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अगर समझते हो कि जातिवाद खत्म हो गया तो ये फिल्में देखो

हमारा सिनेमा बहुत तरक्की कर गया है. टेक्नोलॉजी, स्टोरी, एडवर्टाइज, रिलीज के लेवल पर. लेकिन हमारे समाज के कुछ मुद्दे सिनेमा की मुख्य धारा में आने से छूट जाते हैं. फिल्मों में दलित मुद्दों को अभी तक खुले रूप से उठाया नहीं गया है. बहुत कम सिनेमा ऐसा है, जो दलितों से जुड़े मुद्दे उठाता है. उनकी कहानियां कहता है. कुछ फिल्मकारों ने इस मुद्दे से जुड़ी कुछ कहानियों को हम तक पहुचने की कोशिश की है. इन कोशिशों में से तीन हम आपके लिए लाये है. वक्त देकर तसल्ली बख्श तरीके से इनको देखेंगे तो दिल और दिमाग के कपाट खुलेंगे.

1. फेन्ड्री(2013)

फेन्ड्री जब्या की प्रेम कहानी है. जब्या(सोमनाथ अवघड़े) 13 साल का एक दलित लड़का हैं. अपने स्कूल में पढ़ने वाली एक ऊंची जाति की लड़की से इश्क कर बैठता है. वह एक सपना देखता है. उसने जींस की पैंट पहनी हैं और वह लड़की उसके साथ है. दोनों का हाथ एक दुसरे के हाथ में है.

फेन्ड्री जब्या के उस लडकी से अपने प्यार के इजहार की कहानी है. फिल्म, निर्देशक नागराज मंजुले की खुद की जिंदगी से प्रेरित है. यह फिल्म 2013 की बेहतरीन फिल्मों में से एक है. फेन्ड्री नेशनल अवार्ड और मुंबई फिल्म फेस्टिवल में ग्रैंड जूरी प्राइज के साथ दूसरे कई अवॉर्ड जीत चुकी है.
फिल्म का लास्ट सीन जहन में बस जाने वाला है. यह फेन्ड्री का ट्रेलर हैं. ट्रेलर देखें और फिल्म भी.

2. सद्गति (1981)

सद्गति, प्रेमचंद की कहानी पर बनी एक टेलीफिल्म है. सत्यजीत रे ने यह फिल्म बनायी थी. दुक्खी(ओम पूरी) छोटी जाति का एक मजदूर है. जिसकी बेटी की सगाई होने वाली है. दुक्खी एक ब्राह्मण(मोहन अगाशे) के घर आया है ताकि वह ब्राह्मण को अपने घर ले जा सके.

ब्राह्मण इसी बीच अपने घर के कुछ छोटे मोटे काम दुक्खी से निपटवाने की कोशिश में है. यह कहानी की शुरुआत है. कहानी जहाँ खत्म होती है वो आप खुद ही देखें तो बेहतर है. सत्यजीत रे की डायरेक्शन, साथ ही ओम पूरी और मोहन अगाशे की एक्टिंग सब कमाल के हैं. जिन्होंने ये कहानी पढ़ी उनको तो सब पता होगा. लेकिन फिल्म देखने का एक्सपीरिएंस अलग होता है. फिल्म खत्म होने पर आपको सोच में डाल सकती हैं.

3. इंडिया अनटच्ड (2007)

यह स्टॅालिन के. की डॉक्यूमेंट्री फिल्म है. इंडिया अनटच्ड आज के दौर में दलितों की पोजीशन को दिखाती है. उस पर सवाल भी खड़े करती है. फिल्म ने भारत के लगभग हर हिस्से को कवर किया है. इसमें में कुछ हिस्से तो ऐसे है जिन पर यकीन नहीं आएगा कि यहां भी ऐसा हो सकता है.

फिल्म में एक जगह एक ब्राह्मण बाबा, काला चश्मा लगाए हुए, अपने विचार साझा करते है. इनके विचारों पर आपको हैरानी होगी. अफसोस भी. अगर आप शहर में रहे हैं. और ये मानने लगे हैं कि यहां तो जातिवाद का लफड़ा खतम है. तो शायद ये फिल्म देख कर आपके कुछ भ्रम टूट जायेंगे.

स्टोरी दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रहे निखिल ने एडिट की है.

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