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'एजुकेशन सिस्टम वो कुतिया है जिसे...'

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श्रीलाल शुक्ल ने हिंदी की क्लासिक किताब ‘राग दरबारी’ लिखी है. जिसमें मज़ेदार ‘वनलाइनर्स’ की भरमार है. जिन्हें मंचों से सुना के जाने कितने शोहदे शायर हो गए. जाने कितने बकैत तुर्रम खान हो गए. चौचक भाषा, बमचक चित्रण.  47 साल पहले लिखी गई थी, आज भी प्रासंगिक है.

श्रीलाल शुक्ल यूपी में पीसीएस अफसर थे. बाद में प्रमोट होकर आईएएस हो गए. 25 किताबें लिखी हैं, जिनमें ‘राग दरबारी’ की पॉपुलैरिटी अकाट्य है. अंग्रेजी समेत करीब 15 भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ.

किताब नहीं पढ़ी हो तो दो छोटे अंश यहां ले आए हैं. हमारी रेकमेंडेशन है, पूरी किताब भी पढ़िएगा. राजकमल प्रकाशन ने छापी है.

1

शहर का किनारा. उसे छोड़ते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता था.

वहीं एक ट्रक खड़ा था. उसे देखते ही यकीन हो जाता था, इसका जन्म केवल सड़कों के साथ बलात्कार करने के लिए हुआ है. जैसे कि सत्य के होते हैं, इस ट्रक के भी कई पहलू थे. पुलिसवाले उसे एक ओर से देखकर कह सकते थे कि वह सड़क के बीच में खड़ा है, दूसरी ओर से देखकर ड्राइवर कह सकता था कि वह सड़क के किनारे पर है. चालू फैशन के हिसाब से ड्राइवर ने ट्रक का दाहिना दरवाज़ा खोलकर डैने की तरह फैला दिया था. इससे ट्रक की खूबसूरती बढ़ गई थी, साथ ही यह खतरा मिट गया था कि उसके वहाँ होते हुए कोई दूसरी सवारी भी सड़क के ऊपर से निकल सकती है.

सड़क के एक ओर पेट्रोल-स्टेशन था; दूसरी ओर छप्परों, लकड़ी और टीन के सडे़ टुकड़ों और स्थानीय क्षमता के अनुसार निकलने वाले कबाड़ की मदद से खड़ी की हुई दुकानें थीं. पहली निगाह में ही मालूम हो जाता था कि दुकानों की गिनती नहीं हो सकती. प्रायः सभी में जनता का एक मनपसन्द पेय मिलता था जिसे वहाँ गर्द, चीकट, चाय की कई बार इस्तेमाल की हुई पत्ती और खौलते पानी आदि के सहारे बनाया जाता था. उनमें मिठाइयाँ भी थीं जो दिन-रात आँधी-पानी और मक्खी-मच्छरों के हमलों का बहादुरी से मुुकाबला करती थीं. वे हमारे देसी कारीगरों के हस्तकौशल और उनकी वैज्ञानिक दक्षता का सबूत देती थीं. वे बताती थीं कि हमें एक अच्छा रेज़र-ब्लेड बनाने का नुस्खा भले ही न मालूम हो, पर कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरकीब सारी दुनिया में अकेले हमीं को आती है.

ट्रक के ड्राइवर और क्लीनर एक दुकान के सामने खड़े चाय पी रहे थे.

रंगनाथ ने दूर से इस ट्रक को देखा और देखते ही उसके पैर तेज़ी से चलने लगे.

आज रेलवे ने उसे धोखा दिया था. स्थानीय पैसेंजर ट्रेन को रोज़ की तरह दो घण्टा लेट समझकर वह घर से चला था, पर वह सिर्फ डेढ़ घण्टा लेट होकर चल दी थी. शिकायती किताब के कथा-साहित्य में अपना योगदान देकर और रेलवे अधिकारियों की निगाह में हास्यास्पद बनकर वह स्टेशन से बाहर निकल आया था. रास्ते में चलते हुए उसने ट्रक देखा और उसकी बाछें – वे जिस्म में जहाँ कहीं भी होती हों – खिल गईं.

जब वह ट्रक के पास पहुँचा, क्लीनर और ड्राइवर चाय की आखिरी चुस्कियाँ ले रहे थे. इधर-उधर ताककर, अपनी खिली हुई बाछों को छिपाते हुए, उसने ड्राइवर से निर्विकार ढंग से पूछा, ‘‘क्यों ड्राइवर साहब, यह ट्रक क्या शिवपालगंज की ओर जाएगा?’’

ड्राइवर के पीने को चाय थी और देखने को दुकानदारिन थी. उसने लापरवाही से जवाब दिया, ‘‘जाएगा.’’

‘‘हमें भी ले चलिएगा अपने साथ? पन्द्रहवें मील पर उतर पड़ेंगे. शिवपालगंज तक जाना है.’’

ड्राइवर ने दुकानदारिन की सारी सम्भावनाएँ एक साथ देख डालीं और अपनी निगाह रंगनाथ की ओर घुमायी. अहा! क्या हुलिया था! नवकंजलोचन कंजमुख करकंज पदकंजारुणम्! पैर खद्दर के पैजामे में, सिर खद्दर की टोपी में, बदन खद्दर के कुर्ते में. कन्धे से लटकता हुआ भूदानी झोला. हाथ में चमड़े की अटैची. ड्राइवर ने उसे देखा और देखता ही रह गया. फिर कुछ सोचकर बोला, ‘‘बैठ जाइए शिरिमानजी, अभी चलते हैं.’’

