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कांग्रेस विधायक ने बगल की सीट के कांग्रेसी कैंडिडेट को कोसा

हिमाचल प्रदेश की बिलासपुर सदर सीट से 'दी लल्लनटॉप' की ग्राउंड रिपोर्ट, जहां कांग्रेस के बंबर ठाकुर और बीजेपी के सुभाष ठाकुर के बीच मुकाबला है.

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बिलासपुर सदर सीट.
कुल चार कैंडिडेट मैदान में.
कांग्रेस से सिटिंग एमएलए बंबर ठाकुर.
भाजपा से पूर्व जिलाध्यक्ष सुभाष ठाकुर.
लोकहित पार्टी से अमर सिंह और निर्दलीय बसंत राम संधू.

रात के 11.55 बज गए हैं. हमारा इंतजार पूरा हुआ. कांग्रेस कैंडिडेट और सदर से सिटिंग विधायक बंबर ठाकुर से मिलने का. सदर के दूर दराज के इलाकों से वह लौटे हैं. 2012 के परिसीमन के बाद उनका इलाका फैल गया है. पहाड़ों में दूर दराज में गांव होते हैं, पोलिंग छोटी होती है, मगर जाना भी जरूरी है. खैर, वह आए और बातचीत शुरू हुई. लल्लनटॉप के लिए वीडियो इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कुछ ऐसा बोला, जो पहले कभी नहीं सुना था.

उन्होंने जिले की ही नयनादेवी सीट से कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे रामलाल ठाकुर की जमकर धज्जियां उड़ाईं. वह बोले-

“रामलाल ठाकुर ने मेरा हमेशा विरोध किया. इस चुनाव में भी कोई सहयोग नहीं कर रहे.”

अमूमन पार्टी की गुटबाजी को कैमरे के सामने कोई यूं नहीं कबूलता. इसलिए मैंने उनके कहे को दोहराया. वह इस पर हामी भरकर आगे भी ठाकुर की आलोचना करते रहे. बोले-

“पहले भी उन्होंने ही मेरा टिकट नहीं होने दिया था. फिर भी मैं सफल रहा.”

बंबर ठाकुर फिर से सफल होना चाहते हैं. मगर उनकी राह में एम्स है. चौंकिए मत. नया एम्स वैसे तो पूरे हिमाचल प्रदेश में चुनावी मुद्दा है. मगर बिलासपुर में सबसे ज्यादा. देश के स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा बिलासपुर के ही रहने वाले हैं. यहां की सदर सीट से तीन बार विधायक रहे. एक बार हारे भी. जब दूसरी मर्तबा जीते साल 1998 में, तो सूबे के सेहत मंत्री बने प्रेम कुमार धूमल की सरकार में. इन्हीं धूमल के आंतरिक विरोध के चलते 2011 में केंद्र में संगठन की राजनीति में सक्रिय हुए. वहां अमित शाह के करीब आए और अब देश के सेहत मंत्री हैं. 3 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिलासपुर आए. एक स्टेडियम में एम्स का शिलान्यास किया और इसका पूरा क्रेडिट नड्डा को दिया.

Jan Sabha
बीजेपी के लिए प्रचार की कमान जेपी नड्डा की पत्नी ने संभाल रखी है. (फोटो: केतन बुकरैत/द लल्लनटॉप)

अब बारी नड्डा की है. बिलासपुर जिले की चारों सीटें जितवाने की. और सबसे ज्यादा जोर सदर सीट पर है क्योंकि वह खुद यहां से प्रतिनिधि रहे. इस सीट पर बीजेपी ने नए चेहरे को मौका दिया है. उनका नाम है सुभाष ठाकुर. वह नड्डा के खासमखास माने जाते हैं. कस्बे में ठाकुर के प्रचार की कमान संभाल रखी है जगत प्रकाश नड्डा की पत्नी डॉ. मल्लिका नड्डा ने. वह खुद भी एक राजनीतिक परिवार से आती हैं. शहर में स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिए सक्रिय हैं. जगह जगह नुक्कड़ सभा कर वोट मांग रही हैं. इस दौरान उनके बगलगीर होते हैं एक शायराना तबीयत के मगर मौके बेमौके वीर रस के भाव में आ जाने वाले नरिंदर पंडित. नरिंदर पंडित काउंसलर हैं. पहले कांग्रेस में थे. बंबर ठाकुर के दोस्त थे. बंबर ठाकुर जब 2007 में नड्डा के खिलाफ निर्दलीय लड़े, तो पंडित उनके साथ थे. 2012 में भी. जब बंबर फाइनली जीते. बीजेपी के सुरेश चंदेल को हराकर. मगर उसके एक साल बाद दोनों में कट्टी हो गए. अब पंडित बीजेपी में आ गए हैं और बंबर के खिलाफ खूब आग उगलते हैं.

