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कोरोना वायरस की वजह से 26 साल पहले जैसा हो जाएगा क्रिकेट!

क्रिकेट का ज़िक्र जब भी आता है, तो बात आती है बल्लेबाज़ों की, गेंदबाज़ों की, फील्डर्स की. लेकिन क्रिकेट के उस खास हिस्से का ज़िक्र तब ही होता है, जब आलोचना करनी होती है. यानी क्रिकेट अंपायर्स. गली क्रिकेट हो, क्लब क्रिकेट हो या फिर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट. अंपायर हमेशा निशाने पर ही रहते हैं. खासकर तकनीक के आने के बाद उनका काम आसान होने की बजाए और ज़्यादा तुलनात्मक हो गया है. क्रिकेट के खेल में एक साल में दुनियाभर में किसी भी क्रिकेटर से ज़्यादा ट्रेवल कोई करता है, तो वो एक अंपायर ही होता है.

कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से दुनिया बदल गई है. इसका असर क्रिकेट पर भी पड़ा है. ऐसी खबरें हैं कि अब न तो मैदान पर गेंदबाज़ गेंद को थूक से चमका पाएंगे, न ही अब क्रिकेट के मैदान पर विदेशी अंपायर नज़र आएंगे. आईसीसी ने साफ किया है कि कोरोना वायरस से खतरें को कम करने के लिए अब जिस देश में मैच होंगे, वहीं के अंपायर फैसले सुनाएंगे. यानी 1992 से पहले वाला क्रिकेट एक बार फिर से लौट आएगा. ये आपको आगे बताएंगे कि कैसे.

# अंपायरिंग का स्पोर्ट्समेन स्पिरिट पर कालिख पोतने वाला इतिहास:

क्रिकेट की शुरुआत 16वीं शताब्दी से मानी जाती है. लेकिन 19वीं शताब्दी में साल 1877 में जब पहला आधिकारिक टेस्ट मैच खेला गया, तब से ही क्रिकेट के मैदान पर अंपायर्स नज़र आए. रिचर्ड टेरी और कर्टिस रीड क्रिकेट इतिहास के पहले ऐसे अंपायर रहे, जिन्होंने एक आधिकारिक मैच में अंपायरिंग का जिम्मा निभाया.

इसके बाद साल दर साल क्रिकेट होता रहा और अंपायर दिखते रहे. साल 1930 तक क्रिकेट के मैदान पर इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के अलावा सिर्फ दक्षिण अफ्रीका की टीम ही नज़र आई. लेकिन इसके बाद क्रिकेट ने रंग-रूप बदला और ये खेल वेस्टइंडीज़, न्यूज़ीलैंड और भारत तक पहुंच गया. क्रिकेट की शुरुआती सदी में नॉन-न्यूट्रल यानी जिसका मैदान, उसका अंपायर वाले फॉर्मूले ने क्रिकेट के असली स्पोर्ट्समेन स्पिरिट का तगड़ा नुकसान किया.

Ashes 7071
19070/71 Ashes सीरीज़ का स्क्रीनशॉट. फोटो: Video

इस नुकसान का सबसे बड़ा ज़िम्मेदार ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और वेस्टइंडीज़ को माना गया. फिर चाहे बात 1946-47 या फिर 1971-72 में एशेज़ सीरीज़ की हो. जब डॉन ब्रैडमैन को आउट होने पर भी नॉट-आउट दिया गया, या फिर 1982-83 में भारत के पाकिस्तान दौरे की. जब अंपायर शकूर राणा ने भारतीय गेंदबाज़ों से यहां तक कहा दिया-

”आजा, आजा…एथे सिर्फ बोल्ड कर, एत्थे ओइयो विकेट ही मिलेगी.”

(यानी यहां सिर्फ बोल्ड करके ही विकेट मिलेगा)

1987 का फैसलाबाद टेस्ट भी इसका बड़ा उदाहरण है. जब अंपायर शकूर इंग्लैंड के ग्रेट माइक गेटिंग से मैदान पर ही भिड़ गए. ये सब तो वो हैं, जिन्हें क्रिकेट के काले अंपायरिंग इतिहास के लिए टॉप पर रखा जाता है. लेकिन इसके अलावा भी 1990 से पहले कई मैचों को विवादास्पद नतीज़ों के लिए जाना जाता है.

1877 में शुरू हुए क्रिकेट ने लगभग एक सदी तक इन चीज़ों को यूं ही चलने दिया, क्योंकि घरेलू मैदान पर घरेलू टीम के अंपायर का दबदबा होता था. फिर एलबीडब्ल्यू नतीजे तो आप भूल ही जाइये. खासकर उस दौर में न तो डीआरएस था, न ही थर्ड अंपायर और न ही कोई टीवी वाली टेक्नोलॉजी. वहां अंपायर का फैसला की अटल और अडिग होता था.

