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'सच्चे हिंदू हो तो पटाखे को हाथ मत लगाना'

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पटाखा क्या है

साइज में छोटा, आवाज में दमदार जिसका मकसद सिर्फ हंगामा करना होता है, बदलाव लाना नहीं. माने पटाखे के विस्फोट से अगर इलाके का हुलिया बदल जाता है तो वो बम है पटाखा नहीं. इसलिए पटाखा मतलब तेज आवाज़. जैसे भगत सिंह ने असेंबली में फेंका था. सिर्फ आवाज़ और धुआं था उसमें.

पटाखे में क्या होता है

होता तो बहुत कुछ है. लोग माचिस की तीली का मसाला निकालकर पटाखा बना लेते हैं लेकिन मुख्य रूप से पटाखे का मसाला है बारूद. और बारूद में होता है सॉल्टपेटर, सल्फर वगैरह.

बारूद का इतिहास

देखो दावा चाहे जो करे लेकिन तमाम टेक्नोलॉजी की तरह इसकी खोज भी चीन में हुई. बिना लिखा पढ़ी वाली खोज 9वीं सदी में मानी जाती है, जब टैंग साम्राज्य हुआ करता था. लिखित फॉर्मूला 11वीं सदी का मिलता है. वहां 1040 से 1044 तक एक मिलिट्री का दस्तावेज लिखा गया ‘वूजिंग जोंग्याओ’ जिसमें पहला बारूद का फॉर्मूला मिलता है. मतलब ये भी वहीं से आया है जहां की झालर और पटाखों का विरोध हर सच्चा देशभक्त करता है.

चीन ने बारूद बनाया, मंगोलों ने फैलाया. भारत में उस वक्त तीर तलवार और भाले से लड़ाई होती थी.
चीन ने बारूद बनाया, मंगोलों ने फैलाया. भारत में उस वक्त तीर तलवार और भाले से लड़ाई होती थी.

भारत में बारूद

ये इस आर्टिकल का सबसे खास हिस्सा है. भारत में बारूद मंगोल लाए. मंगोल खाना बदोश आक्रमणकारी थे जिन्होंने तमाम दुनिया के साथ भारत के बड़े हिस्से पर भी कब्ज़ा कर लिया था. चीन पर पहले ही कब्ज़ा किए हुए थे. तो वहां से बारूद लेकर इधर आ गए थे. ये हुआ था 13वीं सदी में. 1606-07 में लिखे गए तारीख ए फरिश्ता में लिखा है कि मंगोल सरदार हलाकू खान के पास बारूद था. हलाकू 13वीं सदी में इधर आया था. हलाकू को तो जानते ही होगे. अगर अजीज नाजां की वो कव्वाली सुनी है “चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता है ढल जाएगा.” उसमें एक लाइन है जिसमें हलाकू का जिक्र है-

अब न वो हलाकू है और न उसके हाथी हैं
जंगजू वो पोरस है और न उसके साथी हैं

तो जैसा कि आपने देखा बारूद मंगोल आक्रमणकारियों का लाया हुआ पदार्थ है, जिससे पटाखे बनते हैं. भारत के हिंदू राजा महाराजा इसी वजह से उनके पास टिक नहीं पाते थे क्योंकि उनके पास बारूद होता था. यहां लोग टापते रह जाते थे कि ये क्या चीज है भई. इस बारूद की वजह से हमको हजारों साल गुलाम रहना पड़ा और आप कहते हैं हमें पटाखे दगाने हैं.

पिछले साल यानी 2016 की दिवाली के बाद तीन दिन तक रही थी जहरीली धुंध
पिछले साल यानी 2016 की दिवाली के बाद तीन दिन तक रही थी जहरीली धुंध.

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर बैन लगा दिया है. एक नवंबर तक दिवाली बीत जाएगी, फिर आराम से दगाना लेकिन इस बैन से सबसे ज्यादा आहत दिल्ली से बाहर वाले हैं. समुद्र में एक जीव होता है जो आगे भी चल लेता है और पीछे भी. पटाखा बैन का विरोध करने वाले वही हैं. मतलब हर साल ये खुद चाइनीज़ झालरों का और पटाखों का विरोध करते थे तो कुछ नहीं था, इस साल सुप्रीम कोर्ट ने हर तरह के पटाखे बैन कर दिए तो भावनाएं आहत हो गईं.

विडंबना ये है कि इनको लगता है हिंदू त्योहार के साथ ज़्यादती हुई है. ये सिर्फ हिंदुत्व बचाना चाहते हैं, हिंदू नहीं. क्योंकि जहरीली ऑक्सीजन सोखकर हिंदू कहां बचने वाला है.

इनका एक तर्क ये है कि जब साल भर एसी चलाते हैं, गाड़ियां चलाते हैं, सिगरेट पीते हैं तो एक दिन में पटाखों से क्या नुकसान हो जाएगा. यही तब भी विरोध कर रहे थे जब दिल्ली में पॉल्यूशन कम करने के लिए केजरीवाल ने ऑड ईवन लागू किया था. दूसरी बात ये है कि एसी, गाड़ी, सिगरेट आदमी की मर्जी है. वो चाहे पिए, चलाए या नहीं. लेकिन पटाखे चलेंगे तो उसकी हवा में सांस सबको लेनी पड़ेगी. पिछले साल दिल्ली से चार दिन धुंध नहीं छटी थी. अस्थमा के मरीजों की जान पर बन जाती है और अस्थमा हिंदू मुसलमान देखकर तो होता नहीं.

एक और फनी लॉजिक देते हैं कि बकरीद पर बकरे कटने पर बैन क्यों नहीं कराते? यानी इनके अंदर का इंसान जाग गया है इसलिए ये बकरों को बचाना चाहते हैं. फिर बचे हुए बकरों, गायों, कुत्तों को पटाखों के जानलेवा शोर से एडवेंचर सिखाना चाहते हैं. अमा जानवरों को तुम्हारे एडवेंचर में दिलचस्पी नहीं है, उन्हें बचाकर टॉर्चर करना बंद करो.

एक तो विदेशी आक्रांताओं के बनाए हुए बारूद का धुंआ पिलाकर हिंदुओं को मार रहे हो और कह रहे हो कि हिंदुत्व की रक्षा कर रहे हैं. चम्मच भर पानी लो और…

अब पटाखे छोड़ो और अपराधियों के छक्के छुड़ाने वाले दो अफसरों की बातें सुनो जो उन्होंने लल्लनटॉप शो में कहीं.


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