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'भारत में पेसर्स पैदा नहीं होते' से 'बेस्ट पेस अटैक' तक का सफर

जब सुनील गावस्कर ने की भारतीय बोलिंग की शुरुआत. सुनने में ही कितनी अजीब लग रहा है ना? सोचिए देखने में कैसा लगा होगा. लेकिन इंडियन क्रिकेट में इससे भी अजीब चीजें हुई हैं. बल्लेबाजों तक तो फिर भी ठीक था. हमने तो विकेटकीपर्स तक से बोलिंग की शुरुआत कराई है. बुधि कुंदरन भी हमारे लिए पहला ओवर डाल चुके हैं.

यही भारतीय क्रिकेट या यूं कहें कि भारतीय क्रिकेट की तेज़ गेंदबाज़ी का सच है. तेज गेंदबाजी, जिसे कभी भी भारतीय क्रिकेट का अहम अंग नहीं माना गया. क्योंकि हम सॉफ्ट नेचर के शांत, सौम्य और मधुर व्यक्तित्व के स्वामी होते थे. जबकि दुनिया के बड़े-बड़े तेज़ गेंदबाज़ तो छह फुट लंबे, खून बहाने को बेताब खतरनाक लोग हुआ करते थे. जिन्हें देखकर ही फूंक सरक जाए.

और हमारी क्रिकेट में लंबे वक्त तक तेज़ गेंदबाज़ों के अकाल में इस सोच का भी बहुत योगदान था. 70 के दशक तक हमारी टीम में सिर्फ एक तेज़ गेंदबाज़ होता था और कई बार तो हमने इसके बिना भी काम चला लिया. और इस इकलौते गेंदबाज़ का काम सिर्फ गेंद को पुराना करना होता था. और बाकी का हाल संभालते थे हमारे स्पिनर्स.

लेकिन फिर ये चलन बदला और अब 2021 में हम कह सकते हैं कि हमारा पेस अटैक दुनिया की किसी भी बैटिंग की धज्जियां उड़ा सकता है. और इस सफर में हमने-आपने काफी कुछ देखा है. तो चलिए इंग्लैंड के खिलाफ तीसरे टेस्ट की शुरुआत से पहले एक बार फिर से नज़र डाल लेते हैं अपनी पेस बोलिंग के सफर पर.

# मोहम्मद निसार और अमर सिंह

शुरू से शुरू करें तो याद आता है साल 1932. भारतीय क्रिकेट टीम इंटरनेशनल स्टेज पर नई-नई एंट्री मार रही थी. इंग्लैंड के पहले दौरे पर हमें 26 फर्स्ट-क्लास और एक टेस्ट मैच खेलना था. ये वो दौर था जब दिन पिच कवर नहीं की जाती थी. जिसकी वजह से स्पिनर्स को ज़्यादा मदद नहीं मिलती थी.

अपने पहले दौरे पर हम दो तगड़े पेस बोलर्स के साथ गए. मोहम्मद निसार और अमर सिंह. पंजाब के होशियारपुर से आने वाले निसार को फरुखाबाद एक्सप्रेस के नाम से जाना जाता था. छह फुट लंबे और पहलवानी शरीर वाले खिलाड़ी. उस समय गेंद की तेज़ी मापने का तो कोई पैमाना नहीं था, लेकिन कहा जाता है कि निसार उस दौर में इंग्लिश तेज़ गेंदबाज़ हेराल्ड लारवुड से भी तेज़ गेंदबाज़ी करते थे.

1932 Team India
1932 की भारतीय टीम. फोटो: Getty Images

दूसरे तेज़ गेंदबाज़ थे अमर सिंह. अमर सिंह को वैसे निसार जितना तेज़ तो नहीं माना जाता था. लेकिन ये भी अपनी मूवमेंट से खिलाड़ियों को परेशान करते थे. अमर सिंह की बोलिंग इतनी खास थी कि सिर्फ एक फर्स्ट क्लास सीज़न के बाद ही उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया. नेवल कार्डिस ने उनके बारे में अपनी किताब में कहा था,

‘अमर सिंह की गेंद पिच पर बाउंस होने के बाद बुलेट शॉट की रफ्तार से आती थी.’

