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घटनाएं घटती क्यों हैं? जुड़ती क्यों नहीं?

himanshu singhहिमांशु दृष्टि समूह के संपादक मंडल के सदस्य हैं और ‘दी लल्लनटॉप’ के दोस्त हैं.  हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और समसामयिक मुद्दों के साथ-साथ विविध विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं.


साल 2019 गुजरने के बाद यूं लगा जैसे दुर्घटनाओं की पूरी सदी बीत चुकी है. 2019 के शुरूआती महीनों में ही पुलवामा हमले और विंग कमांडर अभिनन्दन के पकिस्तान कैप्चर को देश ने झेला. लगा जैसे भारत-पाकिस्तान युद्ध-श्रृंखला का नया दौर शुरू होने वाला है. खैर, युद्ध टल गया. तमाम मौतें टल गयीं. पर अभी पूरा साल पड़ा था. अभी तो हमें जॉर्ज फर्नाडीस, कृष्णा सोबती, वशिष्ठ नारायण सिंह और गिरीश कर्नाड को गंवाना था. राम जेठमलानी, शीला दीक्षित, सुषमा स्वराज और नामवर सिंह को खोना था. और रोना था खय्याम और विद्या सिन्हा पर. पर बात यहीं ख़त्म हो जाती तो गनीमत थी. लेकिन घटनाएं थीं कि घटती ही जा रहीं थीं.

मैं देश में बाढ़-सूखा जैसी नियमित आपदाओं को नज़रंदाज़ कर भी दूं, पर CAA जैसी बड़ी घटना को अनदेखा कर पाना मेरे वश में नहीं है. जामिया विश्वविद्यालय का पुलिसिया दमन आजाद भारत की वो घटना रही, जो आने वाले तमाम सालों तक सरकार के मुंह पर कालिख और व्यवस्थाओं की दाढ़ी का तिनका साबित होती रहेगी. पर तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों की बर्बादी पर आंसू बहाने वालों का JNU और जामिया की बर्बादी के सरकारी प्रयासों पर मूछों मुस्काना और ताली पीटना भी बीते साल की बड़ी सामाजिक दुर्घटना रही.

बाकि अर्थव्यवस्था का डूबना और बर्बाद हो जाना अगर मौजूदा सरकार की निगाह में एक सामान्य घटना है, तो भी मैं हैदराबाद में घटी बलात्कार और हत्या की बहुचर्चित घटना को साल के क्रूरतम अपराधों में जरूर शामिल करूंगा. हालांकि मैं इस घटना के तथाकथित अपराधियों की तथाकथित पुलिसिया मुठभेड़ में हुई मौत को भी बीते साल की बड़ी दुर्घटनाओं में शामिल करूंगा.

अब ये कैसी घटनाएं हैं, और क्यों घटीं, इस पर बात करना बड़ा बोरिंग काम है. हर जगह यही चीर-फाड़ चल रही है. तो जैसा कि मैंने हेडलाइन में वादा किया है, मैं दुर्घटनाओं के इस दौर में मन को राहत देने वाले कॉन्सेप्ट पर बात करूंगा. मैं बात करूंगा ‘घटना’ शब्द पर. मसला रहेगा कि घटनाएं घटती क्यों हैं? जुड़तीं क्यों नहीं?

शायद सब कुछ पूर्वनिर्धारित होने की धारणा के चलते ऐसा कहा जाता हो! फिर तो जो हो चुका या होने को है उसका कोई बहीखाता भी जरूर होता होगा! कि अभी ये बचा है घटने को, घट जायेगा समय आने पर.

हमारे भीतर, हमारे इर्द-गिर्द या हमसे बहुत दूर जो कुछ भी है, सब कुछ घटा ही तो है! समझ ये नहीं आता कि घटने के बाद क्षरण क्यों होता है फिर? और जब क्षरण होना ही था तो घटने से पहले ही हो जाता या घटा ही न होता. कितना अच्छा होता न! फिर सोचता हूं कि क्षरण की विभिन्न प्रक्रियाएं और चरण ही तो असल मनोरंजन हैं उस बहीखाते वाले का.

कोई कह रहा था कि कविताएं रची नहीं जाती हैं, वो पहले से मौजूद होती हैं. रचनाकार उन्हें बस उजागर करते हैं. बात सिर्फ कविता, कहानी, संगीत या किसी अन्य कला तक सीमित होती तो क्या बात थी! पर मुझे तो अब हर जगह यही पैटर्न दिख रहा है. साहित्य, भावनाएं, प्राकृतिक गतिविधियां, नक्षत्रों की दशा, सफलता, असफलता, जीवन, मृत्यु. सब कुछ तो पहले से ही मौजूद रहता होगा फिर तो! और समय आने पर उजागर हो जाता होगा! पर इसका रजिस्टर जरूर किसी सुलेमानी बस्ते में रखा रहता होगा. ये बस्ता किसकी पीठ पर रहता होगा?

खैर, मजेदार बात है कि सब कुछ घटते जाने के बावजूद हम हमेशा जोड़ने की फ़िराक़ में रहते हैं. भ्रम भी गजब रूमानी होता है कभी-कभी.

सोच रहा हूं कि अगर एक बार मुस्कुराते हुए घटने की इस प्रक्रिया में खुद ही शामिल हो जाया जाए, तो संभव है कि घटनाओं के सुलेमानी बस्ते वाले मुनीम से हमारी बनने लगे, दोस्ती हो जाए कि ‘ल्यो भाई, हमने तुम्हारा काम आसान कर दिया’.

तब शायद हम घटने को लेकर भी उतना ही सहज हो जाएं जितना जुड़ने को लेकर हैं. और ये भी समझ पाएं कि जुड़ते वक्त भी दरअसल हम घटते ही तो हैं!

और इस समझ के साथ ही जुड़ने-घटने के तमाम वहम और सूकून हमारे किसी काम के न बचें!

यही तो मुक्ति है न! मोक्ष यही तो है शायद!


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