घरघराकर ट्रक चला. शहर की टेढ़ी-मेढ़ी लपेट से फुरसत पाकर कुछ दूर आगे साफ़ और वीरान सड़क आ गई. यहाँ ड्राइवर ने पहली बार टॉप गियर का प्रयोग किया, पर वह फिसल-फिसलकर न्यूटरल में गिरने लगा. हर सौ गज़ के बाद गियर फिसल जाता और एक्सिलेटर दबे होने से ट्रक की घरघराहट बढ़ जाती, रफ्तार धीमी हो जाती. रंगनाथ ने कहा, ‘‘ड्राइवर साहब, तुम्हारा गियर तो बिलकुल अपने देश की हुकूमत-जैसा है.’’

ड्राइवर ने मुस्कराकर वह प्रशंसा-पत्र ग्रहण किया. रंगनाथ ने अपनी बात साफ़ करने की कोशिश की. कहा, ‘‘उसे चाहे जितनी बार टॉप गियर में डालो, दो गज़ चलते ही फिसल जाती है और लौटकर अपने खाँचे में आ जाती है.’’

ड्राइवर हँसा. बोला, ‘‘ऊँची बात कह दी शिरिमानजी ने.’’

इस बार उसने गियर को टॉप में डालकर अपनी एक टाँग लगभग नब्बे अंश के कोण पर उठायी और गियर को जाँघ के नीचे दबा लिया. रंगनाथ ने कहना चाहा कि हुकूमत को चलाने का भी यही नुस्खा है, पर यह सोचकर कि बात ज़रा और ऊँची हो जाएगी, वह चुप बैठा रहा.

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उधर ड्राइवर ने अपनी जाँघ गियर से हटाकर यथास्थान वापस पहुँचा दी थी. गियर पर उसने एक लम्बी लकड़ी लगा दी और उसका एक सिरा पेनल के नीचे ठोंक दिया. ट्रक तेज़ी से चलता रहा. उसे देखते ही साइकिल-सवार, पैदल, इक्के – सभी सवारियाँ कई फर्लांग पहले ही से खौफ के मारे सड़क से उतरकर नीचे चली जातीं. जिस तेज़ी से वे भाग रही थीं, उससे लगता था कि उनकी निगाह में वह ट्रक नहीं है; वह आग की लहर है, बंगाल की खाड़ी से उठा हुआ तूफान है, जनता पर छोड़ा हुआ कोई बदकलाम अहलकार है, पिंडारियों का गिरोह है. रंगनाथ ने सोचा, उसे पहले ही ऐलान करा देना था कि अपने-अपने जानवर और बच्चे घरों में बन्द कर लो, शहर से अभी-अभी एक ट्रक छूटा है.

तब तक ड्राइवर ने पूछा, ‘‘कहिए शिरिमानजी! क्या हालचाल हैं? बहुत दिन बाद देहात की ओर जा रहे हैं!’’

रंगनाथ ने शिष्टाचार की इस कोशिश को मुस्कराकर बढ़ावा दिया. ड्राइवर ने कहा, ‘‘शिरिमानजी, आजकल क्या कर रहे हैं?’’
‘‘घास खोद रहा हूँ.’’

ड्राइवर हँसा. दुर्घटनावश एक दस साल का नंग-धड़ंग लड़का ट्रक से बिलकुल ही बच गया. बचकर वह एक पुलिया के सहारे छिपकली-सा गिर पड़ा. ड्राइवर इससे प्रभावित नहीं हुआ. एक्सिलेटर दबाकर हँसते-हँसते बोला, ‘‘क्या बात कही है! ज़रा खुलासा समझाइए.’’
‘‘कहा तो, घास खोद रहा हूँ. इसी को अंग्रेज़ी में रिसर्च कहते हैं. परसाल एम. ए. किया था. इस साल से रिसर्च शुरू की है.’’
ड्राइवर जैसे अलिफ़-लैला की कहानियाँ सुन रहा हो, मुस्कराता हुआ बोला, ‘‘और शिरिमानजी, शिवपालगंज क्या करने जा रहे हैं?’’
‘‘वहाँ मेरे मामा रहते हैं. बीमार पड़ गया था. कुछ दिन देहात में जाकर तन्दुरुस्ती बनाऊँगा.’’
इस बार ड्राइवर काफ़ी देर तक हँसता रहा. बोला, ‘‘क्या बात बनायी है शिरिमानजी ने!’’
रंगनाथ ने उसकी ओर सन्देह से देखते हुए पूछा, ‘‘जी! इसमें बात बनाने की क्या बात?’’
वह इस मासूमियत पर लोट-पोट हो गया. पहले ही की तरह हँसते हुए बोला, ‘‘क्या कहने हैं! अच्छा जी, छोड़िए भी इस बात को. बताइए, मित्तल साहब के क्या हाल हैं? क्या हुआ उस हवालाती के खूनवाले मामले का?’’
रंगनाथ का खून सूख गया. भर्राए गले से बोला, ‘‘अजी, मैं क्या जानूँ यह मित्तल कौन है.’’
ड्राइवर की हँसी में ब्रेक लग गया. ट्रक की रफ़्तार भी कुछ कम पड़ गई. उसने रंगनाथ को एक बार गौर से देखकर पूछा, ‘‘आप मित्तल साहब को नहीं जानते?’’
‘‘नहीं.’’
‘‘जैन साहब को?’’
‘‘नहीं.’’
ड्राइवर ने खिड़की के बाहर थूक दिया और साफ़ आवाज़ में सवाल किया, ‘‘आप सी.आई.डी. में काम नहीं करते?’’
रंगनाथ ने झुँझलाकर कहा, ‘‘सी.आई.डी.? यह किस चिड़िया का नाम है?’