1932 दौरे पर लॉर्ड्स टेस्ट में भारत की इस ओपनिंग बोलिंग जोड़ी ने इंग्लैंड को परेशान कर दिया. पहले 30 मिनट में ही इंग्लैंड 19/3 हो गई. निसार ने पहले सरक्लिफ्स को बोल्ड किया. फिर होम्स को बोल्ड किया, और फिर वुली भी रन-आउट. बड़ी बात ये थी कि पर्सी होम्स और हरबर्ट सरक्लिफ्स ने 10 दिन पहले ही फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में 555 रनों की वर्ल्ड रिकॉर्ड ओपनिंग पार्टनरशिप की थी.

भारत ये मैच हार गया. लेकिन पहले ही मैच में भारतीय तेज़ गेंदबाज़ों ने अपना नाम बना लिया. हमारा प्रदर्शन देख इंग्लिश टीम के कप्तान डगलस जार्डिन ने कहा था,

‘आने वाले दस सालों में भारत दुनिया की बेहतरीन टीमो में से एक बन जाएगी.’

निसार ने भारत के लिए छह टेस्ट मैचों में 25 विकेट चटकाए. वहीं अमर सिंह ने सात मैचों में 28 विकेट अपने नाम किए. आज़ादी के बाद निसार पाकिस्तान चले गए. और फिर उम्र के चलते क्रिकेट भी छूट गया. अब उनकी उम्र भी इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने के लिए उनके साथ नहीं थी. दूसरी तरफ अमर सिंह साल 1940 में निमोनिया के कारण चल बसे.

# रमाकांत देसाई

इन दोनों के जाने के बाद भारतीय टीम ने तेज़ गेंदबाज़ों के लिए ज़्यादा दौड़भाग नहीं की. सीधा सी सोच वही थी कि शुरुआत में एक तेज़ गेंदबाज़ का काम सिर्फ गेंद को पुराना करना है और ये तो कोई भी कर लेगा. लेकिन इस सोच के बीच 1959 में एंट्री होती है एक दुबले-पतले छोटे कद वाले लड़के की.

और तमाम दिग्गजों की तरह इस बच्चे की शुरुआत भी मुंबई के शिवाजी पार्क से हुई. बताते हैं कि एक बार मशहूर खेल पत्रकार जीके मेनन वहां से निकल रहे थे. तभी एक गेंद उनके पास से निकली और वो ठिठककर रुक गए. उन्होंने देखा एक छोटा सा बच्चा बोलिंग कर रहा है. और उस बच्चे की बोलिंग ने मेनन को इतना प्रभावित किया कि वह उसे देखने के लिए बैठ गए. मेनन ने देखा कि टेनिस बॉल से भी वो बच्चा एकदम क्लीन ऐक्शन के साथ रफ्तार के साथ गेंदबाज़ी कर रहा है. और बाद रमाकांत देसाई नाम का वो बच्चा इंडिया खेला.

Ramakant Desai
रमाकांत देसाई. फोटो: Getty Images

1958-59 में वेस्टइंडीज़ की टीम भारत आई. बॉम्बे में क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया के खिलाफ एक फर्स्ट क्लास मैच होना था. इस मैच के लिए रमाकांत को चुना गया. रणजी ट्रॉफी बिना खेले ही वो टीम के अंदर थे. आते ही रमाकांत ने कमाल कर दिया. उस वक्त के महान बल्लेबाज़ रोहन कन्हाई को बोल्ड किया और मैच में चार विकेट निकाले.

और इस प्रदर्शन के चलते 19 साल के इस लड़के को टीम में ले लिया गया. वेस्टइंडीज़ के खिलाफ खेले, फिर पाकिस्तान के खिलाफ खिलाया. और पाकिस्तान के खिलाफ खेलने के साथ ही इस लड़के का नाम हो गया. उस वक्त पाकिस्तान के दिग्गज बल्लेबाज़ हनीफ मोहम्मद से बड़े-बड़े गेंदबाज़ डरते थे. लेकिन रमाकांत ने हनीफ की टोपी और प्रतिष्ठा दोनों उछाल दी.

