और बात, जो दुनियाभर के आत्ममुग्ध शासकों में पाई जाती है. जो कोई डेनियल ओर्टेगा का विरोध करता है, उसके साथ देश के दुश्मन की तरह बर्ताव किया जाता है.

अप्रैल 2018 में लोगों ने डर को भुला दिया. वे सड़कों पर उतरे. उन्होंने ओर्टेगा से कुर्सी छोड़ने की मांग की. प्रोटेस्टर्स की मांग को सुनने की बजाय उसने भयानक बलप्रयोग किया. सैकड़ों की संख्या में लोग मारे गए. हज़ारों को देश छोड़कर भागना पड़ा. डेनियल ओर्टेगा की सत्ता बरकरार रही. उसका खौफ़ कायम रहा.

ओर्टेगा का सत्ता में कायम रहना निकारागुआ की अमनपसंद और लोकतांत्रिक आबादी के लिए बड़ा ख़तरा है. हर जीत के बाद उसकी तानाशाही की भूख बढ़ी है. आगे क्या होगा, ये तो आने वाला समय ही बताएगा.


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