 

ड्राइवर ने ज़ोर से साँस छोड़ी और सामने सड़क की दशा का निरीक्षण करने लगा. कुछ बैलगाड़ियाँ जा रही थीं. जब कहीं और जहाँ भी कहीं मौका मिले, वहाँ टाँगें फैला देनी चाहिए, इस लोकप्रिय सिद्धान्त के अनुसार गाड़ीवान बैलगाड़ियों पर लेटे हुए थे और मुँह ढाँपकर सो रहे थे. बैल अपनी क़ाबिलियत से नहीं, बल्कि अभ्यास के सहारे चुपचाप सड़क पर गाड़ी घसीटे लिये जा रहे थे. यह भी जनता और जनार्दनवाला मज़मून था, पर रंगनाथ की हिम्मत कुछ कहने की नहीं हुई. वह सी.आई.डी. वाली बात से उखड़ गया था. ड्राइवर ने पहले रबड़वाला हॉर्न बजाया, फिर एक ऐसा हॉर्न बजाया जो संगीत के आरोह-अवरोह के बावजूद बड़ा ही डरावना था, पर गाड़ियाँ अपनी राह चलती रहीं. ड्राइवर काफ़ी रफ़्तार से ट्रक चला रहा था, और बैलगाड़ियों के ऊपर से निकाल ले जानेवाला था; पर गाड़ियों के पास पहुँचते-पहुँचते उसे शायद अचानक मालूम हो गया कि वह ट्रक चला रहा है, हेलीकोप्टर नहीं. उसने एकदम से ब्रेक लगाया, पेनल से लगी हुई लकड़ी नीचे गिरा दी, गियर बदला और बैलगाड़ियों को लगभग छूता हुआ उनसे आगे निकल गया. आगे जाकर उसने घृणापूर्वक रंगनाथ से कहा, ‘‘सी.आई.डी. नहीं हो तो तुमने यह खद्दर क्यों डाँट रखा है जी?’’

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रंगनाथ इन हमलों से लड़खड़ा गया था. पर उसने इस बात को मामूली जाँच-पड़ताल का सवाल मानकर सरलता से जवाब दिया, ‘‘खद्दर तो आजकल सभी पहनते हैं.’’
‘‘अजी, कोई तुक का आदमी तो पहनता नहीं.’’ कहकर उसने दुबारा खिड़की के बाहर थूका और गियर को टॉप में डाल दिया.
रंगनाथ का परसनालिटी कल्ट समाप्त हो गया. थोड़ी देर वह चुपचाप बैठा रहा. बाद में मुँह से सीटी बजाने लगा. ड्राइवर ने उसे कुहनी से हिलाकर कहा, ‘‘देखो जी, चुपचाप बैठो. यह कीर्तन की जगह नहीं है.’’
रंगनाथ चुप हो गया. तभी ड्राइवर ने झँुझलाकर कहा, ‘‘यह गियर बार-बार फिसलकर… न्यूटरल ही में घुसता है. देख क्या रहे हो? ज़रा पकड़े रहो जी!’’
थोड़ी देर में उसने दुबारा झँुझलाकर कहा, ‘‘ऐसे नहीं, इस तरह! दबाकर ठीक से पकड़े रहो.’’

ट्रक के पीछे काफ़ी देर से हॉर्न बजता आ रहा था. रंगनाथ उसे सुनता रहा था और ड्राइवर उसे अनसुना करता रहा था. कुछ देर बाद पीछे से क्लीनर ने लटककर ड्राइवर की कनपटी के पास खिड़की पर खट्-खट् करना शुरू कर दिया. ट्रकवालों की भाषा में इस कार्रवाई का निश्चित ही कोई खौफ़नाक मतलब होगा, क्योंकि उसी वक्त ड्राइवर ने रफ़्तार कम कर दी और ट्रक को सड़क की बायीं पटरी पर कर लिया.

हॉर्न की आवाज़़ एक ऐसे स्टेशन-वैगन से आ रही थी जो आजकल विदेशों के आशीर्वाद से सैकड़ों की संख्या में यहाँ देश की प्रगति के लिए इस्तेमाल होते हैं और हर सड़क पर हर वक्त देखे जा सकते हैं. स्टेशन-वैगन दायें से निकलकर आगे धीमा पड़ गया और उससे बाहर निकले हुए एक खाकी हाथ ने ट्रक को रुकने का इशारा दिया. दोनों गाड़ियाँ रुक गईं.

स्टेशन-वैगन से एक अफसरनुमा चपरासी और एक चपरासीनुमा अफसर उतरे. ख़ाकी कपड़े पहने हुए दो सिपाही भी उतरे. उनके उतरते ही पिंडारियों-जैसी लूट-खसोट शुरू हो गई. किसी ने ड्राइवर का ड्राइविंग लाइसेंस छीना, किसी ने रजिस्ट्रेशन-कार्ड; कोई बैकव्यू मिरर खटखटाने लगा, कोई ट्रक का हॉर्न बजाने लगा. कोई ब्रेक देखने लगा. उन्होंने फुटबोर्ड हिलाकर देखा, बत्तियाँ जलायीं, पीछे बजनेवाली घण्टी टुनटुनायी. उन्होंने जो कुछ भी देखा, वह ख़राब निकला; जिस चीज़ को छुआ, उसी में गड़बड़ी आ गई. इस तरह उन चार आदमियों ने चार मिनट में लगभग चालीस दोष निकाले और फिर एक पेड़ के नीेचे खड़े होकर इस प्रश्न पर बहस करनी शुरू कर दी कि दुश्मन के साथ कैसा सुलूक किया जाए.