लेकिन फिर भी क्रिकेट के मैदानों से दबी ही सही, 1980 आते-आते ये न्यूट्रल अंपायर की आवाज़ उठने लगी. 1979-80 में वेस्टइंडीज़ के न्यूज़ीलैंड दौरे पर भी अंपायर के भेदभावपूर्ण रवैये के बाद वेस्टइंडीज़ टीम ने न्यूट्रल अंपायर की मांग कर दी.

इससे पहले 1971-72 की एशेज़ सीरीज़ में घरेलू अंपायरों के भेदभावपूर्ण रवैये ने क्रिकेट को हिलाकर रख दिया था.

# क्रिकेट में न्यूट्रल अंपायर की एंट्री

पाकिस्तान में अंपायरिंग के इसी रवैये की वजह से उन पर लगातार भेदभाव वाली अंपारयिंग के आरोप भी लगने लगे थे. कई बार उनके गेंदबाज़ों के विकेट को ‘अंपायरों का विकेट’ भी कहा गया. इसके बाद साल 1987 में इमरान ने फैसला लिया कि वो वेस्टइंडीज़ के खिलाफ लाहौर में होने वाले टेस्ट के लिए दो न्यूट्रल अंपायर बुलाएंगे. यानी क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि दोनों टीमों से बाहर के अंपायर को मैच में अंपायरिंग के लिए बुलाया गया.

Piloo Reporter
भारतीय अंपायर पिल्लू रिपोर्टर. फोटो: Video Screenshot

ये दोनों अंपायर भारत से बुलाए गए, जिनका नाम था वी.के. रामास्वामी और पिल्लू रिपोर्टर. इसके बाद 1989-90 में भारत के खिलाफ सीरीज़ के लिए भी पाकिस्तान ने इंग्लैंड से न्यूट्रल अंपायर मंगवाए. जॉन हैम्पशायर और जॉन होल्डर.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लगातार स्पोर्ट्समेन स्पिरिट और जैन्टलमेन गेम पर उठ रहे सवालों के बीच आईसीसी भी पसोपेश में थी. उसने आखिरकार क्रिकेट शुरू होने के 117 साल बाद न्यूट्रल अंपायर लाने का फैसला लिया. 1992 में इसका एक्सपेरिमेंट करने के बाद 1994 से टेस्ट क्रिकेट में दो में से एक अंपायर न्यूट्रल रखा गया.

# 1992 में क्रिकेट में थर्ड अंपायर की एंट्री:

न्यूट्रल अंपायर की सुगबुगाहट के साथ ये हुआ कि अब जब क्रिकेट को साफ किया ही जा रहा है, तो क्यों न तकनीक के साथ पूरी ही सफाई की जाए. पहली बार क्रिकेट में कैमरे का असली इस्तेमाल भी हुआ. यानी अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में टीवी रीप्ले और थर्ड अंपायर की एंट्री हुई.

अब तक सिर्फ दो ही अंपायर मैदान पर सब कुछ देख-रेख कर रहे थे. लेकिन अब से मैदानी अंपायरों के अलावा एक अलग से अंपायर तसल्ली से टीवी पर बैठकर पूरा मैच रिकॉर्ड करने के साथ-साथ देखेगा भी. उसे ही थर्ड अंपायर कहा गया.

# पहले मैच में ही थर्ड अंपायर ने जलाई बत्ती:

पहली बार 1992 में भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेले गए टेस्ट मैच में थर्ड अंपायर को शामिल किया गया. पहले ही मैच में उनकी ड्यूटी भी आ गई. पहली पारी में सचिन तेंडुलकर नंबर चार पर खेलने उतरे. 22 के स्कोर तक अजय जडेजा और संजय मांजरेकर आउट होकर लौट चुके थे. दूसरे दिन के आगे के खेल में सचिन ने एक रन लेने के लिए कन्फ्यूज़ थे. उन्होंने आगे बढ़कर लौटना चाहा, लेकिन जोन्टी रोड्स ने गेंद को तुरंत हडसन के पास भेज दिया.

मैदान पर इस घटना के बाद साउथ अफ्रीका ने अपील की. ये सब देखकर क्रिकेट इतिहास में पहली बार किसी मैदानी अंपायर ने थर्ड अंपायर को फैसला देने का इशारा किया. स्क्वेयर लेग अंपायर साइरल मिशले ने तुरंत थर्ड अंपायर कार्ल लेबनगर्ग को पहली पार क्रिकेट में रन-आउट फैसले के लिए टीवी रीप्ले देखने के लिए कहा. अंपायर लेबनगर्ग ने अपनी उंगली से इशारा करते हुए टीवी स्क्रीन को देखा और 30 सेकंड के बाद उन्होंने हरी बत्ती जलाकर सचिन को आउट दे दिया.

थर्ड अंपायर के आने के बाद शुरुआत में हरी बत्ती जलाकर ही आउट होने का सिग्नल दिया जाता था.