साल 1960. ब्रेबोर्न स्टेडियम में रमाकांत ने पहले ओवर में ही हनीफ को तीन बाउंसर मारी. हनीफ की टोपी ज़मीन पर और वो पिच से दूर. उन्हें कुछ समझ नहीं आया. और फिर अगली ही गेंद पर हनीफ स्लिप में कैच थमा बैठे. लेकिन इस इतने काबिल लड़के साथ वर्कलोड मैनेजमेंट नहीं हो सका. पहले मैच में ही 49 ओवर फेंकने वाले रमाकांत भारत के लिए हर मैच में 25-30-35 ओवर फेंका करते थे. क्योंकि टीम के पास दूसरा पेसर ही नहीं होता था. और इसी लोड के चलते सिर्फ 29 की उम्र में उन्होंने क्रिकेट को अलविदा कह दिया. रमाकांत ने भारत के लिए 28 टेस्ट में 74 विकेट निकाले.

इसके बाद भारत कभी बल्लेबाज़ों से, कभी विकेटकीपर से तो कभी किसी मीडियम पेसर से गेंद पुरानी कराने का काम लेता रहा. हालात यहां तक थे कि साल 1962-63 की रणजी ट्रॉफी में खेलने के लिए वेस्टइंडीज़ से चार तेज़ गेंदबाज़ बुलाए गए. इन्हें अलग-अलग टीमों में बांटा गया. जिससे विदेशी दौरों पर हमारे बल्लेबाजों को दिक्कत ना हो. लेकिन किराये के गेंदबाज़ों से काम नहीं चलने वाला था. हमें अपना तेज़ गेंदबाज़ चाहिए था. और फिर आया अपना पहला पेस बोलिंग सुपरस्टार

# कपिल देव

1970s में मुंबई का अंडर-19 कैम्प. एक टीनएजर लड़का प्रैक्टिस करने के बाद खाने के लिए आया. उसे थोड़ी सी दाल, थोड़ी सी सब्ज़ी और दो चपाती दे दी गई. वो हैरानी से इसे देखने लगा और बोल पड़ा,

‘मुझे और खाना चाहिए, मैं एक फास्ट बोलर हूं.’

उस कैम्प के मैनेजर केके तारापुर ने जवाब दिया

‘इंडिया में फास्ट बोलर्स नहीं होते.’

लेकिन चंडीगढ़ से ताल्लुक रखने वाले कपिल देव नाम के इस लड़के ने आगे चलकर तारापुर की इस बात को गलत साबित कर दिया. कपिल देव सिर्फ एक तेज़ गेंदबाज़ ही नहीं थे. बल्कि एक लाजवाब एथलीट भी थे. उन्हें लेकर ये भी कहा जाता है कि वो इतनी तेज़ स्प्रिंटिंग करते थे, कि दौड़ते हुए किसी के पास से निकल जाएं और उसे पता भी ना चले.

कपिल देव भारत के पहले नेचुरल फास्ट बोलर माने जाते हैं. उन्होंने देश को कई बार अपनी गेंदबाज़ी से जीत दिलाई. 16 सालों में उन्होंने कभी भी फिटनेस या इंजरी की वजह से कोई मैच मिस नहीं किया. उन्होंने कुल 434 टेस्ट विकेट निकाले और आज भी सबसे अधिक विकेट चटकाने वाले भारतीय तेज़ गेंदबाज़ हैं.

Kapil Dev
कपिल देव. फोटो: Getty Images

कपिल देव के भारतीय क्रिकेट में आने का असर ये हुआ कि अब देश तेज़ गेंदबाज़ों की तरफ देखने लगा. पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, वेस्टइंडीज़, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की तरह ही हम भी अपने देश में तेज़ गेंदबाज़ों को पैदा कर सकते हैं.

# MRF पेस फाउंडेशन

दशकों से एकाध तेज़ गेंदबाज़ के साथ आगे बढ़ रहे भारत ने जल्दी ही तय किया कि ये हालात बदलने हैं. साल 1987 में चेन्नई में MRF पेस्ट फाउंडेशन की पहली अकैडमी खोली गई. MRF के मैनेजिंग डायरेक्टर रवि मामेन ने उस वक्त दुनिया के सबसे सफल तेज़ गेंदबाज़ डेनिस लिली को इस काम की ज़िम्मेदारी सौंपी. 1987 में जब MRF ने अपना पहला सलेक्शन कैम्प लगाया तो उसमें सचिन तेंडुलकर और सौरव गांगुली भी पहुंचे थे. और हमारी किस्मत देखिए कि दोनों ही रिजेक्ट हो गए.