रंगनाथ की समझ में कुल यही आया कि दुनिया में कर्मवाद के सिद्धान्त, ‘पोयोटिक जस्टिस’ आदि की कहानियाँ सच्ची हैं; ट्रक की चेकिंग हो रही है और ड्राइवर से भगवान उसके अपमान का बदला ले रहा है. वह अपनी जगह बैठा रहा. पर इसी बीच ड्राइवर ने मौका निकालकर कहा, ‘‘शिरिमानजी, ज़रा नीचे उतर आवें. वहाँ गियर पकड़कर बैठने की अब क्या ज़रूरत है?’’

रंगनाथ एक दूसरे पेड़ के नीचे जाकर खड़ा हो गया. उधर ड्राइवर और चेकिंग जत्थे में ट्रक के एक-एक पुर्ज़े को लेकर बहस चल रही थी. देखते-देखते बहस पुर्ज़ों से फिसलकर देश की सामान्य दशा और आर्थिक दुरवस्था पर आ गई और थोड़ी ही देर में उपस्थित लोगों की छोटी-छोटी उपसमितियाँ बन गईं. वे अलग-अलग पेड़ों के नीचे एक-एक विषय पर विशेषज्ञ की हैसियत से विचार करने लगीं. काफ़ी बहस हो जाने के बाद एक पेड़ के नीचे खुला अधिवेशन-जैसा होने लगा और कुछ देर में जान पड़ा, गोष्ठी खत्म होनेवाली है.
आखि़र में रंगनाथ को अफ़सर की मिमियाती आवाज़़ सुन पड़ी, ‘‘क्यों मियाँ अशफ़ाक, क्या राय है? माफ़ किया जाए?’’

चपरासी ने कहा, ‘‘और कर ही क्या सकते हैं हुजूर? कहाँ तक चालान कीजिएगा. एकाध गड़बड़ी हो तो चालान भी करें.’’
एक सिपाही ने कहा, ‘‘चार्ज-शीट भरते-भरते सुबह हो जाएगी.’’
इधर-उधर की बातों के बाद अफ़सर ने कहा, ‘‘अच्छा जाओ जी बण्टासिंह, तुम्हें माफ़ किया.’’
ड्राइवर ने खुशामद के साथ कहा, ‘‘ऐसा काम शिरिमानजी ही कर सकते हैं.’’
अफ़सर काफ़ी देर से दूसरे पेड़ के नीचे खड़े हुए रंगनाथ की ओर देख रहा था. सिगरेट सुलगाता हुआ वह उसकी ओर आया. पास आकर पूछा, ‘‘आप भी इसी ट्रक पर जा रहे हैं?’’
‘‘जी हाँ.’’
‘‘आपसे इसने कुछ किराया तो नहीं लिया है?’’
‘‘जी, नहीं.’’
अफ़सर बोला, ‘‘वह तो मैं आपकी पोशाक ही देखकर समझ गया था, पर जाँच करना मेरा फ़र्ज था.’’
रंगनाथ ने उसे चिढ़ाने के लिए कहा, ‘‘यह असली खादी थोड़े ही है. यह मिल की खादी है.’’
उसने इज़्ज़त के साथ कहा, ‘‘अरे साहब, खादी तो खादी! उसमें असली-नकली का क्या फ़र्क़?’’
अफ़सर के चले जाने के बाद ड्राइवर और चपरासी रंगनाथ के पास आए. ड्राइवर ने कहा, ‘‘ज़रा दो रुपये तो निकालना जी!’’
उसने मुँह फेरकर कड़ाई से जवाब दिया, ‘‘क्या मतलब है? मैं रुपया क्यों दूँ?’’
ड्राइवर ने चपरासी का हाथ पकड़कर कहा, ‘‘आइए शिरिमानजी, मेरे साथ आइए.’’ जाते-जाते वह रंगनाथ से कहने लगा, ‘‘तुम्हारी ही वजह से मेरी चेकिंग हुई और तुम्हीं मुसीबत में मुझसे इस तरह बात करते हो? तुम्हारी यही तालीम है?’’

वर्तमान शिक्षा-पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है. ड्राइवर भी उस पर रास्ता चलते-चलते एक जुम्ला मारकर चपरासी के साथ ट्रक की ओर चल दिया. रंगनाथ ने देखा, शाम घिर रही है, उसका अटैची ट्रक में रखा है, शिवपालगंज अभी पाँच मील दूर है और उसे लोगों की सद्भावना की ज़रूरत है. वह धीरे-धीरे ट्रक की ओर आया. उधर स्टेशन-वैगन का ड्राइवर हॉर्न बजा-बजाकर चपरासी को वापस बुला रहा था. रंगनाथ ने दो रुपये ड्राइवर को देने चाहे. उसने कहा, ‘‘अब दे ही रहे हो तो अरदली साहब को दो. मैं तुम्हारे रुपयों का क्या करूँगा?’’

