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चाचा शरद पवार ने ये बातें समझी होती तो शायद भतीजे अजित पवार धोखा नहीं देते

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महाराष्ट्र की सियासत में 23 नवंबर 2019 के दिन जो उठा पठक हुई, वो कोई नहीं भूल सकता. शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की तैयारी कर रही थी, लेकिन अगले दिन एनसीपी के नेता अजित पवार ने बीजेपी को समर्थन दे दिया और डिप्टी सीएम बन गए.

शपथ ग्रहण के तुरंत बाद मामला समझ में आ गया कि पार्टी में फूट हुई है. शरद पवार ने ट्वीट कर मामला साफ कर दिया. लेकिन इसके बावजूद भी जितने लोगों के मन में शक-शुबा थी, वो सुप्रिया सुले के हाव-भाव और वॉट्सऐप स्टेटस ने साफ कर दिया. मीडिया में खबरें आनी शुरू हो गईंं कि अजित पवार ने कुछ विधायकों के साथ अपना रास्ता अलग कर लिया है. और वो बीजेपी के साथ जाकर मिल गए हैं. अब उनके साथ कितने विधायक हैं, कितने नहीं, इस बात का फैसला तो वक्त करेगा. लेकिन आज ये जान लीजिए कि अजित पवार ने आखिर ऐसा किया क्यों.

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अजित पवार के शपथ लेने के तुरंत बाद शरद पवार ने कह दिया कि ये पार्टी का फैसला नहीं है.

मशहूर उर्दू के लेखक बशीर बद्र कह गए हैं- कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफ़ा नहीं होता. अजित पवार के साथ भी कुछ ऐसा ही था. जानकार बताते हैं कि चाचा-भतीजा के बीच का विवाद 2004 में ही शुरू हो चुका था.

#. 2004- महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एनसीपी को 71 और कांग्रेस को 69 सीटें मिली. तब शरद पवार ने सीएम पद लेने के बजाए कांग्रेस को दे दिया. जबकि अजित पवार सीएम का पद कांग्रेस को नहीं देना चाहते थे. शरद पवार ने उस कुर्बानी के बदले दो कैबिनट मंत्री और एक राज्यमंत्री का पद हासिल कर लिया.

#. अब बात 2008 की- इस वक्त डिप्टी सीएम आर आर पाटिल थे. उनके पद से हटने के बाद छगन भुजबल को उप मुख्यमंत्री बनाया गया. इस बात से अजित पवार बहुत खफा हुए थे. क्योंकि वो खुद डिप्टी सीएम बनना चाहते थे.

#. साल 2010 आया- अशोक चव्हाण ने आदर्श घोटाले के बाद सीएम की कुर्सी छोड़ दी. अजित पवार को लगा कि एनसीपी के विधायक ज्यादा हैं तो सीएम उन्हीं की पार्टी का बनेगा. लेकिन कांग्रेस के पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री बना दिए गए और अजित को उप मुख्यमंत्री की कुर्सी से ही संतुष्ट होना पड़ा.

#. अजित पवार और उनकी पार्टी एनसीपी 2014 में सत्ता से बाहर हो गई.

#. 2019- लोकसभा चुनाव में अजित पवार अपने बेटे पार्थ पवार को चुनाव मैदान में उतारना चाहते थे, लेकिन शरद पवार ऐसा नहीं चाहते थे. अजित पवार ने काफी ज़िद की तब जाकर पार्थ पवार को मावल सीट से टिकट दे दिया गया. हालांकि पार्थ  ये चुनाव हार गए.

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2019 लोकसभा चुनाव में अजित पवार की ज़िद की वजह से पार्थ पवार को टिकल मिला था लेकिन उनकी हार हुई .

#. वहीं दूसरी तरफ शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले भी चुनाव मैदान में थी. अजित पवार के मुताबिक शरद पवार ने सुप्रिया को जिताने में जीन जान लगा दी, जबकि पार्थ के लिए किसी ने ज्यादा काम नहीं किया.

#. विधानसभा चुनाव में भी अजित पवार अपने खेमे के कुछ लोगों को टिकट दिलवाना चाहते थे. लेकिन शरद पवार ने उनकी नहीं सुनी. अजित पवार के हिसाब से टिकट नहीं बांटे गए. इसके अलावा शरद पवार ने अपने दूसरे पोते रोहित पवार को टिकट दिया और उसकी जीत के लिए उन्होंने जी जान लगा दी. ये बात अजित पवार को खटक गई.

#. 2019 के विधानसभा चुनाव से पहले जब ईडी की एफआईआर में शरद पवार का नाम आया तो अजित पवार खुद ईडी के दफ्तर गए. इस बात को लेकर काफी हो हल्ला भी मचा.

#. शरद पवार से फोकस हटाने के लिए यहां तक कि उन्होंने विधायक पद से भी इस्तीफा दिया. लोगों ने कहा कि शरद पवार के लिए कुर्बानी दी है. वहीं दूसरी तरफ जब अजित पवार को नोटिस आया तो ना शरद पवार आगे आए और ना ही पार्टी की तरफ से उन्हें समर्थन मिला.

#. लोकसभा चुनावों के दौरान अजित पवार ने ईवीएम पर आरोप लगाने के बजाय ‘काम शुरू करें.’ ऐसा नारा दिया तो दूसरी तरफ शरद पवार ईवीएम में ही गड़बड़ी होने के आरोप पर कायम रहे. ये बाद अजित पवार को काफी खटकी थी.

#. आखिर में भी जब एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के साथ सरकार बनाने की तैयारी कर रही थी. तब शरद पवार ने उद्धव ठाकरे का ही नाम सीएम के लिए आगे किया. जबकि डिप्टी सीएम की लिस्ट में भी अजित पवार का नाम आगे नहीं आ रहा था. ये बातें अजित को तीर की तरह चुभ रही थी.

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राजनीति के मैदान में शरद और अजित पवार के बीच कई बार खटपट हुई.

बाकी राजनीति पंडित अजित पवार के बीजेपी की तरफ जाने के पीछे कुछ और वजहें भी गिना रहे हैं.

ईडी के मुकदमें- अजित पवार के खिलाफ ईडी के कई मुकदमें चल रहे हैं. उन्‍हें उम्‍मीद है कि बीजेपी के साथ जाने के बाद ये मुकदमे ठंडे बस्‍ते में चले जाएंगे या खत्‍म हो जाएंगे. इससे उन्‍हें राहत मिलेगी.

विरासत की जंग- अजित पवार को लगा कि बीजेपी के साथ सरकार बनाकर ही वह एनसीपी चीफ शरद पवार के उत्‍तराधिकारी बन सकते हैं. ऐसा अगर वो कर गए तो वर्चस्व की लड़ाई में वो सुप्रिया सुले से आगे निकल जाएंगे.

डिप्टी सीएम अजित नहीं कोई और होते- शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के बीच चल रही गठबंधन सरकार बनाने की बातचीत में शरद पवार ने अंति‍म समय तक अजित पवार को डिप्टी सीएम के लिए नहीं चुना था. इस बात से अजित परेशान चल रहे थे.

शिवसेना से तकलीफ– अजित पवार को शुरू से ही शिवसेना से दिक्कत रही थी, जबकि बीजेपी के साथ उनके अच्छे संबंध रहे हैं. इसीलिए उन्होंने चाचा शरद पवार का साथ छोड़ बीजेपी के साथ जाना बेहतर समझा.


Video: मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष रहे संजय निरूपम महाराष्ट्र कांग्रेस नेताओं पर क्या बोले?

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