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भारत 6 करोड़ वैक्सीन विदेश न भेजता तो क्या देश में वैक्सीन की इतनी कमी न होती?

देश भर में कोरोना वायरस के मामले बढ़ते जा रहे हैं. पिछले 24 घंटे में सवा लाख से अधिक लोग वायरस से संक्रमित हुए हैं और सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई है. इन सबके बीच राज्यों में वैक्सीन की पर्याप्त सप्लाई न हो पाने की बात सामने आ रही है. राज्यों ने इसको लेकर केंद्र सरकार से बात की है. इसके साथ ही कुछ लोग यह भी दावा कर रहे हैं कि अगर मोदी सरकार करोड़ो वैक्सीन विदेश न भेजती, तो आज भारत में वैक्सीन की कमी न पड़ती. आइए विस्तार से पूरा मामला समझने की कोशिश करते हैं.

क्या दूसरे देशों की मदद के चक्कर में भारत को नुकसान हो रहा है?

क्या विदेशों को वैक्सीन बांटने या बेचने के चलते भारत का अपना वैक्सीनेशन ड्राइव प्रभावित हो रहा है? भारत ने 16 जनवरी से अपने नागरिकों को वैक्सीन लगाना शुरू किया. हमारा लक्ष्य है- शुरुआती आठ महीने में 30 करोड़ लोगों का टीकाकरण. तकरीबन 13 लाख वैक्सीन प्रति दिन.

न्यूज़ एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट मुताबिक़ 5 अप्रैल को कोरोना वायरस वैक्सीन के 43 लाख से अधिक डोज़ दिए गए हैं. ये रेकॉर्ड रफ़्तार है. एक दिन में सबसे अधिक. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ अभी तक कुल 9 करोड़ डोज़ दिए जा चुके हैं. पहले डोज़ की बात करें तो यह आंकड़ा 7.87 करोड़ के करीब है और दूसरे डोज़ की बात करें तो यह आंकड़ा 1.14 करोड़ के करीब है.

एक और बात जानिए. नेशनल हेल्थ मिशन के मुताबिक, 10 फरवरी तक भारत ने 70 लाख लोगों को टीका लगा दिया था. अमेरिका, जहां स्वास्थ्य ढांचा इतना मज़बूत है, उसे 70 लाख लोगों के वैक्सीनेशन में 27 दिन लगे थे. भारत ने ये 26 दिनों में कर लिया था.

Corona Vaccine Doses India
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ अभी तक कुल 9 करोड़ डोज़ दिए जा चुके हैं.

ऐसे में देखा जाए तो भारत अपने टारगेट को तय वक्त से पहले ही छू लेगा. लेकिन एक्सपर्ट्स की राय अलग है.

क्या कह रहे एक्सपर्ट्स?

फ़रवरी के महीने में एक्सपर्ट्स बता रहे थे कि ऑक्सफ़र्ड वाली वैक्सीन के दो डोज़ लगते हैं. दोनों डोज़ के बीच आठ से 12 हफ़्ते का अंतर होना चाहिए. इस हिसाब से भारत को जितनी डोज़ चाहिए, उससे ज़्यादा की सप्लाई है हमारे पास. मतलब, हम सरप्लस में हैं. इसीलिए हम वैक्सीन डोनेट करना, एक्सपोर्ट करना अफ़ॉर्ड कर सकते हैं.

लेकिन अब ऐसा नहीं है. डॉ. अभिषेक शर्मा हेल्थकेयर एनालिस्ट हैं. ग्लोबल इंवेस्टमेंट फर्म जेफ्रीज (Jefferies) में काम करते हैं. एनडीटीवी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे भारत में टीकाकरण की गति बढ़ती है, सप्लाई की मांग बढ़ने वाली है. टीके प्रोड्यूस किए जा रहे हैं, लेकिन उसकी स्पीड तेज नहीं है. जिस तेजी से डिमांड बढ़ी है, ऐसे में एक महीने के टीके 17 दिन में लगाए गए हैं.

हालांकि भारत सरकार ने भी पिछले महीने कहा था कि वह अपनी जरूरतों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए वैक्सीन निर्यात को धीमा करेगा.

भारत अब तक कितनी वैक्सीन बाहर भेज चुका है?

भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ भारत ने अब तक 85 देशों को 6.45 करोड़ वैक्सीन भेजे हैं. इसमें मदद वाली भी हैं और कमर्शियल वाली भी. मदद वाली वैक्सीन 1.05 करोड़, कमर्शियल वैक्सीन 3.58 करोड़ और 1.82 करोड़ कोवैक्स के डोज़ शामिल हैं. अब ये कोवैक्स क्या है?

