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गुजरात, जहां एक रानी ने एक हिंदू राजा के चलते जौहर किया

सबसे पहले तो हेडिंग के लिए माफी. मगर कई बार मौजूदा डिसकोर्स हमारे जेहन पर इस कदर हावी होते हैं कि कहीं और से संदर्भ सूझता नहीं. गुजरात चुनाव यात्रा के दौरान हम रणकदेवी के मंदिर पहुंचे. ये सुरेंद्र नगर के वधवान कस्बे में है. बताया गया कि हेरिटेज साइट है. मगर बोर्ड भी किसी हेरिटेज का हिस्सा बनाए जाने के लिए यहां से उखाड़ दिया गया. यहां तक पहुंचने का रास्ता बस्ती से होकर गुजरता है. आबादी जो परकोटे के भीतर बस गई. वहीं राह में गाय बंधी हैं. वहीं कुछ नए मंदिर बन गए हैं. उनका खूब रखरखाव है. उनकी निजी मिल्कियत है. वहां चमकते संगमरमर और मार्बल हैं.

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रणकदेवी का मंदिर, जो हेरिटेज साइट घोषित है.

और जो असल मंदिर है. या कहें कि प्राचीन है. उसका दरवाजा भी प्राचीनता की हद छूता है. चरमराता है और खुलता है. मंदिर परिसर में प्लास्टिक बिखरी है. क्रिकेट का मैदान भी बन जाता है यह अकसर. खास मौकों पर आसपास के लोग पूजा करने आते हैं. टूरिस्ट कभी भूले भटके ही आ जाएं. गुजरात टूरिज्म की नजर यहां नहीं गई अभी तक. मंदिर का मुख्य गुंबद जर्जर हालत में है. पुजारी और भी कई काम करते हैं. करें भी क्यों न. जब मंदिर में कोई आता ही नहीं तो किसके लिए बैठें. देवताओं का बैठ काम चल जाता है, मनुजों को तो भूख लगती है. इसी भूख में मनुज खोदते हैं. बोते हैं. कभी फसल तो कभी किस्से. फिलहाल तो आप रणकदेवी से जुड़े किस्से सुनें. इनका ऐतिहासिक साक्ष्य क्या है. ये इतिहासकार जानें. हम लोगों को जानते हैं और उनका कहा आप तक बांचते हैं.

कहानी है क्या

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2016 में रानी रणका देवी और रा खिंगार नाम की फिल्म आई थी. उसी फिल्म का एक दृश्य.

जूनागढ़ के एक गांव में हदमत नाम के कुम्हार की बेटी रणक देवी. उसके सौदर्य की चर्चा दूर-दूर तक पहुंची. अपनी राजधानी पाटन में बैठे राजा जयसिम्हा सिद्धराजा तक भी. उसने विवाह का निश्चय किया. मगर उससे पहले ही जूनागढ़ के राजा रा खेंगार ने विवाह कर लिया.
अवांतर प्रसंग- किंवदंती ये भी है कि रणक कुम्हार की नहीं कच्छ के राजा की बेटी थी. वह पैदा हुई. फिर पंडित बुलाए गए. उन्होंने ग्रह बिचारे. और ऐलान किया. ये जहां रहेगी, दुर्भाग्य लाएगी. राजा ने उसे जंगल में त्याग दिया. वहीं कुम्हार को मिली, जो मिट्टी खोदने गया था. यहां सीता सा साम्य दिखता है. वह भी घड़े में मिली थीं.

खैर, रणकदेवी और रा खेंगार का विवाह हो गया. मगर दोनों एक महल में न रहते. राजा रहता जूनागढ़ के अपरकोट के किले में. और रानी रहतीं गिरनार के किले में. दोनों के बीच सुरंग. ऐसा विश्वास. रानी के किले में कौन जाता. राजा जाते. पहरेदार और दास दासियां तो होते ही. इसके अलावा दो पुरुषों को और जाने की इजाजत थी. इनके नाम थे विशाल और देशल. ये भतीजे थे रानी के.

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राजा रा खेंगार इसी जूनागढ़ के किले में रहता था.

