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हिमाचल में जो हो रहा है, मैं नहीं मानता कि इसे चुनाव कहते हैं

हिमाचल प्रदेश. पहली बार जब आया था, तो एक तम्बू लगाया था. कसम खाई थी कि किसी होटल में नहीं रुकूंगा. एक पेटी बियर खरीदी थी. एक साफ़ जल की धारा दिखी. आसपास न आदमी दिखा, न आदमी की परछाईं. वहीं तम्बू गाड़ दिया. साथ में 3 दोस्त थे. 3 में से एक दोस्त डेनमार्क का था. पहली बार इंडिया आया था. बियर की तीन-तीन बोतलें धारा में डाल देते. गजब ठंडा पानी था. पीने का मन करता था, तो उसमें से एक बोतल निकाल लेता था. एक और जाकर पानी में रख देता था. शाम तक लकड़ियां काटकर लाते. धुंधलके तक आग जला लेते. बर्तन वगैरह थे. मैगी-खिचड़ी-उबले अंडे वगैरह-वगैरह चलता था. 50-60 घंटे बढ़िया से कटे. मज़ेदार एक्सपीरियंस. तीन लोगों के सिवा किसी का मुंह नहीं देखा. कोई फ़ोन नहीं. कोई फेसबुक नहीं. न घर की बकैती न दुनिया की. (ये जो अभी बताया है, दो वजहों से बताया है. अव्वल तो ये कि इससे थोड़ा माहौल बन जाएगा. दूसरा, ये आगे काम आएगा.)

उस ट्रिप पर खींची तस्वीर

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27 अक्टूबर. फ़िल्म सिटी से गाड़ी चली. फिर हिमाचल. इस बीच कई बार हिमाचल जाना हुआ. लगभग पूरा घूमा हुआ. ऐसा मुझे आभास था. रात पौने दो बजे आंख खुली, तो बिलासपुर में थे. एक होटल में रुके, जो मनाली जाते वक़्त रास्ते में दिखता ही दिखता था. बड़े अच्छे से याद है. खैर, सुबह हुई और निकल पड़े. मुझे जगहों के नाम नहीं याद रहते, इसलिए सरपंच से गाली खाते हुए उनसे पूछ रहा हूं कि हम कहां-कहां गए थे.

खैर, हिमाचल प्रदेश में लग ही नहीं रहा है कि चुनाव नंगीचे हैं. मैंने वो हाल भी देखा है जब चुनाव से लगभग डेढ़ महीने पहले मुझे हमारे गांव वाले घर के सबसे बड़े कमरे में, जो कि सबसे अंदर भी था, जाना मना कर दिया जाता था. घर में रैंडमली कोई भी आ जाता था. बाबा जी उससे डील करते थे. कभी-कभी पापा और चाचा भी मौजूद रहते थे. फिर उस कमरे में बहुतायत में मौजूद तरल पदार्थ का कुछ शीशीबंद हिस्सा उनके हवाले कर दिया जाता था. वो चले जाते थे.

हिमाचल की एक रैली में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को सुनने आए लोग
हिमाचल की एक रैली में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को सुनने आए लोग

जैसे-जैसे इलेक्शन नज़दीक आते थे, इस कार्यक्रम में तेज़ी आती जाती थी. बाबा राजनीति में काफी सक्रिय रहे. धीरे- धीरे उनकी राजनीति एक्सपायर हो गई. कुछ वक़्त बाद बाबा जी स्वयं एक्सपायर हो गए. अंत में जब उन्हें कुछ समझ आई, तो उन्हें अहसास हुआ कि घर की राजनीति में वो सबसे बड़े फ़ेलियर थे. खैर, हिमाचल प्रदेश में चुनाव नहीं हो रहे हैं. यहां बस चुनाव होने की बात हो रही है. इसलिए क्योंकि पांच साल पूरे होने को आ रहे हैं. मजबूरी है. ठीक वैसे ही, जैसे देश को एक राष्ट्रपति चाहिए ही चाहिए होता है.