ये एक ग्लोबल प्रोग्राम है. इसे लॉन्च किया गया अप्रैल 2020 में. ख़ास कोरोना के लिए. ताकि ये बिना भेदभाव के पूरी दुनिया के लिए वैक्सीन उपलब्ध कराए. कोवैक्स प्रोग्राम का जिम्मा उठाते हैं दो संगठन- UN और गावी. UN की तरह गावी भी एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है. पूरा नाम है- दी ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन्स ऐंड इम्यूनाइज़ेशन्स. इसमें सरकारी और प्राइवेट, दोनों तरह के संगठन मिलकर काम करते हैं. मकसद ये कि अमीर-गरीब के अंतर बिना पूरी दुनिया को बीमारी से इम्यूनिटी मिले.

कोवैक्स का लक्ष्य है, 2021 ख़त्म होते-होते वैक्सीन की कम-से-कम 1.8 बिलियन डोज़ सप्लाई करना. किन्हें? दुनिया के सबसे गरीब 92 देशों को. किसको कितनी वैक्सीन मिलेगी, ये उसकी आबादी के हिसाब से तय होगा. कहीं कोरोना का प्रकोप ज़्यादा हुआ, तो उसे ज़्यादा प्राथमिकता दी जाएगी.

भारत ने अब तक 6.45 करोड़ डोज़ बाहर भेजे हैं और भारत में करीब 9 करोड़ डोज़ की खपत हुई है. माने 57 फीसद डोज़ भारत में खर्च हुई हैं और बाकी 43 फीसद बाहरी मुल्कों को दी गई हैं. माने भारत ने बाहर में वैक्सीन देने की तुलना में अपने लोगों पर अधिक वैक्सीन खर्च की हैं.

Adarpoonawalla
सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के सीईओ आदार पूनावाला. (तस्वीर: पीटीआई)

वैक्सीन बनाने वाली कंपनी का क्या कहना है?

कोविशील्ड वैक्सीन बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा है कि हालात काफी तनावपूर्ण हैं. पूनावाला ने बताया कि फिलहाल कंपनी 6 करोड़ से 6.5 करोड़ डोज़ हर महीने बना रही है. अब तक हम 10 करोड़ डोज़ भारत सरकार को और 6 करोड़ डोज़ देश के बाहर सप्लाई कर चुके हैं. लेकिन हम अब भी हर उस भारतीय तक वैक्सीन पहुंचाने में पीछे हैं, जिसे इसकी जरूरत है. उन्होंने कहा कि अगर कंपनी को जून तक अपनी क्षमता बढ़ानी है, तो इसके लिए 3000 करोड़ रुपए की जरूरत होगी. इसके लिए हमने केंद्र सरकार को लिखा है. वहां से मदद नहीं मिली तो लोन लेने जैसे दूसरे रास्ते खोजे जाएंगे.

बहरहाल, हालात को देखते हुए फिलहाल ऐसा लग रहा है कि आने वाले कुछ दिन वैक्सीनेशन के लिहाज से तनावपूर्ण रहने वाले हैं. इसका सबसे बड़ा कारण डिमांड और सप्लाई में दिख रहा साफ अंतर है.

दुनिया की मदद करके भारत ने गुडविल कमाई है?

भारत ने लीडरशिप क्वॉलिटी दिखाई है. हम वैक्सीन डिप्लोमसी में चीन से आगे निकल गए हैं. बेशक़ इसमें वर्ल्ड पावर बनने की हमारी महत्वाकांक्षा शामिल हो. बेशक़ हमारा मक़सद पड़ोसियों के साथ रिश्ते सुधारना हो. बेशक़ हमें अपनी दोस्तियां मज़बूत करने की चाह हो. हम अफ्रीका और एशिया में अपने लिए पार्टनरशिप बनाना चाहते हों. दुनिया में अपनी साख बढ़ाना चाहते हों. मगर ये सारी मंशाएं पॉज़िटिव हैं. कोरोना की ग्लोबल फ़ाइट से मिलकर लड़ना, पूरी दुनिया की जिम्मेदारी थी. सबसे ज़्यादा, अमीर और ताकतवर देशों की. मगर उन्होंने केवल अपने बारे में सोचा. अपनी ज़रूरत को ऊपर रखा. दुनिया याद रखेगी कि जब सुरक्षा परिषद में बैठकर दुनिया की तकदीर लिखने वाले बड़े देश स्वार्थी बन गए थे, तब भारत ने ज़रूरतमंदों का साथ दिया था.


वीडियो- भारत से पहले दुनिया को वैक्सीन बांट रहे पीएम मोदी?

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