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गुलज़ार की एक फिल्म जो सब लड़कियों को ज़रूर देखनी चाहिए!

A must watch.

मन में किसी की मूरत बसाकर, या अमूर्त को रखकर, सृष्टि बनाने वाले को भजते हुए, या अपने इस संसार में होने के कारण जानने की दिशा में हम मानव आगे बढ़ते हैं. इसमें कृष्ण, क्राइस्ट, मुहम्मद, राम, मोज़ेज़, मार्क्स, कबीर – किसी के भी वचनों को ज़रिया बना लें, वो ठीक है यदि वो हमें आज़ाद करते हैं, भयमुक्त करते हैं, हममें प्रेम व करुणा भरते हैं, हममें अहिंसा जगाते हैं, हमें झगड़ों व युद्धों से दूर करते हैं, हमें साथी मनुष्यों पर राज करने से रोकते हैं, हममें संपूर्ण समानता का भाव रोपते हैं, हममें निर्मलता बहाते हैं.

हम जिस फिल्म की बात करेंगे उसमें ऐसा ही होता है.

ये है 1979 में प्रदर्शित फिल्म ‘मीरा’. गुलज़ार द्वारा लिखी और निर्देशित. हेमा मालिनी, विनोद खन्ना, श्रीराम लागू, ओम शिवपुरी, शम्मी कपूर, ए के हंगल, अमजद ख़ान की भूमिकाओं से सजी. परिधान भानु अथैया द्वारा रचे थे. संगीत पंडित रविशंकर का था.

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अगर हम आज कृष्ण को याद करना चाहते हैं, उसकी बात करना चाहते हैं तो फिल्मों में ऐसे कम ही कृष्ण हैं जो आज के समय में प्रासंगिक हैं. 2012 में प्रदर्शित ‘ओएमजी – ओ माई गॉड!’ का कृष्ण प्रासंगिक दिखता है. वो धर्म की सही और वैयक्तिक व्याख्या करने पर ज़ोर देता है. वह किसी भी व्यक्ति को आस्तिक बनाने का इरादा नहीं पाले है. और वैसे भी अगर आप किसी को आस्तिक बनाना चाहते हैं तो शुरुआत उसे नास्तिक बनाने से होनी चाहिए. लेकिन इस बात को आज तकरीबन सभी धर्म के मैनेजर नहीं समझते. वे एक नियंत्रण की स्थिति पैदा करने की कोशिश करते हैं जिसमें इंसान को जल्दी से जल्दी और मज़बूत से मज़बूत तरीके से धर्म के ‘पवित्र’ शब्दों में बांध दिया जाए. वे इंसान की निजी, व भीतर की ओर यात्रा (जो सर्वोत्कृष्ट है) को तुच्छ समझते हैं.

कृष्ण का दूसरा ऐसा प्रासंगिक रूप फ़िल्म ‘मीरा’ में दिखता है. ऐसी कहानी जिसमें धारण करने के नियम समाज ने बना दिए हैं, जिसमें कृष्ण को लेकर ही सारी बात हो रही है लेकिन शर्तें भक्त की है. मीरा की. वो स्त्री भी है. वो भी सन् 1500 के बाद के काल में जब स्त्री पिता, भाई, पति, पुत्र पर आश्रित थी. उसे कुछ भी करने से के लिए ताउम्र इन चारों से पूछना होता था. समाज, सत्ता और धर्म की सारी नैतिक रेखाएं स्त्रियों के लिए ही बनी थीं. किसी चुनाव, किसी प्रतियोगिता या किसी कला-युद्ध-प्रशासन के कार्य में चुना जाना तो दूर स्त्री कैंडिेडेट भी न थी. वो सिर्फ ट्रॉफी थी. उपयोग के लिए, बलि के लिए, उपभोग के लिए. ऐसे काल में मीरा ने जैसा जीवन जिया वो आज आधुनिक काल में महानगरों में, अरबपति परिवारों की स्त्रियां भी नहीं जीती हैं. ऐसा आभास दिया जाता है कि स्त्रियों को समभाव है, लेकिन ऐसा है नहीं. आज से 500 साल पहले जब कोई सोशल मीडिया, कोई फोन, कोई बिजली, कोई न्यायपालिका, कोई संविधान, कोई सहारा, कोई सशक्तिकरण न था, तब मीरा ने पति, पिता, शासक, धर्मअदालत, समाज, परिवार सभी की घृणा स्वीकार की लेकिन किया वही जो उन्हें सही लगा. लड़कियां आज भी इन सब संस्थानों के खिलाफ नहीं जा पाती हैं. इतने संसाधनों और ज्ञान से युक्त होने के बाद भी.