ये कैसा चुनाव है? न एक भी मर्डर, न कहीं मारपीट, न कहीं आंदोलन, न कहीं धरना. यहां तक कि हिमाचल में व्हाट्सैप फॉरवर्ड भी वही चल रहे हैं, जो बाकी देश में चल रहे हैं. मतलब, देश की व्हाट्सैप यूनिवर्सिटी में इस बात का लोड नहीं लिया जा रहा है कि हिमाचल में चुनाव हैं और उसके लिए कुछ अलग काम किया जाए. यहां कोई हिन्दू-मुस्लिम का टंटा नहीं है. यहां कोई ब्राह्मण-दलित का चक्कर नहीं है. वो शायद इसलिए न हो, क्योंकि यहां पानी में ज़हर घोलने को कुएं नहीं मिलते. यहां वैसी खबरें नहीं आतीं, जिसमें बताया जाता है कि फ़लाने दलित को इसलिए पीट दिया गया, क्योंकि वो घोड़ी पर चढ़कर बारात ले जा रहा था.


 

हमीरपुर में चमियाणा नाम का एक गांव है. वहां लोगों की सबसे बड़ी समस्या मस्जिद से आती नमाज़ की आवाज़ नहीं है. डीजे पर बजते कांवड़ के गाने नहीं हैं. बिजली, पानी, रोजगार नहीं है. वहां समस्या है बंदरों की. उनसे पूछा गया कि अगले होने वाले मुख्यमंत्री से आप एक चीज़ मांगना चाहेंगे, तो क्या मांगेगे. इस पर वो कहते हैं कि उन्हें बंदरों से छुटकारा चाहिए. नेवी में अपनी सेवाएं दे चुका एक रिटायर्ड शख्स, लगभग पोपले गालों मगर सधी हुई सफ़ेद रैंडम कैप के साथ कहता है कि उसे बंदरों को गोली मार देने का हक़ चाहिए.

उनकी फसलें बंदरों ने तबाह कर रखी हैं. उनके छोटे, दुधमुंहे बच्चे बाहर खेलने से वंचित हैं. वो बाहर बैठकर खाना नहीं खा सकते. इस बात को एक बार फिर से अपने मन में रिपीट कीजिए. आपसे पूछा जाता है कि सूबे के अगले सर्वेसर्वा से आप कुछ भी मांग सकते हैं और आप कहते हैं कि हमें बंदरों से निजात दिलाओ. आप यूपी के होते, तो चाहते कि लड़कियां सुरक्षित हों, आपके प्लॉट पर कोई कब्ज़ा न कर ले, आपसे पुलिस वाले पासपोर्ट वेरिफ़िकेशन के नाम पर 500 की पत्ती न ले जाएं, आप अपनी पत्नी, बहन या अपनी किसी दोस्त के साथ हजरतगंज में टहल रहे हों और ऐंटी-रोमियो दस्ता आकर आपको रोमियो न डिक्लेयर कर दें. आप होंगे रोमियो, अपनी जूलियट के लिए. लेकिन विन डीज़ल की फर्स्ट कॉपी के लिए आप छिछोरे होंगे और आपको इसी के साथ बाकी ज़िन्दगी जीनी होगी. खैर, हिमाचल में चुनाव नहीं हैं. बस बातें हैं.

navy man
टोपी कसे, सीधी बात कहने वाला पूर्व नेवी-मैन जिसे अपने गांव में बने शहीद स्मारक द्वार पर गर्व है. 65 और 71 की लड़ाई लड़ी.

आदमी तसल्ली में रहता है. तसल्ली से नहीं, तसल्ली में. एकदम उतरकर. उससे पूछिए कि उसे चाय चाहिए और उसके हां बोलने पर कह दीजिए कि चाय तो नहीं है. वो नाराज़ नहीं होगा. वो हंस देगा. एक लड़का मिला. नोआ गांव में. वहां की गौशाला के ठीक सामने. उससे पूछा कि यहां से पास का गांव कहां है, तो उसने बाइक खड़ी की और हमारे पास आने लगा. हमने कहा कि बाइक लेकर चले आओ तो बोला, “अभी सीख रहा हूं सर. उतना अच्छा चला नहीं पाता हूं.” हम ही उसके पास चले गए.