कहते-कहते उसकी आवाज़ में उन संन्यासियों की खनक आ गई जो पैसा हाथ से नहीं छूते, सिर्फ़ दूसरों को यह बताते हैं कि तुम्हारा पैसा हाथ का मैल है. चपरासी रुपयों को जेब में रखकर, बीड़ी का आखि़री कश खींचकर, उसका अधजला टुकड़ा लगभग रंगनाथ के पैजामे पर फेंककर स्टेशन-वैगन की ओर चला गया. उसके रवाना हो जाने पर ड्राइवर ने भी ट्रक चलाया और पहले की तरह गियर को ‘टॉप’ में लेकर रंगनाथ को पकड़ा दिया. फिर अचानक, बिना किसी वजह के, वह मुँह को गोल-गोल बनाकर सीटी पर सिनेमा की एक धुन निकालने लगा. रंगनाथ चुपचाप सुनता रहा.

थोड़ी देर में ही धुँधलके में सड़क की पटरी पर दोनों ओर कुछ गठरियां-सी रखी हुई नज़र आईं. ये औरतें थीं, जो कतार बाँधकर बैठी हुई थीं. वे इत्मीनान से बातचीत करती हुई वायु-सेवन कर रही थीं और लगे-हाथ मल-मूत्र का विसर्जन भी. सड़क के नीचे घूरे पटे पड़े थे और उनकी बदबू के बोझ से शाम की हवा किसी गर्भवती की तरह अलसायी हुई-सी चल रही थी. कुछ दूरी पर कुत्तों के भूँकने की आवाज़़ें हुईं. आँखों के आगे धुएँ के जाले उड़ते हुए नज़र आए. इससे इन्कार नहीं हो सकता था कि वे किसी गाँव के पास आ गए थे. यही शिवपालगंज था.

 


 

2

थाना शिवपालगंज में एक आदमी ने हाथ जोड़कर दारोग़ाजी से कहा, ‘‘आजकल होते-होते कई महीने बीत गए. अब हुज़ूर हमारा चालान करने में देर न करें.’’

मध्यकाल का कोई सिंहासन रहा होगा जो अब घिसकर आरामकुर्सी बन गया था. दारोग़ाजी उस पर बैठे भी थे, लेटे भी थे. यह निवेदन सुना तो सिर उठाकर बोले, ‘‘चालान भी हो जाएगा. जल्दी क्या है? कौन-सी आफ़त आ रही है?’’

वह आदमी आरामकुर्सी के पास पड़े हुए एक प्रागैतिहासिक मोढ़े पर बैठ गया और कहने लगा, ‘‘मेरे लिए तो आफ़त ही है. आप चालान कर दें तो झंझट मिटे.’’

दारोग़ाजी भुनभुनाते हुए किसी को गाली देने लगे. थोड़ी देर में उसका यह मतलब निकला कि काम के मारे नाक में दम है. इतना काम है कि अपराधों की जाँच नहीं हो पाती, मुक़दमों का चालान नहीं हो पाता, अदालतों में गवाही नहीं हो पाती. इतना काम है कि सारा काम ठप्प पड़ा है.

मोढ़ा आरामकुर्सी के पास खिसक आया. उसने कहा, ‘‘हुज़ूर, दुश्मनों ने कहना शुरू कर दिया है कि शिवपालगंज में दिन-दहाड़े जुआ होता है. कप्तान के पास एक गुमनाम शिकायत गई है. वैसे भी, समझौता साल में एक बार चालान करने का है. इस साल का चालान होने में देर हो रही है. इसी वक़्त हो जाए तो लोगों की शिकायत भी ख़त्म हो जाएगी.’’

आरामकुर्सी ही नहीं, सभी कुछ मध्यकालीन था. तख्त, उसके ऊपर पड़ा हुआ दरी का चीथड़ा, क़लमदान, सूखी हुई स्याही की दवातें, मुड़े हुए कोनोंवाले मटमैले रजिस्टर – सभी कुछ कई शताब्दी पुराने दिख रहे थे.

यहाँ बैठकर अगर कोई चारों ओर निगाह दौड़ाता तो उसे मालूम होता, वह इतिहास के किसी कोने में खड़ा है. अभी इस थाने के लिए फाउंटेनपेन नहीं बना था, उस दिशा में कुल इतनी तरक़्क़ी हुई थी कि क़लम सरकण्डे का नहीं था. यहां के लिए अभी टेलीफ़ोन की ईज़ाद नहीं हुई थी. हथियारों में कुछ प्राचीन राइफलें थीं जो, लगता था, गदर के दिनों में इस्तेमाल हुई होंगी. वैसे, सिपाहियों के साधारण प्रयोग के लिए बाँस की लाठी थी, जिसके बारे में एक कवि ने बताया है कि वह नदी-नाले पार करने में और झपटकर कुत्ते को मारने में उपयोगी साबित होती है. यहाँ के लिए अभी जीप का अस्तित्व नहीं था. उसका काम करने के लिए दो-तीन चौकीदारों के प्यार की छाँव में पलनेवाली घोड़ा नाम की एक सवारी थी, जो शेरशाह के ज़माने में भी हुआ करती थी.