लेकिन जिन खिलाड़ियों को चुना गया. उनमें से कुछ अब देश के लिए क्रिकेट में तेज़ गेंदबाज़ी का इतिहास बदलने वाले थे. MRF पेस फाउंडेशन के खुलने के दो साल बाद ही 1989 में विवेक राज़दान को पाकिस्तान दौरे की टीम में चुना गया. लेकिन यहां से निकलकर भारतीय तेज़ गेंदबाज़ी का पहला बड़ा नाम बने जवागल श्रीनाथ.

# जवागल श्रीनाथ

मैसूर के श्रीनाथ MRF पेस फाउंडेशन से निकले और उन्हें इंग्लैंड दौरे की तैयारी के लिए बतौर नेट गेंदबाज बुलाया गया. टीम के मैनेजर बिशन सिंह बेदी ने श्रीनाथ की तरफ बॉल फेंकी और कहा,

‘मुंडे बॉल करेगा.’

श्रीनाथ ने तुरंत हां कर दी.

उधर नेट्स में ग्लव्स पहनकर दिलीh वेंगसरकर तैयार हो रहे थे. वेंगसरकर तैयार हुए और श्रीनाथ ने आते ही सीधे बाउंसर दे मारी. गेंद सीधे वेंगसरकर के बल्ले के हैंडल पर लगी. और बल्ला हाथ से छूट गया. पहली बार नेट्स में कोई गेंदबाज़ इस रफ्तार से गेंदबाज़ी कर रहा था. खौराए ने कहा,

‘बाउंसर मत डालना, इसकी जगह चाहे कुछ भी डाल.’

श्रीनाथ ने सीनियर का मान रखा और बाउंसर नहीं मारी. लेकिन अगली गेंद सीधे वेंगसरकर के टखने पर. यानि यॉर्कर. बस इसी पल के बाद श्रीनाथ की टीम इंडिया में एंट्री हो गई. कपिल देव के रहते हुए उन्हें ज्यादा मैचों में खेलने का मौका नहीं मिला. लेकिन कपिल के संन्यास के बाद श्रीनाथ भारत की बोलिंग लाइनअप के प्रमुख गेंदबाज़ बन गए.

Javagal Srinath
जवागल श्रीनाथ. फोटो: Getty Images

श्रीनाथ की खासियत थी कि वो एक ओवर में दो गेंदें 140-145 पर ज़रूर फेंकते थे. उस समय श्रीनाथ को मोहम्मद निसार के बाद भारत का सबसे तेज़ गेंदबाज़ माना जाता था. 1999 के वर्ल्डकप तक हर गेंद की स्पीड मापने के लिए स्पीड गन्स आ चुकी थीं. और इस वक्त तक श्रीनाथ अपने कंधे का ऑपरेशन भी करा चुके थे. लेकिन फिर भी वो इस विश्वकप में शोएब अख्तर के बाद सबसे तेज़ गेंदबाज़ी करने वाले गेंदबाज़ रहे.

श्रीनाथ ने 2003 विश्वकप के बाद क्रिकेट को अलविदा कहा. जाने से पहले उन्होंने देश के लिए चार विश्वकप खेले और 236 टेस्ट, जबकि 315 वनडे विकेट चटकाए.

# ज़हीर खान

जवागल श्रीनाथ के रहते हुए ही भारतीय क्रिकेट टीम ने चैम्पियंस ट्रॉफी में औरंगाबाद के श्रीरामपुर से आने वाले एक लड़के को आज़माया. इस लड़के ने उस चैम्पियंस ट्रॉफी में ऑस्ट्रेलिया, केन्या और साउथ अफ्रीकी टीम के ऐसे डंडे उड़ाए कि उसकी एक अलग पहचान बन गई.

