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अमेरिकी ब्लू जीन्स का जवाब हिंदुस्तानी कुर्ता है?

himanshu singhयह लेख दी लल्लनटॉप के लिये हिमांशु सिंह ने लिखा है. हिमांशु दिल्ली में रहते हैं और सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और प्रतिष्ठित करेंट अफेयर्स टुडे पत्रिका में वरिष्ठ संपादक रह चुके हैं. समसामयिक मुद्दों के साथ-साथ विविध विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं.


दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ ने पूरी दुनिया पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए. हथियारों की आपसी होड़, देशों की गुटबाजी और गैरजरूरी अंतरिक्ष अभियानों को अंजाम दिया गया. लेकिन बराबर की टक्कर रहने के बाद अमेरिका ने अपना वो दांव चला, जिससे आज तक दुनिया नहीं उबर पायी.

अमेरिका ने सॉफ्ट पॉवर की जंग शुरू कर दी. सॉफ्ट पॉवर की जंग यानी विचारधारा और संस्कृति की जंग. कोई बंदूक नहीं, कोई तोप नहीं; बल्कि हम तुम्हें अपने रंग में रंग लेंगे. तुम्हारे विचार और तुम्हारी संस्कृति को हम खा जाएंगे. और तब… तब तुम्हारी बंदूकें और तोपें किसी काम की नहीं रहेंगी. हम तुमको अपने जैसा बना लेंगे, पर तुम नकली रहोगे, हम असली. तुम ओरिजिनल्स का पायरेटेड वर्जन बन के रह जाओगे.

सॉफ्ट पॉवर की इस लड़ाई में अमेरिका का सबसे मारक हथियार बनी ‘ब्लू जीन्स’. अमेरिका, जो पूंजीवादी विचारधारा का नेतृत्त्व कर रहा था, उसने नीली जीन्स को पूरी दुनिया में आज़ादी का प्रतीक बनाकर पेश किया.

सोवियत संघ, जो साम्यवाद का अगुआ था, और जिसके नागरिक राज्य द्वारा प्रस्तावित जिम्मेदारियों से बंधे थे, आज़ादी के इस प्रतीक के दीवाने हो गए. सोवियत संघ में नीली जीन्स बैन कर दी गई. पर नीली जीन्स की दीवानगी इस कदर बढ़ी कि सोवियत संघ में नीली जीन्स की स्मगलिंग होने लगी. सालों-साल यही हालात रहे, और इसमें नया अध्याय जुड़ा 31 जनवरी 1990 के दिन, जब मॉस्को के पुश्किनस्काया स्क्वायर पर अमेरिकी सॉफ्ट पॉवर के सबसे बड़े प्रतीक मैकडॉनल्ड्स की पहली शाखा खुली, और सोवियत ने इस सांस्कृतिक युद्ध में अपनी हार का स्वाद चखा.

खैर, ये तो हुई बात सोवियत संघ और उसके हश्र की. अब बात करते हैं भारत की.

शीतयुद्ध के दिनों में भारत चाहे गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अगुआ रहा हो, और किसी भी खेमे में शामिल न हुआ हो, पर भारत पर सोवियत संघ और साम्यवाद का भरपूर असर था. तो अमेरिका की ओर से भारतीय जनता पर भी ‘ब्लू जीन्स’ के डोरे डाले गए. पर हम ठहरे गौतम बुद्ध के देश के लोग…पैदाइशी मध्यममार्गी.

हमने झटपट अपनी धोती और पैजामा उतारकर नीली जीन्स चढ़ा ली, पर बदले में उन्हें भी अपना कुर्ता पहना दिया. आज आलम ये है कि कुर्ता और जीन्स का ये कॉम्बिनेशन न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर से लेकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन तक गुलज़ार है.

पहले धोती, फिर इज़ारबंद-पजामा और अब जीन्स… कितने आये और कितने गए, पर हमारा कुर्ता टस से मस न हुआ. होता भी कैसे! जीन्स अगर एक इमोशन है, तो कुर्ता भी एक अवस्था है. जीन्स अगर उनकी सॉफ्ट पॉवर है, तो कुर्ता भी हमारा जीवन-दर्शन है. और सबसे बड़ी बात – कुर्ता पहना नहीं जाता, बल्कि धारण किया जाता है.

दुनियाभर के विचारक हज़ारों साल से ढीले-ढाले कपड़ों में दिखते रहे हैं. ऐसे में, भारत जैसे देश में, जहां सरकार, धर्म और समाज, तीनों की बागडोर कुर्ताधारियों के हाथों में है, वहां ढीले-ढाले कुर्ते में दिखना विचारवान और महत्त्वपूर्ण होने का स्वांग करने वालों के लिए तुरुप का इक्का है.

पर असल में कुर्ता खरीदकर पहन लेना ही पर्याप्त नहीं है. कुर्ता तो एक स्वभाव है, जो धीरे-धीरे विकसित होता है. कुर्ता तो एक अवस्था है, जिसे अर्जित करना होता है. पर हमारा समाज wannabe’s का समाज है. ऐसे में जरूरी है कि हम समझें कि कुर्ताधारी और कुर्तेबाज़ में अंतर क्या है.

कुर्ता पहनने वाला व्यक्ति अगर अपने दैनिक उपयोग की चीजें मसलन मोबाइल, वॉलेट, कलम इत्यादि अपने कुर्ते की जेब में नहीं रखता, तो वो असली कुर्ताधारी नहीं है.

