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ममता बनर्जी ने राज्यपाल को जैन हवाला केस में भ्रष्ट बता क्या चाल चली?

बात पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री और राज्यपाल के झगड़े की करेंगे. सीएम ममता बनर्जी और राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने अपने झगड़े को नाक की लड़ाई बना लिया है. ममता सरकार इस बात पर अड़ी है कि किसी भी सूरत में राज्यपाल के पद पर अब जगदीप धनखड़ बर्दाश्त नहीं हैं. तो जगदीप धनखड़ भी हर रोज़ राज्य सरकार की कमियां गिनवाते हैं. इस झगड़े में किसकी कितनी गलती है वाली बात पीछे झूठ जाती है. पूछने वाली बात अब ये है कि मुख्यमंत्री और राज्यपाल में दो साल से चल रही इस लड़ाई का कोई अंत भी है या नहीं. हर तरफ ये सवाल पूछे जा रहे हैं कि बतौर राज्यपाल जगदीप धनखड़ चुनी हुई सरकार की जितनी स्क्रूटनी कर रहे हैं, उतनी करनी चाहिए या नहीं. राज्य के अलग अलग हिस्सों के दौरे पर जाकर जिस तरह से वो लोगों की परेशानी उठाने की बात करते हैं, क्या उन्हें ये सब करना चाहिए.

ममता बनर्जी ने केंद्र के साथ गतिरोध को अपनी आदत बना लिया है?

जुलाई 2019 में जगदीप धनखड़ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बनाए गए थे. तब से ही कलकत्ता में मुख्यमंत्री और राज्यपाल वाला झगड़ा चल रहा है. चुनाव के बाद ये झगड़ा एक नए स्तर पर पहुंच गया है. अब मुख्यमंत्री अपने राज्यपाल को भ्रष्ट बताने लगी हैं और तीन दशक पुराने जैन हवाला केस को छेड़ दिया है.

28 जून को ममता बनर्जी ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को ‘भ्रष्ट’ बताया. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनका नाम जैन हवाला कांड की चार्जशीट में था. ममता ने कहा कि जगदीप धनखड़ ने पहले कोर्ट को मैनेज किया, जिसके बाद फिर कोर्ट में केस हुआ, जिसका अब तक फैसला नहीं हुआ है. ममता ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा था कि आखिर धनखड़ को इस तरह से पद पर रहने की अनुमति क्यों है जबकि वो पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पद के हटाने के लिए तीन बार पत्र लिख चुकी हैं.

राज्‍यपाल जगदीप धनखड़ ने ममता बनर्जी के आरोपों को गलत बताया. उन्होंने कहा कि मुझे चार्जशीट नहीं किया गया था. ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है. धनखड़ ने कहा कि ममता को उस आरोप पत्र के बारे में बताना चाहिए, जिसमें मेरा नाम बताया जा रहा है. राज्यपाल ने आगे कहा कि ममता बनर्जी के आरोपों में रत्ती भर सच्चाई नहीं है. वह गलत सूचना फैला रही हैं. तथ्यों की गलत व्याख्या कर रही हैं.

तो ये जैन हवाला कांड असल में था क्या?

1990 के दशक का कथित तौर पर एक बड़ा राजनीतिक और वित्तीय घोटाला था. भारतीय राजनीति में सबसे पहले इसकी गूंज 1993 में सुनी गई. जनसत्ता में जून 1993 को एक स्टोरी छपी. लेकिन मामला दो साल पुराना था. 1991 में दिल्ली पुलिस ने JNU के एक छात्र शहाबुद्दीन गोरी को जामा मस्जिद इलाके से गिरफ्तार किया. कश्मीरी आतंकवादियों को आर्थिक मदद पहुंचाने के संदेह में. मामला सीबीआई को सौंप दिया गया. इसके बाद ये मामला परत दर परत खुलता चला गया. शहाबुद्दीन गोरी की निशानदेही पर सीबीआई ने साकेत में रहने वाले जैन बंधुओं के घर पर छापा मारा. इस छापे के दौरान सीबीआई को चार जैन बंधुओं में से एक सुरेंद्र कुमार जैन की डायरी मिली. इस डायरी में 115 बड़े अफसरों और नेताओं के नाम दर्ज थे, जिन्हें कथित तौर पर 64 करोड़ रुपए दिए गए थे. लालकृष्ण आडवाणी, मदनलाल खुराना, विद्याचरण शुक्ल, नारायणदत्त तिवारी, बलराम जाखड़ जैसे बड़े नाम भी इसमें शामिल थे. इस खुलासे से भारतीय लोकतंत्र में भूचाल आ गया था. हालांकि इस मामले में कानूनी कार्रवाई सिफर साबित हुई, और सीबीआई की भूमिका संदिग्ध साबित हुई.

ये मामला कब का इतिहास में दफ्न हो चुका था. लेकिन ममता बनर्जी ने फिर से इसकी याद दिला दी. अब ममता बनर्जी के बाद पत्रकार विनीत नारायण ने भी कहा है कि जगदीप धनखड़ का नाम जैन हवाला केस में था. जैन हवाला केस को उजागर करने में पत्रकार विनीत नारायण की बड़ी भूमिका थी. विनीत नारायण ने ही इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. ममता के बयान के बाद विनीत नारायण ने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि जैन के खातों में धनकड़ को 5 लाख 25 हज़ार रुपये का भुगतान किए जाने का ज़िक्र था. धनखड़ का नाम जैन बंधुओं की डायरी में पॉलिटिकल पेयी की कैटेगरी में था.