ज़हीर खान नाम के इस लड़के की शुरुआत भी MRF पेस फाउंडेशन से हुई थी. एक स्कूल टीचर मां और फोटोग्राफर पिता के घर में जन्में जहीर खान 17 साल की उम्र में MRF पेस फाउंडेशन पहुंच गए. उनके कोच सुधीर नायक उन्हें डेनिस लिली के पास लेकर गए. और लिली ने उनकी बोलिंग देखते ही कह दिया,

‘ये हमारा नंबर वन बोलर है, हम इस पर पूरा ध्यान देंगे.’

बीच में ज़हीर टीम इंडिया में अंदर-बाहर होते रहे. क्योंकि उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था. वो फिटनेस से परेशान थे. लेकिन 2006 में इंग्लैंड की वरसेस्टरशर काउंटी से लौटने के बाद वो भारत के बेहतरीन गेंदबाज़ बन गए. 2007 में वो भारत के प्रमुख खिलाड़ी रहे. उनकी वजह से ही हमने इंग्लैंड को 21 साल बाद हराया. 2010-2011 में जब भारतीय टीम वर्ल्ड में नंबर वन टीम बनी तो ज़हीर खान का उसमें भी अहम योगदान रहा.

2011 क्रिकेट विश्वकप में देश की जीत में वो देश के सबसे बड़े गेंदबाज़ रहे. ज़हीर खान ने भारत के लिए 311 टेस्ट विकेट और 282 वनडे विकेट निकाले हैं.

Zaheer Khan 1
ज़हीर खान. फोटो: Getty Images

इन तेज़ गेंदबाज़ों के अलावा MRF पेस फाउंडेशन से भारत के लिए कुल 21 तेज़ गेंदबाज़ खेले हैं. जिनमें वेंकटेश प्रसाद, इरफान पठान जैसे बड़े नाम शामिल हैं. 25 सालों तक MRF का कामकाज़ संभालने के बाद 2012 में डेनिस लिली ने संन्यास का ऐलान कर दिया. उनके जाने के बाद से ग्लेन मैक्ग्रा MRF पेस फाउंडेशन की बागडोर संभाल रहे हैं.

# बुमराह, ईशांत, शमी, सिराज

इस स्टोरी में हमने भारतीय टीम में तेज़ गेंदबाज़ी के सफर को जाना. लेकिन आज एक ऐसा दौर आया है. जब हम एक या दो नहीं चार-चार तेज़ गेंदबाज़ों के साथ मैदान पर उतर रहे हैं. ये कहानी भी सिर्फ चार गेंदबाज़ों तक सीमित नहीं है. बल्कि हमारे पास बैकअप और बेंच पर ऐसे गेंदबाज़ हैं जो इनकी जगह भरने में पूरी तरह सक्षम हैं.

इंग्लैंड के लॉर्ड्स की जीत के बाद भारतीय पेस अटैक को भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ पेस अटैक कहा जा रहा है. ये बात सही भी है, 1932 से 89 सालों के क्रिकेट इतिहास में भारत कभी भी एक साथ इतने पेसर्स को लेकर नहीं खेला. वो भी ऐसे पेसर्स जो सामने वाली टीम को 60 ओवर्स के अंदर ढेर करने का दम रखते हों.

Bumrah Siraj Team India
भारत की मौजूदा टेस्ट टीम. फोटो: AP

आज हमारे पास ईशांत शर्मा जैसा तेज़ गेंदबाज़ है. जिसने 100 से ज़्यादा टेस्ट और 300 से ज़्यादा विकेट चटकाए हैं. जसप्रीत बुमराह जैसा तेज़ गेंदबाज़ है, जो आईसीसी की टॉप-10 रैंकिंग में खड़ा है. मोहम्मद शमी जैसा अटैकिंग गेंदबाज़ है जो महज़ 53 मैचों में 200 विकेटों के करीब है. वहीं मोहम्मद सिराज जैसा पेस बोलर है, जिसने ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में भारत की जीत में अहम योगदान दिया है.

इस तरह से आज ये बात कही जा सकती है कि भारत विश्व क्रिकेट में सिर्फ बल्लेबाज़ी के लिए ही नहीं अपनी तेज गेंदबाज़ी के लिए भी पहचाना जाता है.


माइकल वॉन ने ऐसा ट्वीट किया कि इंग्लैंड पर जीत के बाद भारतीय फैन्स ने जमकर मजे लिए 

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