जीन्स पर कुर्ता पहनकर मोबाइल-पर्स इत्यादि जीन्स की जेब में रखने वाले लोग कुर्ते का अपमान करते हैं. ये लोग छद्म कुरताधारी होते हैं, जो बस कुरता पहनने का स्वांग करते हैं.

कुर्ते में पुलिसिया फीता लगवाने वाले लोग, टाइट कुर्ता पहनने वाले लोग, कुर्ते के साथ जूता पहनने वाले लोग और कुर्ते की मौलिकता से किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने वाले लोग शोहदे होते हैं.

एक असली कुर्ताधारी अपने कुर्ते पर भरोसा करता है, और अपना फोन वगैरह अपने कुरते की गहरी जेबों को सौंप, निश्चिन्त रहता है.

कुर्ताधारी अगर नियमित रूप से दाढ़ी बनवाने लगे, या उसके चेहरे से गंभीरता का लोप होता दिखे, तो समझ लीजिए कुरताधारी अपने संक्रमण काल में है. फिर चाहे वो व्यक्ति कितना भी खास क्यों न हो, ऐसे दिनों में उससे किसी भी तरह की गुप्त योजना साझा करना समझदारी नहीं है.

फुसफुसाकर बात करने वालों को, मुंह छुपाकर हंसने और नजरें छुपाकर बोलने वालों को, साथ ही ऐसे लोग जिनके हंसने पर गालों में गड्ढे(डिंपल) पड़ते हों, उन्हें आत्ममूल्यांकन के पश्चात ही कुर्ता धारण करना चाहिए. उन्हें इस बात का बोध भलीभांति होना चाहिए कि कुर्ता नीलम रत्न की भांति होता है, जो अयोग्य धारणकर्ताओं का अहित भी करवा सकता है. ऐसे लोग अक्सर औकात से बड़ा बयाना पाते देखे गए हैं.

एक असली कुर्ताधारी दुनियादारी और औपचारिकताओं को एक साथ पान में चबा कर थूकने की क्षमता रखता है, पर जानबूझकर चूना लगवाना उसकी फितरत होती है. किसी भी प्रतियोगिता में शामिल न रहना उसका स्वभाव होता है.

कुर्ताधारी दुनिया के किसी भी कोने में हो, समय के साथ उसमें बनारसी जीन का म्यूटेशन हो ही जाता है, जिसके ‘मगही इफ़ेक्ट’ के चलते वो झापड़ मारने की कला में स्वतः पारंगत हो जाता है. उसकी विनम्रता भी गाहे-बगाहे उसे बनारसी अंदाज में गरियाने से नहीं रोक सकती. पर किसी कुर्ताधारी की सबसे अंतिम और मजबूत पहचान है उसके कुरते पर पान के छींटों की मौजूदगी होना. अगर ये नहीं है, तो बाकी सभी प्रमाण व्यर्थ हैं. पान के इन छींटों के प्रति उसकी बेपरवाही ही उसे विश्वसनीय कुर्ताधारी बनाती है. उन्मुक्त हंसी और अक्सर अति-नैतिकता के चलते हैमर्शिया से ग्रस्त रहना उसके अन्य लक्षण हैं.

मेरे मित्र पलाश तो इन कुर्ताधारियों की अलग ही व्याख्या करते हैं. पलाश कहते हैं-

असली कुर्ताधारी वही है जिसके कुरते की बाईं जेब में एक चुनउटी हो, सुर्ती-चून पुरहर हो (तम्बाकू-चूना भरा हो), और रुपिया वॉलेट में न हो, निछान रुपिया सीधे चुरौधा जेब में हो. अउर गांव के कई कुरतेबाज़ तो अपनी खतौनी हमेशा अपनी जेब में लेकर चलते हैं; जमानत लेने और किसी के ऊपर अतिरिक्त दबाव बनाने में उसका बराबर इस्तेमाल करते हैं.

खैर, एक असली कुर्ताधारी कचहरी और कलेक्ट्रेट के कामों का महारथी होता है. सलामसिद्ध वो चाहे न हो, पर ब्लॉक और कलेक्ट्रेट के आधिकारी उसे दूर से पहचान लेते हैं. अगर ऐसा नहीं होता, तो या तो कुर्ताधारी नकली है, या कलेक्ट्रेट में साहब का पहला दिन है. बाकी तीसरी संभावना तो बस कुर्ताधारी के ‘मिस्टर इंडिया’ होने की बचती है.

एक सामान्य कुर्ताधारी जितना सहज और सरल होता है, माथे पर गोल टीके वाले कुरताधारी उतने ही जटिल और खतरनाक होते हैं. उनसे उचित दूरी सुखी जीवन की गारंटी होती है.

अंत में यही डिस्क्लेमर दूंगा कि, ऐसा नहीं है कि सिर्फ इन लक्षणों से युक्त लोग ही असली कुर्ताधारी होते हैं. पर ये सौ टके सही बात है कि कुर्ता पहनने वाले लोग लेख में बताये गए आदर्श कुर्ताधारी के सभी लक्षणों से ग्रस्त होने का स्वांग जरूर करते हैं. अपने अंतर्मन में वो चाहते हैं कि उनमें इन्हीं गुणों-अवगुणों की अपेक्षा की जाए.


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