ये मीरा और उसका कृष्ण हमारे लिए प्रेरणा है. आगे जाने का रास्ता. कि मीरा ने जब ऐसा किया. क्या अटल विश्वास रहा होगा, अपनी सोच पर. जब समाज, धर्म, सत्ता के बिछाए propaganda में कोई सच न दिखता होगा. उस दौर में बुद्ध बनना आसान था लेकिन मीरा बनना नहीं. यहां कृष्ण हमारे लिए अपने-अपने सच की तलाश का नाम है. वह किसी भी व्यक्ति की धर्म को लेकर अपनी व्याख्या है. वह वो व्याख्या नहीं है जो समाज के सत्ता व धर्म प्रतिष्ठान हम पर थोपने को लेकर आक्रामक हो रहे हैं.

फ़िल्म में कहानी 1580 के करीब स्थिति है. मेड़ता (राजस्थान) के राजा वीरमदेव राठौड़ राजपुताना के उन शासकों में से हैं जो दिल्ली की सल्तनत से मिलने को तैयार नहीं हैं. सुल्तान अक़बर को राजा मानसिंह की बहन जोधाबाई से संतान हुई है और वीरम का मानना है कि ये राजपूत-मुग़ल बच्चा हिंदुस्तान का राजा बनेगा. सिसोदिया राजपूतों से उनकी बनती नहीं लेकिन जानते हैं कि यदि पड़ोसी राणा विक्रमजीत सिंह को भी मुग़लों ने हरा दिया तो अगला नंबर उन्हीं का होगा. ऐसे में शत्रुता भुलाते हुए वे अपनी बेटी कृष्णा का रिश्ता विक्रमजीत के छोटे भाई भोजराज से तय कर आते हैं.

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लेकिन कुछ अनहोनी होती है. फिर वीरम की भतीजी मीरा की शादी भोजराज से की जाती है. लेकिन मीरा तो बचपन से ही कृष्ण को अपना पति मान बैठी है. ससुराल पहुंचती तो अपनी शर्तों पर चलती है. भक्ति में डूबी रहती है. भजन लिखती है. गाती है. पति से कह देती है कि वे उन्हें वो सब नहीं दे पाएंगी जिसकी उम्मीद होती है. भोजराज उसे अपने रास्ते लाने की कोशिश भी करता है लेकिन फिर अंत तक उसका सम्मान करने लगता है, उसे बाकी सब से बचाने की कोशिश करता है. मीरा को बदलने के लिए कई कोशिशें की जाती हैं लेकिन वे स्पष्ट हैं. वे जूते गांठने वाले नीची जाति के संत रैदास को अपना ज्ञान गुरु बनाती हैं.

ये फिल्म किसी भी लिहाज से शाब्दिक अर्थों में कृष्ण भक्ति पर नहीं है बल्कि एक स्त्री के स्वतंत्र फैसलों पर है. उसके शारीरिक, सामाजिक, शैक्षिक और आध्यात्मिक फैसले. और इसमें उसे इज्जत, अपमान, मृत्यु का भय नहीं है. सत्ता का भी नहीं.

सबसे महत्वपूर्ण है इसका अंतिम पड़ाव जहां मीरा पर धर्म अदालत बुलाई जाती है जहां उसे मृत्युदंड दिया जा सकता है. यहां पर मीरा (हेमा मालिनी) का सिसोदिया शासन के कुलगुरु (ओम शिवपुरी) के साथ संवाद यादगार है. हिंदी सिनेमा में ऐसे महिला पात्र न के बराबर हैं जो इतनी नियंत्रण की स्थिति से किसी supreme order से यूं बात करते हैं. इस संवाद में विषयों का दायरा बहुत विस्तृत है. कई-कई धाराओं पर इसमें बात होती है.

