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साहिर लुधियानवी के बारे में क्या लिखा है गुलज़ार ने

गुलज़ारवे संभवत: हमारे समय के सबसे कीमती व्यक्तित्व हैं. गुलज़ार को सुनना हमेशा दुनिया के सबसे जटिल अनुभवों अौर बातों को सरल रेखा की सीधी सच्चाई में समझना होता है. मैंने उन्हें अपने चाहने वालों के बीच देखा है, जहां उनकी उमर भले सबसे ज़्यादा हो, ‘नए’ के प्रति सबसे आग्रही हमेशा खुद गुलज़ार ही होते हैं. अौर यही ‘नए’ को खुली बाहों से अपनाने का आग्रह उन्हें हर नए दौर का प्रतिनिधि गीतकार बनाता है.

वे अपने गीतों में समय की निरंतर रास्ता बदलती पगडंडियों के निशान पकड़ते हैं. उनके शब्द कभी पुराने नहीं पड़ते.

लेकिन इस नएपन के आग्रही गीतकार, शायर गुलज़ार का एक अौर चेहरा भी है. क्या आपने कभी गुलज़ार को सिनेमा के शुरुआती दौर के गीतों अौर गीतकारों पर बात करते सुना है? या पचास के दशक के ‘गोल्डन एरा’ के संगीत का किस्सा सुनाते? मैंने सुना है. जब वो अपने प्रिय गीतकारों अौर शायरों पर बात करते हैं तो उनके चेहरे पर एक कमाल की चमक आ जाती है. जैसे कोई कवि अपने पहले प्यार का किस्सा सुना रहा हो. आज वे हमारी सिनेमा इंडस्ट्री का जीता-जागता किस्सों से भरा इंसाइक्लोपीडिया हैं. जितना उन्हें सुनें-गुनें, उतना कम.

गुलज़ार ने फिल्म फेयर मैगज़ीन को हिन्दी सिनेमा के ‘गोल्डन एरा’ के शायर साहिर लुधियानवी की शायरी अौर हिन्दी सिनेमा के गीत लेखन से जुड़ी कई मज़ेदार बातें बताई हैं. कुछ मज़ेदार किस्से अौर बातें आप भी पढ़ें.


1.

गुलज़ार हिन्दी सिनेमा में गीत लेखन की ज़रूरतों पर बात करते हुए बताते हैं कि यूं तो हर शायर को इस माध्यम की ज़रूरतों के अनुसार अपने गीतों को ढालना पड़ता है, लेकिन साहिर लुधियानवी अौर कुछ हद तक कवि प्रदीप वो कवि अौर शायर थे जिन्हें इस सिने माध्यम ने खुद उनकी अपनी शर्तों पर अपनाया. उनकी शायरी गीतों के दायरे में बंधकर भी बची रही. फिफ्टीज़ में देश में नया सिनेमा था अौर डीएन मधोक, केदार शर्मा जैसे गीतकार देसी-देहाती बोली को सिनेमा के गीतों में लेकर आ रहे थे. साहिर इसी क्रम में आए अौर मील का पत्थर बन गए. वे गीतों में उर्दू का स्वाद लेकर आए, अौर ‘पेड़ों की शाखों पे सोई सोई चांदनी’ जैसे ताज़ा बिम्ब लेकर आए.

2.

मज़रूह एक तरफ जहां गीत लेखन के माध्यम को समझकर गुफ्तगू की शैली में गाने लिख रहे थे, शैलेंद्र के पास गीतों में गूढ़ बातों को सबसे सहज तरीके से कह देने का चमत्कारी गुण था. साहिर यहीं सिनेमाई गीतों में एक परिपक्वता लेकर आए. वे विषय में पूरी तरह डूब जाते थे अौर किरदारों की परिस्थितियों को महसूस कर उन्हें अपने गीतों के भावों में ढालते थे. ‘प्यासा’ के गीत इसका सटीक उदाहरण हैं. जैसे पानी से भरा गहरा काला बादल हो, उनके सुलभ गीतों में गहरी अर्थवत्ता होती थी.

3.

गीत लेखक के पेशे में सम्मान साहिर ही लेकर आए. गुलज़ार बताते हैं कि ये साहिर ही थे जिन्होंने फिल्म में संगीतकार अौर गायक के नामों के साथ गीतकार का नाम भी लिखे जाने की लड़ाई लड़ी. इसी के चलते ‘विविध भारती’ भी गाना सुनाते हुए गीत लेखक का नाम लेने लगा. वे एक गीत लेखक के काम को संगीतकार से कहीं भी कमतर नहीं मानते थे, अौर इसे स्थापित करने को अपनी फिल्मों में संगीतकार को मिलनेवाली फीस से एक रुपया ज़्यादा डिमांड करते थे.

4.

साहिर चार बंगला इलाके में रहा करते थे. उस समय वो इलाका शहर से इतना दूर था कि वहां नियमित बसें भी नहीं आती थीं. साहिर उन शुरुआती गीतकारों में से थे जिनके पास अपनी कार थी – मौरिस कार. साहिर लुधियानवी बंगले की दूसरी मंज़िल पर रहा करते थे अौर पटकथा लेखक किशन चंद्र पहली मंज़िल पर. युवा गुलज़ार उन दिनों उसी बंगले के आउटहाउस में अपने दोस्तों के साथ बीस रुपये किराए पर रहा करते थे. गुलजार लिखते हैं कि हम तो साहिर साहब की संगत में रहकर ही अभिभूत थे.

5.

जब भी गुलज़ार अपनी लिखी शायरी साहिर को दिखाते, कद के लम्बे साहिर गुलज़ार के कांधे पर हाथ रखकर बोलते कि ‘अगर मैं अपनी उम्र अौर तजुर्बे के आधार पर तुम्हारी शायरी को परखूंगा तो ये नाइंसाफी होगी.’ लेकिन फिर वो साथ में ये भी जोड़ते कि ‘तलफ़्फ़ुज़ सही रखना. तलफ़्फ़ुज़ से ही पंजाबियों के वज़न बिगड़ जाते हैं.’ यूं साहिर लुधियाना से थे अौर पंजाबी में बात करते थे, लेकिन जब उर्दू बोलते तो एकदम खालिस.


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