एक रोज राजा पहुंचा. उसने एक भतीजे को शराब के नशे में धुत्त पाया. क्रोधित हो दोनों को देस निकाला दे दिया. जी देस ही, देश नहीं. और तब का देस हुआ जूनागढ़, जिसकी चौहद्दी खत्म होते ही पाटन का चालुक्य साम्राज्य शुरू होता था. दोनों राजा जयसिम्हा के पास पहुंचे. जयसिम्हा रा खेंगार से वैसे ही रंजिश मानता था. जब वह कहीं और चढ़ाई करने गया था, पीछे से खेंगार ने उसके कुछ हिस्से कब्जा लिए थे.
तो विशाल और देशल की मदद से जयसिम्हा ने जूनागढ़ पर चढ़ाई कर दी. राजा रा खेंगार सैनिकों संग मारे गए. उसके पास जयसिम्हा गिर वाले किले में पहुंचे. किलेदारों ने विशाल और देशल के आवाज लगाने पर दरवाजा खोल दिया. मगर फिर वहां मारकाट मच गई. क्योंकि इन दोनों के पीछे जयसिम्हा की फौज थी. उन्होंने रानी रणकदेवी के दोनों बेटों को मार दिया. रानी को बंदी बना लिया गया.

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भोगव नदी, जिसमें अब गंदा पानी बहता है.

पूरा लश्कर पाटन की तरफ चलने लगा. रास्ते में पड़ा ये वधवान इलाका. भोगव नदी के किनारे. यहीं पर रानी रणकदेवी के सामने जयसिम्हा ने विवाह का प्रस्ताव रखा. कहा, तुम्हें पटरानी बनाकर रखूंगा. रणकदेवी को यह स्वीकार नहीं था. मगर उन्होंने कुछ युक्ति से काम लिया. उनके पति का अभी तक दाहसंस्कार नहीं हुआ था. सबसे पहले उसका इंतजाम किया गया.

वीडियो में देखें रानी के जौहर की पूरी कहानी

यहां कथा प्रवाह में तर्क पीछे छूट रहा है. राजा ने वीरगति पाई जूनागढ़ की लड़ाई में. तो फिर अभी तक दाह संस्कार क्यों नहीं. नहीं पता. पता है तीन और सोते, जो यहां से फूटते हैं.

पहला. एक सुरंग थी. जो यहां वधवान में बरगद के पेड़ की जड़ों के बीच से शुरू होती थी. जूनागढ़ तक जाती थी. वहां से राजा का शव लाया गया. साथ में कुछ भरोसेमंद अनुचर. और दासियां. रानी ने राजा के शव के साथ ही अग्नि में प्रवेश कर लिया. यानी सती हो गईं.
दूसरा. रानी ने जयसिम्हा का प्रस्ताव सुनने के बाद इहलीला समाप्त करने की ठानी. उन्होंने अपनी दासियों समेत इसी जगह पर जौहर कर लिया. स्थानीय लोगों ने उनके मंदिर बना दिए. सब दासियों के एक साथ. उसमें कई और भगवान भी. और उससे कुछ हटकर एक बड़ा मंदिर रणकदेवी का.
तीसरा. रानी न सती हुईं न जौहर किया. वह फिर से सीता हो गईं. उन्होंने धरती का आह्वान किया. धरती फटी और वह समा गईं. अभी कुछ बरस पहले तक धरती की दरार में उनकी चुनरी नजर आती थी. सैकड़ों बरस बीतने के बाद भी. आफ्टर इफेक्ट.

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रानी के जौहर करने के बाद स्थानीय लोगों ने वहां पर कई मंदिर बना दिए.

1- रानी का श्राप. वधवान के लोगों ने मेरी मदद नहीं की. इसलिए इनको संचित करने वाली भोगव नदी सूख जाएगी.
यह नदी ज्यादातर महीने सूखी रहती है. बारिश में बढ़ती है तो इतनी कि वधवान की गढ़ी के परकोटे पर टक्कर मारती है.
2- रानी का आशीर्वाद. वधवान के लोगों ने जौहर में मेरी मदद की. इसलिए हमेशा यह आबाद रहे.
परकोटे की दीवारों पर रानी के साथ के वीरों की तस्वीरें. जिन्हें स्थानीय लोग पूजते हैं मांगलिक कार्यों के दौरान.
3- एक मूंछों वाला सांप का जोड़ा जो परकोटे में विचरता रहता है. जिसे यह दिखेगा, वह लकी हो जाएगा.

हमें कुछ बच्चे दिखे. अलमस्त. बरगद की मूंछदार डार से चींटे झाड़ झूलते. मोजिला मामा की कहानी सुनाते. मोजिला मामा भी एक ग्राम्य देवता. उनका भी यहीं वास. और उन्हें प्रसन्न करने के लिए शराब चढ़ाते हैं. आप कहेंगे कि शराब कैसे. वह तो बंद है गुजरात में. हम कहेंगे. ये कहानी है. बहुत सारी सच्चाइयों से बनी. आप समझ लें कि झूठ कौन बोलता है.


वीडियो में देखें कैसी होती है गुजराती थाली

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