शहर के गुरुद्वारा चौक पर एक सभा में हमारी दोनों से मुलाकात हुई. मल्लिका नड्डा सभा में बोलते हुए इशारों में जगत प्रकाश की दावेदारी जता रही थीं. मुख्यमंत्री के पद पर. उन्होंने कहा कि बिलासपुर की चारों सीटें जिताइए और नड्डाजी को दिल्ली से शिमला बुलाइए. इस पर भीड़ ने खूब तालियां पीटीं. भीड़, जिसके पास कार्यकर्ताओं ने दो ही पर्चे बांटे थे. पहला जिसमें जेपी नड्डा ने बतौर स्वास्थ्य मंत्री राज्य को जो सहूलियतें दीं, उनका जिक्र था. दूसरा, एक कैलेंडर था, जिसमें नरेंद्र मोदी और जेपी नड्डा की तस्वीर थी.

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धूमल के पोस्टर गायब होने से नड्डा के समर्थक उत्साहित हैं.

एक तस्वीर गायब है ज्यादातर जगहों से. बीजेपी से दो बार मुख्यमंत्री रहे बगल के हमीरपुर जिले के प्रेमकुमार धूमल की. नड्डा की मुख्यमंत्री की दावेदारी धूमल से ही टकरा रही है. पिछले कई चुनावों में वह ही बीजेपी के इकलौते घोषित अघोषित मुख्यमंत्री फेस रहे. इस बार ऐसा नहीं है. और इसी में नड्डा समर्थकों को अपनी संभावनाएं नजर आ रही हैं. नड्डा खुद शिमला को केंद्र बनाकर पूरे प्रदेश में दौरा कर रहे हैं. वहीं उनके गृह जनपद में पत्नी ने कमान संभाल रखी है. वह एम्स की सौगात का जिक्र करती हैं. इसके अलावा एक हाइड्रो इंजीनियरिंग कॉलेज का भी. यह भी केंद्र सरकार ने दिया है. एम्स की अगर बात करें, तो यह शहर के दसेक किलोमीटर दूर कोठीपुरा गांव में बनेगा. अभी सिर्फ बोर्ड लगा है, काम शुरू नहीं हुआ. लेकिन प्रचार का काम भरपूर जारी है. शहर के कई नागरिकों ने ये माना कि अब बिलासपुर में तरक्की होगी. एम्स बन जाएगा तो कई कारोबार फलेंगे. लाहुल स्पीती, कुल्लू, कांगड़ा और मंडी के लोग जो वाया बिलासपुर चंडीगढ़ जाते थे इलाज के लिए. अब यहीं रुक जाएंगे.

सभा में एक लोग और रुके थे अपनी बात कहने को. नरिंदर पंडित. उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत हाज़रीन कहकर की. हम चौंके. ये अंदाज तो हमने मशहूर पाकिस्तानी कव्वाल अजीज़ मियां में देखा था. पूछा तो पंडित बोले, उर्दू तहज़ीब की ज़ुबान है. फिर कुछ ही देर में उन्होंने तहज़ीब और मिठास को किनारे रखा और लगे विधायक बंबर ठाकुर की ऐसी तैसी करने में. पंडित ने कहा कि बंबर ठाकुर नशे का कारोबार करवाता है. मैंने उसे अपने पैसों से चुनाव लड़वाया और जितवाया. मगर जब उसने कुमार्ग पर चलना शुरू किया तो साथ छोड़ दिया.

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चुनाव में दोनों ही निर्दलीय प्रत्याशियों की चर्चा बेहद कम हो रही है. (फोटो: केतन बुकरैत/द लल्लनटॉप)

इन इल्जामों पर बंबर ठाकुर पलटवार करते हैं. बोलते हैं कि नरिंदर पंडित खुद नकली दवाइयां बेचता है. वह बहुत छोटा आदमी है, बर्तन मांजता था. उसके जैसे कई लोगों से मैं मिलता हूं. अब सब कहने लगे कि उन्होंने मुझे बनाया तो मैं क्या करूं. स्थानीय अखबारों में पंडित के भाजपा में जाने के चर्चे हैं. मगर बंबर कहते हैं कि उनसे आज तक मेरे चुनाव में कोई मदद नहीं की तो नुकसान क्या करेगा.

ये घात प्रतिघात देख सुन और पढ़ लगता है कि जैसे बिलासपुर में लोकल लेवल पर भयानक वर्चस्व की लड़ाई चल रही है और इसके लिए तरकश के सब तीर इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं. और इन सबमें एक बड़ा मुद्दा जो दशकों से घिसट रहा था, पीछे छूट रहा है. इस मुद्दे को समझने के लिए हमें बिलासपुर की बसाहट को समझना होगा.