थाने के अन्दर आते ही आदमी को लगता था कि उसे किसी ने उठाकर कई सौ साल पहले फेंक दिया है. अगर उसने अमरीकी जासूसी उपन्यास पढ़े हों, तो वह बिलबिलाकर देखना चाहता कि उँगलियों का निशान देखनेवाले शीशे, कैमरे, वायरलेस लगी हुई गाड़ियाँ – ये सब कहाँ हैं? बदले में उसे सिर्फ़ वह दिखता जिसका ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है. साथ ही, एक नंग-धड़ंग लंगोटबन्द आदमी दिखता जो सामने इमली के पेड़ के नीचे भंग घोट रहा होता. बाद में पता चलता कि वह अकेला आदमी बीस गाँवों की सुरक्षा के लिए तैनात है और जिस हालत में जहाँ है, वहाँ से उसी हालत में वह बीसों गाँवों में अपराध रोक सकता है, अपराध हो गया हो तो उसका पता लगा सकता है और अपराध न हुआ हो, तो उसे करा सकता है. कैमरा, शीशा, कुत्ते, वायरलेस उसके लिए वर्जित हैं. इस तरह थाने का वातावरण बड़ा ही रमणीक और बीते दिनों के गौरव के अनुकूल था. जिन रोमाण्टिक कवियों को बीते दिनों की याद सताती है, उन्हें कुछ दिन रोके रखने के लिए यह थाना आदर्श स्थान था.

 

 

जनता को दारोग़ाजी और थाने के दस-बारह सिपाहियों से बड़ी-बड़ी आशाएँ थीं. ढाई-तीन सौ गाँवों के उस थाने में अगर आठ मील दूर किसी गाँव में नक़ब लगे तो विश्वास किया जाता था कि इनमें से कोई-न-कोई उसे देख ज़रूर लेगा. बारह मील की दूरी पर अगर रात के वक़्त डाका पड़े, तो इनसे उम्मीद थी कि ये वहाँ डाकुओं से पहले ही पहुँच जाएँगे. इसी विश्वास पर किसी भी गाँव में इक्का-दुक्का बन्दूकों को छोड़कर हथियार नहीं दिए गए थे. हथियार देने से डर था कि गाँव में रहनेवाले असभ्य और बर्बर आदमी बन्दूकों का इस्तेमाल सीख जाएँगे, जिससे वे एक-दूसरे की हत्या करने लगेंगे, खून की नदियाँ बहने लगेंगी. जहाँ तक डाकुओं से उनकी सुरक्षा का सवाल था, वह दारोग़ाजी और उनके दस-बारह आदमियों की जादूगरी पर छोड़ दिया गया था.

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उनकी जादूगरी का सबसे बड़ा प्रदर्शन खून के मामलों में होने की आशा की जाती थी, क्योंकि समझा जाता था कि इन तीन सौ गाँवों में रहनेवालों के मन में किसके लिए घृणा है, किससे दुश्मनी है, किसको कच्चा चबा जाने का उत्साह है, इसका वे पूरा-पूरा ब्यौरा रखेंगे, और पहले से ही कुछ ऐसी तरकीब करेंगे कि कोेई किसी को मार न सके; और अगर कोई किसी को मार दे तो वे हवा की तरह मौके पर जाकर मारनेवाले को पकड़ लेंगे, मरे हुए को क़ब्ज़े में कर लेंगे, उसके खून से तर मिट्टी को हाँडी में भर लेंगे और उसके मरने का दृश्य देखनेवालों को दिव्य दृष्टि देंगे ताकि वे किसी भी अदालत में, जो कुछ हुआ है, उसका महाभारत के संजय की तरह आँखों-देखा हाल बता सकें. संक्षेप में, दारोग़ाजी और उनके सिपाहियों को वहाँ पर मनुष्य नहीं, बल्कि अलादीन के चिराग़ से निकलनेवाला दैत्य समझकर रखा गया था. उन्हें इस तरह रखकर 1947 में अंग्रेज़ अपने देश चले गए थे और उसके बाद ही धीरे-धीरे लोगों पर यह राज़ खुलने लगा था कि ये लोग दैत्य नहीं हैं, बल्कि मनुष्य हैं; और ऐसे मनुष्य हैं जो खुद दैत्य निकालने की उम्मीद में दिन-रात अपना-अपना चिराग घिसते रहते हैं.

शिवपालगंज के जुआरी-संघ के मैनेजिंग डायरेक्टर के चले जाने पर दारोग़ाजी ने एक बार सिर उठाकर चारों ओर देखा. सब तरफ़ अमन था. इमली के पेड़ के नीचे भंग घोटनेवाला लंगोटबन्द सिपाही अब नज़दीक रखे हुए एक शिवलिंग पर भंग चढ़ा रहा था, घोड़े के पुट्ठों पर एक चौकीदार खरहरा कर रहा था, हवालात में बैठा हुआ एक डकैत ज़ोर-ज़ोर से हनुमान-चालीसा पढ़ रहा था, बाहर फाटक पर ड्यूटी देनेवाला सिपाही – निश्चय ही रात को मुस्तैदी से जागने के लिए – एक खम्भे के सहारे टिककर सो रहा था.

