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ये 3 नाम चलाएंगे अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार!

दुनिया के तमाम देश तालिबान पर अपना-अपना स्टैंड ले रहे हैं. तालिबान से रिश्ते रखने या ना रखने की बात कह रहे हैं. लेकिन भारत का तालिबान पर स्टैंड खोजने पर भी नहीं मिलेगा. तालिबान को लेकर हमारी सरकार का रुख क्या है, हमें नहीं पता. सरकार तालिबान का नाम भी नहीं लेना चाहती. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर अमेरिका के दौरे पर हैं. सुरक्षा परिषद की बैठक में हिस्सा लेने गए थे. बैठक के बाद पत्रकार वार्ता हुई. विदेश मंत्री से पूछा गया कि क्या भारत ने हाल फिलहाल में तालिबान से बात की है? विदेश मंत्री का जवाब था कि

“अभी हम बदलते हालात पर नज़र बनाए हुए हैं. तालिबान और उसके प्रतिनिधि काबुल पहुंच गए हैं, मुझे लगता है कि हमें वहां से शुरू करना चाहिए.”

विदेश मंत्री से पूछा गया कि अफगानिस्तान में इंवेस्टमेंट क्या आगे भी जारी रखेंगे. इस पर विदेश मंत्री ने कहा –

“अफगान लोगों के साथ हमारे ऐतिहासिक रिश्ते आगे भी जारी रहेंगे. अभी बाकी देशों की तरह ही हम भी अफगानिस्तान में बदलते हालातों पर नज़र बनाए हैं. अभी हमारा ध्यान भारतीयों वहां मौजूद भारतीयों की सुरक्षा पर है.”

तो इस तरह से सरकार गोलमोल जवाब दे रही है. पक्के तौर पर कुछ भी कहने से बच रही है. भारत शायद इस इंतजार में है कि तालिबान की सरकार का स्वरूप साफ हो तब कुछ स्टैंड लिया जाए. क्या तालिबान पुरानी राजनीतिक पार्टियों को सत्ता में भागीदार बनाएगा? क्या उन नेताओं को साथ लेगा, जिनके भारत के साथ अच्छे रिश्ते रहे हैं? तालिबान की हामिद करज़ई और अब्दुल्ला अब्दुल्ला जैसे कई नेताओं से बातचीत भी चल रही है. हालांकि तालिबान ये कह चुका है कि सरकार लोकतांत्रिक नहीं होगी. मतलब चुनाव नहीं होंगे. सीधे नियुक्तियां होंगी. तो तालिबान की हुकूमत में कुछ संभावित बड़े नामों की चर्चा कर लेते हैं.

#1 हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा

20 जुलाई 2017. अफगानिस्तान में हेलमंड प्रांत के गेरेशक इलाके में एक फिदायीन हमला हुआ. अफगानिस्तान के मिलिट्री बेस को निशाना बनाया गया था. कार में विस्फोटक लेकर फिदायीन हमलावर मिलिट्री बेस में घुस गया था. हमलावर की पहचान हुई 23 साल के अब्दुर रहमान उर्फ हाफिज़ खालिद के तौर पर हुई. ये फिदायीन, ताबिलान के मुखिया हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा का बेटा था. माना जाता है कि अखुंदज़ादा के कहने पर ही उसका बेटा फिदायीन हमलावर बना था. अखुंदज़ादा सुसाइड बॉम्बिंग का बड़ा समर्थक माना जाता है. इसके समर्थन में वो फतवा जारी करता था. जन्नत नसीब होगी वाली बात कहकर मदरसे के बच्चों को फिदायीन बनने के लिए उकसाया जाता था. इस तरह की कट्टर छवि अखुंदज़ादा की रही है.

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हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा. (फोटो- India Today)

अखुंदज़ादा भी उन मुजाहिदों में शामिल रहा है जो 80 के दशक में सोवियत के खिलाफ लड़े थे. हालांकि उसकी छवि एक सैन्य कमांडर के बजाय धार्मिक नेता की रही है. 1990 के दशक में वो शरीया कोर्ट्स का हेड था. वो फतवे जारी किया करता था. 1996 में सत्ता में आने के बाद तालिबान ने कई तरह के नियम लागू किए थे. जैसे महिलाओं को पब्लिक में पत्थर मारना, कौड़े मारना, या लड़कियों के स्कूल जाने या नौकरी करने पर पाबंदी लगाना. या किसी को पब्लिक में शरीयत कानून के हिसाब से फांसी देना, या हाथ पैर काट देना. इस तरह की सजा देने के पक्के समर्थकों में अखुंदज़ादा को गिना जाता है.

अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद अखुंदज़ादा भी पाकिस्तान में आकर छिप गया था. 2016 में मुल्ला मंसूर अख्तर के अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने के बाद अखुंदज़ादा को तालिबान का चीफ बनाया गया. तालिबान प्रमुख बनने के बाद अखुंदज़ादा ने अफगान सेना के खिलाफ हमलों को बढ़ावा दिया. अमेरिकी सेना के जाने के बाद तालिबान की पॉलिटिकल कमेटी इस बात के पक्ष में नहीं थी कि युद्ध के ज़रिए अफगानिस्तान पर कब्जा किया जाए. इस फैसले के पीछे अखुंदज़ादा का रोल माना जाता है. और अखुंदज़ादा की ये रणनीति कामयाब भी रही. अब तालिबान की सरकार में अखुंदज़ादा अफगानिस्तान का सुप्रीम लीडर बन सकता है. यानी सबसे बड़ा धार्मिक नेता. जिस तरह का सिस्टम ईरान में है. ईरान के लिए कहा जाता है कि राष्ट्रपति कोई बने, ताकत सुप्रीम लीडर के हाथ में होती है. इसी तरह की व्यवस्था अफगानिस्तान में हो सकती है. अखुंदज़ादा का सुप्रीम लीडर बनने का मतलब है- उस आदमी के हाथ में देश की कमान जो फिदायीन हमलों का समर्थक रहा है, महिलाओं को पब्लिक में कोड़े बरसाने का समर्थक रहा है, अपराधियों के अंग काटने का समर्थक रहा है. अब कैसे मान लें कि ये आदमी बदल गया होगा, शरीयत कानून के बारे में इसके पुराने ख्याल बदल गए होंगे. और तालिबान की सत्ता में अब पिछली बार जैसा अफगानिस्तान नहीं होगा.