उसने बताया कि गांव पास ही में है और सीट से उतर गया. गाड़ी सौरभ द्विवेदी के हवाले कर दी और मुझसे कहा कि मैं पीछे बैठ जाऊं. कहता है, “आप सीधे चलते जाओ. मैं पैदल आता हूं.” इस बार हिमाचल में अब तक जो मिले हैं, सब ऐसे ही मिले हैं. हिमाचल में एंट्री मारते वक़्त स्टेट एंट्री टोल लेने वाले लोगों के साथ कुछ बातचीत की, तो उन्होंने साथ ही हमारे लिए चाय चढ़वा दी. हमें देर हो रही थी इसलिए हमें बिना उस चाय को गले से नीचे उतारे आगे बढ़ना पड़ा.

बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश (इसे इसी क्रम में इसलिए लिखा है, क्योंकि दिल्ली में बिहारी को गाली के तौर पर कहा जाता है. इसीलिए दिल्ली को यूपी और बिहार के बीच में रखा है) में मैं वो समय या वो दिन नहीं सोच सकता हूं, जिसमें एक लड़का किसी अजनबी को अपनी मोटर साइकिल थमा दे और खुद पैदल आने की बात कहे. खैर, हिमाचल में जो भी हो रहा है, वो चुनाव नहीं, बस चुनाव की बातें हैं.

saurabh dwivedi with bike group
सौरभ के बगल में उनका कुर्ता भाई और पान सिंह तोमर वाली ड्रेस में वो बाइक वाला जो बस चलाना सीख रहा था. बाकी उसके दोस्त.

यहां न कोई पोस्टर है, न कोई झंडा है. न सड़क को पाटी हुई झंडे वाली झंडियां हैं. मेरे चाचा की ससुराल में एक बाग़ है. उस बाग़ के बारे में बताया जाता है कि वहां की ज़मीन ने बाग़ के घने होने की वजह से अपने पिछले 50-60 सालों में धूप नहीं देखी. यूपी में चुनाव के वक़्त सड़कें झंडियों की वजह से धूप को तरस जाती हैं. यहां झंडी-वंडी के नाम पर झुके हुए झंडे मिलते हैं. मानो चुनाव की असामयिक मृत्यु के बाद लोकतंत्र मातम मना रहा हो और राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई हो.

एक बस दिखी. भाजपा का ‘स्टार’ चेहरा और मज़ाक में कार्यभारी प्रधानमंत्री के नाम से मशहूर अनुपम खेर की पत्नी किरन खेर दिखीं. बस पर चस्पा. रस्क खाने को उकसा रही थीं. ब्रांड काफी छिछला था. बस मज़ेदार बात ये थी कि ठीक उसी दिन ट्विटर पर राहुल गांधी ने अपने कुत्ते की तस्वीर डाली और कहा कि मैं इसे बिस्किट खिलाता हूं. खैर, हिमाचल में जो कुछ चल रहा है उसे चुनाव कहना बेइमानी कहा जाएगा. यहां बस बातें हो रही हैं.

kiran kher
वो बस, जिस पर किरण के प्रचार वाला पोस्टर लगा था

बात फिर से चमियाणा की. एक महिला आ रही थी. अपने सिर पर घास-फूस का एक ढेर लादे हुए. कुछ काम होगा उन्हें इसका. अपने को मालूम नहीं था. आस-पास खड़े लोगों ने कहा इनसे बात कर लो. वजह पूछी, तो मालूम चला कि वो उस गांव की प्रधान हैं. और यहां मेरे कान में एक तेज़, चुभने वाली सीटी बजने लगी. ‘ब्लैक फ्राइडे’ फ़िल्म में जब स्टॉक एक्सचेंज के बाहर बम फटता दिखाया जाता है, तो कुछ देर के लिए सब शांत हो जाता है और सिर्फ एक तेज़ सीटी बजती रहती है. मैं उस सीटी को अपने गर्म हो चुके कानों में सुन रहा था. ऐसा मेरे लिए पहला एक्सपीरियंस था.

एक पचास के एटे-पेटे की महिला अपने सर पर बोझा रखकर अप-हिल ला रही थी, जिसे अभी 3 किलोमीटर और जाना था और वो अपनी पंचायत की प्रधान थी. हमारे यहां प्रधान उस लखनऊ के नवाब की तरह होते हैं, जिनकी शख्सियत तो नहीं बचती लेकिन किस्सा बचता है, क्योंकि उधर दुश्मनों ने हमला बोल दिया था और इधर ये हज़रात इसलिए नहीं डुल रहे थे, क्योंकि इनकी चप्पलें इनके पास नहीं थीं. वो इसी पर राज़ी हो गईं कि उनके सिर पर वो बोझा रखे-रखे ही उनका इंटरव्यू कर लिया जाए. हमने समझाया कि उनका चेहरा दिखना थोड़ा मुश्किल होगा. वो इसमें भी राज़ी हो गईं.