धर्मगुरु और मीरा संवाद :

“मनुष्य असंपूर्ण है. मनुष्य, मनुष्य की परीक्षा के योग्य नहीं. किंतु धर्म, समाज का नियम है और जो उस नियम को खंडित करता है वो धर्म, समाज और ईश्वर के प्रति दोषी है. नैतिक पाप है ये और सामाजिक अपराध है. ब्राह्मणो, और प्रजाजनो, राजकुंवर भोजराज की पत्नी राजरानी मीरा पर आरोप है कि इसने एक नहीं कई नियमों का खंडन किया है, उन पर विचार करने के लिए ये धर्म अदालत बुलाई गई है. ईश्वर की इच्छा और प्रजाजनों की अनुमति से मैं इस धर्म अदालत का कार्य आरंभ करता हूं.”

“मीरा के दोष प्रजाजनों को पढ़कर सुना दिए जाएं.”

1. धर्मशास्त्र और समाज के नियम के अनुसार निश्चित है कि पत्नी को अपने पति का धर्म स्वीकार्य है. मीरा ने अपने पति का धर्म स्वीकार करने से इनकार किया.
2. मीरा ने पर-पुरुषों से संबंध जोड़े जो रिश्ते में न उसके ससुराल से थे और न ही नैहर से.
3. छोटी जाति के लोगों से संबंध बनाकर मीरा ने राजपरिवार की मर्यादा को भ्रष्ट किया.
4. मीरा ने कृष्ण मंदिर जलाने की चेष्ठा की जो राजसी हुकुम से बंद कर दिया गया था.
5. पति की अनुमति के बिना मीरा ने पति का घर छोड़ा और एक से ज्यादा दिन तक बाहर रही.
6 राणा भोजराज के सिवा भी मीरा किसी और को अपना पति मानती है जो धर्मशास्त्रों के अनुसार किसी भी स्त्री के लिए पाप है.
7. राजा, प्रजा और देश के प्रमुख शत्रु सुल्तान अक़बर से मीरा ने उपहार स्वीकार किए जो स्वयं उसके भाई राजा जयमल की मृत्यु का कारण हुआ.

मीरा-धर्मगुरु संवाद.
मीरा-धर्मगुरु संवाद.

“मीरा, क्या तुमने अपने पति का धर्म स्वीकार करने से इनकार किया?”
“म्हारो धर्म तो एक ही सांचो, भव सागर संसार सब काचो.”

“क्या तुम स्वीकार करती हो कि राजकुंवर भोजराज के सिवा भी तुम्हारा कोई और पति है?”
“जाके सिर मोर-मुकुट मेरो पति सोई.”

“तो अदालत ये मान ले तुम्हारे एक नहीं दो पति हैं?”
“मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई.”

“पत्नी होने के नाते एक पति की तरफ तुम्हारे क्या कर्तव्य हैं, ये तो अवश्य जानती होगी? उसे संतान भी दे सकती हो जिसे अपना पति मानती हो? नारी का ये कर्तव्य तो अच्छी तरह जानती होगी.”
“मैं आत्मा हूं, शरीर नहीं. मैं भावना हूं किसी समाज का विचार नहीं. मैं प्रेमी हूं, प्रेमिका हूं. केवल प्रेम नाम की जोगन, किसी संबंध की कड़ी नहीं, किसी परिवार की खूंटी से बंधी सांकल नहीं हूं मैं.”

“जिंदा रहने के लिए जो आहार अपने पति से लेती हो, उनकी तरफ तुम्हारा कोई फ़र्ज़ नहीं. ये वस्त्र जो पहनती हो..”
“वस्त्र शरीर के लिए है महाराज, शरीर वस्त्र के लिए नहीं. जैसे लिबास शरीर से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता. वैसे शरीर आत्मा से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता.”

“जो परिवार तुम्हे जिंदा रखता है और जिस समाज में तुम रहती हो, क्या उसके नियम तुम्हारे लिए कोई महत्व नहीं रखते.”
“आज, इसी पल, मैं अपना परिवार, और आपके समाज दोनों का परित्याग करती हूं.”

“हमें अफसोस है मीरा कि तुम्हारे विचार के लिए हमें ही नियुक्त किया गया है. तुम्हारे कुलगुरु होने की हैसियत से..”
“मेरे ज्ञान गुरु संत रैदास हैं, आप नहीं.”

