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विकिशु, आप लिखते हैं कि जादू करते हैं?

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छत्तीसगढ़ में बैठा एक शख्स तमाम जरूरी समझी जाने वाली चीज़ों से निरपेक्ष होकर, बरसों से सिर्फ लिख रहा है. दिल्ली के भव्य और खर्चीले साहित्यिक आयोजनों में आप उसे नहीं पाएंगे. मोटा चश्मे, चेक कमीज़, ढीली पतलून और जल्दी न बदलने वाले हाव-भाव. जैसी दृश्यात्मकता वह अपने साथ लिए रहता है, लगता है कि दुनिया कितनी भी तेज दौड़े, यह व्यक्ति उससे अप्रभावित ही रहेगा.

विनोद कुमार शुक्ल (विकुशु) अपने लेखन में बेहद साधारण चीजों का जादुई चित्रण करते हैं. मसलन, हाथी के चलने, या पेड़ों पर चिड़ियों की आवाज़ों को वो इस तरह लिखते हैं कि आप बैठकर आधा घंटा सोचते रहिए. लगता है कि वह आदमी अपने जीवनकाल में कभी जल्दी में नहीं रहा होगा. इसलिए उसके पास हमेशा समय रहा, मामूली चीजों को देर तक देखने और उन पर जादूगर की तरह सोचने का. कुछ लोग नहीं मानते, लेकिन हिंदी में उन्हें ‘जादुई यथार्थवाद’ की शैली में लिखने वाला इकलौता शख्स कहा जाता है. ‘जादुई यथार्थवाद’ यानी ‘मैजिकल रियलिज्म’. सच्ची-मुच्ची की घटनाओं को इस तरह लिखना कि वे जादुई लगने लगें.

जब आप दोस्तों को ‘हैप्पी न्यू ईयर’ कहते हैं, उसी दिन विनोद कुमार शुक्ल का जन्मदिन होता है. 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव में जन्मे थे विनोद. आज वह 79 साल के हो गए.

नॉवेल के लिए ज्यादा जाने जाते हैं. ‘नौकर की कमीज’ पर मणि कौल ने फिल्म भी बनाई. ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ को 1999 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड भी मिला. लेकिन हम आपको पढ़वाएंगे उनकी किताब, ‘हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़’ का एक अंश और उनकी दो कविताएं. उनका लिखा सब कुछ पढ़ना है तो राजकमल प्रकाशन से उनकी किताबें मंगवा सकते हैं.

‘हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़’ से एक हिस्सा

एक लड़का है छह साल का. दूसरी कक्षा में पढ़ता है. मटमैले रंग की एक नई कमीज़ पहने है जो दो बार धुलने के बाद बहुत पुरानी लगती है. कत्थई रंग की पैंट है. वह दृश्य में इस तरह घुल-मिल जाता है कि मैदान पर थोड़ी दूर ही जाता है तो ओझल होने के बहुत पहले से ओझल होने लगता है. जब वह अचानक पास आकर दिखाई देता है तो लगता है कि कैमरे के ज़ूम लेंस से लाया गया है. बाग घुंघराले, काले और बड़े हैं. कंघी से पीछे कोरे गए. उसकी इच्छा होती है, उड़ जाए. यदि चुप बैठा रहता है तो लगता है कहीं खो गया. उसकी मां तब उसे बुलाती कि कहीं खो गया है? ‘कहीं खो गया है’ उसे पुकारने का नाम जैसा था. यह पुकारने का नाम घर का था, बाहर भी. स्कूल में भी था. परंतु स्कूल का लिखाया हुआ नाम बोलू था. यह नाम उसकी सफलता के साथ चहकने के कारण रखा गया था.

बहुत दिनों के बाद एक दिन उसकी मां को पता चला कि वह केवल चलते हुए बोलता है. चुप रहता है तब खड़ा रहता है या बैठा रहता है. अच्छे से बोलना उसने तब सीखा, जब वह चलना, दौड़ना सीख गया. कूल्हे के बल जब खिसकता था, तब च, च या ब, ब या द, द बोलना शुरू किया था. घुटने के बल चलते समय चच, बब, दद बोलता था. अच्छा था कि उसकी नींद में बड़बड़ाने की आदत नहीं थी.

चलते-चलते बोलने की आदत के कारण सुनने वालों को उसके साथ-साथ चलना पड़ता. उसकी मां उसके साथ नहीं चल पाती थी. पीछे-पीछे चल पाती थी. कई दिनों के बाद उसकी मां को यह भी पता चला कि वह जल्दी थक क्यों जाती है. इसके बाद भी बोलू का काम ठीक चल रहा था. घर-संसार का काम भी ठीक चल रहा था. जैसे उसे स्कूल जाना है, तो किताब से बोलने के लिए कोई पाठ जो उसे याद करना है, निकाल लेता और बस्ता लटकाकर ज़ोर से पढ़ते, दुहराते स्कूल के रास्ते चल पड़ता. कक्षा में अपनी जगह पर आकर बैठकर चुप हो जाता या बैठने के लिए चुप हो जाता. स्कूल से लौटते समय भी ऐसा ही करता. रास्ते में उससे कोई कुछ पूछता तो खड़े होकर सुन लेता और उत्तर देते हुए चल पड़ता. बोलते हुए आने के कारण जब वह स्कूल से लौटता तो उसका पास आना मां सुन लेती. दरवाज़े का सांकल अन्दर से खोल देती, बोलू दरवाज़े को ठेलकर अंदर आ जाता. रोज़ रास्ते भर पढ़ते हुए स्कूल जाने और पढ़ते हुए घर आने से बोलू पढ़ने में होशियार था.

कविता: आग़ाज़

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे

कविता: सबसे गरीब आदमी

सबसे गरीब आदमी की
सबसे कठिन बीमारी के लिए
सबसे बड़ा विशेषज्ञ डॉक्‍टर आए
जिसकी सबसे ज्‍यादा फीस हो

सबसे बड़ा विशेषज्ञ डॉक्‍टर
उस गरीब की झोपड़ी में आकर
झाड़ू लगा दे
जिससे कुछ गंदगी दूर हो
सामने की बदबूदार नाली को
साफ कर दे
जिससे बदबू कुछ कम हो

उस गरीब बीमार के घड़े में
शुद्ध जल दूर म्‍युनिसिपल की
नल से भर कर लाए
बीमार के चीथड़ों को
पास के हरे गंदे पानी के डबरे
से न धोए
बीमार को सरकारी अस्‍पताल
जाने की सलाह न दे
कृतज्ञ होकर
सबसे बड़ा डॉक्‍टर सबसे गरीब आदमी का इलाज करे
और फीस मांगने से डरे

सबसे गरीब बीमार आदमी के लिए
सबसे सस्‍ता डॉक्‍टर भी
बहुत महंगा है

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