बिलासपुर एक पुरानी रियासत थी. 1954 में इसे हिमाचल प्रदेश में मिला दिया गया. फिर बना भाखड़ा नांगल बांध. उसके लिए बिलासपुर शहर के इलाके में गोविंद सागर बांध झील बनना तय हुआ, जहां अतिरिक्त पानी स्टोर किया जाए. इसके लिए पूरा शहर विस्थापित हो गया. नया शहर बसा. झील और बंदलाधार की पहाड़ियों के बीच. यहां शहरी विस्थापितों को मकान और दुकान दी गई. मगर उनका परिवार बढ़ा और अब प्रशासन का रोना है कि वह आगे आगे अतिक्रमण कर सरकारी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं. उधर ज्यादातर गांव जो प्रभावित हुए थे, उनका अब भी बुरा हाल है. क्यों? क्योंकि ये गांव झील के उस पार हैं. उस पार से इस पार जिला मुख्यालय आने के लिए एक पुल है, जो शहर से 12-14 किलीमीटर दूर है. पहाड़ के रास्तों के पैमाने पर देखें तो गांव की तरफ से ये दूरी दुष्कर हो जाती है.

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एम्स का शिलान्यास तो हो गया है, लेकिन अभी तक सिर्फ एक साइन बोर्ड ही लगा है.

पहले क्या व्यवस्था थी पार जाने की. रियासत के समय जब झील नहीं सिर्फ नदी थी, तब एक लकड़ी का सस्पेंशन वाला पुल होता था. अब लकड़ी की नाव हैं, जो सवारियां ढोती हैं. मगर चार छह महीने इनका भी बुरा हाल होता है. झील में पानी घटता है, दलदल सा बन जाता है. कई बार इसके चलते दुर्घटनाएं भी होती हैं. अब ऐसे में शहर क्या चाहता है. झील पर एक पुल. कई दशकों से. और कई दशकों से उसे आश्वासन मिलते हैं. मेले में मुख्यमंत्री आते हैं. कोई भरोसा दिलाता है, कोई पत्थर से पर्दा हटाता है. मगर पुल नहीं बन पाता. अब पुल बन रहा है. राज्य सरकार नहीं बना रही. केंद्र सरकार सड़क को फोरलेन कर रही है और वही पुल बना रही है. मगर ये पुल भी शहर के दूसरे छोर पर है. मुख्य शहर से 10 किलोमीटर दूर. हालांकि एम्स को ध्यान में रखें तो ये पास होगा.

Subhash Thakur
बीजेपी प्रत्याशी सुभाष ठाकुर का पूरा ध्यान गांवों में प्रचार करने पर है. (फोटो: केतन बुकरैत/द लल्लनटॉप)

अब चुनाव में कौन पास फेल होगा. पब्लिक तय करेगी. शहर में सन्नाटा सा है. बीच बीच में एक आध प्रचार गाड़ी माइक पर हल्ला मचाती निकल जाती है. बंबर ठाकुर का गांव में जोर है तो बीजेपी के सुभाष ठाकुर का शहरों में. और इसीलिए सुभाष ठाकुर गांव गांव ज्यादा घूम रहे हैं, कमजोर ठिए मजबूत करने को. दो निर्दलीय भी हैं, मगर उनकी कोई ज्यादा बात नहीं करता एक अपवाद के. संधू नाम के जो निर्दलीय हैं, उनके बारे में बंबर ठाकुर समर्थकों ने एक बात कही कि उन्हें रामलाल ठाकुर ने पैसे देकर खड़ा करवाया है. बंबर को कमजोर करने के लिए.

ये सियासत है. बिलासपुर की. जिसे अपना नाम महाभारत के रचयिता वेदव्यास से मिला. यहां की महाभारत भी कुछ ऐसी ही है. यहां अपनों के घात का ज्यादा डर है.

पुनश्च

जैसा कि हर चुनाव की रवायत होती है. यहां भी दोनों ही पार्टियों को भीतरघात का सामना करना पड़ रहा है. यहां से कांग्रेस के विधायक रहे तिलकराज शर्मा ने भी टिकट कटने से नाराज होकर अपना नामांकन दाखिल कर दिया था. वहीं बीजेपी से पिछली बार चुनाव लड़े सुरेश चंदेल भी टिकट कटने से नाराज थे. मान-मनौवल हुई तो कांग्रेसी तिलकराज शर्मा ने नामांकन वापस ले लिया. बीजेपी के सुरेश चंदेल भी मंच पर सुभाष ठाकुर के साथ प्रकट तौर पर दिखने लगे हैं.

Video में देखें हिमाचल प्रदेश से जुड़ी ग्राउंड रिपोर्टः

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