बोझा उतारते ही सबसे पहली बात- “बंदर मेरे सिर पर बैठ गए थे. (घास-फूस की ओर इशारा करते हुए) खाने लगे थे.” और फिर वही बात. ‘बंदरों से छुटकारा पाना है.’ खेती-बाड़ी नहीं हो पा रही है. मोदी जी जो कर रहे हैं, कहां कर रहे हैं, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. कहना न होगा कि वहां सभी भारी कांग्रेसी थे. एक भी भाजपाई नहीं दिखा. राजेन्द्र राणा की जेब में सभी वोट जाते दिखाई दे रहे थे. जनता सरकारी बस चाहती है, जिससे कि उन्हें टाइम पर बसें मिलें. वरना शाम ढलते ही अगर प्राइवेट बस न मिले, तो टैक्सियां 6 किलोमीटर के 550-600 रुपए लेती हैं. लेकिन मुद्दा ये है कि लोग ये बात बिना गुस्से के कहते हैं. कानपुर में एक मिठाई की दुकान के सामने लोग भिड़ गए थे. गाली-गलौज सुनाई दी थीं लल्लनटॉप के लाइव वीडियो में. यहां लोग ऐसे बातें कह रहे थे जैसे बस बातें कर रहे हों और चुनाव होने ही वाले न हों. बस चुनाव की बातें हों.

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ये जिनके सिर पर गट्ठर है, ये ग्राम-प्रधान हैं

वापस आते हैं उस एक पेटी बियर पर, जिसे पीकर मैंने ब्यास नदी बने पर लारजी हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रॉजेक्ट से कुछ सौ मीटर ऊपर लगे अपने तम्बू के 200 मीटर दायरे में मूत दी थी. हिमाचल बहुत आगे निकल गया है. धर्मशाला, मैक्लॉइडगंज, भाग्सू, कुल्लू, मनाली, ओल्ड मनाली वगैरह देखिए, तो लगता है कि हिमाचल बहुत ही आगे निकल गया है. लेकिन अपने साथ बाकी के हिस्से ले जाना भूल गया. वो हिस्से, जहां आप गाड़ी के शीशे दो मिनट के लिए खुला रखिए, तो न चाहते हुए भी तीन पाव धूल फांक लेंगे. वो हिस्से, जहां लगभग हर 18 साल पार कर चुका लड़का ड्राइवरी का काम कर रहा है और दसवीं में पढ़ने वाले उसके ‘जूनियर’ ड्राइवर बनने की इच्छा रखते हैं. वो हिस्सा, जहां लड़का हाथ में सफ़ेद कपड़े का इलास्टिक लगा बीस रुपए का बैंड पहनता है और उस पर कढ़े चे गुएरा को बोही मार्ले (बॉब मार्ले का हिमाचली रिप-ऑफ) बताता है. वो हिस्सा, जहां एम्स की घोषणा तो हो गई है, लेकिन एम्स के नाम पर एक बोर्ड और धूल भरी कच्ची सड़क मौजूद है. वो हिस्सा भी, जहां बंदरों ने उत्पात मचा रखा है. हिमाचल की धूल ने पत्तियों की सतह पर मौजूद पोरों को ढंक दिया है और अब पेड़ों ने प्रकाश संश्लेषण के बारे में सोचना छोड़ दिया है. वो सीमेंट और धूल और धुआं सोखते हैं. पेड़ों को इस नशे की लत लग गई है. बारिश या बर्फ़ इन्हें कुछ महीनों के लिए एक रीहैब में ले ज़रूर जाएंगी, लेकिन विकास नाम की इस शय के साथ इस नशे का होना उतना ही सच है, जितना मैगी के पैकेट में टेस्ट-मेकर मसाले का होना. एक सच ये भी है कि संविधानानुसार पांच साल पर चुनाव होने चाहिए. मगर हिमाचल में चुनाव नहीं हो रहे हैं. बस चुनाव की बातें जैसा कुछ हो रहा है.

कल ऊना जाना है. फिर कहीं और. फिर कहीं और.


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