दारोग़ाजी ने ऊँघने के लिए पलक बन्द करना चाहा, पर तभी उनको रुप्पन बाबू आते हुए दिखायी पड़े. वे भुनभुनाए कि पलक मारने की फुरसत नहीं है. रुप्पन बाबू के आते ही वे कुर्सी से खड़े हो गए और विनम्रता-सप्ताह बहुत पहले बीत जाने के बावजूद, उन्होंने विनम्रता के साथ हाथ मिलाया. रुप्पन बाबू ने बैठते ही कहा, ‘‘रामाधीन के यहाँ लाल स्याही से लिखी हुई एक चिट्ठी आयी है. डाकुओं ने पाँच हज़ार रुपया माँगा है. लिखा है अमावस की रात को दक्खिनवाले टीले पर….’’
दारोग़ाजी मुस्कराकर बोले, ‘‘यह तो साहब बड़ी ज़्यादती है. कहाँ तो पहले के डाकू नदी-पहाड़ लाँघकर घर पर रुपया लेने आते थे, अब वे चाहते हैं कि कोई उन्हीं के घर जाकर रुपया दे आवे.’’
रुप्पन बाबू ने कहा, ‘‘जी हाँ. वह तो देख रहा हूँ. डकैती न हुई, रिश्वत हो गई.’’
दारोग़ाजी ने भी उसी लहज़े में कहा, ‘‘रिश्वत, चोरी, डकैती – अब तो सब एक हो गया है… पूरा साम्यवाद है!’’
रुप्पन बाबू बोले, ‘‘पिताजी भी यही कहते हैं.’’
‘‘वे क्या कहते हैं?’’
‘‘…यही कि पूरा साम्यवाद है.’’
दोनों हँसे. रुप्पन बाबू ने कहा, ‘‘नहीं. मैं मज़ाक नहीं करता. रामाधीन के यहाँ सचमुच ही ऐसी चिट्ठी आयी है. पिताजी ने मुझे इसीलिए भेजा है. वे कहते हैं कि रामाधीन हमारा विरोधी है तो क्या हुआ, उसे इस तरह न सताया जाए.’’
‘‘बहुत अच्छी बात कहते हैं. जिससे बताइए उससे कह दूँ.’’

रुप्पन बाबू ने अपनी गढ़े में धँसी हुई आँखों को सिकोड़कर दारोग़ाजी की ओर देखा. दारोग़ाजी ने भी उन्हें घूरकर देखा और मुस्करा दिए. बोले, ‘‘घबराइए नहीं, मेरे यहाँ होते हुए डाका नहीं पड़ेगा.’’
रुप्पन बाबू धीरे-से बोले, ‘‘सो तो मैं जानता हूँ. यह चिट्ठी जाली है. ज़रा अपने सिपाहियों से भी पुछवा लीजिए. शायद उन्हीं में से किसी ने लिख मारी हो.’’
‘‘ऐसा नहीं हो सकता. मेरे सिपाही लिखना नहीं जानते. एकाध हैं जो दस्तख़त-भर करते हैं.’’
रुप्पन बाबू कुछ और कहना चाहते थे, तब तक दारोग़ाजी ने कहा, ‘‘जल्दी क्या है! अभी रामाधीन को रिपोर्ट लिखाने दीजिए…चिट्ठी तो सामने आए.’’
थोड़ी देर दोनों चुप रहे. दारोग़ाजी ने फिर कुछ सोचकर कहा, ‘‘सच पूछिए तो बताऊँ. मुझे तो इसका सम्बन्ध शिक्षा-विभाग से जान पड़ता है.’’
‘‘कैसे?’’
‘‘और शिक्षा-विभाग से भी क्या – आपके कॉलिज से जान पड़ता है.’’
रुप्पन बाबू बुरा मान गए, ‘‘आप तो मेरे कॉलिज के पीछे पड़े हैं.’’
‘‘मुझे लगता है कि रामाधीन के घर यह चिट्ठी आपके कॉलिज के किसी लड़के ने भेजी है. आपका क्या ख्याल है?’’
‘‘आप लोगों की निगाह में सारे जुर्म स्कूली लड़के ही करते हैं.’’ रुप्पन बाबू ने फटकारते हुए कहा, ‘‘अगर आपके सामने कोई आदमी ज़हर खाकर मर जाए, तो आप लोग उसे भी आत्महत्या न मानेंगे. यही कहेंगे कि इसे किसी विद्यार्थी ने ज़हर दिया है.’’
‘‘आप ठीक कहते हैं रुप्पन बाबू, ज़रूरत पड़ेगी तो मैं ऐसा ही कहूँगा. मैं बख्तावरसिंह का चेला हूँ. शायद आप यह नहीं जानते.’’
इसके बाद सरकारी नौकरों की बातचीत का वही अकेला मज़मून खुल गया कि पहले के सरकारी नौकर कैसे होते थे और आज के कैसे हैं. बख्तावरसिंह की बात छिड़ गई. दारोग़ा बख्तावरसिंह एक दिन शाम के वक़्त अकेले लौट रहे थे. उन्हें झगरू और मँगरू नाम के दो बदमाशों ने बाग में घेरकर पीट दिया. बात फैल गई, इसलिए उन्होंने थाने पर अपने पीटे जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी.
दूसरे दिन दोनों बदमाशों ने जाकर उनके पैर पकड़ लिये. कहा, ‘‘हुज़ूर माई-बाप हैं. गुस्से में औलाद माँ-बाप से नालायक़ी कर बैठे तो माफ़ किया जाता है.’’

बख्तावरसिंह ने माँ-बाप का कर्त्तव्य पूरा करके उन्हें माफ़ कर दिया. उन्होंने औलाद का कर्त्तव्य पूरा करके बख्तावरसिंह के बुढ़ापे के लिए अच्छा-ख़ासा इन्तज़ाम कर दिया. बात आई-गई हो गई.