इस तरह के आरोपों के साथ ममता बनर्जी सरकार राज्यपाल पर नए सिरे से हमलावर है. इससे पहले ममता बनर्जी सरकार जगदीप धनखड़ को हटाने के लिए कई बार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख चुकी हैं. 2 जुलाई से पश्चिम बंगाल में विधानसभा का सत्र शुरू हो रहा है. इसमें टीएमसी राज्यपाल धनखड़ को हटाने का प्रस्ताव ला सकती है. पिछले दिनों खबर आई थी कि इस बारे में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष बिमान बनर्जी से बात की है. बिमान बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से भी बात की, कहा कि राज्यपाल विधानसभा के मामलों में दखल देते हैं. इस पर आज जगदीप धनखड़ ने विधानसभा स्पीकर को चिट्ठी लिखी. लिखा की इस तरह के आरोप दुर्भाग्यपूर्ण हैं.

अब सवाल है क्या राज्य की सरकार या विधानसभा राज्यपाल को हटा सकती है?

इसका जवाब है नहीं. राज्यपाल राज्य में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर होते हैं. राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं, इसलिए राज्यपाल को हटाने की शक्ति भी राष्ट्रपति के पास होती है. संविधान के अनुच्छेद 74 के मुताबिक राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं. इसलिए राज्यपाल को हटाना या नहीं हटाने का फैसला केंद्र की सरकार में निहित होता है. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का भी एक पुराना फैसला मिलता है. 2010 के बीपी सिंघल केस में सुप्रीम कोर्ट ने लैंडमार्क जजमेंट दिया था. केस ये था कि 2004 में यूपीए की सरकार ने पूर्व की एनडीए सरकार के दौर के कई राज्यपालों को हटा दिया था. ये मामला कोर्ट में गया था और फिर 2010 में इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को किसी भी वक्त, बिना कारण बताए हटाने की शक्ति राष्ट्रपति के ज़रिए केंद्र सरकार के पास है. लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल मनमाने या अतार्किक ढंग से नहीं होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केंद्र और राज्य में अलग अलग विचारधारों वाली सरकार है या केंद्र ने राज्यपाल में भरोसा खो दिया है तो ये तर्क राज्यपाल को हटाने का पर्याप्त कारण नहीं हो सकता.

ये फैसला तो इस बाबत था कि केंद्र सरकार किस स्थिति में राज्यपाल को हटा सकती है . बंगाल वाला मामला इसका उल्टा है. राज्य सरकार राज्यपाल को हटवाना चाहती है. इस बारे में एक हाईकोर्ट का फैसला मिलता है. 2020 में मद्रास हाईकोर्ट में राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित को हटाने की याचिका दायर की गई थी. तब हाईकोर्ट ने कहा था कि याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेदों और 2010 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया था.

राज्य की सरकार और राज्यपालों के संबंध कैसे होने चाहिए?

राज्यपाल को हटाने की क्या शर्तें होने चाहिए, इस बारे में कई आयोग भी बने हैं. 2010 में पंछी कमीशन ने सिफारिश की थी कि संविधान से वो हिस्सा हटाया जाना चाहिए जिसमें राज्यपाल के ‘राष्ट्रपति की इच्छा पर्यांत’ तक रहने का प्रावधान है. क्योंकि एक राज्यपाल को केंद्र की सरकार की इच्छा से नहीं हटाया जाना चाहिए. राज्यपाल को राज्य विधानसभा में प्रस्ताव से ही हटाया जाना चाहिए. हालांकि ये सिफारिश कभी भी कानून का हिस्सा नहीं बनी.

हमारे संविधान का पहला अनुच्छेद कहता है कि भारत यानी इंडिया राज्यों का संघ है. राज्य के संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होते हैं, और देश के संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति हैं. दोनों की ही शक्तियां सांकेतिक हैं. और एक परंपरा बनी हुई जिसमें चुनी हुई सरकार में अमूमन राज्यपाल दखल नहीं देते हैं. जब तक ऐसा है तब तक झगड़े की गुंजाइश नहीं होती है. लेकिन फिर पश्चिम बंगाल जैसे उदाहरण मिलते हैं. उदाहरण पेश करने के लिए ओडिशा जैसे राज्य भी हैं. जहां गैर-बीजेपी सरकार होने के बावजूद मुख्यमंत्री और राज्यपाल के गतिरोध वाली खबरें नहीं आती हैं. कई और भी राज्य हैं, जिनके उदाहरणों से ये समझ आता है कि अगर राज्य की सरकार मिलकर काम करना चाहे तो राज्यपाल वाले झगड़े नहीं पनपेंगे. पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार और वहां के राज्यपाल को भी बाकी राज्यों की तरह अब मिलकर काम करने वाला ईको सिस्टम बनाना चाहिए. क्योंकि इन झगड़ों में अगर कोई पिस रहा है, तो वो है राज्य की जनता. जिसका हक है कि उसके कल्याण के लिए राज्य और केंद्र मिलकर काम करें.


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