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हिमाचल, जहां सरकारी कर्मचारियों का सरकार के खिलाफ बोलना 'महापाप' है

द हीरो एक फिल्म आई थी. अपने सनी देयोल साहब की. उसमें एक गाना है
रब दी कसम सच बोल मेरे मितवा, झूठ बोले तो काट खाए बिछवा.
पहले ये गाना सुन लीजिए

अब काम की बात. इस गाने के विजुअल्स पर मत जाइए. बस लिरिक्स पर ध्यान दीजिए. जैसे मैं दे रहा हूं. हिमाचल में सरकारी कर्मचारियों से किसी भी मुद्दे पर बात करते हुए इसी गाने की ये लाइन दिमाग में आने लगती है. सरकारी कर्मचारियों के लिए सरकार के खिलाफ एक शब्द भी बोलना सबसे बड़ा पाप है. अगर आपने अपने सवालों के फेर में फंसा भी लिया और कोई एक शब्द गलती से निकल भी गया तो तुरंत बोल उठेंगे- मेरा नाम मत लेना, मैं सरकारी मुलाजिम हूं.

Himachal school
अपनी बात कहने के लिए बच्चे तो कैमरे के सामने आ जाते हैं, लेकिन उनके टीचर नहीं आते.

सड़क के किनारे पीडब्ल्यूडी का मजदूर हो या फिर किसी सरकारी स्कूल में टीचर. इस पहाड़ी प्रदेश में हर सरकारी मुलाजिम की जुबान खुलवाना मुश्किल है. इसके पीछे कारण भी हैं. कारण ये कि यहां छोटी सी छोटी बात पर भी ट्रांसफर हो जाता है. ट्रांसफर को सजा का एक हथियार माना जाता है. सिरमौर के एक सरकारी स्कूल में कांगड़ा से टीचर को ट्रांसफर कर भेजा गया है. अब सरकार को ही पता होगा कि वो टीचर बच्चों पर कितना फोकस कर पा रहा होगा. नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया,

“हिमाचल सरकार में ट्रांसफर दंडित करने का एक हथियार बन गया है. कोई सरकारी कर्मचारी लीक से हटकर करने की कोशिश करता है या इस सुस्त सिस्टम में थोड़ी जान लाने की कोशिश करता है तो विरोधी गुट अपने राजनैतिक संबधों से उस कर्मचारी को ठिकाने लगाने में लग जाते हैं. हाल ये है कि हर फाइल मुख्यमंत्री की टेबल से गुजरती है. चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो. फिर अपना ट्रांसफर रुकवाने या किसी दूसरी जगह पर करवाने के लिए भी मंत्रियों के चक्कर काटने पड़ते हैं.”

ये हालात तब हैं, जब हिमाचल में करीब 33 फीसदी लोगों को एजुकेशन सेक्टर में सरकारी रोजगार मिला हुआ है.

Hospital
अस्पताल का कोई भी कर्मचारी कैमरे के सामने बोलने को तैयार नहीं होता है.

बात सिर्फ टीचर्स की नहीं है. सोलन की अर्की सीट वीरभद्र के यहां से चुनाव लड़ने के चलते फेमस हो गई है. यहां के सिविल हॉस्पिटल में काम करने वाले एक कर्मचारी से अस्पताल के बारे में सामान्य जानकारी लेने की कोशिश की. उन्होंने जानकारी दी भी. मगर जैसे ही उन्हें पता चला कि हम किसी मीडिया समूह से आए हैं और चुनावों के सिलसिले में हिमाचल घूम रहे हैं तो तुरंत आकर कहा,

“मेरी न्यूज न लगाना, मैं सरकारी मुलाजिम हूं.”

शिमला रूरल में घूमते हुए जब-जब किसी सरकारी मुलाजिम के सामने हमारा माइक गया, जवाब यही मिला कि मैं तो सरकारी आदमी हूं. यहां मुद्दा ये नहीं कि अपनी बात नहीं रखना चाहते हैं. यहां मुद्दा ये भी है कि सरकारी कर्मचारियों के भीतर कितनी इनसिक्युरिटी है. वो चाहकर भी अपनी बात कहने और किसी पटल पर रखने के इंसानी नेचर से समझौता कर रहे हैं.

Himachal CM
अभी के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह हो, उनसे पहले रहे प्रेम कुमार धूमल हों या फिर शांता कुमार, सरकारी कर्मचारी जुबान नहीं खोलता है.

दूसरा पहलू ये भी है कि हिमाचल में शुरू से हर पार्टी ने सरकारी कर्मचारियों को सर-आखों पर बिठा कर रखा है. शांता कुमार को छोड़ हर मुख्यमंत्री ने अपना राजनैतिक करियर सरकारी कर्मचारियों को अपने पक्ष में रख कर ही काम किया है. साल 1990 में जब शांता दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे तो सरकारी मुलाजिमों को इतना नाराज किया था कि उसके बाद बीजेपी शांता को आगे ही नहीं लाई. शांता के नो वर्क, नो पे कानून पर बीजेपी 1993 का चुनाव हार गई थी. वहीं वीरभद्र ने शांता के उलट कर्मचारियों को खूब रियारतें दीं. इसी का असर है कि आज हिमाचल में आज सरकारी कर्मचारियों का किसी मुद्दे पर ओपिनियन पार्टी कार्यकर्ताओं से कम नहीं लगता. सरकारी कर्मचारियों में अपनी अपनी पार्टियों के प्रति निष्ठा है, लेकिन विपक्षी पार्टी के खिलाफ भी कोई स्वर नहीं.

Himachal man
सबसे ज्यादा सरकारी मुलाजिम होने की वजह से ठीक-ठीक अंदाजा लगाना मुश्किल होता है.

किसी पत्रकार या सर्वे करने वाले के लिए हिमाचल में ये स्थिति और भी विकट इसलिए भी हो जाती है क्योंकि यहां सरकारी मुलाजिम सबसे ज्यादा हैं. ये किसी भी मुद्दे पर अपनी बात तटस्थता से रखने की आजादी खो चुके हैं. दूसरा, पहले से ही हिमाचल में आम इंसान अपनी जिंदगी से जुड़े मुद्दों पर मुखर नहीं है. हालांकि जनता अवेयर है, मगर आक्रामक नहीं. कोई काम हो रहा है तो ठीक, नहीं हो रहा है तो कोई बात नहीं, हो जाएगा कभी- वाला एडिट्यूट है. संतुष्ट होना अच्छी बात है. मगर नेताओं की मनमर्जी को सरकारी तंत्र का हिस्सा मानकर जिंदगी भर ढोना किसी समझदार नागरिक की निशानी बिल्कुल नहीं है.


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