“एक नीच जाति के आदमी से और ज्ञान मिल भी क्या सकता था तुम्हे? जिस त्याग की बात करती हो तुम उसमें समाज के नियम से फरार और छुटकारे का छल नजर आता है. जिसे प्रेम कहती हो उसमें वासना की गंध आती है. वरना कई दिन तक पराए पुरुषों के साथ तुम घर से बाहर न रहती. तुमने राजघराने की मान और मर्यादा को भ्रष्ट किया है. प्रजा के धर्म में विष घोला है. राणा बिना कोई विचार किए तुम्हे मृत्युदंड दे सकते थे लेकिन ये हमारी विशालता है कि हम तुम्हे सफाई का अवसर दे रहे हैं क्योंकि हमारा धर्म आज भी क्षमा और पश्चाताप को दंड से ऊंचा स्थान देता है.”
“क्रोध, बुद्धि विनाश करता है महाराज. क्रोध न करिए. आप अपना धर्म देखिए, मैं अपना कर्म कर रही हूं. मृत्यु से मुझे भय नहीं. जिस शरीर से सीमित हूं, उसकी मृत्यु हो जाए तो मैं असीम हो जाऊंगी, अनंत में समा जाऊंगी. आप परिणाम की इच्छा से बंधे हैं और मैं इच्छा का परिणाम जानती हूं. मेरे कर्म में..”

“गीता मत सिखाओ हमें. यहां न कृष्ण है, न अर्जुन, न कुरुक्षेत्र. तुम क्या दूसरी गीता की रचना कर रही हो?”
“उसकी गीता भी एक ही थी और गीता का वो भी एक ही था. मेरा कृष्ण.”

“तुम्हारा कृष्ण! तुम्हारी बपौती नहीं है वो”

दूसरे दिन धर्म अदालत में राणा भोजराज स्वास्थ्य ठीक न होने पर उपस्थित नहीं होते, सुनने पर मीरा पूछती है..

“क्या हुआ राणा को?”

“तुम्हे क्या सचमुच भोजराज की चिंता है बहू..”
“चार दिन पास रह लो तो पड़ोस की चिंता हो जाती है महाराज, अपने राणा की चिंता नहीं होगी मुझे, जिनकी शरण में इतनी दिन जी हूं.”

“अपने परिवार में और किसकी चिंता है तुम्हे?”
“मुझे तो आपकी भी चिंता है महाराज, जिन्हें बहुत क्लेश दिया है मैंने.”

“जिन्हें त्याग रही हो उनकी चिंता भी करती हो तुम?”
“चिंता अपने प्रेम की है महाराज, परिवार की नहीं. संसार घटता घट जाए, मेरी प्रीत नहीं घटती.”

“तुम दीवानी हो गई हो मीरा और दीवानों को हमारा कानून दंड नहीं देता, उनका इलाज करता है.”
“प्रेम क्या रोग है, जिसका इलाज करेंगे आप.”

“मीरा तुम पर देशद्रोही होने का आरोप है. तुमने देश के प्रमुख शत्रु सुल्तान अक़बर से उपहार स्वीकार किए.”
“मेरा कोई शत्रु नहीं.”

“तुम्हारे देश का शत्रु क्या तुम्हारा शत्रु नहीं.”
“आप अपना देश बस वहीं तक मानते हैं जहां तक आपका राजपाट चलता है. आपका देश कभी घट जाता है, कभी बढ़ जाता है. मैं आपकी सीमा को अपने देश की सीमा नहीं मानती.”

“तुम अक़बर को भी अपने देश का शत्रु नहीं मानती? जो तुम्हारे भाई की मृत्यु का कारण बना और जिसने तुम्हारे पति को असंख्य घाव दिए.”
“देश-प्रबंध और राजनीति राणा का क्षेत्र है, मेरा नहीं.”

“न्याय आसन पर बैठकर न्याय करना हमारा क्षेत्र है. जो भी देश हित और धर्म नीति के विरुद्ध व्यवहार करेगा, उसे दंड देना हमारा कर्तव्य है.”
“मैं आपको आपके कर्तव्य से नहीं रोकूंगी.”

मीरा.

“अपने अपराध का दंड जानती हो?”

“मेरा दंड क्या होगा ये आप भी जानते हैं, मैं भी जानती हूं. मैं आपको अपनी हत्या के पाप से मुक्त करती हूं.”

..

फ़िल्म के गीत यहां देखे-सुनें:

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