#2 अब्दुल गनी बरादर उर्फ मुल्ला बरादर

कहा जाता है कि अगर तालिबान मुल्ला बरादर के हिसाब से चलता तो इतिहास कुछ अलग होता है. अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले की नौबत नहीं आती. मुल्ला बरादर वो आदमी है जिसने ओसामा बिन लादेन को अफगानिस्तान में शरण देने का विरोध किया था. तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर ने लादेन को 1996 में अफगानिस्तान में शरण दी थी. मुल्ला बरादर को ये फैसला ठीक नहीं लगा था. लादेन को शरण देने का अंजाम क्या हुआ, वो आपको पता ही है. मुल्ला बरादर के तालिबान की कोर लीडरशिप से अलग राय रखने के और उदाहरण भी मिलते हैं. लादेन के प्रभाव में तालिबान के नेता पश्चिम देशों के विरोध में हो गए थे, पश्चिम देशों के एनजीओ के अफगानिस्तान में काम करने का विरोध कर रहे थे. हालांकि मुल्ला बरादर का मानना था कि अफगानिस्तान को पश्चिमी देशों से मदद की दरकार है, अफगानिस्तान आइसोलेशन में नहीं रह सकता. तो इस तरह के कई फैसलों में जब तालिबान के बाकी नेताओं की संकीर्ण सोच थी, तो मुल्ला बरादर अफगानिस्तान के भविष्य को देखते हुए फैसले ले रहा था. तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर का बेहद करीब माना रहा है मुल्ला बरादर है. इसलिए तालिबान की शुरुआत से लेकर अब तक संगठन में भी अच्छा दबदबा रहा है.

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मुल्ला बरादर (बीच में). (फोटो- PTI)

मुल्ला बरादर ही तालिबान का पहला नेता था जिसे 2009 में ही लग गया था कि अब सरकार से बात करनी चाहिए. 2009 में जब हामिद करज़ई अफगानिस्तान के राष्ट्रपति थे तो मुल्ला बरादर ने बातचीत शुरू की थी. रिपोर्ट्स हैं कि तब मुल्ला बरादर भारत की एजेंसियों के भी संपर्क में था. हालांकि इसकी जानकारी पाकिस्तान को मिल गई और फिर 2010 में पाकिस्तान ने मुल्ला बरादर को गिरफ्तार कर लिया था. 8 साल तक पाकिस्तान की हिरासत में रहा. जब तालिबान ने अमेरिका से बातचीत शुरू की तो उनको लगा कि नेगोसिएशन के लिए मुल्ला बरादर बेहतर आदमी है. इसलिए अमेरिका और कतर ने पाकिस्तान पर दबाव बनाकर मुल्ला बरादर को रिहा करवाया. कतर की राजधानी दोहा में हुई बातचीत में भी मुल्ला बरादर अहम भूमिका में रहा है. और अब मुल्ला बरादर तालिबान की सरकार में राष्ट्रपति बन सकता है. और ये भारत के लिए राहत की बात हो सकती है. बरादर के राष्ट्रपति बनने से मुमकिन है कि पाकिस्तान की भी उधर ज्यादा ना चले.

#3 सिराजुद्दीन हक्कानी

ये हक्कानी नेटवर्क तंज़ीम के संस्थापक जलालुद्दीन हक्कानी का बेटा है. अभी हक्कानी नेटवर्क का चीफ है और तालिबान का डिप्टी चीफ. हक्कानी नेटवर्क आत्मघाती हमलों के लिए कुख्यात है. अफगानिस्तान में अमेरिका और भारत के खिलाफ कई हमलों को अंजाम दिया है. सिराजुद्दीन हक्कानी की चाबी पूरी तरह से आईएसआई के पास मानी जाती है. अमेरिका ने भी पूर्व में कई बार आरोप लगाया है कि हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान की मदद मिलती है. तो सिराजुद्दीन हक्कानी को तालिबान की सरकार में कोई भी बड़ा पद मिलना पाकिस्तान के फायदे की बात होगा, और भारत के लिए नुकसान की बात.

ये कुछ अहम नाम हैं जिनसे आगे भारत को भी डील करना पड़ सकता है. ज़्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार इस बार पिछली बार वाली गलती दोहराना नहीं चाहती है. कि हमें काम पड़े, और हमें मालूम ही न हो कि हमें अफगानिस्तान में बात किससे करनी है. इसीलिए सरकार ताबड़तोड़ बैकचैनल बातचीत में लगी है. विशेषज्ञ ये दावा भी करते हैं सरकार सिर्फ अफगानिस्तान में ही नहीं, पाकिस्तान से भी बात कर रही है. वैसे सरकार ने औपचारिक रूप से इन दोनों बिंदुओं को स्पष्ट नहीं किया है.


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