पर कप्तान ने इस पर एतराज़ किया कि, ‘‘टुम अपने ही मुकडमे की जाँच कामयाबी से नहीं करा सका टो डूसरे को कैसे बचायेगा? अँढेरा ठा टो क्या हुआ? टुम किसी को पहचान नहीं पाया, टो टुमको किसी पर शक करने से कौन रोकने सकटा!’’
तब बख्तावरसिंह ने तीन आदमियों पर शक किया. उन तीनों की झगरू और मँगरू से पुश्तैनी दुश्मनी थी. उन पर मुक़दमा चला. झगरू और मँगरू ने बख्तावरसिंह की ओर से गवाही दी, क्योंकि मारपीट के वक्त वे दोनों बाग़ में एक बड़े ही स्वाभाविक कारण से, यानी पाख़ाने की नीयत से, आ गए थे. तीनों को सज़ा हुई. झगरू-मँगरू के दुश्मनों का यह हाल देखकर इलाके की कई औलादें बख्तावरसिंह के पास आकर रोज़ प्रार्थना करने लगीं कि माई-बाप, इस बार हमें भी पीटने का मौक़ा दिया जाए. पर बुढ़ापे का निबाह करने के लिए झगरू और मँगरू काफ़ी थे. उन्होंने औलादें बढ़ाने से इन्कार कर दिया.

रुप्पन बाबू काफ़ी देर हँसते रहे. दारोग़ाजी खुश होते रहे कि रुप्पन बाबू एक क़िस्से में ही खुश होकर हँसने लगे हैं, दूसरे की ज़रूरत नहीं पड़ी. दूसरा क़िस्सा किसी दूसरे लीडर को हँसाने के काम आएगा. हँसना बन्द करके रुप्पन बाबू ने कहा, ‘‘तो आप उन्हीं बख्तावरसिंह के चेले हैं!’’
‘‘था. आज़ादी मिलने के पहले था. पर अब तो हमें जनता की सेवा करनी है. गरीबों का दुख-दर्द बँटाना है. नागरिकों के लिए….’’
रुप्पन बाबू उनकी बाँह छूकर बोले, ‘‘छोड़िए, यहाँ मुझे और आपको छोड़कर तीसरा कोई भी सुननेवाला नहीं है.’’
पर वे ठण्डे नहीं पड़े. कहने लगे, ‘‘मैं तो यही कहने जा रहा था कि मैं आज़ादी मिलने के पहले बख्तावरसिंह का चेला था, अब इस ज़माने में आपके पिताजी का चेला हूँ.’’
रुप्पन बाबू विनम्रता से बोले, ‘‘यह तो आपकी कृपा है, वरना मेरे पिताजी किस लायक हैं?’’
वे उठ खड़े हुए. सड़क की ओर देखते हुए, उन्होंने कहा, ‘‘लगता है, रामाधीन आ रहा है. मैं जाता हूँ. इस डकैतीवाली चिट्ठी को ज़रा ठीक से देख लीजिएगा.’’

 

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रुप्पन बाबू अठारह साल के थे. वे स्थानीय कॉलिज की दसवीं कक्षा में पढ़ते थे. पढ़ने से, और खासतौर से दसवीं कक्षा में पढ़ने से, उन्हें बहुत प्रेम था; इसलिए वे उसमें पिछले तीन साल से पढ़ रहे थे.

रुप्पन बाबू स्थानीय नेता थे. उनका व्यक्तित्व इस आरोप को काट देता था कि इण्डिया में नेता होने के लिए पहले धूप में बाल सफ़ेद करने पड़ते हैं. उनके नेता होने का सबसे बड़ा आधार यह था कि वे सबको एक निगाह से देखते थे. थाने में दारोग़ा और हवालात में बैठा हुआ चोर – दोनों उनकी निगाह में एक थे. उसी तरह इम्तहान में नक़ल करनेवाला विद्यार्थी और कॉलिज के प्रिंसिपल उनकी निगाह में एक थे. वे सबको दयनीय समझते थे, सबका काम करते थे, सबसे काम लेते थे. उनकी इज़्ज़त थी कि पूँजीवाद के प्रतीक दुकानदार उनके हाथ सामान बेचते नहीं, अर्पित करते थे और शोषण के प्रतीक इक्केवाले उन्हें शहर तक पहुँचाकर किराया नहीं, आशीर्वाद माँगते थे. उनकी नेतागिरी का प्रारम्भिक और अन्तिम क्षेत्र वहां का कॉलिज था, जहाँ उनका इशारा पाकर सैकड़ों विद्यार्थी तिल का ताड़ बना सकते थे और ज़रूरत पड़े तो उस पर चढ़ भी सकते थे.

वे दुबले-पतले थे, पर लोग उनके मुँह नहीं लगते थे. वे लम्बी गरदन, लम्बे हाथ और लम्बे पैरवाले आदमी थे. जननायकों के लिए ऊल-जलूल और नये ढंग की पोशाक अनिवार्य समझकर वे सफ़ेद धोती और रंगीन बुश्शर्ट पहनते थे और गले में रेशम का रूमाल लपेटते थे. धोती का कोंछ उनके कन्धे पर पड़ा रहता था. वैसे देखने में उनकी शक्ल एक घबराए हुए मरियल बछड़े की-सी थी, पर उनका रोब पिछले पैरों पर खड़े हुए एक हिनहिनाते घोड़े का-सा जान पड़ता था.

वे पैदायशी नेता थे क्योंकि उनके बाप भी नेता थे. उनके बाप का नाम वैद्यजी था.


ये स्टोरी कुलदीप सरदार ने लिखी है.


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