Light Signal
थर्ड अंपायर का लाइट सिग्नल. फोटो: MCG

# 2002, क्रिकेट को ईमानदार बनाने की कोशिश वाला साल:

1992 में टेस्ट क्रिकेट में एक न्यूट्रल अंपायर आ गया था. इसके बाद साल 2002 में पहली बार आईसीसी ने एलीट अंपायर्स का एक पैनल बनाया. इसके बाद ये बड़ा फैसला लिया गया कि टेस्ट क्रिकेट के मैदान पर एक ही नहीं, बल्कि दोनों अंपायर न्यूट्रल होंगे. यानी मेज़बान या मेहमान टीम से कोई भी अंपायर नहीं होंगे, जबकि वनडे में भी एक न्यूट्रल अंपायर के साथ इसकी शुरुआत होगी.

Virat Umpires
अंपायर के साथ विराट की फाइल फोटो

तब से लेकर अब 2020 की नई गाइडलाइंस तक इसी नियम को फॉलो किया जाता रहा है. हर साल आईसीसी अपने एलीट पैनल के अंपायर्स में बदलाव भी करता है. इसकी घोषणा हर साल एक जुलाई के दिन की जाती है. लेकिन 2002 के इस फैसले के बाद से क्रिकेट के खेल में अगर सबसे ज़्यादा दबाव किसी पर बढ़ा है, तो वो अंपायर ही हैं. आईसीसी के मुताबिक एलीट लिस्ट वाला एक अंपायर एक साल में लगभग 8-10 टेस्ट और 10-15 वनडे में मौजूद रहता है. इसके अलावा अगर उस साल में आईसीसी इवेंट है, तो उसे वहां भी मौजूद रहना होगा. एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक क्रिकेट अंपायर साल में 200 दिन तक ट्रेवल करता है, जो कि किसी भी खिलाड़ी से अधिक है.

# क्रिकेट में डीआरएस:

क्रिकेट में रन-आउट देने का फैसला तो 1992 में ही फील्ड अंपायर से छिन गया था. लेकिन अब इकलौता उसके विवेक का एलबीडब्ल्यू और कैच का फैसला भी उसके हाथ से जाता रहा. क्रिकेट को भेदभाव वाले रवैये से बचाने के लिए न्यूट्रल अंपायर मैदान पर पहले ही आ चुके थे. लेकिन फिर भी आखिरकार अंपायर भी इंसान हैं और गलती उनसे भी होती है. इसी सोच के साथ आईसीसी क्रिकेट में ‘अंपायर डिसीज़न रिव्यू सिस्टम’ लेकर आया, यानी डीआरएस.

Drs
फाइल फोटो

पहली बार साल 2008 में इंडिया और श्रीलंका के मैच में इसका टेस्ट हुआ, जिसके बाद 2009 में आईसीसी ने इसे अपनी मंज़ूरी दे दी. मौजूदा नियम के मुताबिक टेस्ट मैच में किसी भी एक टीम को 80 ओवर में दो रिव्यू का मौका मिलता है. वहीं वनडे में ये एक पारी ये एक बार होता है.

डीआरएस का असली मतलब है कि खिलाड़ी का अंपायर के फैसले से नाखुश होना. जब भी ऐसा होता है, तो वो डीआरएस लेकर तीसरे अंपायर से तकनीक के जरिए इसे जांचने की मांग करता है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ये काम कैसे करता है.

डीआरएस रिव्यू.
डीआरएस रिव्यू.

कैसे काम करता है DRS:

स्लो मोशन रीप्ले: सबसे पहले तीसरा अंपायर स्लो मोशन रीप्ले देखता है. इसमें बल्लेबाज़ के शॉट के साथ-साथ गेंदबाज़ के पैर को भी चेक किया जाता है.

इन्फ्रा रेड कैमरा: इसके बाद इंफ्रा रेड कैमरे से चेक किया जाता है कि गेंद बल्लेबाज़ के बल्ले या कलाई के निचले हिस्से से टकराई तो नहीं.

एज डिटेक्शन: इसके बाद स्निको मीटर से भी जांच की जाती है कि गेंद का बल्ले से कोई संपर्क तो नहीं हुआ.

बॉल ट्रैकिंग: इसके बाद मैदान के चारों तरफ लगे आठ कैमरों की मदद से ये देखा जाता है कि बॉल किस दिशा में जा रही है.

ये तो बात रही क्रिकेट के मैदान पर अंपायर और अंपायर से जुड़ी चीज़ों और पहलुओं की. लेकिन अब कोरोना वायरस के बाद अब क्रिकेट फिर से जब भी शुरू होगा, तो 1994 से पहले की तरह ही बिना न्यूट्रल अंपायर के खेला जाएगा.

हालांकि अंपायर्स के नज़रिये से इससे उन पर दबाव थोड़ा कम हो सकता है, जिसकी शिकायत अक्सर अंपायर करते हैं. हो सकता है अब क्रिकेट के अंपायर दिग्गज डिकी बर्ड की तरह कुंवारे भी न रहें, क्योंकि दुनिया में कम घूमने और कम बिज़ी रहने की वजह से वो अपनी संगिनी को ज़्यादा समय दे पाएंगे!


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